Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 18-07-2026 | Pune Chaturmas

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मेरे प्रभु सूं प्रगट्यो पूरन राग

प्रीति और पूर्ण प्रीति – दोनों में फर्क है। प्रीति का अर्थ है कि प्रभु भी मुझे पसंद हैं और विभाव में जाना भी मुझे पसंद है। पूर्ण राग, पूर्ण प्रीति का अर्थ है कि कॉन्शियस माइंड, अनकॉन्शियस माइंड, व्यक्तित्व, हृदय, अस्तित्व सब कुछ प्रभु से भर जाए; प्रभु के अलावा वहाँ कुछ भी न रहे।

परम चेतना में डूब जाना है। संसार में बहुत डूबे; अब परमात्मा में डूबना है। इसके लिए तो हम आए हैं, आपको प्रभु में डुबाने के लिए! एक बार डूबोगे न परमात्मा में, तो फिर आपसे संसार में डूबा नहीं जाएगा। संसार में शायद रहना पड़ेगा, रहोगे, लेकिन डूबोगे नहीं।

शरीर संसार में हो, पर मन तो परमात्मा में ही रहे। आपके लिए और भी ज़्यादा डिस्काउंट देता हूँ! आपको व्यापार का गणित बिठाना है, Future Planning करना है, तो उसके लिए भले ही आपका Conscious Mind भी संसार में रहे, लेकिन आपका Unconscious Mind, आपकी अस्तित्व की धारा तो प्रभु में ही रहेगी।


समर्पण ही प्रभु शासन, समर्पण ही प्रभु की साधना पद्धति। जब प्रभु के चरणों में हम समर्पित हो जाते हैं, प्रभु के अतीत में हुए उपकारों से हमारा हृदय जब भर जाता है, तब प्रभु के प्रति अत्यंत प्रेम से हमारा हृदय छलक जाता है। और प्रभु पर का जो प्रेम है, वो ही प्रभु की आज्ञा के प्रेम में कन्वर्ट (Convert) होता है। प्रभु की आज्ञा के प्रति प्रेम! एक-एक आज्ञा का पालन करेंगे, और हमारे रोएं खुल जाएंगे, खिल जाएंगे।

अब एक मज़ा की बात, प्रभु के प्रति प्रेम शुरुआत कौन करेंगे? हम करेंगे या प्रभु करेंगे? मेरे जीवन की एक घटना कहूँ तो, मेरा तो दृढ़ विश्वास है कि हम कौन प्रेम करने वाले हैं? प्रभु ही हमें प्रेम करते हैं, और बादमें हमारा प्रेम प्रभु की ओर जाता है।

मैं २५ वर्ष का था, मेरी दीक्षा के १४ वर्ष हुए थे। योग मार्ग में जाने की रुचि बहुत थी, लेकिन इर्द-गिर्द ऐसे कोई साधक नहीं मिले जो योग मार्ग में पारंगत हों। एक दिन मैं सोच रहा था कि मुजे योग मार्ग में जाना है, लेकिन मैं कैसे जाऊँ? मार्गदर्शक तो कोई होना चाहिए, बिना मार्गदर्शक मैं योग मार्ग में कैसे जाऊँ? ये विचार आया, और मैं सो गया था। नींद में संकेत मिला, प्रभु कह रहे थे कि— ‘तुजे कहाँ बाहर जाना है? तुजे दूसरा मार्गदर्शक कौन खोजना है? मैं ही तेरा मार्गदर्शन करूँगा। तुजे कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है, मैं तेरे लिए ही हूँ, जाग गया।

