Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 24-08-2026 | Pune Chaturmas

30 Min Read

विस्मयो योगभूमिका:

विस्मय (आश्चर्य) योग का प्रवेश द्वार है! जब हमारे मन में कोई चीज़ के प्रति, कोई घटना के प्रति आश्चर्य होता है, तब कॉन्शियस माइंड साइड में खिसक जाता है। कॉन्शियस माइंड नहीं रहता है इसलिए वहां तुम स्वयं होते हो।और योगमार्ग में प्रवेश तुम्हारा कराना है, कॉन्शियस माइंड का नहीं! तो, आश्चर्य तुम्हें योग में प्रवेश कराने का द्वार है।

आश्चर्य… कोई तीर्थ में हम जाएं जहाँ भूगर्भ में विशाल परमात्मा हो… आप उनको देखते ही आश्चर्यचकित होंगे : इतने बड़े भगवान!!! आश्चर्य के इन क्षणों में कॉन्शियस माइंड साइड में खिसक जाएगा, और आप परमात्मा का दर्शन कर सकोगे। बाकी तो आप आँख से या कॉन्शियस माइंड से ही दर्शन करते हो; आप खुद तो वहां होते ही नहीं!

आँख और मन तो दर्शन करने के साधन हैं; द्रष्टा तो तुम स्वयं हो। प्रभु का दर्शन तुम्हें करना है। लेकिन तुम कब दर्शन कर सकोगे? जब कॉन्शियस माइंड साइड में होगा तब। आश्चर्य के क्षणों में कॉन्शियस माइंड साइड में खिसक जाता है और तुम खुद दर्शन करते हो।


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित स्तवना २४ की प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति: “जगजीवन जगवाल हो, मरुदेविनो नंदलाल रे।” परमात्मा ऋषभदेव की माताजी का नाम मरुदेवा था। पार्श्वनाथ प्रभु की माताजी का नाम वामा माता था। वामा अर्थात् मनोविजय। मनोविजय जहाँ तक नहीं होता, तब तक आंतर-यात्रा का प्रारंभ भी नहीं होता। विचारों पर नियंत्रण जब हमारा प्रस्थापित होता है, तभी हम ध्यान की यात्रा में आगे बढ़ सकते हैं।

मनोविजय के लिए प्रायोगिक आयाम बहुत बताए गए हैं। एक सुंदर प्रयोग ‘शिव-सूत्र’ में आता है। ‘शिव-सूत्र’ भारतीय परंपरा का एक सुंदर योग-ग्रंथ है, जिसमें पार्वती जी के प्रश्न हैं और खुद महादेव जी के उत्तर हैं। पार्वतीजी ने पूछा है कि: “योग के मार्ग में डग भरने हैं, तो सबसे पहले हमें क्या करना चाहिए?” तब महादेवजी ने सूत्र दिया: “विस्मयो योगभूमिकाः।”

विस्मय, आश्चर्य योग का प्रवेश द्वार है। जब हमारे मन में कोई चीज़ के प्रति, कोई घटना के प्रति आश्चर्य होता है, तब कॉन्शियस माइंड (Conscious mind) साइड में खिसक जाता है। कॉन्शियस माइंड उस समय नहीं होता है, और तुम होते हो। और तुम्हें ही तो योग मार्ग में प्रवेश करना है, कॉन्शियस माइंड को प्रवेश नहीं करना है, तुम्हें प्रवेश करना है।

आश्चर्य… कोई तीर्थ में हम गए हैं, भूगर्भ में गए, बड़े भगवान हैं। मैं ‘प्रतिमाजी’ शब्द का यूज़ (Use) नहीं करता हूँ। भक्त की डिक्शनरी (Dictionary) में, भक्त की वॉकैब्यूलरी (Vocabulary) में ‘मूर्ति’ शब्द का अस्तित्व नहीं है। मूर्ति शब्द तो कहाँ तक? जब तुम जयपुर से लाए तब तक मूर्ति। प्राण-प्रतिष्ठा की विधि हो गई, अंजन-शलाका की विधि हो गई, अब परमात्मा बन गए। तो आप भूगर्भ में गए, विशाल परमात्मा हैं। आप आश्चर्यचकित होंगे, इतने बड़े भगवान! आश्चर्य के उस क्षणों में कॉन्शियस माइंड साइड में खिसक जाएगा, और आप दर्शन कर सकोगे।

