मनसा पूरन बाती
निरंतर स्मरण। एक क्षण ऐसा न हो जिसमें प्रभु का स्मरण न हो। हम साधना करेंगे तब तो प्रभु में डूबे हुए ही होंगे लेकिन साधना पूरी हुई, तब भी हमारी आँखों से आँसू बह रहे होंगे कि “प्रभु! तेरा आभार! तूने कितनी सुंदर साधना मुझे दी!” ऐसे प्रभु का निरंतर सुमिरन बना रहे – यह हो गया दीपक।
पूर्ण मन है, दीपक की बाती। आप सब अपूर्ण मन से जी रहे हैं। आप EverFresh, Evergreen क्यों नहीं हैं? कारण एक ही है – आप स्वयंसंपूर्ण नहीं हैं; आपका मन पूर्ण नहीं है। आपको लगता है कि अभी भी कुछ बाकी है, कुछ बाकी है, कुछ बाकी है। लेकिन आप हमसे पूछेंगे न, तो हम कहेंगे : “अब कुछ बाकी न रहा; सब कुछ मिल गया!”
आपके मन में जो अहंकार है न, वह कभी भी आपको तृप्ति की ओर नहीं ले जाएगा। मन को तृप्त करना है, पूर्ण करना है, तो अहंकार को Side में रखना ही पड़ेगा। अहंकार केंद्र में हो और आप तृप्त हों – ये दो बातें साथ में बनती नहीं; बन सकती नहीं।
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित स्तवन चोवीसी, प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति:
“जगजीवन जगवालहो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”
प्रभु ऋषभदेव की माताजी का नाम मरुदेवा था। और पार्श्वनाथ प्रभु की माताजी का नाम था वामा माता। ‘वामा’ का अर्थ है मनोविजय। जब हमें आत्मानुभूति करनी है, तब मनोविजय करना अनिवार्य आवश्यकता है। जहाँ तक विचारों पर हमारा नियंत्रण नहीं है, हम स्वरूप दशा की ओर जा नहीं सकते। क्योंकि विचार अनंत जन्मों से संज्ञाओं की ओर जाने के आदि होने से, हम विचारों के ज़रिए राग-द्वेष में पहुँच जाएँगे।
हमारा स्वरूप राग, द्वेष और अहंकार से बिल्कुल मुक्त है। और हमारा अवतार-कृत्य एक ही है कि हम हमारा अनुभव करें, स्वानुभूति करें। पर का अनुभव, संसार का अनुभव, अनगिनत जन्मों में हमने किया। लेकिन हमारा अनुभव हमने कब किया? तो यह जो जन्म मिला है, वह सिर्फ़ स्वानुभूति के लिए मिला है।
जब स्वानुभूति होती है, तब भीतर का आनंद कैसा होता है, इसकी बात भक्तिमती मीरा ने कही। मीरा कहती हैं:
“सुरत निरत को दिवलो जोयो, मनसा पूरन बाती।”
“अगम घाणी को तेल सिंचायो, बाल रही दिन-राती॥”
ग्लास (Glass) तो तैयार हो गया— निरंतर स्मरण! एक क्षण ऐसा न हो जिसमें प्रभु का स्मरण न हो। हम साधना करेंगे और प्रभु में डूबे हुए होंगे। साधना पूरी हुई, हमारी आँख से आँसू बह रहे होंगे कि “प्रभु! तेरा आभार। तूने कितनी सुंदर साधना मुझे दी!” साधना का आनंद प्रभु के सुमिरन में परिवर्तित होता है।
अब बाती कौन सी? “मनसा पूरन बाती।” पूर्ण मन, ये बाती है। आप सब अपूर्ण मन से जी रहे हैं। आप Ever fresh, Ever green क्यों नहीं हैं? कारण क्या? कारण एक ही है— आप स्वयं संपूर्ण नहीं हैं, आपका मन पूर्ण नहीं है। लगता है ‘अभी कुछ बाकी है, कुछ बाकी है, कुछ बाकी है।’ अहंकार जो मन में है न, वह कभी भी तृप्ति की ओर आपको नहीं ले जाएगा। अंबानी को पूछो! अपने अदानी तो जैन हैं, अदानी से पूछो कि, “अब कैसा लगता है? तुम एशिया में, भारत में सबसे बड़े समृद्ध हो, ऐसा मीडिया कहते हैं। तुम्हें कैसा लगता है?”
