Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 22-08-2026 | Pune Chaturmas

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पदस्थ ध्यान – गुण विचार निज गुण जे लहे

पदस्थ ध्यान का अर्थ है समवसरण में विराजमान प्रभु का ध्यान। अतीत की यात्रा में मैं और आप एक बार नहीं, अनेक बार समवसरण में जाकर आए हैं। लेकिन हमारी गलती यह हुई कि समवसरण में जाकर हमनें इंद्रों को, अप्सराओं को, चतुर्विध संघ को, प्रातिहार्यों को देखा; बस, प्रभु को ही नहीं देखा! जो देखने का था, वह नहीं देखा; नहीं देखने का था, वह देखा!

आज समवसरण में जाना है, सिर्फ प्रभु को देखने। प्रभु के मुख पर आनंद भी है, उदासीन दशा भी है; दोनों का एक मिलन है। इंद्र हों, अप्सरा हों, कोई भी हों, वह झुके क्योंकि झुकना उनका धर्म है। लेकिन प्रभु का किसी के साथ संबंध नहीं था। प्रभु पूर्ण रूप से पूरे संसार से अलिप्त थे। एक विरोधाभास… सब पर प्रभु का प्रेम था और साथ में प्रभु सबसे अप्रभावित, सबसे अलिप्त, परम उदासीन भी थे।

पदस्थ ध्यान में प्रभु के इन गुणों का अनुमान अपने में करना है। प्रभु के पास परम उदासीन दशा प्रकट है; मेरे पास भी वही उदासीन दशा ढकी हुई है। वहाँ प्रकट है; यहाँ ढकी हुई है – फर्क इतना ही है। तो प्रभु को देखकर, प्रभु की जो परम उदासीन दशा है, प्रभु की जो वीतराग दशा है, उसका अनुभव हमें हो – यह पदस्थ ध्यान।


गुर्जिएफ, आज के युग के योगाचार्य थे—उनके पास जितने भी साधक आते थे, गुर्जिएफ सबसे पहले एक लेसन उन्हें देते थे। गुर्जिएफ साधकों को एक घड़ी देते थे, सेकंड काटा वाली, और कहते कि सेकंड कांटे को तुम बरोबर गौर से देखो, सेकंड टू सेकंड उसका पीछा करो। सभी साधक उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते थे, सेकंड टू सेकंड गौर से कांटे को देख सकते थे, लेकिन दूसरा लेसन टफ था।

दूसरे लेसन में गुर्जिएफ कहते थे कि अब सेकंड कांटे को जो देखने वाला है, उसको देखो। अभी तो तुमने दृश्य को देखा, अब देखने वाले को देखो। मतलब कि आत्म साक्षात्कार। तुम्हारी ओर तुम्हारी दृष्टि स्थापित होनी चाहिए।

सभी साधक दूसरी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होते थे। वे कहते थे कि देखने वाले को देखना आसान नहीं है। क्यों आसान नहीं है? तुम सेकंड कांटे को देख सकते हो, तो उसके देखने वाले को तुम क्यों नहीं देख सकते हो? क्या कारण है? देखने वाले को जब देखना है, तब बीच में विचार नहीं चाहिए। जब तक विचार तुम्हारे पास है, तुम विचारों में खोए हुए हो, तब तक देखने वाला अदृश्य ही रहेगा। तुम दृश्यों की ओर तुम्हारी चेतना को केंद्रित करेंगे। देखने वाले को देखना है, तो तुम्हें निर्विचार होना चाहिए।

तो कोई भी ध्यान में तुम्हें जाना है। पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि विचारों पर तुम्हारा नियंत्रण होना चाहिए। जब तक विचारों पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है, तब तक ध्यान में जाना आसान नहीं है।

ध्यान का अर्थ है अनुभव। आत्मा का अनुभव, देखने वाले का अनुभव। तो क्या करना चाहिए? विचारों से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए? करना यह चाहिए कि कॉन्शियस माइंड को साइड में रख देना चाहिए। अभी क्या हुआ है? तुम्हारा कॉन्शियस माइंड जो है, वही सब प्रवृत्ति करता है, वही सब निगरानी करता है। तुम तो पर्दे के पीछे हो। कॉन्शियस माइंड ही सब कुछ काम करता है। अब कॉन्शियस माइंड को सुला दो, और तुम जागृत हो जाओ। तो ऐसे क्षण आने चाहिए जब कॉन्शियस माइंड नहीं है, अर्थात् सुषुप्त है, और तुम जागृत हो।