आज प्रभु का दर्शन किया था? किसने किया था? तुमने किया था या तुम्हारे कॉन्शियस माइंड ने किया था? दर्शन किसने किया? आँख ने किया? मन ने किया? आँख और मन तो साधन हैं, द्रष्टा तुम हो। तो प्रभु का दर्शन तुम्हें करना है। लेकिन तुम कब कर सकोगे? जब कॉन्शियस माइंड साइड में होगा तब। तो आश्चर्य के उन क्षणों में कॉन्शियस माइंड साइड में खिसक जाता है, “ओह! इतने बड़े भगवान!” बस आपका दर्शन शुरू हो गया। बाकी तो आप कॉन्शियस माइंड से दर्शन करते हो।

रत्नसुंदरसूरी जी अहमदाबाद में थे। प्रवचन के बाद एक भक्त आया और उसने कहा: “गुरुदेव, पालिताना जा रहा हूँ यात्रा करने के लिए, कोई कार्य सेवा?” तो आचार्य श्री ने कहा: “प्रभु का दर्शन करो, तब याद करना।” दूसरे दिन प्रवचन शुरू हुआ, और वह भक्त हाज़िर था। तो प्रवचन के बाद आचार्य श्री ने उससे पूछा: “तुम तो पालिताना जाने वाले थे न?” तो उसने कहा: “हाँ साहब, पालिताना जाकर आया, यात्रा करके आया, मुझे कहाँ विहार करने का था? अहमदाबाद से फ्लाइट पकड़ी भावनगर। भावनगर से टैक्सी पकड़ी पालिताना। धर्मशाला में गया, थोड़ा नाश्ता कर लिया। रिक्शा पकड़ ली तलहटी तक, डोली पकड़ी ऊपर। शाम साढ़े चार-पाँच बज गए थे। अंतिम पूजा मेरी हुई, बाद में तो आंगी चढ़ गई। और आंगी का दर्शन करके डोली में तलहटी आया। रिक्शा में धर्मशाला पर आया। सूर्यास्त के लिए थोड़ा समय शेष था, तो थोड़ा भोजन कर लिया। टैक्सी पकड़ी भावनगर, फ्लाइट पकड़ी अहमदाबाद, रात को घर पर आकर सो गया!”

उस समय आचार्य श्री ने पूछा: “प्रभु की आंगी का दर्शन तुमने कल किया था, तो उस समय प्रभु की आंगी कैसी थी? आंगी भी जात-जात की होती है, तो कल आंगी कैसी थी?” तब उस भक्त ने कहा: “साहब जी, इतना भारी प्रश्न? मुझे फिर से पालिताना जाना पड़ेगा!” आंगी चढ़ गई, वह कहते हैं, “मैंने आंगी का दर्शन किया।” आंगी कौन सी थी, वह उसे पता नहीं! तो दर्शन किसने किया? कॉन्शियस माइंड ने किया! और एक कॉन्शियस माइंड का हिस्सा दर्शन करता था, दूसरा कॉन्शियस माइंड का हिस्सा घर पर पहुँच गया था। तो आश्चर्य के क्षणों में तुम प्रभु का दर्शन कर सकते हो। तो आश्चर्य के क्षणों में क्या होता है? कॉन्शियस माइंड खिसक जाता है।

एक झेन कथा है, बौद्ध परंपरा का एक हिस्सा है झेन परंपरा। मूल शब्द है ध्यान। ध्यान का प्राकृत हुआ ‘झाण’ और उसका पाली भाषा में ‘झेन’ हो गया। तो झेन कथा है, एक शिष्य गुरु के पास आया, गुरु के चरणों में वंदना पेश की और गुरु से पूछा: “गुरुदेव, भगवान बुद्ध के चेहरे पर कैसी शांति होगी?”