तो वे क्या कहेंगे मालूम है? “अरे! अपने पास क्या है? ये तो भारत के नंबर की बात करते हैं, एशिया के नंबर की बात करते हैं, अमेरिका की बात देखो, वहाँ कितने धनकुबेर हैं! उन धनकुबेरों के सामने हमारी संपत्ति क्या है? कुछ नहीं है! अभी बहुत कुछ बाकी है।”
मुकेश अंबानी को भी लगता है कि अभी बाकी है, अदानी को भी लगता है अभी बाकी है। आपको भी लगता है अभी कुछ बाकी है। हमसे पूछेंगे न, तो हम कहेंगे, “अब कुछ बाकी न रहा! सब कुछ मिल गया!” तो मन को तृप्त करना है, पूर्ण करना है, तो अहंकार को साइड (Side) में रखना पड़ेगा। अहंकार केंद्र में हो और आप तृप्त हों, ये दो बात साथ में बनती नहीं।
३०० वर्ष पहले गुजरात में, खंभात में एक अनोखी घटना घटित हुई। महापुरुषों का सत्संग भाग्य से मिलता है। लेकिन खंभात में एक समय ऐसा हुआ कि दो दिग्गज महात्माएँ खंभात में एक साथ विराजमान थे। महोपाध्याय यशोविजयजी और महोपाध्याय मानविजयजी, दोनों खंभात में विराजमान थे। दोनों का शिष्यवृंद बड़ा था, इसलिए अलग-अलग उपाश्रय में ठहरे थे। मन एक था, उपाश्रय ही अलग थे। आप एक घर में रहते हो, लेकिन कितने दूर होते हो? एक घर में रहने पर भी किलोमीटरों की दूरी आपके मन में होती है। ये महात्माएँ अलग उपाश्रय में थे, लेकिन मन उनका एक था।
अब ऐसे दिग्गज संत पधारे हैं, तो लोगों की अपेक्षा होती है कि ‘हमें भी उनके ज्ञान का लाभ मिले।’ तो अग्रणियों ने दोनों महात्माओं से विनंति की कि “आपका प्रवचन हमें मिलना चाहिए।” दोनों महात्मा इकट्ठे हुए और दोनों ने निश्चित किया कि अलग-अलग समय पर हम प्रवचन रखेंगे, जिससे कि जो भी लोग सुनना चाहते हैं, वे दोनों महात्माओं को सुन सकें। एक का ८ से ९ चलता था, एक का ९:३० से १०:३० चलता था। लोग दोनों महात्माओं के प्रवचन में जाते और अत्यंत प्रसन्न होते।
आप प्रवचन सुनते हैं न? सुनते तो हैं, लेकिन कैसे सुनते हैं? कान से सुनते हैं, ये तो सामान्य बात है। आप अपने कॉन्शियस माइंड (Conscious mind) से प्रवचन को सुनते हैं, या एक श्रद्धा से आप प्रभु के शब्दों को पीते हैं? दो बातें हैं। कॉन्शियस माइंड प्रवचन सुन सकती है, और श्रद्धा प्रभु के शब्दों को पी सकती है। कॉन्शियस माइंड की यह ताकत नहीं कि वह प्रभु के शब्दों को पी सके। कॉन्शियस माइंड सिर्फ़ सुन सकेगा कान के ज़रिए, और इंटरप्रिटेशन (Interpretation) कर सकेगा। ज़ेन (Zen) आश्रमों में तो बाहर एक सूचना-पट्टी लगी होती है— “No mind place! तुम्हारे मन को लेकर भीतर नहीं आना।”
यहाँ तो समझो कि मैं एक प्रवचनकार हूँ। बड़ा समारोह होता है, तब दो-तीन-चार प्रवचनकार महात्मा होते हैं। अब आप श्रद्धा लेकर आए हैं, तो एक-एक महात्मा के शब्दों को आप पी सकेंगे। आप कॉन्शियस माइंड को, बुद्धि को लेकर आए हुए हैं, तो आपकी बुद्धि महात्माओं के प्रवचनों का वर्गीकरण करेगी— ‘ये महात्मा बहुत अच्छे बोले, ये ज़रा ठीक-ठीक बोले, और इनके प्रवचन में मज़ा नहीं आया।’ बुद्धि क्या कर सकती है?