गुर्जिएफ ने एक ऐसा प्रयोग किया था। शाम की वेला एक साधक गुरु के पास आया, गुर्जिएफ के पास। और साधक ने गुरु के चरणों में पड़कर विनंति की कि गुरुदेव! मुझे साधना दीक्षा दो। गुरु तो तैयार ही होते हैं। गुरु तो इसलिए हि है।

मैं बहुत बार कहता हूँ—कि मेरा अवतार कृत्य पूर्ण हो गया। प्रभु को पाना था, पा लिया। मेरा अवतार कृत्य पूर्ण हो गया। अब प्रभु ने कहा है कि तू थोड़ी देर रुक जा, और दूसरों को भी प्रभु के साथ संपर्क तू करा दे। तो प्रभु ने कहा है, “मैं रुका हुआ हूँ।” तो मेरा अवतार कृत्य तो पूर्ण हो गया। लेकिन तुम्हारे लिए मैं रुका हूँ।

तो सद्गुरु तो तैयार ही होते हैं साधना दीक्षा देने के लिए, लेकिन सद्गुरु को डुअल एक्शन करना पड़ता है। डुअल एक्शन। दोहरी प्रक्रिया। पहले तुम्हें तैयार करने होते हैं, और जब तुम तैयार हो जाते हैं, तब तुम पर साधना दीक्षा का प्रयोग हम करते हैं। जहाँ तक तुम साधना दीक्षा स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हो, तब तक हम साधना दीक्षा तुम्हें देंगे नहीं। पहले तुम्हें तैयार करेंगे।

तो गुर्जिएफ ने देखा कि यह साधक कह रहा है कि गुरुदेव, मुझे साधना दीक्षा दो। लेकिन साधना दीक्षा के लिए मन स्थिर चाहिए। उसका तो मन ही अस्थिर है। कॉन्शियस माइंड कभी भी स्थिर नहीं होता। होता है? इतने दिन से आप प्रवचन सुन रहे हो। ऐसा एक दिन आया होगा कि 45 मिनट तक मैं बोलता रहा, और आप मुझे ही देखते रहे, और मुझे ही सुनते रहे। ऐसा हुआ कभी? पीछे कोई आ गया? पीछे देखना! अच्छा तो यह है, पीछे आँख नहीं है। वरना तो तुम्हें प्रवचन सभा में बैठाना बहुत ही दुष्कर कार्य हो जाए। तुम पिछली आँखों से देखते रहोगे, कौन आया। और फिर कहोगे मन में, “मैं इतना जल्दी आ गया, यह इतना लेट आया, क्यों इतना लेट आया।” अरे, वह लेट आया तो लेट आया। तू तेरी लगा दे। तू दूसरों की कहाँ लगाता है?

तो एक दिन ऐसा हुआ तुम्हारे लिए भी। एक दिन ऐसा हुआ? कि 40 मिनट्स, 45 मिनट्स मैं लगातार बोलता ही रहा, बोलता ही रहा। तुम मुझे ही देखते रहे, और मुझे ही सुनते रहे। ऐसा कभी बना है? अभी तक बना नहीं है, और बनने वाला भी नहीं है। महाराज साहिब, आपका तो धर्म है बोलने का। आपका धर्म एक ही है, बोलने का। लेकिन हमारे तो धर्म बहुत हैं। सुनेंगे भी, आँख से देखेंगे भी, लेकिन तुम्हें नहीं देखेंगे, आजू-बाजू वालों को देखेंगे। तुम टू इन वन, थ्री इन वन, फोर इन वन—कितने काम कर सकते हो? क्या तुम्हारी शक्ति है, बोलो?

माताएँ हमारी सामायिक भी करेंगी, प्रवचन भी सुनेंगी, माला हाथ में होंगी, माला भी फिरेगी। सामायिक होगा, माला फिरेगी, और प्रवचन में कोई अच्छा चुटकुला आ गया, तो माला थम जाएगी और सुन लेगी। सामायिक हो जाएगी, माला हो जाएगी, प्रवचन हो जाएगा, और आजू-बाजू वाली कौन सी नई साड़ी पहनकर आई? फोर इन वन।