गुरु शिष्य के मुख को देख रहे हैं। गुरु उत्तर देने को राज़ी हैं। समझ लो, गुरु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने को राज़ी हैं, लेकिन तुम्हें उत्तर देने के लिए राज़ी हैं, तुम्हारे कॉन्शियस माइंड को उत्तर देने के लिए गुरु राज़ी नहीं हैं। तो गुरु देख रहे हैं कि पूछ कौन रहा है? सच बोलो! तुम संपूर्णतया प्रकट कौन से क्षणों में होते हो? विभाव के क्षणों में! भोजन कर लिया, टेस्टी (Tasty) वानगी कौन-सी थी आपको पता है। क्योंकि उस समय आप हाज़िर थे, सिर्फ कॉन्शियस माइंड नहीं, तुम भी हाज़िर थे।

तो खाने-पीने के क्षणों में तुम संपूर्णतया हाज़िर होते हो। लेकिन प्रतिक्रमण के क्षणों में? प्रतिक्रमण पूरा हो गया और कोई पूछेगा: “स्तवन कौन-सा बोला था?” तो वह सिर खुजलाएगा! “स्तवन? स्तवन तो गाया था न? हाँ हाँ गाया तो था ही।” बिना स्तवन गाए प्रतिक्रमण पूरा कैसे होगा? लेकिन स्तवन किसने गाया था? कौन-सा स्तवन था? वह तो स्तवन गाने वाला जाने, हमें कोई पता नहीं! तो आपने किया क्या? शुभ के क्षणों में आप ग़ैरहाज़िर हो गए। शुद्ध के क्षण तो हैं नहीं तुम्हारे पास। है? शुद्ध के क्षण तुम्हारे पास हैं? कि जिसमें तुम तुम्हारे आनंद में विराज रहे हो? जिसमें तुम तुम्हारी वीतराग दशा का अनुभव करते हो, ऐसे शुद्ध के क्षणों का तो अनुभव नहीं है, लेकिन शुभ के जो क्षण हैं उन क्षणों में भी तुम ग़ैरहाज़िर रहते हो! और अशुभ के क्षणों में तुम हाज़िर रहते हो।

उसने क्या बात की थी आपको याद है? आप लोग हैं न, एक बात तो बहुत सुंदर करते हो, और इसके लिए आपको धन्यवाद देना पड़ेगा। कोई भी प्रवचनकार हो और उनके मन में शायद थोड़ा अहंकार रह गया हो कि: “मैं धुआंधार लेक्चरर (Lecturer) हूँ!” लेकिन उन प्रवचनकार के, महात्मा के अहंकार को आप खत्म कर सकते हो। क्यों? एक व्यक्ति ने कहा: “तुम कैसे बैठे थे? कुर्सी लेकर बैठे थे और म्हारासाहेब के सामने बैठ गए थे। कुर्सी वालों को तो पीछे बैठना चाहिए। कुर्सी पर बैठना है और आगे बैठ गए थे!”

अब एक मिनट का प्रवचन कितना याद रहेगा आपको? एक मिनट का प्रवचन कितना याद रहेगा? घर पर जाओगे, भोजन करोगे: “उसने क्या कहा? उसने कहा म्हारासाहेब के सामने बैठ गए थे कुर्सी लेकर। अरे, तेरे बाप का क्या गया? कुर्सी लेकर मैं बैठा था तेरा क्या गया?”

एक मिनट का उसका प्रवचन याद रहता है: “कोई माताजी पीछे से आईं और आगे बैठ गईं।” फिर पीछे वाले ने कहा: “क्या कुछ तमीज है? आती हैं पीछे से और आगे बैठ जाती हैं।” तो एक मिनट का प्रवचन कितना याद रहेगा बोलो? और म्हारासाहेब एक घंटे तक प्रवचन देंगे। कोई पूछेगा: “म्हारासाहेब ने क्या कहा आज प्रवचन में?” “अरे बहुत अच्छी बातें थीं!” अरे म्हारासाहेब कहते हैं तो अच्छी बातें ही होती हैं, लेकिन क्या था? “यह तो म्हारासाहेब जाने, मुझे तो यह प्रवचन याद रह गया, यह कुर्सी वाला प्रवचन! मुझे म्हारासाहेब का प्रवचन याद नहीं।”