तो खंभात में ९९% श्रोताएँ श्रद्धा से प्रभु के शब्दों को पीने वाले थे। और एक बात मैं आपसे कहूँ, श्रद्धा से प्रभु के शब्दों को आप पी सकते हैं। एक प्रवचन आपके लिए काफ़ी है! एक प्रवचन! चातुर्मास तो सुन लिया, आपको मैं छुट्टी देता हूँ, एक प्रवचन काफ़ी है। लेकिन श्रद्धा से तुम पी सको तब! तो ९९% लोग श्रद्धाजीवी थे। एक व्यक्ति बुद्धिजीवी था और था भी गाँव का अग्रणी। वह बुद्धि से दोनों महात्माओं के प्रवचनों को सुनता था और फिर मार्क्स (Marks) देता था!
पेपर (Paper) कौन देख सकता है? एसएससी (SSC) का पेपर है, तो बीए (BA) पास या एमए (MA) पास प्रशिक्षक हो, वह देख सकता है। और केजी (KG) में पढ़ता है, वह एसएससी का पेपर देख सकता है और मार्क्स दे सकता है? प्रवचन करने वाले इतने दिग्गज महात्मा थे, और ये सामान्य मनुष्य, बुद्धि वाला, वह मार्क्स देने के लिए तैयार हो गया!
एक दिन वह अग्रणी महोपाध्याय मानविजय महाराज के पास गया। और उसने मानविजय महाराज से कहा कि, “साहब! आपका प्रवचन बहुत सुंदर है।” शैली दोनों महात्माओं की अलग थी। महोपाध्याय यशोविजय बहुत बड़े विद्वान थे, तो उनकी तार्किक शैली थी, और तर्क से, लॉजिकली (Logically) सब बातों को सिद्ध करते थे। मानविजय महाराज स्तवनाओं की पंक्तियाँ बोलते, कथानक बीच-बीच में देते, और लोगों को पकड़े रखते। तो उस अग्रणी ने मानविजय महाराज से कहा कि, “साहब! व्याख्यान तो आपका है। क्या सुंदर आप प्रवचन देते हो! मैं दोनों प्रवचनों में जाता हूँ। यशोविजयजी को भी मैं सुनता हूँ, लेकिन इतना मज़ा नहीं आता है। आपके प्रवचन में बहुत मज़ा आता है।”
अब देखो कि जब अहंकार साइड में आ गया है, तब क्या होता है। मानविजय महाराज बड़े प्रभु के भक्त थे। और जिनके पास भक्ति है, उसके पास अहंकार कैसे होगा? भक्त तुम कैसे बन सकते हो, मालूम है? तुम्हारे पास भीतर आँसू का समंदर हो। प्रभु को देखो, सद्गुरु को देखो, आँखों से आँसू बह रहे हैं। और उस आँसू की धार में अहंकार की मिट्टी पिघल-पिघल कर बाहर जा रही है। आँसू का दरिया भीतर से निकल ही रहा है, निकल ही रहा है, निकल ही रहा है! और उसमें अहंकार की मिट्टी पिघल-पिघल कर निकल रही है। तो जिसके पास अहंकार की मिट्टी नहीं है, जिसकी अहंकार की मिट्टी पिघल गई है, वही भक्त है।
अब मज़ा में क्यों है, बोलो? हमारे अहंकार को प्रभु ने छीन लिया। एक सुंदर पद आता है:
“छाप तिलक सब छीन लियो, मोहे नैना मिलाय के।”