उस समय योग की रुचि होने पर भी, मैं रैशनलिस्ट (Rationalist), बुद्धिवादी था। अब मैं ट्रेडिशनलिस्ट (Traditionalist) हूँ, परंपरावादी, इमोशनलिस्ट (Emotionalist) हूँ, श्रद्धावादी। लेकिन वो तो प्रभु ने मुजे बनाया। मैं तो रैशनलिस्ट ही था, बुद्धिवादी। तो उस समय मैं रैशनलिस्ट था, तो मैंने सोचा कि प्रभु ऐसे थोड़ी आते हैं, ये तो ऑटो सजेशन (Auto Suggestion) होगा, मेरा आत्मस्फुरण। लेकिन उस दिन शाम, एक साधक मुजे मिलने के लिए आए, और उन्होंने कहा, “आपको योग में रुचि है, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ। आप योग मार्ग में कहाँ तक गए हो?” मैंने कहा, “मेरा तो प्रारंभ ही नहीं हुआ है। आप कहाँ तक पहुँचे हो?” उन्होंने बात की, “ऐसे-ऐसे मेरा प्रारंभ हुआ, और आज मैं वर्तमान योग की धारा में हूँ।” उनकी बातों से मुजे साधना का मार्गदर्शन मिला। तब मैंने सोचा कि इस साधक को भेजा किसने मेरे पास? प्रभु ने ही भेजा। मैं उस मार्ग पर चला।

थोड़े दूर हुए, एक दूसरे साधक आए। उनके पास एक किताब थी, योग मार्ग की। उन्होंने मुजे पूछा कि, “आपने ये किताब पढ़ी है?” उस समय, अंग्रेज़ी में जिसको हम बुक वर्म (Bookworm) कहते हैं, ग्रंथकीट, ऐसा मैं था। मेरे रस के सैकड़ों पुस्तकें मैंने पढ़ ली थी। तो योग मार्ग में जितनी भी पुस्तकें प्राप्य थी, गुजराती, हिंदी, अंग्रेज़ी, सब मैंने देख ली थी। लेकिन ये पुस्तक मैंने देखी ही नहीं थी। मैंने कहा, “ये किताब मैंने नहीं पढ़ी है।” तो उन्होंने कहा, “आपको देने के लिए ही मैं आया हूँ। मुजे ऊपर से संकेत मिला है कि यशोविजय को ये पुस्तक देना है।” तब मुजे हुआ कि प्रभु मेरी कितनी केयर (Care) करते हैं!

ऐसे तो एक सूत्र है—

सरेंडर के सामने केयर (Surrender के सामने Care)

आपका जितना समर्पण, उतनी आपकी सुरक्षा। मैं कहूँगा, प्रभु ने ऐसा सुरक्षा चक्र हम सबको दिया है, कि हम एक सेकंड विभाव में न जा सकें। “न जाए” ऐसा नहीं कहता हूँ, हम जा न सकें। प्रभु ने ऐसा सुरक्षा चक्र हमें दिया है। आपको भी दे सकते हैं। आप भी प्रभु की आज्ञा को समर्पित हो जाओ। सरेंडर के सामने केयर। आप समर्पित हो गए, प्रभु का सुरक्षा चक्र आपको मिल जाएगा। तो हम बड़भागी हैं, प्रभु ने कृपा की, और ये चद्दर दी। ‘मैंने दीक्षा ली’, ऐसा मैं कभी नहीं कहूँगा। प्रभु ने ही मुजे सिलेक्ट (Select) किया है।

मैं ८ साल का था, टाइफाइड (Typhoid) हुआ था। मेरा गाँव छोटा सा गाँव, झिंजुवाडा। वहाँ मेडिकल सर्विसीस (Medical Services) इतनी अच्छी नहीं थी। तो मुजे नज़दीक के टाउन, खाराघोड़ा में हॉस्पिटल में एडमिट (Admit) कराया। हॉस्पिटल में ७ सप्ताह तक मैं रहा। ७ वीक्स (7 Weeks)। लेकिन बुखार कम नहीं हुआ। न बुखार कम हुआ, न अशक्ति कम हुई। अशक्ति बढ़ती ही जाती थी। शरीर तो अस्थिपिंजर जैसा हो गया। तब मेरी माँ की आँखों से आँसू बहने लगे, कि मेरा लाडला बेटा रहेगा या नहीं रहेगा। माँ भक्ति परायण थी। माँ ने प्रभु से प्रार्थना की, कि— “प्रभु, ये मेरा बच्चा ज़िंदा रह गया तो तेरा। अब मैं मेरे बच्चे पर से अधिकार उठा लेती हूँ। अब ये ज़िंदा रह गया, टिक गया तो तेरा।” और जैसे ही माँ ने प्रार्थना की, मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा। एक वीक में तो डिस्चार्ज (Discharge) मिल गया। मैं मेरे गाँव पहुँच गया, और दूसरे वीक में मेरा स्कूल जाने का चालू हो गया।