तो क्या होता है? विभाव के क्षणों में आप हाज़िर रहते हो, और शुभ के क्षणों में आपका मन नौ-दो-ग्यारह हो जाता है, कहीं न कहीं घूमने के लिए पहुँच जाता है। तो गुरु ने देखा शिष्य का चेहरा, और गुरु तो फेस रीडिंग (Face reading) के मास्टर (Master) होते हैं। मैं बहुत बार कहता हूँ, आप आपकी साधना की बात गुरु से करें, वह आपकी ओर खुलती बात है। गुरु तो आपके चेहरे को देखकर आपकी साधना का अभी का स्टैंडपॉइंट (Standpoint) क्या है, वह निश्चित कर देते हैं कि: “यहाँ आप बैठे हुए हैं।” गुरु यह भी निश्चित करते हैं कि अभी तुम कहाँ बैठे हो, और यह भी निश्चित कर सकते हैं कि इस जन्म के अंत समय तक तुम कहाँ पहुँच सकते हो। और गुरु की तैयारी है कि जहाँ तक तुम पहुँच सकते हो, वहाँ तक तुम्हें पहुँचा दें।

तो सद्गुरु ने देखा कि यह प्रश्न तो पूछ रहा है, लेकिन यह प्रश्न उसका नहीं है, कॉन्शियस माइंड का है। कभी आप देखना, यहाँ तो फ्रेश (Fresh) सभा है, बाकी कहीं जूनी-पुरानी सभाएँ होती हैं। हमें तो सभी सभाओं का अनुभव होता है। तो वहाँ क्या होता है? कोई आदमी प्रश्न पूछता है, प्रश्न पूछने के बाद वह लोगों के सामने देखता है। कौन? प्रश्न पूछने वाला! अरे! प्रश्न पूछने के बाद तो गुरु के सामने देखना चाहिए कि गुरु क्या उत्तर देते हैं। लेकिन वह प्रश्न पूछने के बाद लोगों के सामने देखेगा कि: “मैंने प्रश्न पूछा, कितना बुद्धिमान प्रश्न!” तो यह जो प्रश्न था वह उसके अस्तित्व से नहीं आया था, उसके कॉन्शियस माइंड से आया था। और तुम्हारे कॉन्शियस माइंड से जो भी प्रश्न आए हों, उस प्रश्न को उत्तरित करने में गुरु राज़ी नहीं है।

गुरु तुम्हारे ख़ुद के प्रश्नों के उत्तर देने में राज़ी है। तुम्हारे जीवन में जो समस्या है और उसके तुम प्रश्न पूछो कि: “साहबजी, साधना करनी है, पूजा करनी है, और भाव तो ऐसा ही है कि निसीहि मंदिर में जाऊँ, प्रभु में खो जाऊँ। लेकिन ऐसा होता नहीं है। कोई व्यक्ति आता है और मन प्रभु को छोड़कर उस व्यक्ति में पहुँच जाता है। गुरुदेव मैं क्या करूँ?” यह प्रश्न आपका ख़ुद का है, और ऐसे प्रश्न आपके हों, तो हमें उत्तर देने में मज़ा आता है। लेकिन कॉन्शियस माइंड का प्रश्न है।

प्रश्नों के तीन स्तर हैं: कुतूहल, जिज्ञासा, और मुमुक्षा। पहला प्रश्न कुतूहल का, जैसे बच्चों के पास होता है कि: “पक्षी आकाश में उड़ते हैं, तो हम आकाश में क्यों नहीं उड़ते?” यह कुतूहल के प्रश्न हैं। फिर जिज्ञासा कि: “ज़रा प्रवचन में जाकर आएँ। म्हारासाहेब आत्मा की बात करेंगे तो जान लेंगे कुछ।” जान लेंगे, शब्दों से आगे नहीं बढ़ना है। तीसरा स्तर है मुमुक्षा का। एक वेदना, एक तीव्र वेदना कि: “मैं बंधन में बँधा हुआ हूँ, मेरा मोक्ष कब होगा? मेरी आत्मा निर्मल कब होगी?” यह प्रश्न। यह मुमुक्षा के स्तर का प्रश्न है।