बहुत ही सुंदर पद है यह। “छाप तिलक सब छीन लियो!” कैसे छीन लिया? “नैना मिलाय के!” उसकी आँखें मेरी आँख पर टिकी थी। लगता है कभी कि चिंतामणि दादा तुम्हें देख रहे हैं? लगता है? प्रभु की आँखें तुम पर टिकी हुई हैं! जब तुम्हारी आँख प्रभु की आँख से मिल जाएगी, सब छूट जाएगा। “छाप तिलक सब छीन लियो, मोहे नैना मिलाय के!” बस, नैन से नैन मिले, सब गया। जिस-जिस पर अहंकार था, वह सब प्रभु ने ले लिया।
ये वैष्णव लोग छाप लगाते हैं— “राम राम राम राम”, तिलक भी लगाते हैं। लेकिन तिलक लगाना अपराध नहीं है, तिलक पर अहंकार हो तो अपराध है। तुम अहंकार को कहाँ-कहाँ लाते हो? महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने अरनाथ प्रभु की स्तवना में कहा कि, “प्रभु! मैं संसार में था, तब तो मेरे पास अहंकार था— मेरा घर, मेरी संपत्ति, मेरा परिवार! लेकिन मैंने दीक्षा ली। दीक्षा लेने के बाद भी अहंकार वैसा का वैसा है! ‘मैंने इतना तप किया, मैंने जप किया, मैंने साधना की! एक करोड़ का जाप किया!’ मैंने एक करोड़ का जाप किया!” जाप तो करोड़ का, लेकिन अहंकार दस करोड़ का!
एक बात मैं आपसे पूछूँ, बाय द वे (By the way), एक लाख नवकार मंत्र आपने गिने। अब रिज़ल्ट (Result) आपको क्या मिला? आपका अहंकार गया, बरोबर? एक लाख नवकार गिने, क्या हुआ? “नमो नमो नमो नमो।” झुक जाओ, झुक जाओ, झुक जाओ। “मैं नमो बोलूँगा, लेकिन झुकूँगा नहीं! लाख क्या, करोड़ नवकार गिनूँगा, लेकिन झुकने वाला नहीं हूँ। मेरा अहंकार तो वैसा का वैसा ही है।” एक बात मैं पूछूँ, कितने ही जन्म प्रभु की साधना में गए। नमस्कार महामंत्र मिला। ऐसे बहुत जन्म गए, जहाँ हमने, मैंने, लाख-लाख नवकार मंत्र गिने थे। लाख नवकार मंत्र गिन भी लिया, उसका अहंकार संजोकर रख भी दिया, और झुका तो नहीं! “मैं और झुकूँ? मैं दूसरों को झुकाने वाला हूँ, तुम झुकने वाले हो?”
अपने युग के महान गुरु, पंन्यास प्रवर भद्रंकरविजय महाराज साहब कहते थे कि “नमस्कार महामंत्र में ‘नमो’ पहले है, ‘अरिहंताणं, सिद्धाणं’ बाद में है। तुम किनको झुकते हो, वह दो नंबर की बात है। अरिहंत परमात्मा को झुकते हो, सिद्ध परमात्मा को झुकते हो, या आचार्य भगवंतों को झुकते हो, यह बाद की बात है। पहले ‘नमो’ है। झुको! झुक जाओ!” तुम्हारा झुकना घटित हुआ? तुम झुके? तो उपाध्याय यशोविजय महाराज ने प्रभु से अपना दर्द अभिव्यक्त किया कि, “प्रभु! संसार में तो अहंकार था। दीक्षा ली मैंने, तेरी साधना पथ पर मैं आया, लेकिन अहंकार तो वैसा का वैसा ही है। मैंने इतना तप किया, मैंने इतना जप किया!”
