Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 30-07-2026 | Pune Chaturmas

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पूरन मन पूरन सब दीसे

प्रभु के प्रेम से हृदय जब भर जाता है, तब क्या होता है? पूरन मन पूरन सब दीसे। जब मन पूर्ण हो जाए, तो पूरी दुनिया, पूरी दुनिया के लोग पूर्ण लगते हैं; अपूर्णता कहीं पर लगती ही नहीं।

जब मन पूर्ण हो गया, तब फिर परिस्थितियाँ कैसी भी हो, परिस्थितियों के साथ हमें कोई संबंध नहीं रहता; हमारी मनःस्थिति आनंदमय ही रहती है। कोई भी घटना प्रतिकूल रूप से घटित हो जाए, स्वीकार के सिवा दूसरा आप कर भी क्या सकते हो? घटना घटित हो गई, उसके बाद आप कितने ही विचार कर लो, क्या होगा उन विचारों से?

पूर्ण मन हुआ, फिर किसी को प्रभावित करने की इच्छा भी होती नहीं है। आप बस अपने में ही मस्त रहते हैं। मीरां ने कहा है : कोई निंदे, कोई बंदे, मैं अपनी चाल चलूँगी। किसी का recognition नहीं चाहिए। certificate सिर्फ प्रभु का और सद्गुरु का ही चाहिए; society का नहीं।


प्रभु के प्रेम से जब हृदय भर जाता है, तब क्या होता है? महोपाध्याय यशोविजयजी महाराजा ने अपनी अनुभूति को शब्दों में अभिव्यक्त किया— “पूरन मन पूरन सब दीसे।” मन पूर्ण हो गया, और जब मन पूर्ण हो गया तो पूरी दुनिया, पूरी दुनिया के लोग पूर्ण ही लगते थे। अपूर्णता कहीं भी लगती नहीं।

देवचंद्रजी महाराज साहब बड़े ज्ञानी गुरु-भगवंत हो गए। एक दिन महाविदेह में सीमंधर प्रभु को सौधर्मेंद्र ने पूछा कि, “प्रभु! भरत क्षेत्र में श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुष कौन हैं?” तब प्रभु ने कहा— “अभी देवचंद्रजी श्रेष्ठ ज्ञानी और भक्त पुरुष हैं।” उनकी स्तवना में साधना और भक्ति का कॉम्बिनेशन (Combination) है। भक्ति की बात करते-करते वे साधना की गहराई में उतर जाते हैं। साधना की ऊंडी बात करते-करते वे भक्ति की धारा में उतर जाते हैं। तो साधना और भक्ति का बहुत सुंदर कॉम्बिनेशन उनकी एक-एक स्तवना में है।

तो प्रभु ने कहा कि, “देवचंद्रजी ज्ञानी और भक्त पुरुष हैं।” सौधर्मेंद्र को हुआ कि, ‘ऐसे महापुरुष के दर्शन के लिए मैं जाऊँ।’ सौधर्मेंद्र वहाँ आए, उस नगर में, जहाँ देवचंद्रजी भगवंत विराजमान थे। सुबह का समय, भगवंत का प्रवचन चल रहा था और सौधर्मेंद्र सभा में आ गए, लेकिन ब्राह्मण का रूप धरके आए। पीछे बैठ गए। किसी को मालूम भी ना हुआ कि कोई आया है। आपको भी मालूम नहीं होता है ना? कोई यहाँ से आता है, कोई यहाँ से आता है, आपको मालूम होता है? क्योंकि आपकी दृष्टि तो कहा फोकस (Focus) होती है? प्रवचनकार महात्मा की ओर, दूसरा तो कुछ आप देखोगे भी नहीं। तो किसी को मालूम नहीं पड़ा कि कोई पीछे आकर बैठ गया है।

लेकिन देवचंद्रजी महाराज को अपने श्रुतबल से ख्याल आ गया कि सौधर्मेंद्र आए हुए हैं। लेकिन जैसे प्रवचन दे रहे थे, इसी ही ढंग से उन्होंने प्रवचन चालू रखा। ऐसी कोई बात मन में भी ना आई कि ‘सौधर्मेंद्र आए हुए हैं तो उन्हें प्रभावित करने के लिए कोई नई बात करूँ।’ किसी को प्रभावित करने की इच्छा ही नहीं है, क्योंकि कुछ भी चाहिए ही नहीं। कोई प्रभावित हो तो भी क्या, कोई ना प्रभावित हो तो भी क्या! साहेब को तो कुछ चाहिए नहीं था।