लेकिन यह तकलीफ तुम्हारी नहीं है। यह तकलीफ कॉन्शियस माइंड की है। जब तक कॉन्शियस माइंड रहेगा, तब यही तकलीफ रहेगी। मैं भी कॉन्शियस माइंड वाला था, तो मेरी भी यही तकलीफ थी। जब तक कॉन्शियस माइंड रहता है, तब यही बात रहती है। इसलिए हमें साधना को कॉन्शियस माइंड के स्तर पर नहीं, लेकिन अस्तित्व के स्तर पर ले जाना है।

तो गुर्जिएफ ने सोचा कि यह कह रहा है कि गुरुदेव, मुझे साधना दीक्षा दो, लेकिन मैं दूँ कैसे? इसलिए गुर्जिएफ ने कहा कि हाल नया बन रहा है, और मिस्त्री लोग बिम सरीखा करते थे ऊपर, लेकिन समय हुआ तो वे चले गए। तू ऊपर चढ़ जा। इस लाकड़े के बिम को अपन सरका कर दे। वह साधक ऊपर चढ़ गया।

गुरु ने कहा, “वहाँ बैठ जा।” बैठ गया। अब गुरु नीचे से कहते हैं, “थोड़ा राइट में बिम ले ले। सेंटर में नहीं है।” उसने राइट किया। अरे, अरे, राइट ज्यादा आ गया। थोड़ा लेफ्ट ले। लेफ्ट लिया। नहीं, नहीं, अभी सेंटर में नहीं आया। थोड़ा और ज्यादा लेफ्ट। और ज्यादा लेफ्ट हुआ, तो सेंटर से फिर भटक गया। अरे, ज्यादा लेफ्ट हो गया। थोड़ा राइट ले अब। ऐसे गुरु राइट-लेफ्ट, राइट-लेफ्ट, राइट-लेफ्ट कराते रहे।

और पूरा दिन काम करके, थक करके आया हुआ आदमी था। और यह नीरस काम। एक बात देखना। खड़े-खड़े बात करेंगे, रात को नींद नहीं आएगी। लेकिन प्रतिक्रमण में नींद जरूर आएगी। प्रतिक्रमण में नींद आएगी। लेकिन प्रतिक्रमण के बाद कैसे हो? ओहो, तुम कब आए? देश में सब मज़ा में है? क्या है देश में? बारिश-बारिश कैसी है? अच्छा है। आधे घंटे खड़े-खड़े। नींद कहाँ गई?

जहाँ रस का विषय है, वहाँ नींद नहीं होती। नीरस विषय होता है, तो वहाँ नींद आ जाती है। तो यह नीरस विषय था। बिम सो राइट के लिए लेफ्ट से राइट लेना। तो से झपकी आ गई। नींद आ गई। गुरु नीचे से देख रहे हैं। गुरु को यही काम था। सोने दिया। दो मिनट, तीन मिनट, पाँच मिनट सोने दिया। और गुरु देखते हैं कि ऐसे बैठा है कि नीचे गिर नहीं जाएगा।

पाँच मिनट हुए। गुरु ने नीचे से आवाज़ दी, “ए, क्या कर रहा है?” और ऊपर बैठे हुए साधक ने आँख खोली। अब आप देखना, जब भी नींद से आप उठेंगे, रात को भी बाथरूम के लिए आप जाते हैं, उठते हैं। जब उठेंगे, उस समय आप जगे हुए हैं, लेकिन कॉन्शियस माइंड जागृत नहीं हुआ। हमारा तो अनुभव है। हम शाम को विहार करके गए हैं। हमने सब देख लिया है कि रात को पारिष्ठा-पनिका के लिए कहाँ जाने का। लेकिन जब हम सो गए हैं, रात को 12, 12:30 बजे उठते हैं बाथरूम जाने के लिए, पहले ही दंडासन हमारे हाथ में आ जाता है। हम जग गए हैं, लेकिन कॉन्शियस माइंड सुषुप्त है। तो खयाल नहीं आता है कि बाथरूम जाने की दिशा कहाँ है। हम ऊपर हैं या नीचे हैं। 30 सेकंड, 40 सेकंड, 50 सेकंड में कॉन्शियस माइंड जागृत हो जाएगा। और मेमोरी आ जाएगी कि हम ऊपर खड़े हुए हैं, बाथरूम जाने के लिए यहाँ जाने का है। सब स्मृति आ जाएगी। लेकिन यह जो 30 सेकंड का समय था, वह बहुत ही महत्वपूर्ण था। महत्वपूर्ण इसलिए था कि तुम थे, पर कॉन्शियस माइंड नहीं था। अभी क्या है? कॉन्शियस माइंड है, और तुम नहीं हो। तुम हो? अभी तुम हाजिर हो? मन कहाँ घूमता है? कहाँ घूमता है? इस क्षण देखो तो, हर व्यक्ति, मन कहाँ है?