एक दिन माँ ने मुजसे कहा, कि— “बेटा, तु बहुत ही बीमार था। तेरी जीने की कोई आशा नहीं थी। तब मैंने प्रभु से प्रार्थना की थी, कि प्रभु, ये मेरा बच्चा यदि टिक गया, रह गया तो तेरा। तो अब तु प्रभु का है।” मैंने कहा, “बरोबर, मैं प्रभु का हो गया, अब मुजे क्या करनेका?” तो माँ ने कहा, “तुजे अब दीक्षा लेने की।” मैंने कहा, “ज़रूर, दीक्षा लूँगा।” माँ पर इतना भाव था, माँ जो भी कहे, करने के लिए मैं तैयार था। दीक्षा क्या है, उस समय मैं समझता भी नहीं था। लेकिन माँ ने कहा, ‘तुजे दीक्षा लेने की है’। मैंने कहा, ‘मैं ले लूँगा’। गुरुदेव ओमकार सूरीश्वर महाराज साहेब, अंकल (Uncle) थे। वहाँ मुजे ट्रेनिंग (Training) के लिए भेजा गया। ट्रेनिंग में मैं पास हो गया, और मेरी दीक्षा हो गई।

तो मुजे दीक्षा जो मिली, वो प्रभु के कारण। मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं दीक्षा लूँगा। माँ ने कहा, तुजे लेनी है। मैंने कहा, ले लूँगा। तो अब मुजे लगता है कि प्रभु ने मुजे सिलेक्ट किया था। और सद्गुरु ने मुजे रजोहरण दे दिया। मैं प्रभु के मार्ग पर आ गया। तो ये प्रभु का प्रेम था। मेरे जैसे अज्ञानी, सामान्य व्यक्ति को भी प्रभु सिलेक्ट करें, ये प्रभु का कितना प्रेम होगा मुज पर। तो हमारा अवतार-कृत्य एक ही है, प्रभु के प्रेम को स्वीकारना।

उपाध्याय यशोविजय महाराज की एक स्तवना है—

मेरे प्रभुसु प्रगट्यो पूरन राग

प्रभु से पूर्ण प्रीति मुजे हो गई है। अब ‘प्रीति हो गई है’, ऐसा नहीं कहते हैं। लेकिन क्या कहते हैं? ‘पूर्ण प्रीति हो गई है’। प्रीति और पूर्ण प्रीति, उसमें फर्क है। प्रीति का मतलब ये है कि प्रभु भी मुजे पसंद हैं और संज्ञावासित मन होने के कारण, विभाव में जाना भी मुजे पसंद है। प्रभु भी पसंद हैं, विभाव भी पसंद है।

इसलिए नारद ऋषि ने ‘भक्तिसूत्र’ में कहा—

तस्मिन् अनन्यता तद्विरोधिषूदासीनता

बहुत ही सुंदर सूत्र है। तस्मिन् अनन्यता, परमात्मा के विषय में, एकाकार तुम हो जाओ। परमात्मा की चेतना के साथ, तुम्हारी चेतना एक हो जाए। तो परम चेतना में डूब जाना है। संसार में बहुत डूबे। अब परमात्मा में डूबना है ना! इसलिए तो हम आए हैं, आपको डुबाने के लिए। एक बार डूबोगे ना परमात्मा में, तो फिर संसार में डूबने का नहीं होगा। संसार में शायद रहना पड़ेगा, रहोगे, लेकिन डूबोगे नहीं। जो परमात्मा में डूब गया, वो फिर परमात्मा में ही रहेगा। उसका मन परमात्मा में ही रहेगा। शरीर संसार में आ सकता है, मन तो नहीं। और तुम्हारे लिए ज़्यादा डिस्काउंट (Discount) दूँ। कॉन्शियस माइंड (Conscious Mind), संसार में भी हो। व्यापार का गणित बिठाना है। फ्यूचर प्लानिंग (Future Planning) करना है, तो कॉन्शियस माइंड भी संसार में है। लेकिन आप, आपका अनकॉन्शियस माइंड (Unconscious Mind), आपकी अस्तित्व की धारा, वो तो प्रभु में ही है।