आनंदघनजी के पास राजा की रानी आई। बेटा नहीं होता था, थोड़ी दुखी थी। किसी ने कहा कि ‘बड़ा योगी पुरुष है, उनके आशीर्वाद से बेटा हो जाएगा।’ रानी आई आनंदघनजी के पास— “गुरुदेव, बेटा नहीं होता है, मुझे बेटा चाहिए।” अब आनंदघनजी प्रभु की दुनिया में विहर रहे हैं और ये बात कर रही है बेटे की! आनंदघनजी ने कहा कि, “हमारा कोई काम नहीं है, तू जा।” लेकिन वो जाने वाली नहीं थी। किसी ने कहा था कि ‘बड़े योगी पुरुष हैं और उनका आशीर्वाद मिल गया तो बेटा हो ही जाएगा।’ आनंदघनजी ने बहुत ही कहा— “तू यहाँ से जा, मेरी साधना में मुझे जाने दे।” लेकिन वह खड़ी ही ना हो, बैठ गई कि, “जब तक तुम नहीं कहोगे कि बेटा होगा मुझे, तब तक मैं उठूँगी नहीं।” तब आनंदघनजी ने कुछ लिखकर कागज़ में, एक कागज दे दिया कि ‘गले के ताबीज़ में बाँध लेना।’ कागज़ को बांध लीया और बेटा हो भी गया। फिर बेटे को लेकर रानी आनंदघनजी के पास आई— “आपकी आशीष से बेटा हो गया।” आनंदघनजी ने कहा कि, “ताबीज़ खोल और मैंने जो कागज़ दिया था, वो कागज़ पढ़ तू।” उस कागज़ में आनंदघनजी ने लिखा था— “रानी को बेटा हो तो भी आनंदघन को क्या! ना हो तो भी आनंदघन को क्या!”

पूरन मन! जब मन पूर्ण हो गया, तब किसी को प्रभावित करने की इच्छा कभी भी होती नहीं है। बस अपने में ही वे मस्त रहते हैं। एक गीत आता है— ‘मेरी मस्ती मुझे कहाँ लेके आई, जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाहि!’ मैं ही अकेला रह जाता हूँ, दुनिया छूट जाती है। और आप ही बोलो, आप दुनिया में रहते हैं, घर में रहते हैं, श्राविका के साथ रहते हैं, कितना आनंद आपके पास है? और हम अकेले रहते हैं, हमारा आनंद कितना होता है! जब हमारे मन में प्रभु का प्रेम उतर आया और प्रभु के प्रेम से हृदय भर गया, हम आनंद में हि हैं, परम आनंद में! आनंद ही आनंद है। परिस्थितियां कैसी भी हो, परिस्थितियों के साथ भी हमें कोई संबंध नहीं है। हमारी मनःस्थिति आनंदमय होती है।

एक बात मैं आपसे पूछूँ— आप परिस्थिति को बदल सकते हो? बदल सकते हो? नहीं बदल सकते। अब एक-एक परिस्थिति विपरीत रूप से खुलेगी और आप नाराज़ हो जाएंगे, तो फिर आनंदमय कब होंगे? आप देखते हैं, एक दिन में कितनी घटनाएं प्रतिकूल रूप से घटित होती हैं। अब एक-एक घटना प्रतिकूल रूप से घटित हुई और आप नाराज़ हो गए, तो आप आनंदमय कब होगे? हमने क्या किया? परिस्थितियों के साथ हमारा कोई संबंध ही न रहा। आप परिस्थिति से प्रभावित हो, घटनाओं से प्रभावित हो। हम घटनाओं से प्रभावित नहीं होते। जैसी भी घटना खुले, हम देख रहे हैं।

एक बड़े दिग्गज हिंदू संत थे, बहुत ही निस्पृह, थोड़े ज्ञानी। एक गाँव के लोग संत के आश्रम में आए और विनंति की कि, “गुरुदेव, हमारे गाँव को पावन करो। एक सप्ताह के लिए आप पधारो। आप प्रभु की बातें हमसे करो। हम तो निपट अज्ञानी हैं। आपके ज्ञान से, आपके सत्संग से हमें कुछ-कुछ मिलेगा।” अब संत तो उदार होते ही हैं। संत ने कहा, “ज़रूर मैं आऊँगा।” दिवस निश्चित हो गया। इस दिन पर एक बड़े संत हमारे गाँव में पधारेंगे, लोगों के मन में उत्साह का कोई ओर-छोर नहीं था! ‘इतने बड़े संत हमारे गाँव में आएंगे और प्रभु की बातें करेंगे।’