तुम्हारे कॉन्शियस माइंड को पकड़ने के लिए हम चुटकुले देते हैं, हम कहानियाँ देते हैं। सिर्फ तत्वज्ञान क्यों नहीं देते? क्योंकि हम भी एक घंटे के लिए यहाँ आते हैं। और आप जैसे भले मानुष, हमको एक घंटा देते हैं। तो तुम्हें भी पकड़ कर रखना है। इसलिए तुम्हें पकड़ कर रखने के लिए हम कहानियाँ का भी उपयोग करते हैं, चुटकुलों का भी उपयोग करते हैं।

तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण समय था। कि कॉन्शियस माइंड नहीं था, पर तुम थे। यह भी देखना, एक्सीडेंट हो जाता है। तब हम कहते हैं कि खयाल ही नहीं आता है। एक्सीडेंट हुआ, यह बात मालूम है। लेकिन कॉन्शियस माइंड उस समय जागृत नहीं हुआ।

जब अप्रत्याशित घटना, अविचारित घटना घटित होती है, तब कॉन्शियस माइंड थोड़ी सेकंड के लिए आउट हो जाता है। एक्सीडेंट हो गया, तुम जागृत हो, कॉन्शियस माइंड गैर-हाजिर। तो गुर्जिएफ ने यह समय निकाला। नीचे से कहा, “क्या कर रहा है?” ऊपर वाले ने देखा, आँख खुली है, वह जागृत है, कॉन्शियस माइंड अजागृत है, सुषुप्त है। बस गुरु को यही समय चाहिए था। कि तुम हो, और वह न हो। समझ गए? मुझे कितनी सेकंड दोगे आज? तुम हो, और तुम्हारा कॉन्शियस माइंड न हो। तुम्हारा ज्ञात मन न हो।

तो वह आँख से देख रहा है गुरु को, और गुरु ने आँख से उसे देखा। अब गुरु ने तो पहले भी देखा था आँख से, लेकिन वह तैयार नहीं था। जब तक कॉन्शियस माइंड होता है, तब तक क्या होता है? गुरु कैसे हैं? गुरु प्रभावशाली हैं? गुरु का प्रवचन कैसा है? अब गुरु का प्रवचन कैसा है, वह निश्चित कौन करेगा? तुम्हारी बुद्धि नक्की करेगी? क्या? गुरु का प्रवचन कैसा है, वह तुम्हारी बुद्धि निश्चित करेगी? कि तुम्हारी श्रद्धा निश्चित करेगी?

मैं बहुत बार कहता हूँ, जब मुंबई या ऐसे बड़े शहरों में मैं जाता हूँ, और प्रतिष्ठित संघों में मेरा प्रवचन होता है, तब मैं वहाँ कहता हूँ कि तुम्हारे जैसे संघों में क्राउड पूलर ऑरेटर्स की आवश्यकता नहीं। समूह को खींचे ऐसे प्रवचनकार की यहाँ आवश्यकता नहीं। यहाँ क्राउड पूलर ऑरेटर्स नहीं चाहिए। यहाँ तो कोई भी महात्मा हो, पुस्तक देखकर भी बोले, “प्रभु ने ऐसा कहा था,” और तुम सब समवसरण में पहुँच जाओगे।

नई-नई जो सभा है, उस सभा के लिए क्राउड पूलर ऑरेटर की आवश्यकता है। तुम्हारे लिए आवश्यकता है? तो तुम गुरु को नहीं देखते हो। गुरु के आसपास के वातावरण को देखते हो। गुरु के पास गाड़ियाँ बहुत आती हैं, तो गुरु बहुत बड़े हैं। गाड़ियों की लाइन लगती है गुरु के पास। वह तो बहुत बड़े गुरु हैं। तो गाड़ियों से गुरु बड़े हो जाएँगे? महान हो जाएँगे? कि त्याग से गुरु महान हो जाएँगे? तुम्हारी अवधारणाएँ कैसी-कैसी होती हैं। लेकिन जब तुम बुद्धि से निर्धारण करोगे कि गुरु ऐसे होने चाहिए, तो बुद्धि ऐसा ही कहेगी। जब श्रद्धा आएगी, तब गुरु गुरु ही होते हैं।