एक बहुत ही सुंदर बात आपसे कहूँ। जप करो, गिनती भी करो, गिनती भी करो। एक लाख नवकार मंत्र गिने, लेकिन क्यों? एक आनंद घना हो जाए कि ‘प्रभु की इतनी कृपा बरसी कि एक लाख नवकार मंत्र का जाप हुआ!’ लेकिन तुम गिनती इसलिए करते हो कि ‘मैंने लाख नवकार मंत्र गिने’, तो तुम बिल्कुल गलत हो।
एक आदमी था, गुरु के पास गया था। हिंदू आदमी था। तो गुरु ने उसे मंत्र दिया— “ॐ नमः शिवाय।” और कहा कि “नौ लाख मंत्र का जाप कर।” और गुरु की इच्छा यह थी कि नौ लाख मंत्र गिनेगा, और “ॐ नमः शिवाय” ‘नमः’ बोलेगा, तो झुक जाएगा। और झुकने का आनंद इतना होगा कि ‘मैंने इतने मंत्र गिने’, यह बात तो रहेगी ही नहीं। क्योंकि तुम झुक गए, तो तुम रहे ही नहीं! तुम झुक गए, फिर कौन रहेगा? फिर प्रभु रहेंगे, तुम कैसे रहोगे? तुम झुक गए, तो रहेंगे कैसे केंद्र में? तो गुरु ने इस भावना से कहा कि नौ लाख नवकार मंत्र गिनना,यह “ॐ नमः शिवाय” गिनना।
वह आदमी अपने घर पर गया, और घर तो छोटा था। नन्हे-मुन्ने बच्चे भी थे, आवाज़ भी होती रहती थी। तो उसने सोचा कि छोटा गाँव है, गाँव के बाहर नदी थी। नदी पर पुल था, और नदी के सामने छोर पर तो जंगल ही जंगल था। वहाँ कोई आता न था, कोई जाता न था। तो उसने सोचा कि नदी के सामने पार जाकर रोज़ मंत्र गिनना। अब वह क्या करता? माला घुमाता। एक माला पूर्ण होती, नदी के किनारे पर बैठा हुआ है। कंकड़ की तो कोई कमी नहीं। एक कंकड़ लेकर यहाँ मूकता (रखता)। दूसरी माला हुई, दूसरा कंकड़। सुबह ५:०० बजे जाता, और करीब ९:०० बजे तक जाप चलता उसका, चार घंटे तक।
लेकिन उसने सोचा कि ‘थोड़ी नींद भी आ जाएगी, सुबह का समय है, तो बीच में थोड़ा दूध ले लूँ, तो नींद हट जाए।’ तो एक भरवाडण को कहा था कि “मेरे लिए एक लीटर दूध नदी के सामने छोर पर दे जाना।” रोज़ वह दे जाती थी। एक दिन ऐसा हुआ, वह बीमार थी, तो उसकी बच्ची थी, १५-२० साल की। उस बच्ची को माँ ने कहा कि “हमारे इतने ग्राहक हैं, वहाँ तू दूध पहुँचा आ।” तो बच्ची दूध लेकर चली, और नदी के सामने पार भी आ गई, और एक लीटर दूध उस मंत्र वाले को दे दिया। अब वह अपने गिलास में से दूध पी रहा है। उसने देखा कि यह जो लड़की थी, वह थोड़ी दूर गई, और एक भरवाड का बच्चा, लड़का, १५-२० साल का, बकरे चराने के लिए आया था। तो वहाँ वह गई, और जितना दूध था, वह सब उसको पिला दिया।
तो उस आदमी को एक प्रश्न हुआ कि ‘मुझे दूध दिया, तो लीटर से, लीटरिया से बरोबर माप-तौल कर दिया, और उसको दिया, तो कुछ मापा नहीं, तौला नहीं?’