भगवद गीता में, अर्जुन और श्रीकृष्ण का एक बहुत बड़ा सुंदर संवाद आता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, “तेरा मन मुजे दे दे।” मन दे दिया ना? कि बाकी है अभी? तुम्हारा मन तुम्हारा कि प्रभु का? तुम्हारा मन किसका? प्रभु का कि तुम्हारा? प्रभु को जो पसंद है, वो ही तुम करोगे। प्रभु को जो नापसंद है, प्रभु की आज्ञा जिसमें नहीं है, वो कृत्य तुमसे होगा ही नहीं। तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि, “तेरा मन मुजे दे दे।”

तब अर्जुन ने पूछा, “मैं मेरा मन आपको दे दूँ, तो मुजे मिलेगा क्या?” अर्जुन भी कमर्शियल माइंड (Commercial Mind) वाला है। आप कमर्शियल माइंड वाले हैं? ‘मैं मन दे तो दूँ, लेकिन मुजे मिलेगा क्या?’ तब श्रीकृष्ण कहते हैं—

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं संशयः

श्रीकृष्ण कहते हैं कि, “यदि कि तुने तेरा मन मुजे दे दिया, तो तु मुजमें ही है, तेरे में नहीं है। तु तेरे में नहीं, मुजमें। अब तु तेरा नहीं रहा, मेरा रह गया।”

हमें प्रभु का बनना है, तो हमारा मन हमें प्रभु को देना होगा। तो प्रीति और पूर्ण प्रीति। महोपाध्याय यशोविजयजी कहते हैं, मेरे प्रभुसु प्रगट्यो पूरन राग पूर्ण प्रीति प्रभु से मेरी हुई। तो पूर्ण प्रीति का अर्थ क्या? पूर्ण प्रीति का अर्थ ये है कि, तुम्हारा कॉन्शियस माइंड, अनकॉन्शियस माइंड, तुम्हारा व्यक्तित्व, तुम्हारा हृदय, तुम्हारा अस्तित्व, सब कुछ प्रभु से भर जाए। प्रभु के बिना कुछ भी वहाँ न रहे। और यही बात नारद ऋषि ने कही, तस्मिन् अनन्यता तद्विरोधिषूदासीनता परम में डूबना है। परम में एकाकार होना है। लेकिन जो अपरम तत्व है, उसके साथ उदासीन भाव से रहना है। अपरम तत्वों के साथ प्रीति बिल्कुल नहीं है। तो पूर्ण प्रीति प्रभु के साथ होगी। दूसरे किसी के साथ प्रीति नहीं। प्रीति केवल प्रभु से। प्रीति केवल प्रभु की आज्ञा से, तो पूर्ण प्रीति आएगी।

और एक बात मैं कहूँ आपसे, जब पूर्ण प्रीति आ गई प्रभु से, प्रभु की आज्ञा से, तब ही आपके जीवन में गुरु तत्व का वास्तविक रूप से प्रवेश होगा। आप गुरुदेव से पूछेंगे कि, “गुरुदेव, प्रभु से ही प्रीति करनी है। दूसरे किसी के साथ प्रीति करनी नहीं है। राग नहीं करना है। तो मैं कौनसे रास्ते पर चलूँ?” तो प्रभु के साथ पूर्ण प्रीति आपको करनी है, तभी गुरु चेतना का प्रवेश आपके जीवन में होगा। हमारा कार्य क्या है? हमारा कोई दूसरा कार्य नहीं है। आपको प्रभु से पूर्ण प्रेम करना है, तो कैसे करना, वो हम बताएँगे। उस मार्ग पर आपको चलाएंगे। लेकिन आपकी ये इच्छा होनी चाहिए।