एक दिल्ली का व्यापारी था, होलसेल (Wholesale) व्यापारी, घी-तेल-खांड का। एक दिन सुबह चार बजे उठ गया। उठ गया और एक प्रश्न हुआ कि: “मैंने संसार के लिए बहुत किया, लेकिन मेरी आत्मा के लिए मैंने क्या किया? अरे, मैं आत्मा को जानता भी नहीं हूँ! तो मुझे कोई गुरु के पास जाना चाहिए और आत्मा की बात जाननी चाहिए।” अब एक गुरु का नाम सुना हुआ था, ऋषिकेश में बड़े गुरु थे।

तो चार बजे उठा, स्नान कर लिया, चाय-वाय पी लिया, और शॉफर (Chauffeur) को कहा: “गाड़ी तैयार करो।” गाड़ी में बैठ गया और ऋषिकेश पहुँच गया दिल्ली से। ६ बजे ऋषिकेश पहुँच गया। पहुँचने के बाद आश्रम के कार्यालय में गया और पूछा कि: “गुरुदेव कब मिलेंगे?” तो कहा कि: “१० बजे मिलेंगे। गुरुदेव १० बजे तक तो ध्यान में ही रहते हैं, १० बजे के बाद मिलेंगे।” इसकी इच्छा तो ऐसी थी, ६ बजे आया हूँ, गुरु मिल जाएं, ६:३० बजे लौट जाऊँ और ८:३० बजे ऑफिस पर हाज़िर हो जाऊँ। लेकिन अब गुरु भी १० बजे मिलने वाले हैं। चलो ठीक है, नाश्ता-वाश्ता कर लिया, चाय पी ली। १० बजे गुरु के चेंबर (Chamber) में गया, गुरु के चरणों में झुका और कहा: “गुरुदेव, दिल्ली से आया हूँ और आत्मा के स्वरूप को जानने की बहुत ही इच्छा है, तो आप कृपा करके आत्मा के स्वरूप की बात करो।”

अब गुरु राज़ी है, मैंने पहले कहा। लेकिन कॉन्शियस माइंड का प्रश्न है, तो गुरु राज़ी नहीं है। तो गुरु ने पूछा कि: “दिल्ली में तुम क्या करते हो?” तो उसने कहा: “घी, तेल, खांड, गुड़ का होलसेल व्यापारी हूँ।” “अच्छा, अच्छा। कल रात का कोल्हापुरी गुड़ नंबर १, क्या भाव था?” उसने भाव कहा। “बासमती चावल, उसका क्या भाव?” कल रात का भाव।

बाद में वह व्यापारी विचार में पड़ गया कि इतने बड़े गुरु हैं और भाव क्यों पूछ रहे हैं? तो उसने कहा: “गुरुदेव आपको जो चाहिए वह बोलो, मैं यहाँ से फोन कर दूँगा, ट्रक (Truck) भरकर सामान आ जाएगा। आपको भाव पूछने की क्या आवश्यकता है? मुझे लाभ मिलेगा।” तो गुरु ने कहा: “आश्रम में क्या चाहिए वह आश्रम की मैनेजमेंट (Management) जो है, वह विचार करती है, मैं विचार नहीं करता हूँ। मैं तो इसलिए भाव पूछ रहा हूँ कि कल रात के कोल्हापुरी गुड़ के, बासमती चावल के भाव तुम्हें याद हैं और तुम्हें आत्म-स्वरूप की जानकारी चाहिए! दिल्ली पीछे जाओ! दिल्ली चले जाओ, गेट आउट (Get out)! जब सब भाव भूल जाओ, तब आ जाना मेरे पास।”