लोग मिलते हैं तो क्या बात करते हैं? “कैसी तबियत है? स्वास्थ्य कैसा है?” लोग अपनी ही बात करते हैं। संत आते हैं, तो प्रभु की बातें करते हैं। आप यहाँ क्यों इकट्ठे होते हो? प्रभु की बातें सुनने के लिए, कि ‘प्रभु ने क्या कहा है?’ प्रभु ने ऐसी बातें कही हैं कि जीवन आनंद से भर जाए। और मैं तो कहूँगा कि मैं शब्दों को देने वाला आदमी नहीं हूँ, मैं मेरे आनंद को आपके साथ शेयर (Share) करना चाहता हूँ। जब से प्रभु मिले, प्रभु का प्रेम मिला, आनंद ही आनंद है। और मैं इच्छता हूँ कि इसी आनंद की बात करूँ, प्रभु के प्रेम की बात करूँ, और मेरा आनंद आपको दूँ। आप भी सब आनंद में रहो।

आज ही ऐसा करो, कोई भी घटना प्रतिकूल रूप से घटित हो जाए, स्वीकार कर लो। अब दूसरा आप कर भी क्या सकते हो? एक घटना घटित हो गई, कितने भी विचार आप करोगे, लेकिन क्या होगा विचारों से? आप गिर गए, गिर गए तो गिर गए। घटना घटित हो गई, हड्डी तूट गई तो तूट गई। ऑर्थोपेडिक सर्जन (Orthopedic Surgeon) के पास जाना ही पड़ेगा। तो आगे की सोचो अब क्या करना है। “लेकिन किसी ने पानी डाला था! तुमने पानी नहीं देखा!” यह बात तुम भी करोगे। “किसने पानी डाला था? मेरा पैर फिसल गया और मैं गिर गया।” तो गिर गए तुम, और अपराधी दूसरा! तो आज कोई भी घटना प्रतिकूल रूप से घटित हो, स्वीकार कर लो।

आज घर में भी प्रयोग करो। पत्नी कुछ भी कहे, प्रेम से सुन लो। हमारे वहाँ एक शब्द आता है— ‘गरमा-गरम’। इसका अर्थ क्या होता है? एक गरम तो दूसरा अगरम – ठंडा। पति गरम है तो पत्नी ठंडी होनी चाहिए, पत्नी गरम है तो पति ठंडे होने चाहिए। लेकिन दोनों गरम हो गए, तो?

कोलकत्ता में एक प्रोफेसर थे। यूनिवर्सिटी (University) में पढ़ाते थे। प्रोफेसर तो थे ही, समाज सेवक भी थे। १२ बजे कॉलेज छूट जाती, लेकिन कोई भी प्रोग्राम समाज सेवा का आ जाए तो वहाँ वे पहुँच जाते। घर लौटने के समय का कोई ठिकाना ही नहीं! कभी २ बजे आते, कभी ३ बजे आते। उस समय मोबाइल नहीं था, लैंड-लाइन (Landline) फोन था और वो भी प्रोफेसर के घर पर तो नहीं था, लेकिन पड़ोसी के घर में था। तो पत्नी ने एक दिन कहा पति से कि, “तुम लेट आने वाले हो तो कम से कम फोन से आप कह तो दो, जिससे मैं रसोई घर में बैठी तो ना रहूँ। तुम ३ बजे आने वाले हो तो मैं इस रूप से रसोई की तैयारी करूँ।”

लेकिन प्रोफेसर भूल ही जाते। एक दिन तो शाम ६ बजे प्रोफेसर आए। और पत्नी आगबबूला हो गई! अब पत्नी का भी दोष क्या था इसमें? उसने कहा कि, “तुम कह दो टेलीफोन से कि कब आने वाले हो, तुम कहोगे ही नहीं और मैं घर में बैठी रहूँ?” ६ बजे आए प्रोफेसर, पत्नी आगबबूला हो गई। इसमें आपका कोई दोष नहीं, दोष इनका है। इनका दोष कभी नहीं होता, क्योंकि ये आराधना में रहते हैं! मासक्षमण, कल सुबह विधि होगी। आप देखेंगे, भाई कितने है और बहेने कितनी है, आराधना में आगे… तो पत्नी गरम हो गई। उसने कहा कि, “चावल और ये दाल ठंडी है। खाना हो तो खाओ, नहीं तो भूखे सो जाओ। खाना हो तो खाओ, नहीं तो सो जाओ। तुम्हारा कोई ठिकाना ही नहीं। १२ बजे कॉलेज छूटती है, कभी २ बजे, कभी ३ बजे, आज ६ बजे शाम आते हो। मुझे कोई दूसरे काम होते हैं क्या? होते ही नहीं! रसोई घर में ही बैठी रहूँ तुम्हारे लिए!”

