मुख दीठे सुख ऊपजे, दरिसने अतिही आनंद
मुख दीठे तो एक प्रतीक है; यहाँ पाँचों इंद्रियाँ और मन की बात है। जब वे प्रभु के साथ जुड़ते हैं, तब सुख पैदा होता है। संसार में सुख है ही नहीं। तीन तत्त्व हैं: सुखाभास, सुख और आनंद। जो सुख जैसा लगे, लेकिन सुख न हो, उसे सुखाभास कहते हैं। आपको सुख की दुनिया में ले जाना है तभी आपको मालूम पड़ेगा कि आपके पास सुख नहीं है, सुखाभास है। और सुख से भी आगे आपको आनंद में ले जाना है।
कोरी-कोरी आँखों से तो प्रभु का दर्शन आप रोज़ करते हो। पर अगर प्रभु को देखने पर याद आए कि यह प्रभु न होते, तो मैं कहाँ होता? इतनी भूमि प्रभु तुम ही आण्यो – प्रभु! तुम ही मुझे उठाकर मनुष्य जन्म में लेकर आए। ये पाँच इंद्रियाँ, मन और बुद्धि भी प्रभु! तेरी कृपा से मिले हैं। प्रभु का दर्शन होने पर कृतज्ञता से, अहोभाव से आँखें भीग जाएं तब सुख का अनुभव होता है।
हमारी इंद्रियाँ, हमारा मन प्रभु के साथ जुड़ जाए, संतों के साथ जुड़ जाए, साधना के साथ जुड़ जाए, तब हमारे मन में, हमारे शरीर में सुख का अवतरण होता है। और जब हमारा पूरा अस्तित्व, हमारी पूरी चेतना प्रभुमय बन जाती है, तब आनंद नाम की संघटना का जन्म होता है!
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित स्तवना। प्रथम कड़ी का उत्तरार्ध: मुख दीठे सुख ऊपजे, दरिसने अतिही आनंद लाल रे।
प्रभु के साथ जुड़ी हुई दो संघटनाओं की चर्चा महोपाध्याय जी यहाँ करते हैं: सुख और आनंद। सुख भी तभी प्राप्त होता है जब हमारी इंद्रियाँ और हमारा मन प्रभु के साथ जुड़ जाते हैं। और जब हमारा पूरा अस्तित्व, हमारी पूरी चेतना प्रभुमयी बनती है, तब आनंद नाम की संघटना का जन्म होता है।
“मुख दीठे सुख ऊपजे” – आँख दर्शन करती है प्रभु के मुख का, लेकिन उस समय कॉन्शियस माइंड (Conscious mind) भी उसमें जुड़ा हुआ है। सिर्फ आँख देख नहीं सकती, वर्गीकरण भी नहीं कर सकती। आँख तो सिर्फ कैमरा (Camera) का लेंस (Lens) है; प्रतिबिंब पड़ गया। प्रतिबिंब कैसा है? अच्छा है, अच्छा नहीं है, यह सब वर्गीकरण कॉन्शियस माइंड करता है। तो जब हमारी इंद्रियाँ और हमारा मन प्रभु के साथ जुड़ते हैं, तब सुख हमें प्राप्त होता है।
प्रभु का दर्शन किया, आँखों से आँसू निकले थे? आज प्रभु का दर्शन किया था, उस समय क्या हुआ था? मेरु अभिषेक के बाद इंद्राणी माता प्रभु महावीर के परम पावन देह को पोंछ रही हैं। प्रभु के एकदम निकट जाने का हुआ। प्रभु का मुख देखने पर इतना तो आनंद इंद्राणी माँ के हृदय में उत्पन्न होता है कि वह आनंद आँखों से डिस्चार्ज (Discharge) होता है अश्रु के रूप में।
बहुत सुंदर घटना उस समय घटित हुई। प्रभु के मुख को देखकर इंद्राणी माँ की आँखें आँसू से भर आई हैं। भीगापन कहाँ है? इंद्राणी माँ की आँखों में। लेकिन वह भीगापन प्रतिबिंबित होता है प्रभु के मुख पर। इंद्राणी माँ को लगता है कि प्रभु का मुख अभी भीगा है, भीगा है, भीगा है… और वह पोंछ रही है, पोंछ रही है! प्रभु को कितनी बार हमने देखे? कितनी बार दर्शन हो गए? लेकिन ऐसी घटना कब घटित हुई जैसी घटना इंद्राणी माँ की आँखों में घटित हुई थी?