मैं बहुत बार कहता हूँ, “There is the same fragrance and same taste in all of the respected Sadguru.” “There is the same fragrance and same taste in all of the respected Sadgurus.” पहुँचे हुए जो सद्गुरु हैं, वह सब सद्गुरु हैं। एक समान सुगंध और एक समान आस्वाद होता है। क्योंकि वह सुगंध प्रभु की होती है, वह आस्वाद प्रभु का होता है।

गुरु ने अपना हृदय टोटली वैकेंट कर दिया है, और उस वैकेंसी में परम चेतना का अवतरण हुआ है। तो आपको जो आस्वाद मिलता है, आपको जो सुगंध मिलती है, वह परम चेतना की मिलती है। गुरु को पहचानना, वह बुद्धि का काम नहीं है।

तो कॉन्शियस माइंड दूर गया, और वे गुरु को देख रहा है ऊपर वाला। पर गुरु उसे देख रहे हैं। हो गया शक्तिपात। साधना दीक्षा हो गई। फिर वह नीचे उतरा। अब नहीं कहेगा कि साधना दीक्षा दो। अब कहता है, “बहुत-बहुत शुक्रिया, आभार, आपने साधना दीक्षा दे दी।” हो गया काम। सेकंड हो गया। तो ये गुरुओं के पास एक टेक्निक थी, कि तुम्हारे विचार को कैसे झंझोड़ दें, कैसे बिखेर दें।

हमने रूपस्थ ध्यान की बात की थी। आज पदस्थ ध्यान की बात करते हैं। पदस्थ ध्यान का मतलब यह है कि समवसरण में विराजमान प्रभु का ध्यान करना। बहुत ही सुंदर कंडिका आई। हिंदी भाषा में यही है।

“तीर्थंकर पदवी प्रधान, गुण अनंत को मानो स्थान।

गुण विचार निज गुण जे लहे, ध्यान पदस्थ सुगुरु इम कहे।”

ये चिदानंद जी महाराज के शब्द हैं। लेकिन अंतिम पद बहुत ही सुंदर। “ध्यान पदस्थ सुगुरु इम कहे।” मैं नहीं कहता हूँ। सद्गुरु कहते हैं। मुझे कहने का कोई अधिकार नहीं। सद्गुरुओं की परंपरा, जो बात कह गई है, उसे ही मुझे रिपीट करने का है। मुझे मेरे घर की कोई नई बात करने की नहीं है। शास्त्रों में जो बात है, और परंपरा में जो बात है, उन बातों को ही मुझे रिपीट करने की है।

मैं ऐसा मानता हूँ, ऐसा कोई भी प्रवचनकार कभी नहीं कहेगा। शास्त्रों में ऐसा कहा है, लेकिन मैं ऐसा मानता हूँ। कोई प्रवचनकार ऐसा नहीं कह सकता। वह कहता है, “शास्त्रकार भगवंतों ने ऐसा लिखा है।” शायद हमारी बुद्धि में यह बात न भी उतरे, लेकिन हमारी बुद्धि बहुत ही स्थूल है, और शास्त्रों की बात बहुत ही सूक्ष्म है। इसलिए सूक्ष्म बात हमारी स्थूल बुद्धि में न उतरे, लेकिन शास्त्र की बात ही सच्ची है।

तो यह बात कह रहे हैं चिदानंद जी महाराज, “ध्यान पदस्थ सुगुरु इम कहे।” तो दूसरा ध्यान कौन सा? पदस्थ ध्यान। श्रेष्ठ पद कौन? तीर्थंकर पद। उस पद में रहे हुए जो परमात्मा, उसका अनुभव करना, वह पदस्थ ध्यान।

तो आज हम महाविद्या पहुँच जाएँगे। प्रभु के समवसरण में। आपसे मैं पूछूँ, अतीत की यात्रा में, समवसरण में गए हुए हैं? बोलो तो। याद है? नहीं याद है। लेकिन मैं और आप समवसरण में जाकर आए हैं। एक बार नहीं, अनेक बार। लेकिन हमारी गलती क्या हुई?

गलती यह हुई कि समवसरण में जाकर जो देखने का था, वह नहीं देखा। नहीं देखने का था, वह देखा। क्या किया? बोलो। समवसरण में गए, लेकिन किया क्या? इंद्रों को देखे। ओह, 64 इंद्र प्रभु के चरणों में झुके। अरे, इंद्रों को नहीं देख, प्रभु को देख। 64 इंद्र मानते हैं कि हमारे लिए पूज्यतम प्रभु हैं, तो वे प्रभु कैसे होंगे? तो हमने इंद्रों को देखे। अप्सराओं को देखी। चतुर्विध संघ को देखा। प्रातिहार्यों को देखा। प्रभु को ही नहीं देखे। और कहा, “समवसरण में जाकर आए।” क्या जाकर आए?