प्रीति तुम्हारे पास भी है। श्रावकों के पास, इन श्राविका माताओं के पास, प्रभु के प्रति प्रीति है। लेकिन प्रभु के पर पूर्ण प्रीति साधु और साध्वी की होती है। फर्क इतना ही है। आपको भी प्रभु पर प्रेम है। इतने लोग मेरी लिस्ट (List) में हैं, जिनको स्वद्रव्य से जिनालय बनाना है। ‘साहेबजी, दो करोड़ हों, पाँच करोड़ हों, मुजे लाभ मिले ऐसा हो, वहाँ मुजे स्वद्रव्य से जिनालय बनाना है।’ एक पैसे के लिए आप जूझेंगे, और प्रभु के लिए पाँच करोड़ देने के लिए आप तैयार हैं। प्रतिष्ठा के चढ़ावे बोले जाते हैं, पाँच करोड़, छह करोड़, सात करोड़… प्रभु आपको प्यारे हैं। प्रभु के पर आपकी प्रीति है। लेकिन पूर्ण प्रीति नहीं है। पूर्ण प्रीति करनी हो, तो ये चद्दर पहननी पड़ेगी। बोलो तो, फ्यूचर प्लानिंग तो यही है ना? यही है ना? फ्यूचर प्लानिंग यही है ना? प्रभु की चद्दर! कितनी सुहावनी ये चद्दर है। ये चद्दर और ये रजोहरण, सुरक्षा चक्र, जो प्रभु ने दिया है, ये चद्दर हमारे पास है। हम कोई गलत कार्य नहीं कर सकेंगे। ये ब्रेक (Break) लगाएगा। तो आपके पास भी प्रभु के पर प्रीति है, लेकिन पूर्ण प्रीति नहीं है। क्योंकि संसार भी आपको पसंद है। आप ‘मेरे भगवान’ कहते हो, और दिल से कहते हो, लेकिन ‘मेरा बच्चा’ भी है। ‘मेरी श्राविका’ भी है। आपके लिए ‘मेरे श्रावकजी’ भी हैं। हमारे लिए मेरे भगवान, मेरे गुरु, दूसरा कुछ नहीं।

तो महोपाध्यायजी कहते हैं, मेरे प्रभुसु प्रगट्यो पूरन राग पूर्ण राग, पूर्ण प्रीति हो गई। अब पूर्ण प्रीति प्रभु से हुई, तो क्या मिलेगा? अर्जुन ने पूछा था, ऐसा हम भी पूछेंगे। भगवद गीता के दो पात्र, कृष्ण और अर्जुन। कृष्ण गुरु चेतना हैं। कृष्ण कॉन्शियस (Consciousness), ये गुरु चेतना है। और अर्जुन कॉन्शियस, ये शिष्य चेतना है। शिष्य कैसा होता है? आप भी टेम्परेरी (Temporary) तो शिष्य हैं ही ना। एक घंटे के लिए, दो घंटे के लिए। टेम्परेरी शिष्य तो हैं ना? ये लोग परमेनन्ट है, बस इतना तो फर्क है। तो शिष्य किसे कहते हैं? अर्जुन, जो ऋजु-ऋजु है, सरल-सरल है। क्रिस्टल क्लीन हार्टेड (Crystal Clean Hearted)। स्फटिक जैसे पारदर्शी हृदय वाला जो साधक, वो शिष्य।

शिष्य को क्रिस्टल क्लीन हार्टेड होना चाहिए। गुरु से कुछ भी छुपाना नहीं। जो भी बात है, गुरु से निवेदित करनी है। और गुरु से तुमने कुछ भी छुपा लिया, तो तुम शिष्य नहीं हो। तुम क्रिस्टल क्लीन हार्टेड नहीं हो। तो शिष्य अर्जुन, जो ऋजु-ऋजु, सरल-सरल है। और कृष्ण गुरु चेतना हैं। ‘कृष्’ का अर्थ है ‘खींचना’। जो आपके कॉन्शियस माइंड को खींच लेता है, वो गुरु है। आप सरल हो गए, समर्पित हो गए, फिर गुरु क्या काम करेंगे? आपके कॉन्शियस माइंड को, अनकॉन्शियस माइंड को, गुरु खींच लेंगे। फिर संज्ञावासित मन आपके पास नहीं रहेगा। आज्ञावासित मन हम आपको दे देंगे।