लेकिन पति बहुत ठंडा था। उसने दाल-भात की थाली हाथ में ली और पत्नी के सिर पर रख दी! पत्नी ने पूछा, “क्या कर रहे हो?” तो पति ने कहा, “तेरे सिर का बॉयलर (Boiler) गरम-गरम है, तो मेरी चावल और दाल गरम हो जाएगी!” पत्नी हँस पड़ी, मामला खत्म हो गया! तो आप भी ऐसा नहीं कर सकते? ऐसा हो तो ऐसा करो— सोमवार के दिन तुम्हे ठंडा होना, ये गरम हो जाए। मंगलवार के दिन ये ठंडी हो जाए, तुम गरम हो जाना। लेकिन दोनों को गरम साथ में नहीं होना।

तो लोगों के मन में उत्साह था कि इतने बड़े ज्ञानी संत हमारे नगर में पधार रहे हैं। बाजे-गाजे के साथ संत की स्वागत यात्रा निकली। लोग घर-घर से बाहर आते हैं और संत के गले में हार डालते हैं। पूरा गाँव संत का प्रशंसक! और ये तो हमारी संस्कृति है – संतों की सेवा, संतों की भक्ति हम करते ही आए हैं और करते ही रहेंगे। लेकिन एक आदमी गाँव में ऐसा था जिसको संत के साथ विरोध था। संत ने प्रेम से कुछ कहा था, लेकिन इसको बुरा लगा था तो ये संत का विरोधी हो गया था। तो उसने क्या किया? पूरी रात जगकर जूते का हार बनाया, जूते का हार! और संत जब उसके घर से पसार हुए, तब संत के गले में जूतों का हार डाल दिया। गाँव वाले शर्मिंदा हो गए! “अरे! इतने बड़े संत और हमारे गाँव का कोई आदमी जूतों का हार संत के गले में डाले!”

लेकिन संत की प्रसन्नता में कोई फर्क नहीं। तुम फूल का हार दो या जूतों का हार दो, संत को क्या फर्क पड़ता है? और यदि फर्क पड़ता है, तो वे संत नहीं हैं। संत के लिए सन्मान और अपमान दोनों एक-सरीखा (समान) हैं। कोई फर्क होता नहीं। तुम सन्मान करो, तुम्हारी ओर खुलती बात है, तुम अपमान करो, तुम्हारी ओर खुलती बात है। हम तो प्रभु की ओर देखते हैं। हमारी दृष्टि तो प्रभु की ओर है। तो संत प्रसन्न थे। स्वागत यात्रा पूरी हुई और प्रवचन सभा के रूप में परिवर्तित हो गई। संत ने प्रवचन शुरू किया और कहा कि, “आज तो बहुत बड़ा मज़ा आ गया। आज बहुत मज़ा आ गया! मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहाँ लोग फूलों के हार लेकर आते हैं, तब मुझे थोड़ी निराशा होती है कि सब फूलों के हार वाले, तो सब माली हो गए। अब माली के गाँव में फूल की इज़्ज़त क्या? सब माली ही माली हैं तो फूल की इज़्ज़त क्या? लेकिन आज एक चमार मिला, तो मुझे बहुत बड़ी प्रसन्नता हुई कि चलो गाँव में चमार भी है तो फूलों की इज़्ज़त होगी और मालियों की भी इज़्ज़त होगी।”

तो घटना तो घटना ही थी, लेकिन घटना को देखने का नज़रिया कैसा! जूतों का हार गले में डाला और संत प्रसन्न! तो घटना से अप्रभावित होना और सिर्फ प्रभु से प्रभावित होना, प्रभु के वचनो से प्रभावित होना— यही साधना है। ये साधना आपके पास आ जाए, आप कितने मज़ा में आ जाओ! फिर आपका चेहरा भी हमारे जैसा हो जाए। बाकी तो क्या होता है, ऐसे मूडलेस (Moodless) होकर बैठे हो। कोई पूछता है “क्या हुआ?” अरे क्या हुआ पूछते हो! “इसने क्या बोला साला अंट-संट! कितना बोला मेरे लिए!” “अरे बोला तो बोला, उसके गले से बोला, तुझे क्या तकलीफ?” मज़ा में रहो। किसी ने कहा तुम अच्छे नहीं हो, तो उसका अभिप्राय है। तुम प्रभु को सामने रखकर अच्छे कार्य करो। कोई प्रशंसा करे या ना करे, तो भी क्या?