प्रभु का दर्शन तीन रूप से होता है। पहली बात तो यह कि जो दर्शन आप रोज़ कर रहे हैं: कोरी-कोरी आँखों से। दूसरा दर्शन है: प्रभु के देखने पर याद आता है कि यह प्रभु न होते तो मैं कहाँ होता? “इतनी भूमि प्रभु तुम ही आण्यो,” प्रभु तुम ही मुझे उचककर मनुष्य जन्म में लेकर आए। ये पाँच इंद्रियाँ, मन और बुद्धि प्रभु की कृपा से हमें मिले हैं। तो यह याद आती है और आँखें भीगी हो जाती हैं। तो पहला दर्शन तो हुआ कोरी आँखों से, दूसरा दर्शन प्रभु का हुआ भीगी-भीगी आँखों से।
अब एक तीसरा भी दर्शन है, जो शायद आप नहीं कर पाए हों। तीसरा दर्शन यह कि आपकी आँख कोरी है, और आपकी इच्छा है कि प्रभु के भीगे रूप का दर्शन करें। अब आँख तो कोरी है, प्रभु के भीगे रूप का दर्शन कैसे होगा? तब शास्त्रों ने यह विधि बताई कि: “तुम्हारी आँख कोरी है, उस समय तुम सद्गुरु की आँखों में देखो।” सद्गुरु की आँखों में प्रभु विराजमान हैं। सद्गुरु की आँखें सतत भीगी होती हैं। उस भीगापन की पृष्ठभूमि पर प्रभु का जो रूप है, उस रूप का दर्शन करो। तो आपकी आँख कोरी है, प्रभु के भीगे रूप का दर्शन तुम्हें हो जाएगा। तो आँख प्रभु के साथ जुड़ती है, सुख नाम की संघटना पैदा होती है।
फिर दूसरी इंद्रिय, श्रवण इंद्रिय। मानविजय महाराज साहिब ने शीतलनाथ प्रभु की स्तवना में कहा कि: “प्रभु! तेरा नाम मैं सुनता हूँ, और भीतर आनंद ही आनंद छा जाता है।” प्रभु का नाम सुनने पर हृदय में आनंद ही आनंद!
रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक घटना है। आज के युग के हिंदू संतों में वे बहुत प्रभावशाली हुए, परमात्मा के परम भक्त थे। वे सुबह स्नान करने के लिए तालाब की ओर जाते। वहाँ स्नान कर मंदिर में जाते। मंदिर में जाने के बाद समय का कोई निर्धारण नहीं होता। दो घंटे भी लगते पूजा में, चार घंटे भी लगते और शाम भी हो जाती कभी! प्रभु सामने हैं, बस प्रभु को ही निहार रहे हैं। न देह की सुध है, न समय का ख्याल है, पूरी चेतना प्रभु में डूब गई है!
अब संत के दर्शन के लिए रोज़ हजारों लोग आते थे। जो लोग रात की गाड़ी से आए हुए हैं और सुबह जिनको जाना है, उनको ख्याल है कि मंदिर में जाने के बाद संत बाहर कब निकलेंगे वह किसी को भी ख्याल नहीं है। उनके पट्ट शिष्य से पूछो कि: “गुरुदेव कब बाहर निकलेंगे मंदिर से?” तो कहे, वह तो गुरुदेव जाने, मैं कहाँ से जानूँ? रामकृष्ण जी को प्रभु पकड़ रखते थे, और रामकृष्ण जी कहते थे कि: “मैं कैसे आऊँ बाहर? प्रभु का सम्मोहन, प्रभु मुझे पकड़ रखते थे।” आपको नहीं पकड़ते, क्यों? प्रभु आपको पकड़ते? जब भी जाना हो, जा सकते हो मंदिर से?