समवसरण में गए थे मेघकुमार। राजकुमार मेघकुमार। वेरी फर्स्ट टाइम इन हिज लाइफ, समवसरण में गए थे। पहली बार प्रभु को देखे। प्रभु को पिए। इतना सम्मोहन हो गया कि मेघकुमार को लगता है कि अब प्रभु के बिना जीना मेरा दुभर है। मैं नहीं जी पाऊँगा। बिना प्रभु मैं नहीं जी पाऊँगा। एक ही बार प्रभु को देखे। प्रभु के ओरा फील्ड में आ गए। इतना सम्मोहन लग गया कि अब प्रभु के बिना मैं कैसे रहूँ?

समवसरण में नहीं गए थे, तब तक दीक्षा लेने का कोई विचार नहीं था। स्वप्न में भी सोचा नहीं था मेघकुमार ने कि मैं दीक्षा लूँगा। हमारा तो फ्यूचर प्लानिंग है सबका। हमारा सबका तो फ्यूचर प्लानिंग है। दीक्षा ही लेनी है। आनंद कहाँ है? आनंद कहाँ है? वहाँ के यहाँ? बोलो। आनंद कहाँ है? यहाँ? कि वहाँ? यहाँ? और आनंद चाहिए, तो फिर कहाँ आने का? संयम ही योग्य।

तो मेघकुमार ने सोचा नहीं था, समवसरण में जाने के पूर्व, कि मैं दीक्षा लूँगा इस जीवन में। लेकिन प्रभु का सम्मोहन ऐसा लग गया, एक घंटे में मन बदल गया, अब लगता है कि बिना प्रभु मेरा जीवन दुभर है। माँ के पास गया मेघकुमार, और माँ से कहा कि माँ! अब प्रभु के बिना एक क्षण मैं नहीं जी पाऊँगा। यह सम्मोहन है प्रभु का।

तो आज समवसरण में जाना है, और प्रभु को देखने। सिर्फ प्रभु को। प्रभु के मुख पर क्या है? आनंद भी है, उदासीन दशा भी है। दोनों का एक मिलन है। परम आनंद है मुख पर। और परम उदासीन दशा है। इंद्र हों, अप्सरा हों, कोई भी हों, वह झुके। झुकना उनका धर्म है। उससे मुझे कोई संबंध नहीं है।

प्रभु का किसी के साथ संबंध नहीं था। प्रभु पूर्ण रूप से पूरे संसार से अलिप्त थे। एक विरोधाभास। प्रभु सबको चाहते थे। सब पर प्रभु का प्रेम था। लेकिन प्रभु सबसे अप्रभावित, सबसे अलिप्त थे। यह परम उदासीन दशा है। किसी से हम प्रभावित न हों।

“तीर्थंकर पदवी प्रधान, गुण अनंत को मानो स्थान।”

अनंत गुण तीर्थंकर प्रभु में हैं। अब पदस्थ ध्यान में क्या करना है?

“गुण विचार निज गुण जे लहे।”

प्रभु का जो गुण है, उसका अनुमान अपने गुण में करना है। प्रभु के पास परम उदासीन दशा है। वह खुली है, प्रकट है। मेरे पास भी वही उदासीन दशा है। ढकी हुई है। वह प्रकट है या ढकी हुई है, फर्क इतना ही है। फर्क ज्यादा नहीं। प्रभु भी वीतराग हैं, और तुम भी वीतराग हो। तुम रागी नहीं हो। रागी तुम्हारा मन है। रागी तुम्हारा चित्त है। तुम रागी नहीं हो, तुम वीतरागी हो।