मीरा ने कहा था— “कोई निंदे, कोई बंदे, मैं अपनी चाल चलूँगी।” कोई निंदा करे, कोई स्तुति करे, मेरी चाल में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मैं अपनी चाल चलूँगी। गुर्जियेफ  अभी-अभी हुए। बड़े योगी थे। एक दिन गुर्जियेफ को एक साधक ने कहा कि, “मिस्टर एक्स (Mr. X) आपकी बहुत निंदा करते हैं।” गुर्जियेफ हँसे— “अच्छा! मैंने तो नहीं सुनी है कि मिस्टर एक्स कैसे निंदा करते हैं। लेकिन मेरी निंदा सुननी हो ना, तो मिस्टर वाई (Mr. Y) के पास जाओ! इतनी लिज़्ज़त से बोलते हैं, तबियत खुश हो जाती है।”

गुर्जियेफ ने कहा— “एक दिन मैं कॉफी हाउस (Coffee House) में बैठा था। खंभे के पीछे अँधेरे में बैठा था और चिंतन करता था। उस समय मिस्टर वाई और उनके मित्र आए। एक मित्र ने पूछा मिस्टर वाई से कि गुर्जियेफ के बारे में आपका क्या अभिप्राय है? तब एक घंटे तक मिस्टर वाई ने मेरे लिए जो बोला, मेरी तबीयत खुश हो गई! इतनी लिज़्ज़त से बोले कि गुर्जियेफ जैसा दुष्ट आदमी इस संसार में नहीं है। संसार में दुष्ट आदमी तो होंगे, लेकिन गुर्जियेफ जैसा दुष्ट आदमी पूरे संसार में कहीं भी मिले नहीं! एक घंटे तक मेरी निंदा की। मैं इतना खुश हो गया कि वाह! क्या इसकी अभिव्यक्ति है! कैसी सुंदर स्पीच (Speech)! तुम खुश हो जाओगे, ‘कोई तुम्हारी निंदा करे? क्या स्पीच है इसकी! क्या सुंदर बोलता है!'” तो मीरा ने कहा— कोई निंदे, कोई बंदे, मैं अपनी चाल चलूँगी। निंदा के भी शब्द हैं और स्तुति के भी शब्द हैं, उस शब्द से क्या होगा?

भगवान बुद्ध के पास एक आदमी आया था। साधक था। उसकी इच्छा थी कि भगवान बुद्ध के कर-कमल से उसे दीक्षा मिले। तो उसने भगवान बुद्ध के चरणों में विज्ञप्ति पेश की— “प्रभु! मुझे आपका शिष्य बना दो ना!” लेकिन बुद्ध फेस रीडिंग (Face reading) के मास्टर थे। बुद्ध ने देखा कि इसका वैराग्य इतना प्रबल नहीं है, ये अहंकारी चेतना भी है। कोई इसकी स्तुति करता है, तो ये आनंद में आ जाता है। कोई निंदा करता है, तो ये दुःख में पड़ जाता है। ऐसे आदमी को दीक्षा नहीं दी जाती। लेकिन उस साधक की अदम्य इच्छा थी, झंखना! तड़पन!— “गुरुदेव मुझे दीक्षा दो।” तब बुद्ध ने कहा, “एक काम करो, एक काम करो, फिर बाद में मैं सोचूँगा।” “फरमाइए साहब, क्या काम है?” तो बुद्ध ने कहा कि, “पास में ही क़ब्रिस्तान है। क़ब्रिस्तान में जाना और एक-एक क़ब्र के पास खड़े रहकर, क़ब्र में सोए हुए आदमी की स्तुति करना कि ‘तुम बड़े परोपकारी थे।’ भले तुम नहीं जानते हो, तुमने उसका नाम भी नहीं जानना है, लेकिन तुम्हें यह काम करना है। क्योंकि सभी आदमी में गुण तो होते ही हैं। हम गुण को देख नहीं सकते, हमारे पास दोष दृष्टि है, गुण दृष्टि नहीं। दूसरों के दोष तुरंत दिख जाते हैं, लेकिन गुण को हम नहीं देख सकते।”