संसार की याद इतनी तीव्र है और आत्मा के स्वरूप की जानकारी लेने आए हो? गेट आउट, चले जाओ! गुरु तैयार नहीं थे उत्तर देने के लिए, क्योंकि शब्दों के स्तर पर आने का कोई अर्थ नहीं था। उसके पास जिज्ञासा थी, आत्मा का स्वरूप जान लूँ। अरे जानने से क्या होगा? तुम्हें आत्मा का अनुभव करना है। बोलो, इतने वर्ष हुए, इतने महापुरुषों को इस गोड़ीजी ट्रस्ट टेंपल (Godiji trust temple) के उपाश्रय में आपने सुने, आत्मा की अनुभूति आपको हुई? “अरे नहीं हुई, करनी है? नहीं-नहीं, ऐसा है न, बड़े म्हारासाहेब को बुलाए हैं तो ज़रा हमारा भी अच्छा लगे, पुणे वालों का, तो ज़रा सभा में आना चाहिए!”

तुम हमारे लिए आते हो या तुम्हारे लिए आते हो? सच बोलना। म्हारासाहेब को अच्छा लगे? क्यों? तुम क्यों आते हो? तुम्हारे लिए आते हो या हमारे लिए आते हो? तो गुरु ने कह दिया कि गेट आउट, दिल्ली जाओ, जब सब भूल जाओ तब मेरे पास आना।

वह गुरु ने शिष्य के सामने देखा और देखा कि प्रश्न तो है अच्छा, कि बुद्ध भगवान के चेहरे पर शांति कैसी होगी? लेकिन प्रश्न जिज्ञासा के स्तर का था। तो गुरु ने क्या किया? गुरु ऐसे बैठे हुए थे, पीछे खिड़की थी, खुली खिड़की थी। तो गुरु ने शिष्य को पकड़ा गले से और खिड़की से बाहर फेंका! गुरु को ख़याल था कि पीछे रेती थी, तो वह पटकाएगा लेकिन बहुत लगने वाला नहीं है। गले से पकड़कर फेंका और वह गिरा सीधा। वह तो सुन्न-मुन्न हो गया। ऐसा तो सोचा भी नहीं था। गुरु के पास प्रश्न पूछने के लिए जाओ, गुरु उत्तर दे भी, न भी दे। गुरु इज़ द सुप्रीम बॉस (Guru is the supreme boss)। तुम प्रश्न लेकर आए हो तो उत्तर देना ही है, यह कोई हमारे पर फोर्स (Force) नहीं होता है, हम उत्तर दे भी न भी दें।

तो उसने सोचा था कि शायद गुरु उत्तर देंगे, शायद नहीं भी देंगे। लेकिन यह नहीं सोचा था कि मुझे गले से पकड़कर नीचे फेंकेंगे! वह चत्ता सोया हुआ है रेत में। उस समय गुरु खिड़की से देखते हैं नीचे, उसकी ओर। आप हों तो क्या होगा, बोलो? मन में क्या भाव उठता है? ऐसे कोई गुरु होते हैं? गुरु का यह कोई स्वभाव है? मैं इन लोगों को बहुत बार कहता हूँ कि तुम सब परम गुरु हो, शिष्य नहीं हो, परम गुरु। गुरु को क्या करना चाहिए वह निश्चित करने वाले तुम हो।

“गुरु ने ऐसा क्यों किया? तो गुरु तुमसे पूछने के लिए आएं कि बेटा मैं क्या करूँ? और फिर उत्तर दें! गुरु महाराज ने ऐसा क्यों किया? और क्यों किया?” गुरु इज़ द सुप्रीम बॉस। गुरु के मन में जो भी आए वह करने के लिए स्वतंत्र है। कोई तुम्हें पूछने के लिए आएगे! कि मैं क्या करूँ?! तुम बोलो वैसा करूँ! तो गुरु खिड़की से देखते हैं और पूछते हैं उसे कि: “अभी ख़याल आया कि बुद्ध भगवान के चेहरे पर कैसी शांति होगी?”

तो वह नीचे सोया हुआ शिष्य कहता है हाथ जोड़कर: “हाँ गुरुदेव, अब ख़याल आ गया!” उसका प्रश्न पहले कॉन्शियस माइंड का था, गुरु ने स्तर को बदल दिया। जिज्ञासा के स्तर से मुमुक्षा के स्तर पर पहुँचा दिया, पटक करके। शिष्य के शरीर को गुरु ने पटका ऐसा आपको लगता है, मैं कहता हूँ गुरु ने शिष्य की बुद्धि और अहंकार को पटका!