दो मन हैं। ऐसे तो मन के बहुत ही विभाग हैं। कॉन्शियस माइंड, सबकॉन्शियस माइंड (Subconscious Mind), अनकॉन्शियस माइंड। दो के बीच में भी दूसरे बहुत मन हैं। लेकिन मैं वर्गीकरण दो ही मन से करता हूँ। संज्ञावासित मन, और आज्ञावासित मन। राग, द्वेष आदि संज्ञाओं से मन प्रभावित हो, तो आपका मन संज्ञावासित है। और प्रभु की आज्ञा से प्रभावित आपका मन है, तो आप आज्ञा प्रभावित मन वाले हो।

अब मन की बात कहता हूँ। आप संसार में हो। शरीर से आप बिज़नेस (Business) भी करेंगे। शरीर से आप रसोई भी करेंगे। आरंभ-समारंभ का काम भी करेंगे। लेकिन मन जो है, वो आज्ञावासित होना है। मैं माताओं से पूछूँ, यहाँ से आप जाओगी। दोपहर की रसोई का समय होगा, आप रसोई के लिए तैयार होगी। गैस को पेटायेंगी (जलाएंगी), और सब्जी को आप बिल्कुल ठीक करेंगी। उस समय आपके मन में क्या होगा? आपके मन में ये साध्वीजी भगवतीओ आएंगी। कि साध्वीजी! कितना पवित्र जीवन, कितना निर्दोष जीवन! हम संसार में हैं, हमें आरंभ-समारंभ करने पड़ते हैं। वे प्रभु को समर्पित हो गए, न आरंभ, न समारंभ, न कोई विराधना। बस आराधना ही आराधना, चौबीस घंटों। तो आप रसोई करती हैं, और मन में साध्वीजी भगवती बस गईं। और आपके मन में हुआ कि कब मैं साध्वीजी बनूँगी। तो आपका मन आज्ञावासित हो गया।

आप ऑफिस में गए हैं, सच्चा-झूठा भी करना पड़ता है आपको। अनीति में भी जाना पड़ता है कभी-कभी। उस समय आप क्या सोचेंगे? कि हम भी मुनिराज बन जाए, तो कैसा अच्छा, न कोई आरंभ, न कोई समारंभ, न कोई विराधना। पद्मविजय महाराज साहेब ने पूजा में लिखा—

संयम कबहु मिले सस्नेही प्यारा

और बाद में लिखा—

यु समकित गुण ठाणग वारा, आतम से करत विचारा हो

श्रावक की व्याख्या क्या है? जिसके मन में साधुपन बैठा हुआ है, वो श्रावक। समझ गए? ‘संयम कबहु मिले सस्नेही प्यारा’— ये विचार कौन करता है? ‘यु समकित गुण ठाणग वारा।’ आप तो देशविरति पाँचवें गुणस्थानक पर हो। उससे पहले, चौथे गुणस्थानक पर, समकिती आत्मा है, वो भी विचारती है कि कब मुजे संयम मिले। तो श्रावकपन की व्याख्या यह हुई, कि जिसके मन में साधु बनने की इच्छा है, वो श्रावक। बरोबर ना? इच्छा तो यही होगी ना?

और इच्छा यही होगी, तो क्या होगा? पैसे कम हैं, आप संतुष्ट हैं? मेरे गुरुदेव के पास एक भी पैसा नहीं है और वे आनंद में रहते हैं। उपाश्रय भी आपका, गोड़ीजी ट्रस्ट का, हमारा नहीं। कोई खेत- बेत हमारे पास नहीं। कोई मकान हमारे पास नहीं। एक पैसा हमारे पास नहीं। और हम सुखी हैं। बोलो, एक प्रश्न पूछूँ? आप सुखी कि हम सुखी? बोलो! मेरा प्रवचन ऐसे ही चलेगा। आपसे बातचीत करनी है। आपके मन में कुछ संवेदना पनपे। आप सुखी या हम सुखी? बोलो। होंठ से उत्तर नहीं देना। हृदय से उत्तर दो।

एक बात है, एक मन तो ज़रूर कहेगा कि साधु भगवंत ही सुखी हैं, साध्वीजी भगवती ही सुखी हैं। लेकिन कौन सा मन? संस्कारवासित मन। जैन कुल में जन्मे हो, बचपन से ही यही बात मन में घुमराती है कि साधु भगवंत बड़े सुखी होते हैं। साधु भगवंत बड़े आनंद में होते हैं। लेकिन ये संस्कारवासित मन का विचार है। आपका खुद का विचार क्या है? साधु सुखी हैं, तो साधु के पास कुछ नहीं है। बरोबर? अब साधु सुखी आप मानते हो, तो जैसे पैसा बढ़ेगा, वैसे सुख बढ़ेगा? या पैसे कम होंगे, ऐसे सुख बढ़ेगा? बोलो, अब बोलो! संपत्ति बढ़ेगी, तो सुख बढ़ेगा? या संपत्ति कम होगी, तो सुख बढ़ेगा? क्या होगा?