एक सम्मोहन, एक परम आकर्षण परमात्मा का नहीं होता? ऐसा होना चाहिए कि तुम उस सम्मोहन से निकल न सको। आधा घंटा तो मंदिर से बाहर निकलने में लग जाए। कैसे निकलो तुम? तुम्हारा शरीर मना करता है, तुम्हारा मन मना करता है। तुम निकलोगे तो कैसे निकलोगे?
तो रात की गाड़ी से जो भक्त आए हुए हैं और जिनको सुबह कोलकाता चले जाना है, वे भक्त क्या करते थे? कि तालाब से मंदिर तक लाइन लगाकर खड़े रहते। संत वहाँ से पसार होते, संत के चरणों में वंदना करके वे लोग घर पर पहुँच जाते। उस समय आश्रम की ऑफिस (Office) से एक उद्घोषणा होती थी कि: “जब भी तुम्हारे पास से गुरुदेव गुजरें, तब प्रभु का जयघोष उच्चारना नहीं।” गुरुदेव ने मना किया था कि मेरा जयघोष कभी भी बोलना नहीं। “मैं तो एक सामान्य मनुष्य हूँ।” कोई भी व्यक्ति उच्च कक्षा पर कब पहुँच सकता है? जब अपन को वह सामान्य व्यक्ति समझता है, तब। जो मानता है कि मैं श्रेष्ठ हूँ, वह कभी श्रेष्ठ नहीं होता है। “मैं सामान्य से भी सामान्य हूँ, प्रभु के चरणों की मैं तो रज हूँ,” वह व्यक्ति ही असाधारण बन सकता है। तो संत ने मना किया था कि मेरे नाम का जयघोष कभी भी उच्चारने का नहीं, प्रभु के नाम का जयघोष उच्चारने का।
अब ऑफिस से सूचना प्रसारित होती है कि: “संत तुम्हारे पास से पसार हों, तब प्रभु के नाम का जयघोष भी तुम उच्चारो नहीं।” एक व्यक्ति ने गुरुदेव का दर्शन कर लिया, फिर ऑफिस में पहुँचा और ऑफिस बेयरर (Office Bearer) से पूछा कि: “क्यों तुम मना करते हो? गुरुदेव ने कहा है कि मेरे नाम का जयघोष नहीं उच्चारने का, तो हम गुरुदेव का नाम का जयघोष नहीं उच्चारते, लेकिन प्रभु के नाम का जयघोष हम उच्चारें तो तुम मना क्यों करते हो?”
उस समय ऑफिस बेयरर ने कहा कि: “तुम्हें मालूम नहीं है कि हमारे गुरुदेव इतने प्रभुमय हैं कि प्रभु का नाम सुनते ही उन्हें समाधि लग जाती है।” प्रभु के नाम सुनते ही उन्हें समाधि लग जाती है! एक दिन तो ऐसा हुआ, तालाब से स्नान करके वे बाहर निकले और शिला जैसा भाग था, पत्थर जैसा भाग। और एक भक्त आया और प्रभु के नाम का जयघोष उच्चारा। गुरुदेव तुरंत बेहोश हो गए। समाधि में जाने का मतलब क्या? शरीर का होश चुक जाता है। अच्छा हुआ कि दो-तीन गुरुभक्त वहाँ थे, उन्होंने गुरु के शरीर को पकड़ लिया, वरना गुरुदेव का देह पत्थर पर पटक जाता। और गुरुदेव को न जाने कितनी ईजाएँ हो जाती। तो प्रभु का नाम सुनने पर उन्हें समाधि लग जाती।