निश्चय नय से जब तक आत्म तत्व का चिंतन नहीं करोगे, तब तक तुम्हारी साधना अपलिफ्टेड नहीं होगी। तो यह रोज़ सोचना है, कि मैं वीतराग ही हूँ। राग मुझमें है ही नहीं, हो भी नहीं सकता। राग और तुम्हारे निर्मल स्वरूप में कैसे हो सकता है? और तुम वीतराग अभी नहीं हो। तो जब तुम वीतराग होगे, तो वीतरागता बाहर से आएगी? अभी तुम वीतराग नहीं हो, और वीतराग तुम होगे, तीरों में गुणठाणे पर, तो वीतराग दशा बाहर से आएगी? तुम्हारे भीतर अभी वीतराग दशा है। ढकी हुई है। और तुम अज्ञान से भ्रमणा वश मान बैठे हो कि मैं रागी हूँ। तुम रागी नहीं हो। राग तुम्हारे मन में है, राग तुम्हारे चित्त में है, राग तुम्हारी निष्ठा में है। तुम्हारे स्वरूप में राग है ही नहीं। द्वेष तुम्हारा स्वभाव ही नहीं है। अहंकार तुममें है ही नहीं।

अपनी सभा में क्या हुआ? व्यवहार मार्ग की प्ररूपणा तो बहुत ही होती है, लेकिन निश्चय की छूट गई। अब क्या हुआ? श्रोता बुद्धिमान होने लगे। तो क्या हुआ? जो निश्चय नय वाले नहीं हैं, निश्चयाभास वाले हैं, वहाँ भी हमारे लोग पहुँच गए। ऐसे बहुत अभी के प्रवचनकार हैं, जो निश्चयाभास की बात करते हैं। हमारे जैन युवा वर्ग बहुत बड़ी संख्या में वहाँ पहुँच गया है। हमारे महाराज साहिब तो बस उपधान और संघ की बात करते हैं। आत्मा की बात तो करते ही नहीं। मैं दोहरा कार्य करता हूँ। ड्यूल एक्शन। पहले सभा को तैयार करता हूँ, और बाद में निश्चय की बात करता हूँ। तो अभी धीरे-धीरे मुझे तुम्हें तैयार करना है, कि निश्चय की बात तुम सुन सको। वरना क्या होगा? कोई तुम्हें पूछेगा, “इतने सामायिक किए, क्या हुआ?” समभाव तुम्हारा प्रकट तो हुआ नहीं। क्रोध तो ऐसा का वैसा है, तो सामायिक से क्या हुआ? तुम अधूरे मनुष्य सामायिक को छोड़ देते हो। अरे, सामायिक तो अमृत क्रिया है। सामायिक को छोड़ने का नहीं है। सामायिक को सही ढंग से करने का है। तुम सामायिक करो, और समभाव में न आओ, वह कैसे बन सकता है?

पाँच रोटी खाई, और पेट नहीं भरा, तो पेट में कुछ गड़बड़ है। शरीर में कुछ गड़बड़ है। रोटी में गड़बड़ नहीं है। रोटी तो तीन, चार, पाँच कोई खाएगा, तो पेट भर जाएगा। तुम्हारा पेट नहीं भरा था, तो तुम्हारे पेट में क्यों गड़बड़ है? ऐसे सामायिक तो अमृत क्रिया है। लेकिन निश्चयाभास वाले जो होते हैं न, वह क्रिया को ही छुड़वा देते हैं।

मेरा एक मुमुक्षु था, एक पंडित जी की सभा में जाता था। पंडित जी पहले तो थोड़ी-थोड़ी व्यवहार की बात भी करते थे। लेकिन देखा कि मेरी पकड़ में श्रोता वृंद आ गया है। फिर व्यवहार मार्ग का किया खंडन। कि पूजा निकम्मी है। कि सामायिक निकम्मा है। यह निकम्मा, यह निकम्मा। इसका कोई अर्थ नहीं। इसका कोई अर्थ नहीं। मेरा जो मुमुक्षु था न, वह बुद्धिमान था। वह खड़ा हो गया। उसने कहा, “पंडित जी, ये क्रियाएँ काम की नहीं हैं। तुम्हारा प्रवचन क्या काम का है?” वह भी शब्द ही है न। हमारी प्रतिमा जो है, वह पुद्गल है। तो तुम्हारा शब्द है, वह भी पुद्गल ही है न। तो पुद्गल से धर्म होता है कभी? चलो, तुम प्रवचन छोड़ो या न छोड़ो, मैं तुम्हारे प्रवचन को छोड़कर जाता हूँ।