तो बुद्ध ने कहा— “एक-एक क़ब्र के पास एक-एक मिनट खड़ा रहने का और कहने का— तुम बड़े परोपकारी थे। तुम सज्जन थे। तुम सज्जनों के भी शिरोमणि थे। फिर दूसरी क़ब्र पर जाना, वहाँ भी ऐसा ही कहना। तीसरी क़ब्र पर जाना… पूरे क़ब्रिस्तान में जितनी क़ब्र हैं, उस क़ब्र के पास जाना और सबकी स्तुति करना।” उसने कहा, “तहत्ति गुरुदेव!”। गया क़ब्रिस्तान में, सबकी स्तुति कर दी और शाम को लौटा। सुबह गया था, शाम को लौटा बुद्ध के पास— “प्रभु, आपने कहा था, वैसा किया।” बुद्ध ने कहा, “अच्छा, कल मिलना, कल बात करेंगे आगे।”

दूसरे दिन सुबह आ गया— “गुरुदेव, फरमाइए क्या काम है?” “उसी क़ब्रिस्तान में अभी जाने का है और एक-एक क़ब्र के पास खड़े रहकर गालियां देने की! ‘तुम्हारे जैसा नीच आदमी कोई नहीं। तुम दुर्जन थे, दुर्जनों के शिरोमणि थे!’ सब क़ब्र के पास गालियां देकर के आ।” दूसरे दिन सुबह से शाम तक ये प्रोग्राम चला। शाम को भगवान के पास आया— “प्रभु! आपका किया हुआ काम मैंने पूरा कर दिया।” अब बुद्ध पूछते हैं कि, “कल तो तुमने स्तुति की थी सबकी, आज सबको गालियां दीं, निंदा की। तो क़ब्र में जो सोए हुए हैं, उनकी फीलिंग्स (Feelings) क्या थीं? क़ब्र में जो सोए हुए हैं, उनकी फीलिंग्स क्या थीं?”

उसने कहा, “गुरुदेव! ये तो डेड बॉडीज़ (Dead bodies) थे, मरे हुए आदमी थे! और जो मरा हुआ आदमी होता है, उसकी फीलिंग्स कैसे होती हैं? जीवंत आदमी में फीलिंग्स होती हैं, संवेदना होती है। मृत आत्मा में संवेदना कैसी? फीलिंग्स कैसी? ना स्तुति का कोई असर होगा, ना निंदा का कोई असर होगा। ये तो आपने कहा तो मैंने कर दिया, बाकी मैं भी समझता था कि क़ब्र में सोया हुआ आदमी, उसकी स्तुति करो या निंदा करो, उसे क्या फर्क पड़ता है?” तो बुद्ध ने कहा, “तुम भी ऐसा बन जाओ, फिर दीक्षा दे दूँगा।” ऐसे भी, संन्यासी संसार के लिए डेड (Dead) व्यक्ति होता है, मृत व्यक्ति! “तो तुम भी ऐसे हो जाओ, क़ब्र में सोए हुए आदमी जैसे। फिर मैं दीक्षा दूँगा। ऐसे-ऐसे दीक्षा नहीं दूँगा।”

तो घटनाओं का संसार हमसे छूट गया। छूट गया तो मज़ा में आ गए हम! कोई घटना का असर तो नहीं होता? होता है? किसी ने कुछ कहा, हमने क्या? जिसको बुरे या अच्छे वचनों का असर नहीं होता, वे ही प्रभु के साधु हैं, वे ही प्रभु की साध्वी हैं। असर कैसे होगा? दो निमित्त होते हैं – एक बड़ा निमित्त, एक छोटा निमित्त। छोटा निमित्त कैसा? “इसका काम ठीक नहीं है” ऐसा। लेकिन दुसरेने तो कह दिया— “इसको काम सौंपा? उसके काम में कभी कुछ ठिकाना होता है? ये तो निकम्मा आदमी है। उसको कोई भी काम नहीं सौंपना है। ये तो आलसू आदमी है। ये तो हराम हड्डी का आदमी है!” अब दो निमित्त हुए। एकने इतना ही कहा, ‘इसको काम नहीं सौंपने का’ और दूसरे ने धज्जियां ही निकाल दीं! तुम्हारी धज्जियां उड़ाइ।