दूसरे दिन वही लड़की आई, तो उसने पूछा कि, “तूने मुझे दूध दिया, तब तो तूने माप-तौल कर दिया। उस लड़के को दिया था कल, तब माप-तौल नहीं किया था, उसका कारण क्या?”
वह लड़की शर्मिंदी हो गई। उसने कहा, “उसके साथ मेरा एंगेजमेंट (Engagement) हो गया है, वह मेरा घरवाला होने वाला है। तो उसके साथ मेरा संबंध जुड़ गया है।”
और जिसके साथ संबंध जुड़ गया है, वहाँ हिसाब कैसा? वहाँ गणित कैसा? प्रेम में गणित नहीं होता। बिज़नेस (Business) में गणित होता है। “तुम्हारे साथ मैं बिज़नेस कर रही हूँ, वहाँ मैं प्रेम कर रही हूँ। बिज़नेस में गणित होता है, प्रेम में गणित नहीं होता है।”
उस आदमी को स्ट्राइक (Strike) हुआ कि “अरे! यह मैं क्या कर रहा हूँ? मैं एक-एक कंकड़ मूकता हूँ, रखता हूँ, और बाद में लिखता हूँ, आज इतनी मालाएँ गिनी! तो मैं बिज़नेस करता हूँ या प्रभु से प्रेम करता हूँ?” उसने सब कंकड़ फेंक दिए नदी में, और जो नोट (Note) थी, उसके पन्ने फाड़कर फेंक दिए। कोई गणित नहीं! प्रेम में गणित नहीं होता। तो जप में, शायद हम गिनती करें, तो भी गिनती का उद्देश्य इतना कि ‘प्रभु की कृपा से इतना जाप हुआ।’ लेकिन “मैंने इतना जाप किया”, ऐसा बोलना हो, ऐसा सोचना हो, तो गिनती करनी ही नहीं। तो गिनती नहीं करनी। क्योंकि गिनती करके तुमने अहंकार को बढ़ाया— “मैंने इतना किया!” अरे, कितनी साधना तुमने की, वह गिनते हो? कितने पाप किए, वह गिनते हो? कितने पाप किए? एक-एक डग पर पाप होता है, पाप की गिनती की? तो गिनती धर्म की करते हो?
तो मानविजय महाराज साहब को उस अग्रणी ने क्या कहा? कि, “साहब! आपका प्रवचन तो आपका प्रवचन है। वो महाराज साहब ज्ञानी होंगे, लेकिन प्रवचन में इतना मज़ा नहीं आता।” अब सामान्य आदमी होता तो क्या होता? ‘अरे, यह ऐसा अग्रणी आदमी, वह भी कहता है, तुम्हारा प्रवचन बहुत सुंदर! मैं कितना बड़ा बुद्धिमान!’ लेकिन नहीं, मानविजय महाराज साहब भक्त थे। भक्त थे, अहंकार नहीं था। तो उन्होंने उस अग्रणी से कहा कि, “देखो! मेरा प्रवचन तुम्हारे जैसे लोगों के लिए है, और यशोविजयजी का प्रवचन मेरे जैसे लोगों के लिए है!” मेरा प्रवचन तुम्हारे जैसे लोगों के लिए है, और यशोविजयजी का प्रवचन मेरे जैसे लोगों के लिए है!