आज तो मीडिया वाले मुकेश अंबानी की संपत्ति गिनाते हैं। गौतम अदाणी की संपत्ति गिनाते हैं। किसी के पास पाँच लाख करोड़ हो, किसी के पास छह लाख करोड़ हो। और आप सोचेंगे, “ओ, पाँच लाख करोड़! अपने पास तो पाँच सौ करोड़ भी नहीं है।” तो ज़रा वेग से चलो। कि पाँच करोड़ में क्या होता है? पच्चीस करोड़, पचास करोड़, सौ करोड़, कुछ हो तो बात बनती है। आपका मन क्या कहता है? बोलो। तो दो मन हुए। एक संस्कारवासित मन, और एक संज्ञावासित मन। संस्कारवासित मन ने कहा साधु भगवंत सुखी हैं। लेकिन संज्ञावासित मन कहता है कि जैसे-जैसे संपत्ति बढ़ेगी, वैसे-वैसे सुख बढ़ेगा।

एक बात मैं पूछूँ आपसे, भोजन के लिए आप बैठे। भोजन के लिए बैठे। भूख लगी है। श्राविकाजी भक्ति वाली हैं। गरम-गरम बाटी और शाक आपको परोसती हैं। अब चार रोटियाँ आपने खाईं। फिर पाँचवीं परोसने के लिए आई श्राविकाजी। आप कहेंगे, “नहीं, अब नहीं। पेट भर गया।” फिर भी आग्रह से पाँचवीं रोटी थाली में डाल देगी। आपको खानी पड़ेगी। लेकिन छठवीं रोटी डाले तो? आप कहेंगे, “नहीं-नहीं-नहीं, अब बिल्कुल नहीं।” अब पहली रोटी खाई, तब मज़ा आया था। अब छठवीं रोटी खानी पड़े तो? यदि रोटी में आनंद है, तो पहली रोटी में ही आनंद क्यों? छठवीं रोटी में आनंद क्यों नहीं? बोलो! रोटी खाने में कोई आनंद नहीं आता है। लेकिन भूख का जो दुःख था, वो दुख कम हुआ, आपको भ्रांति हुई कि मुजे सुख मिला।

ठंड लगी है। श्राविका से कहा, ब्लैंकेट (Blanket) ओढ़ाओ। एक ब्लैंकेट डाला, फिर भी ठंडी लगती है। दूसरा डाला, अच्छा लगा। तीसरा डाला, फिर चौथा, पाँचवाँ, छठवाँ, कंबल ओढ़ाए जाए? तो वहाँ आपने सीलिंग एक्ट (Ceiling Act) रखा है। रोटी चार से ज़्यादा नहीं। ब्लैंकेट तीन से ज़्यादा नहीं। एक सीलिंग एक्ट संपत्ति में नहीं? बरोबर?

हमारे वहाँ श्रावक के पाँचवें व्रत में, अणुव्रत में, ‘परिग्रह परिमाण व्रत’ आता है। ये ही सीलिंग एक्ट है। ये ही गांधीजी की ट्रस्टीशिप (Trusteeship) है। फिर तुम ट्रस्टी होगे। You are only the trustee, and not the owners. तो संपत्ति में परिग्रह परिमाण, ये सीलिंग एक्ट हुआ। कि इतने से ज़्यादा मुजे नहीं चाहिए। तो कितना सुख होगा? बोलो तो? दो करोड़, तीन करोड़ आपने धार लिए। तीन करोड़ हो गए। चलो, अब शांति। अब बैठ जाओ। बाकी तो बैठने का होता ही नहीं। ज़िंदगी के अंत तक दौड़ो, दौड़ो, दौड़ो। शांति से कब बैठोगे? कब बैठोगे? यहाँ से जाने के बाद?