अब असर होगा तो दूसरे निमित्त का होगा ना? दूसरे निमित्त का होगा! तो सिद्धांत ये है कि दो निमित्त हैं, तो उसमें जो बड़ा निमित्त है, उसका असर ज़्यादा होगा। ठीक है? बराबर? अब दो निमित्त आपके पास हैं। एक सामान्य व्यक्ति के शब्द, एक प्रभु के शब्द। अब सामान्य निमित्त कौन? सामान्य व्यक्ति के शब्द। और श्रेष्ठ निमित्त कौन? बड़ा निमित्त, प्रभु के वचन! अब आप पर असर बड़े निमित्त की होगी? बड़े निमित्त का असर होगा। सामान्य व्यक्ति ने कहा, “इसका तो नाम छोड़ो! क्या आदमी है? कुछ ठिकाने वाला आदमी ही नहीं है!” और तब प्रभु के शब्द आते हैं— “उवसमेण हणे कोहं” जब मन में क्रोध उत्पन्न हो जाए तब शांति को ला देना। “उवसमेण हणे कोहं” तो अब असर किसका होगा? मैं पूछता हूँ, असर किसका होगा?

एक दिन प्रवचन में कैसा हुआ। एक अंकल पीछे से प्रवचन सभा में आए। थोड़ा कम दिखता था और पैरों की तकलीफ थी तो बिना कुर्सी नहीं बैठ सकते थे। तो कुर्सी लेकर आगे आ गए। मेरे सामने बैठ गए। अब मेरे सामने बैठ गए तो पीछे वालों को प्रवचनकार का मुख दिखता नहीं था। एक घंटा मेरा प्रवचन चला। प्रवचन के बाद जब लोग नीचे उतरने लगे, तब सबने अंकल से कहा, “अंकल, कुर्सी पर बैठना हो तो दीवार के पास बैठना चाहिए। ऐसे महाराज साहब के सामने कुर्सी लेकर तुम बैठ गए थे, हमको महाराज साहब का मुख भी नहीं दिखता था। तो प्रवचन में हमें मज़ा भी नहीं आया आज।”

अब उस अंकल को मेरा एक घंटे का प्रवचन याद रहेगा या एक मिनट वाला वो प्रवचन याद रहेगा? समझो कि आप ही थे। तो कौन सा प्रवचन आपको याद रहेगा? घर जाकर वो झोंजलाये, “उस साले ने ऐसा कहा, उसने ऐसा कहा कि महाराज साहब के सामने क्यों बैठ गया? अरे मुझे तो कम दिखता था तो मुझे कोई कहेगा ही नहीं।” लेकिन इतनी छोटी सी भूल और इतना मुझे कहा गया, सब लोगों ने कहा ऐसा क्यों किया, ऐसा क्यों किया, ऐसा क्यों किया? ‘क्या मैं निकम्मा आदमी हूँ?’ अब कोई पूछेगा कि, “अंकल आप प्रवचन में गए थे, तो महाराज साहब ने प्रवचन में क्या कहा था?” “वो कुछ याद नहीं है!” लोगों का प्रवचन याद है!

क्यों? रस कहा था? आपको प्रवचन के शब्द याद ना रहें, रहे, कोई दिक्कत नहीं। मेरी सभा में आराम से बैठना। मैं आराम से बातें करता हूँ। बिल्कुल सरलता से आप समझ सको, इस रूप से मुझे शास्त्रों की बात करनी है। मेरे घर की बात नहीं करनी, बात प्रभु की ही करनी है। लेकिन आप सब समझ सको, इस रूप से करनी है। तो ऐसा क्यों होता है? आज मैंने एक बात कही कि घटनाओं से प्रभावित नहीं होना और तब आपका मन पूर्ण हो जाएगा। आप तो पूछते भी नहीं, “महाराज साहब आपका मन पूर्ण कैसे है?” हम पुणे में हैं, मज़ा में हैं, ऐसा नहीं। छोटे गाँव में जाएंगे, वहाँ भी आनंद में होंगे। कहीं भी हम होंगे, क्योंकि हमारा आनंद भीतर से आता है, प्रभु से आता है। यहाँ से नहीं आता, यहाँ से आता है! और मेरी कोशिश यही है कि तुम्हारा भी आनंद भीतर से झरना चालू हो जाए। भीतर से आनंद झरे!