तो प्रभु को देखकर, प्रभु की जो परम उदासीन दशा है, प्रभु की जो वीतराग दशा है, उस वीतराग दशा का, उस उदासीन दशा का अनुभव हमें होना चाहिए। हमारे पास अनुभव है। We have the experience. प्रभु का जो आनंद है, उस आनंद की एक छोटी सी glimpse हमने अनुभूत की है। हमारे पास जो आनंद है, वह अनुभूति का स्तर का आनंद है। खाने के बाद मिला हुआ आनंद नहीं है। संयोगजन्य आनंद हमारे पास नहीं है। हमारे और तुम्हारे आनंद में फर्क इतना ही है। तुम्हारे पास संयोगजन्य सुख है। अच्छे कपड़े पहने, जरा अच्छा लगता है। लोगों ने कहा, “वाह, बहुत सुंदर गहने पहने।” पचास लाख के गहने लाए, पतिदेव। फिर क्या करेंगे? अभी तो चेन स्नेकर्स बहुत होते हैं। पहनकर बाहर जाओगे तो कोई चेन स्नेकर मिल जाएगा। घर के रूम में, रूम बंद करके, गहने पहन लेना। दर्पण में देख लेना। चलेगा? अरे, गहने हैं। दूसरा नहीं देखेगा, तो गहनों का अर्थ क्या? तो यह गहने तुम्हारे लिए हैं या दूसरों के लिए? कितने परोपकारी तुम हो। गहने का भार तुम्हें ऊँचकनेका। और प्रसन्न दूसरों को कर देगा। और यह हमारे श्रावक जी भी कोई कम नहीं हैं। यह भी भीतर जो पहनते है, बनियान, वह खुरदुरा होता है। ऊपर पॉलिएस्टर का शर्ट पहनते हैं। किसी की आँख को खुजली नहीं। सबकी आँखों को कोमल लगे। मेरी चमड़ी को बनियान खुरदुरा है, खुंचेगा तो खुंचेगा, कोई बात नहीं। मैं तो परोपकारी आदमी हूँ। परोपकारी हु? चमड़ी को टच कौन करता है? बनियान या शर्ट। बनियान। तो बनियान खुरदुरा चलेगा और शर्ट पॉलिएस्टर का चलेगा। क्यों? तुम परोपकारी आदमी हो।

तो तुम्हारे पास सुख है, वह संयोगजन्य है। दूसरा कहता है, “तुम अच्छे हो,” तब तुम्हें लगता है कि हाँ, मैं ठीक हूँ। तो तुम्हारा सुख दूसरे पर आधारित है। हमारा आनंद हम पर आधारित है।

कोई कहे कि महाराज साहिब, क्या ऐसे वस्त्र पहने हैं? यह तो बहुत पुराने हैं। 2500 वर्ष पहले भी ऐसे ही वस्त्र पहने जाते थे। हमको देखो न, 10 वर्ष में। यहाँ से यहाँ, यहाँ से यहाँ। स्लीवलेस से फुल स्लीव, फुल स्लीव से स्लीवलेस, स्लीवलेस। चले ही जाते हैं हम। पर तुममें बदलाव ही नहीं। तो हम कहेंगे कि हमारा आनंद हम पर निर्भर है, दूसरों पर नहीं। तो

“गुण विचार निज गुण जे लहे, ध्यान पदस्थ सुगुरु इम कहे।”

तो जब भी प्रभु का दर्शन करो, प्रभु के मुख पर जो आनंद है, सोचना कि वैसा ही आनंद आपके भीतर है।

आप आनंदघन हैं। आनंद आपके भीतर है। लेकिन तुम घटना-प्रभावित हो गए। इसलिए घटनाओं के कारण तुम पीड़ित होते हो। यदि तुम घटनाओं को साइड में रख दो, तुम आनंदघन ही हो। रोग आया तो आ गया। चलो, आगे चलो। जो भी हो, उसको स्वीकार कर लो।

मुझे एक प्रवचन में पूछा गया था, कि प्रभु की पूरी साधना को एक शब्द में समेटना हो, तो वह शब्द कौन सा होगा? तब मैंने कहा कि “सर्वस्वीकार” एक शब्द ऐसा है, जो प्रभु की संपूर्ण साधना का प्रतिनिधित्व करता है। सर्वस्वीकार। जो भी आए, अनुकूलता-प्रतिकूलता, सबका स्वीकार, यह प्रभु की साधना है। तो आपके पास भी सर्वस्वीकार आ जाए, तो आप आनंदघन ही हैं। तो प्रभु के आनंद को देखकर, हमारे आनंद को हमें प्रकट करना है। तो यह पदस्थ ध्यान है। थोड़ी पदस्थ ध्यान की अगली बातें अगले चरण में करते हैं।

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