मैंने जब यह कथा पढ़ी थी, तब मुझे भी रामकृष्ण परमहंस की ईर्ष्या आई थी। आपको ईर्ष्या किसकी आती है? अंबानी की, अदानी की? बोलो तो? ईर्ष्या का मतलब क्या होता है? जो चीज़ तुम्हारे पास नहीं है और तुम जो चीज़ की प्राप्ति की इच्छा करते हो, वह जिसके पास है उसके प्रति तुम्हें ईर्ष्या होती है। तो तुम्हारे पास पैसे ही नहीं हैं, ऐसा थोड़े है? तुम्हारे पास भक्ति भी नहीं है! तो भक्त को देखेंगे तो ईर्ष्या नहीं आएगी कि ऐसी भक्ति मुझे कब मिले? कलापूर्णसूरी दादा को हमने देखे थे। दादा की ईर्ष्या आई थी? दादा की भक्ति की ईर्ष्या आई थी? कभी प्रभु से माँगा था कि: “प्रभु, दादा जैसी भक्ति मुझे दे दो। मुझे दूसरा कुछ नहीं चाहिए, बस ऐसी भक्ति मुझे दे दो।” ऐसी भक्ति मिल गई तो मोक्ष मिल गया।
आप प्रभु के पास जाते हो, कभी-कभी कुछ माँगते भी हो, लेकिन क्या माँगते हो? माँगते क्या हो? शालिभद्र जैसी रिद्धि। अब आपको यह मालूम भी नहीं है कि शालिभद्र की रिद्धि क्यों माँगते हो? आपको तो बस ९९ पेटीयाँ दिखती हैं। आपको दिखता क्या है? ९९ बॉक्सेस (Boxes) रोज़ उतरते हैं, तो मुझे भी शालिभद्र जैसी रिद्धि चाहिए। लेकिन शास्त्रों ने कहा कि रिद्धि माँगनी ही है, तो शालिभद्र जैसी माँगो। क्यों? कि जब शालिभद्र को हुआ कि मुझे दीक्षा लेनी है, तो यह जो रिद्धि थी, वह शालिभद्र को पकड़ नहीं सकी। शालिभद्र ने छोड़ दिया रिद्धि को।
तुम्हारा बंगला तुम में पकड़े हुए है। ठीक है? तुम्हारी संपत्ति तुम में पकड़े हुए है। इसलिए कहता हूँ, संपत्ति नहीं माँगना, पैसे नहीं माँगना, लक्ष्मी माँगना। लक्ष्मी माँगोगे तो जब भी छोड़नी है, छोड़ सकोगे। तो शालिभद्र की रिद्धि इसलिए माँगी कि जब भी शालिभद्र ने इच्छा की, शालिभद्र रिद्धि को छोड़ सका। ऐसा तो नहीं सुना है कि शालिभद्र क्या करे बेचारा, अब ९९ पेटीयाँ आनी बंद हो गई, फिर शालिभद्र ने दीक्षा ली! ऐसा तो नहीं सुना? पेटीयाँ उतरती थी, पेटीयाँ उतरने की चालू थी, और शालिभद्र ने दीक्षा ले ली। बरोबर? तो शालिभद्र की रिद्धि शालिभद्र को बाँध नहीं सकी। तुम्हारी संपत्ति तुम्हें बाँधे हुए है न? तुम्हें बाँधे हुए है? संपत्ति ने तुम्हें बाँधा है कि तुमने संपत्ति को बाँधा है?
एक आदमी ने खंभा पकड़ लिया, बड़ा मोटा स्तंभ था, पकड़ लिया और कहा: “मैं नहीं छूट सकता, मैं नहीं छूट सकता, खंभे ने मुझे पकड़ लिया!” अरे, खंभे ने पकड़ा है कि तूने खंभे को पकड़ा? तो प्रभु के पास क्या माँगेंगे? “कलापूर्णसूरी दादा जैसी भक्ति हमें दो,” ऐसा प्रभु के पास माँगो।
श्रवणेंद्रिय के बाद घ्राणेंद्रिय, नासिका। प्रभु के देह की सुगंध कभी एन्जॉय (Enjoy) की है? बोलो तो! समवसरण में हम गए थे, याद है? समवसरण में जाकर आए हो, याद है? एक बार नहीं, कितनी बार जाकर आए हो, याद है? समवसरण में गए थे, लेकिन वहाँ जाकर जो देखना था वह नहीं देखा था, जो सूँघना था वह नहीं सूँघा था। फूलों की सुगंध उस समय एन्जॉय की थी, लेकिन प्रभु के देह से जो सुगंध आ रही थी, उस सुगंध को एन्जॉय की थी?