यह क्या था? “मनसा पूरन बाती।” पूर्ण मन! अहंकार होता, तो अपूर्णता हो जाती। लेकिन अहंकार नहीं है, मन पूर्ण ही है। घटना कैसे भी घटे, हम आनंद में ही रहेंगे। क्यों? कि हमारा मन पूर्ण है।
थोड़े समय पूर्व, न्यूयॉर्क (New York) में, एक बड़े बौद्ध गुरु आने वाले थे। बहुत दिनों से मीडिया (Media) में प्रचार हो रहा था कि एक दिग्गज बौद्ध गुरु आने वाले हैं। उनकी बहुत किताबें प्रकाशित हुई थीं, और उस युग के नामांकित विद्वान थे। एक संस्था ने गुरु को आमंत्रित किया था, और प्रवचन के लिए बड़े हॉल (Hall) का प्रावधान और सब कुछ उस संस्था ने किया था। और संस्था के द्वारा प्रचार भी किया जाता था। टिकटें सब बिक गईं। अमेरिका में, यूरोप (Europe) में, लोग पैसे देकर प्रवचन सुनने जाते हैं। हमारे वहाँ प्रवचन सुनने पर पैसे मिलते हैं, प्रभावना की! वहाँ एक योग का सेशन (Session) होता है, ५०० डॉलर (Dollar) से लगाकर ५००० डॉलर के बीच, एक वीक (Week) के लिए होती है। और रजिस्टर (Register) कराने के लिए लोगों की होड़ मची होती है। और यहाँ हम ध्यान का सत्र बिना फीस (Fees) के चलाते हैं।
कल ध्यान का सत्र आएगा, शनिवार को। रविवार के दिन संघ का कार्य है। तो कल शनिवार को ध्यान का सत्र होगा। ध्यान को हम थ्योरिकली (Theoretically) भी आगे-आगे जानेंगे, प्रैक्टिकली (Practically) भी जानेंगे। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, गारंटी (Guarantee) के साथ, कि आप यदि ध्यान का अभ्यास करें, तो मन पर नियंत्रण आपका प्रस्थापित हो जाता है। और जब मन पर नियंत्रण प्रस्थापित हो जाता है, तब पीड़ा जैसी घटना कोई होती ही नहीं। आनंद ही आनंद होता है। कल का समय यही है, क्योंकि ‘चालु दिन हैं न। इसलिए यही ८:१५ से ९:१५, यही समय है। लेकिन कल ध्यान का सत्र चलेगा।
तो बौद्ध गुरु आने वाले हैं। बहुत बड़ा हॉल था, दस हज़ार लोग बैठकर सुन सकें, कुर्सी पर। इतना बड़ा हॉल था। एक बड़ी बिल्डिंग (Building) थी, और इसके ७५वें माले पर यह हॉल था। लेकिन वहाँ की व्यवस्था, बड़ी-बड़ी लिफ्टें, और बीस-बीस लिफ्ट एक साथ में काम करती थीं। हॉल में जाने का था… जिस दिन प्रवचन था, सुबह ९:०० बजे, टिकट धारक सब ८:०० बजे से अपनी कुर्सी पर आने लगे। ८:३० बजे हॉल पूरा भर गया। और हमारे वहाँ? मैं आ जाऊँ, फिर हॉल भरा जाता है! हॉल भरता है, वह तो ठीक ही है। हॉल भरा जाता है, लेकिन मेरे आने के बाद! लोग दौड़ते-दौड़ते आते हैं, बारी से देखते हैं, ‘चालू हो गया कि नहीं हो गया!’
८:३० बजे दस हज़ार चेयर्स (Chairs) भरी हुई थीं। शार्प (Sharp) ९:०० बजे गुरु मंच पर आए, और सीधा ही गुरु ने प्रवचन शुरू कर दिया। दो घंटे का प्रवचन था, ९ से ११। १०:०० बजे अर्थक्वेक (Earthquake), भूकंप आया। इतना बड़ा भूकंप कि इतनी बड़ी बिल्डिंग डोलने लगी। लोगों को ख्याल आ गया— भूकंप! बीसों-बीस लिफ्ट चालू हो गईं। १० मिनट में हॉल खाली! लेकिन एक घटना घटी, कि लोग घर पर जाने के लिए तैयार नहीं, ऑफिस जाने के लिए तैयार नहीं। इतना प्रवचन का सम्मोहन! और मेरी इच्छा यही है, कि तुममें भी प्रवचन का एक सम्मोहन लग जाए। कि तुम्हें बुलाना न पड़े। बस मंगलाचरण के पहले, तुम तुम्हारी सीट (Seat) लेकर बैठे हुए हो। सम्मोहन! तो लोग जाते नहीं, बिखरते नहीं। नीचे टीवी (TV) पर देख रहे हैं। अब टीवी के उद्घोषक कह रहे हैं, “एक शॉक (Shock) आ गया, अब आफ्टर शॉक्स (Aftershocks) की कोई संभावना नहीं है। अभी कोई शॉक्स आने वाले नहीं हैं।” वैज्ञानिको भी टीवी पर आए, और उन्होंने वार्तालाप में कहा कि, “एक अर्थक्वेक का शॉक आ गया, लेकिन अब आफ्टर शॉक्स की कोई संभावना नहीं है। लोग आराम से रहें, अब कोई चिंता की बात नहीं।” इतना सुना, बीसों-बीस लिफ्ट चालू, १० मिनट में हॉल भरा गया! कितना आकर्षण होगा! आपको तो एक बार छोड़ें नीचे तो फिर कल दर्शन होंगे आपके!