फिर तुम स्वतंत्र हो जाओगे। अभी तो आप परतंत्र हैं। एक पाँच मिनट की स्पीच दी आपने। कोई कहेगा, “बहुत अच्छा बोला”, आनंद हो जाएगा। दूसरा कहेगा, “हाँ, बहुत अच्छा बोला, मज़ा आया।” लेकिन तीसरा क्लोज फ्रेंड (Close Friend) आपका, वो कहेगा, “अरे क्या बोला था आज तू? कुछ समझ में ही नहीं आता था। ना सिर, ना पैर, क्या अंट-संट तू बोलता था! क्या कुछ ठिकाना नहीं था मगज़ का? ऐसा कैसे तू बोल गया?” अब क्या होगा? किसी ने कहा ‘अच्छा बोला’, तुम राजा पाट में आ जाओगे! किसी ने कहा ‘ठीक नहीं बोला’, तुम डाउन (Down)।

हमारे लिए ऐसी बात नहीं। हम तो बैठे हैं यहाँ प्रभु की बातें करने। अच्छी हुई, नहीं हुई, प्रभु जानें! हमे रिकग्निशन (Recognition), सर्टिफिकेट (Certificate) प्रभु का और सद्गुरु का ही चाहिए। आपको सोसाइटी (Society) का सर्टिफिकेट चाहिए। बस फर्क इतना है। हमें सोसाइटी का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। कोई कहेगा, “महाराज साहब के वस्त्र तो अच्छे नहीं लगते हैं। ज़रा ऐसे पहनो।” हम कहेंगे कि, “हमारे प्रभु ने कहा है, ऐसा ही यूनिफॉर्म (Uniform) हम पहनेंगे। इसमें कोई बदलाहट नहीं होगी।” आपके हालात क्या होते हैं मालूम है? टेलर (Tailor) के पास गए, सूट सिलवाना था। उसने कहा, “दो सप्ताह के बाद आना।” दो सप्ताह बाद गए, कोई ठिकाना ही नहीं! “अरे थोड़े दिन के बाद आओ ना, तैयार हो जाएगा।” थोड़े दिन बाद गए, कुछ ठिकाना ही नहीं! यूँ करते-करते छह महीने के बाद सूट मिला। सूट पहना और बाज़ार में निकले। पहले तो दर्पण में देखा, ‘कैसा लगता हूँ? अच्छा लगता हूँ।’ बाज़ार में गए। एक मित्र मिला, “अरे ये क्या पहना है? ये बाबा आदम के ज़माने की कोई चीज़ पहनी! एक बोरिया-बिस्तर जैसा लगता है।” ठीक है, तो भी नहीं सुना। दूसरा मित्र मिला— “अरे क्या पहना है ये?” तीसरा मिला— “क्या पहना है ये?” तुम सीधे घर पहुँच जाओगे, सूट को फेंक दोगे! तुम दूसरों के सर्टिफिकेट पर जीते हो।

अब ऐसा करो, प्रभु का और गुरु का ही सर्टिफिकेट चाहो। गुरुदेव को पूछ लेना— Am I right sir? आप आते हैं ना वंदन करने के लिए, तो पूछते हैं, “सुख संयम यात्रा निर्वहो छो जी?” अरे हमारी संयम यात्रा तो प्रभु की कृपा से बहुत अच्छी चल रही है। लेकिन तुम्हें पूछना है गुरुदेव से— Am I right sir? गुरुदेव मेरी साधना कैसी चलती है?’ और गुरुदेव कहें कि ‘तेरी साधना अच्छी चलती है’, तुम आनंद में आ जाओगे।

तो आज दो बातें मैंने कहीं। एक तो घटना से प्रभावित नहीं होना। घर से ही चालू कर देंगे! श्राविकाओं को कह दूँ, परीक्षा कर ले। पहले तो देव उतरते थे, आज लोग कहते हैं ‘देव नहीं उतरते।’ अरे देव को उतरने की आज ज़रूरत ना रही! काउसग्ग मे हो, दिन में हो, और एक मक्खी आ जाए… देव को आने की ज़रूरत क्या है? तो श्राविका आज परीक्षा करेंगी, आप घटनाओं से अप्रभावित रहना। और दूसरी बात, सर्टिफिकेट, रिकग्निशन सिर्फ प्रभु का और सद्गुरु का। दो बातें याद रह गईं?

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