मानविजय महाराज साहिब ने स्तवना में कहा कि सुगंध दो जात की होती है: पुष्पों की सुगंध, इत्तर की सुगंध। लेकिन यह जो सुगंध है न, वह आदमी को भटकाती है, वह भोग की दुनिया में व्यक्ति को ले जाती है। प्रभु के देह की सुवास, प्रभु के देह की सुगंध हमें आध्यात्मिक जगत में भेज देती है। शायद हम भूल भी गए हैं, प्रभु के देह की सुगंध हमने एन्जॉय भी की हो, लेकिन अभी हम भूल गए हैं।
‘योगदृष्टिसमुच्चय’ में हरिभद्राचार्य ने लिखा है कि योगियों के शरीर से भी सुगंध उठती है। योगी पुरुष जो होते हैं, उनके शरीर में दुर्गंध पैदा होती ही नहीं। अपन खाते हैं, आहार लेते हैं, उस आहार से दुर्गंधी वातावरण पैदा होता है। योगी पुरुष का आहार बहुत ही कम होता है, और वह भी आहार सुगंध में परिवर्तित होता है, दुर्गंध में नहीं।
कलापूर्णसूरी महाराज साहिब के देह से सुगंध आती थी। हमारे दादा गुरुदेव भद्रसूरी दादा थे, उनकी देह से सुगंध आती थी। दादा गुरुदेव भद्रसूरी दादा ज्यादातर जूना डीसा गांव में रहते थे। भक्तों की बहुत इच्छा कि: “गुरुदेव यहाँ ही आप विराजो। अब आपकी देह शिथिल हो गई है, अब आपको विहार नहीं करना है।” तो गुरुदेव भक्तों की विनती को स्वीकार कर ज्यादातर उस गांव में रहते थे।
उस गांव के एक व्यक्ति ने मुझसे कहा था, जो पीछे से मुनि हुए और उपाध्याय हुए। उपाध्याय महायशविजय जी, मुनि धुरंधरविजय जी के पिताजी। उपाध्याय महायशविजय जी ने मुझे कहा था कि: “मैं भी जूना डीसा का हूँ। मैंने दीक्षा नहीं ली थी, तब हम रोज़ सुबह दादा के सानिध्य में प्रतिक्रमण करने के लिए सुबह पाँच बजे जाते थे। अब सियाले का समय हो, सब खिड़कियाँ बंद हों, दरवाजे भी बंद हों, और सुबह पाँच बजे दादा जिस रूम (Room) में विराजमान हैं, उस रूम के द्वार को हम खोलें तो एक सुगंध हमें मिली। और वह सुगंध दादा के देह से उठती थी।” तो योगी पुरुषों के देह से सुगंध उठती है। और उस सुगंध को हम एन्जॉय कर लें, तो आध्यात्मिक जगत में हमारा प्रवेश हो जाता है।
आज का सूत्र हमारे सामने है: “मुख दीठे सुख ऊपजे”। मुख दीठे एक सिंबल (Symbol), प्रतीक हो गया। पाँचों इंद्रियाँ और मन प्रभु के साथ जुड़ते हैं और सुख पैदा होता है। संसार में सुख है ही नहीं। यहाँ दो तत्व बताए: सुख और आनंद। एक तीसरे तत्व की बात यहाँ नहीं की गई है, लेकिन वह है सुखाभास। सुख जैसा लगे लेकिन सुख न हो, उसे सुखाभास कहते हैं।