तो प्रभु के साथ पूर्ण प्रीति हो जाए, तो मज़ा ही मज़ा। और इसलिए आगे सूत्र दिया— पूरन मन, पूरन सब दिसे, नहीं दुविधा को लाग प्रभु के साथ पूर्ण प्रीति हुई, तो क्या हुआ? मन पूर्ण हो गया। आपका मन अपूर्ण है, इसलिए आप दौड़ते हो। हम दौड़ते ही नहीं।

भगवान बुद्ध जंगल में चल रहे थे। उस जंगल में अंगुलिमाल डाकू रहता था। उसके मन में एक सनक पैदा हुई थी। कि एक सौ आठ मनुष्य की, आदमी की उँगली को काट कर, उसका हार बनाना है। माला बनाना है। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ गया। एक सौ सात आदमी मिल गए थे। लेकिन फिर तो ऐसा भय का साम्राज्य छा गया कि उस जंगल में कोई आए ही नहीं मनुष्य। और उस जंगल में भगवान बुद्ध आते हैं। अंगुलिमाल के पास एक पद्धति थी। पहले किसी को डरा लेना। “ऐ, कौन है? खड़े हो जाओ!” लेकिन ये तो बुद्ध थे। अंगुलिमाल ने कहा बुद्ध को देख कर, “कौन है? खड़े हो जाओ!” बुद्ध धीरे से चलते हैं। चेहरे पर बड़ी शांति है। और कहते हैं, “मैं तो खड़ा ही हूँ।” चलते हैं। और कहते हैं, “मैं तो खड़ा ही हूँ। तु खड़ा रह जा ! तु दौड़ता है।” और अंगुलिमाल खड़ा था। जो खड़ा है, बुद्ध कहते हैं, “तु दौड़ रहा है।” अपन चल रहे हैं, और बुद्ध कहते हैं, “मैं खड़ा हूँ।” बुद्ध के ये शब्द, बुद्ध के चेहरे पर की शांति! अंगुलिमाल को लगा कि ये आदमी कोई अलग है। बुद्ध के पास आया। “तुम कैसे कहते हो कि तुम खड़े हो? तुम तो चलते हो।” तो बुद्ध ने कहा, “शरीर चल रहा है, मैं तो स्थिर ही हूँ। मेरा मन शांत है, स्थिर है। तो मैं स्थिर ही हूँ। “अच्छा, तो मुजे आपने क्यों कहा कि तु दौड़ रहा है? मैं तो खड़ा था। “अरे, तेरा शरीर खड़ा था। तु तो दौड़ रहा था। तेरे मन में विकल्प-विचार, कितने घूम रहे हैं, तु दौड़ता है।” इतने ही शब्द, अंगुलिमाल बुद्ध को समर्पित हो गया। उसने कहा, “गुरुदेव, आप यदि मुजे योग्य समझो, तो आपका शिष्य बना लो।”

तो हम विहार भी करते हैं, लेकिन खड़े हैं। आप खड़े हो तो भी चलते हैं। रात को भी चलते हो आप। दिन भर तो विचार करते हो, रात को सपने में विचार करते हो। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि स्वप्न क्यों आते हैं? जो वासनाएं दिन में अतृप्त रह गई हैं, और दिन में पूरी होने वाली हैं नहीं। उन वासनाओं की तृप्ति के लिए स्वप्न आते हैं। और आदमी स्वप्न में वासनाओं को तृप्त करता है। इच्छाओं को तृप्त करता है। तो बहुत सुंदर सूत्र हमारे सामने है। कि जब प्रभु से पूर्ण प्रीति हुई, तो—

पूरन मन, पूरन सब दिसे

मन पूर्ण हो गया। और मन पूर्ण हो गया, तो दुनिया पूरी पूर्ण लगती है। तो इस सूत्र को कल अपन डेवलप (Develop) करेंगे कि “पूरन मन, पूरन सब दिसे, नहीं दुविधा को लाग।” इस सूत्र के द्वारा महोपाध्यायजी क्या कहना चाहते हैं।

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