दर्शक आ गए। टीवी पत्रकार, अखबारों के पत्रकार, उसके लिए अलग दीर्घा थी, वे भी सब बैठ गए। जहाँ से प्रवचन अटका था, वहाँ से गुरु ने शुरू किया। गुरु वहीं बैठे थे! प्रवचन पूरा हुआ। एक टीवी पत्रकार ने नजदीक आकर गुरु से पूछा, कि “इतना बड़ा अर्थक्वेक का शॉक आया, भूकंप का शॉक, और आप यहीं बैठे रहे?”
तब गुरु ने हँसते-हँसते कहा, “यहाँ कोई शॉक नहीं आया! यहाँ कोई शॉक नहीं आया! यहाँ सब ठीक-ठाक था।”
भूकंप आता है, लेकिन हृदय कंप होता है? मुझे पूछना है। एक अलग ही संदर्भ में, मुझे पूछना है आज आपसे, कि भूकंप के शॉक्स आते हैं, लेकिन हृदय कंप के शॉक्स आते हैं? फुटपाथ पर किसी को देख लिया, सुबह का समय है, कोई शॉक होता है भीतर? हृदय में कंपन होता है? कभी पूछा उस फुटपाथ वाले से, “भाई, उठ गए? नाश्ता किया कि नहीं?”
“नहीं साहब, नाश्ता तो कैसे करें, चाय भी नहीं पी, पैसे ही नहीं हैं।”
“अच्छा, ऐसा है? चल मेरे साथ!” तो उसे लेकर होटल (Hotel) में जाते हैं, और चाय और नाश्ता करा देते हैं, बिल भुगतान कर देते हैं। ऐसे-ऐसे छोटे-छोटे भूकंप के शॉक्स आते हैं? हृदय कंप के आते हैं? हृदय काँपता है कभी?
आज मीडिया ने क्या काम किया? लोगों के हृदय को निष्ठुर बना दिया, कठोर बना दिया। आज का आदमी टीवी पर लाइवली (Lively) देख रहा है, भूकंप का शॉक आया है, कितनी ही स्काईस्क्रैपर (Skyscraper) बिल्डिंग्स ढह गई हैं, एंबुलेंस (Ambulance) की सायरन (Siren) बज रही है, सैकड़ों लोग मर गए हैं, वह लाइवली देख रहा है, और चाय पी रहा है! उसके हृदय में कुछ होता नहीं। मीडिया के देखने से, मीडिया में पढ़ने से, आपका हृदय कठोर हो गया।
प्रभु कब आते हैं हृदय में? महोपाध्याय यशोविजयजी ने कहा, “हृदय कमल में ध्यान धरत हो!” जब हृदय कमल जैसा कोमल बनता है, तब प्रभु का अवतरण भीतर होता है। तो हृदय कठोर हो, तो प्रभु का अवतरण अपने भीतर होगा नहीं। हृदय को कमल जैसा कोमल बनाना होगा।