भूख लगी थी और खाना खाया, आपको लगा मजा आया। वह वास्तविक सुख नहीं था, सुखाभास था। क्यों? कि यदि रोटी और सब्जी खाने से सुख मिलता है, तो रोटी खाते ही जाओ, खाते ही जाओ, खाते ही जाओ! जितनी रोटी ज्यादा खाओ, उतना सुख ज्यादा। होता है ऐसा? चार रोटियाँ खाई, पाँच रोटियाँ खाई, बस अब नहीं! क्यों? पहली रोटी अच्छी लगी थी, दूसरी रोटी भी अच्छी लगी, चौथी थोड़ी-थोड़ी अच्छी लगी। पाँचवीं में तो पेट भर गया। अब छठवीं रोटी कोई दे तो? नहीं अब नहीं, अब नहीं! अब कोटा (Quota) पूरा हो गया। तो रोटी से सुख मिलता है? आप बोलो न अब! रोटी से सुख मिलता है? क्या सोच में पड़ गए? भूख लगी है तो सुख जैसा लगता है, तो सुख का आभास होता है, सुख नहीं होता है। यदि सुख होता है, तो जितनी रोटी ज्यादा खाओ उतना सुख ज्यादा बढ़े।
जैसे प्रभु को हम निहारें, प्रभु का दर्शन करें और सुख मिलता है, तो जितना ज्यादा दर्शन करेंगे उतना ज्यादा सुख मिलेगा। इसमें ऐसा नहीं है कि आधा घंटा बैठो भगवान के सामने तब तक सुख मिलेगा, फिर दुख मिलेगा, ऐसा कोई बात नहीं है। वहाँ तो सुख ही सुख है। तो सुख कहाँ पर है? अपनी बात यह है, सुख कहाँ पर है?
एक सम्राट था। अब सम्राट है, बड़ा साम्राज्य उसके पास है। पानी माँगता है और दूध मिलता है, अब क्या चाहिए ज्यादा? बड़ा महल है, घोड़े हैं, हाथी हैं, सब कुछ है। लेकिन एक दूसरा राज्य है, जो उससे बड़ा है। बस तो उसे अखरता है कि मेरा राज्य छोटा है और उसका बड़ा है। तो वह दुखी है।
तुम दुखी कैसे हो, बोलो। तुम्हारा अच्छा फ्लैट (Flat) है, अच्छा फ्लैट है। लेकिन तुम्हारे फ्रेंड (Friend) का बहुत बड़ा लग्जरियस (Luxurious) फ्लैट है। उसे तुम देखोगे तो क्या होगा? तुम्हारा फ्लैट वैसा का वैसा ही है, कोई चुरा कर ले गया नहीं है। लेकिन तुम दुखी होते हो: “साला इसका फ्लैट कितना बड़ा, कितना लग्जरियस, और अपना तो ठीक, क्या है इसमें!” तो तुम दुखी कैसे होते हो?
तो सम्राट दुखी था। एक संत गांव में पधारे। संत का प्रवचन सुना। प्रवचन के बाद लोग बिखर गए। सम्राट संत के चरणों में बैठा और कहा: “महाराज मैं दुखी हूँ, सुखी होने का रास्ता बताओ।” तब संत ने कहा कि: “तुम्हारे राज्य में जो भी सुखी आदमी हो, श्रेष्ठ सुखी आदमी हो, उसका शर्ट (Shirt) एक दिन के लिए तुम तुम्हारे पास रखो, तुम सुखी हो जाओगे।” “क्या करनेका?” “तुम्हारे राज्य में जो सबसे सुखी आदमी हो, जो कहे कि मैं सुखी हूँ, उसका शर्ट एक दिन के लिए लाने का, और उस शर्ट को पहनने का, तुम सुखी हो जाओगे।”
सम्राट समझा कि कोई विधि होगी, बापजी बताते हैं तो विधि होगी। तो उसने अपने मंत्रियों से कहा कि: “चलो, मेरे राज्य में जो सुखी आदमी है उसका शर्ट लेकर आओ।” तो मंत्री एक यहाँ पूर्व में गया, एक पश्चिम में, एक उत्तर में, एक दक्षिण में।
किसी को भी पूछते: “आप सुखी हो न?” “नहीं-नहीं, मैं सुखी नहीं हूँ, इतना बाकी है।” “पैसे तो हैं, लेकिन बच्चा नहीं है।” “पैसे भी हैं, बच्चा भी है, लेकिन प्रतिष्ठा नहीं है।” “पैसे भी हैं, बच्चे भी हैं, प्रतिष्ठा भी है, लेकिन सेहत अच्छी नहीं रहती। साला स्वास्थ्य अच्छा रहता ही नहीं है!”
तो कोई सुखी आदमी नहीं मिला। यूँ करते-करते पूर्व दिशा में जो मंत्री गया था, उसे एक आदमी मिला। खेत में रहता था, अकेला था, खेती करता। एक बार रोटी और दाल पका लेता, भोजन करता और आराम से रहता। मंत्री ने पूछा: “तुम सुखी हो?” “अरे हाँ, मैं सुखी हूँ।” “तो तुम्हारा शर्ट एक दिन के लिए तुम नहीं दोगे तुम्हारे सम्राट के लिए?” “अरे क्यों न दूँ? सम्राट के लिए सब कुछ दे दूँ, तो तुम्हारा शर्ट एक दिन के लिए दे दूँ।” तो उसने कहा: “लेकिन मैं शर्ट पहनता ही नहीं हूँ, कैसे दूँगा? मैं खेत में रहता हूँ, तो बस यह पहनता हूँ, टॉवेल (Towel) जैसा। ऊपर पहनने की कोई आवश्यकता नहीं होती। कभी बाहर जाना है तो खेस लगा देता हूँ ऊपर। शर्ट तो है ही नहीं मेरे पास!”
सब मंत्री आए। पश्चिम दिशा वाला आ गया, उत्तर वाला, दक्षिण वाला। तीनों ने कहा: “महाराज कोई सुखी आदमी नहीं मिला।” लेकिन यह आया बाद में। “महाराज एक सुखी आदमी मिला।” “हाँ मिला? बस तब तो हमारा काम हो गया! उसका शर्ट लेकर आए?” “लेकिन महाराज बात यह थी, सुखी था लेकिन शर्ट पहनता ही नहीं था!”
जो शर्ट कोई न पहने वह सुखी! सुखी कौन?
तो तीन तत्व हैं: सुखाभास, सुख और आनंद। आपको सुख की दुनिया में ले जाना है। तभी आपको मालूम होगा कि आपकी दुनिया सुख की दुनिया नहीं है, सुखाभास की दुनिया है। आपके पास सुख नहीं है, सुखाभास है।
अब बोलो, एक प्रश्न कर दूँ? हम ज्यादा सुखी या आप ज्यादा सुखी? बोलो। अब बोलो। ज्यादा सुखी कौन? हम ज्यादा सुखी या आप ज्यादा सुखी? अब तो बोलो। “हम सुखी, आप दुखी!” कुछ गड़बड़ है! सुख पैसे इकट्ठे करने से मिलता है या सुख पैसे को छोड़ने से मिलता है? उसमें थोड़ी दुविधा है आपको। क्यों? हम सभी पैसे को छोड़कर यहाँ आए। एक भी पैसा हमारे पास नहीं, और हम परम सुखी हैं। यह उपाश्रय भी गोड़ी जी टेंपल ट्रस्ट (Temple trust) का, हमारा नहीं। हम रहे है, चौमासा पूरा होगा, भई जाते हैं हम, तुम्हारा उपाश्रय तुम संभालो!
सचमुच हम परम आनंद में हैं। सचमुच हम परम सुखी हैं। आप सुखी हैं या नहीं? चलो सुखी हैं थोड़े-थोड़े, ज्यादा सुखी बनना है? अब ऐसा बोलो।
तो महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने प्रथम स्तवन में यह बात बताई: ‘मुख दीठे सुख ऊपजे’। हमारी इंद्रियाँ, हमारा मन प्रभु के साथ जुड़ जाए, संतों के साथ जुड़ जाए, साधना के साथ जुड़ जाए, तब हमारे मन में, हमारे शरीर में सुख का अवतरण होता है।