हमारा काम क्या है? तुम्हारे अहंकार को छीन लेना। उपनिषद में ऋषि कहते हैं: “आचार्यो ही मृत्यु:” सद्गुरु यानी कि मृत्यु। तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारा अहंकार इन सबके लिए गुरु मृत्यु है। जब तक तुम्हारे पास बुद्धि है, जब तक तुम्हारे पास अहंकार है, तुम तत्त्व की प्राप्ति कैसे करोगे?

बुद्धि की व्याख्या आपको मालूम है? बुद्धि का अर्थ क्या? अहंकार से युक्त विचारसरणी उसका नाम है बुद्धि। और श्रद्धा के साथ की विचार-शैली उसका नाम है मेधा, प्रज्ञा। तो विचार-शैली की कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन विचार-शैली अहंकार युक्त नहीं होनी चाहिए। केवल बुद्धि से कुछ नहीं होता है। बुद्धि से तुम पैसा कमा सकते हो, लेकिन परमात्मा की प्राप्ति करनी हो तो बुद्धि नहीं चलेगी। वहाँ मेधा चाहिए, प्रज्ञा चाहिए।

एक रेलवे (Railway) के कंपार्टमेंट (Compartment) में एक प्रोफेसर (Professor) बैठे हुए थे। और एक देहाती मनुष्य वह भी कंपार्टमेंट में आया। देहाती मनुष्य अनपढ़ था, लेकिन यूँ होशियार था, बुद्धिमान था। अब कंपार्टमेंट के इस कोने में दो ही आदमी थे, एक प्रोफेसर और एक देहाती आदमी, ग्राम्य जन।

उस देहाती आदमी ने प्रोफेसर से पूछा: “साहब, आपके चेहरे पर से आप प्रोफेसर लगते हो।” प्रोफेसर का अहंकार बढ़ गया: “हाँ, मैं प्रोफेसर हूँ, यूनिवर्सिटी (University) में पढ़ाता हूँ।” “अच्छा-अच्छा, तब तो आप बहुत बुद्धिमान हैं। प्रोफेसर हैं तो क्या ऐरे-गैरे थोड़ा प्रोफेसर होते हैं!” फिर देहाती आदमी ने कहा: “साहब, जर्नी (Journey) लंबी है मेरी और आपकी दोनों की। तो कुछ प्रश्न पूछें? कुछ मैं पूछूँ, कुछ आप पूछो, तो रास्ता कट जाएगा।”

अब प्रोफेसर मन में सोचते हैं कि: “देहाती आदमी, यह क्या मुझे पूछेगा? यह मुझे क्या पूछेगा? मैं तो कितना बुद्धिमान हूँ।” बुद्धि का अहंकार है! लेकिन देहाती आदमी बड़ा चालाक था। उसने कहा: “साहब, प्रश्न भी पूछेंगे लेकिन ऐसा करेंगे, थोड़ा हार-जीत का मामला रखते है, तो ज़रा और मज़ा आएगा। लेकिन आप तो बड़े प्रोफेसर हैं, मैं तो देहाती आदमी, मेरे पास तो कोई ज्ञान नहीं, आप तो बड़े ज्ञानी हो। तो ऐसा करो, मैं आपसे पूछूँ आपको नहीं आए, तो आप मुझे ५०० रुपये देंगे। आपका ज्ञान बहुत है। आपने पूछा, मुझे नहीं आया, तो मैं १० रुपये आपको दूँगा। क्योंकि आपका ज्ञान तो मेरे से ५० गुना है।”

प्रोफेसर मन में कहते हैं: “५० गुना नहीं, १०० गुना!” तो प्रोफेसर तैयार हो गया, प्रोफेसर का अहंकार तैयार हो गया: “हाँ-हाँ बोल, मैं हार जाऊँगा ५०० रुपये तुम्हें दूँगा!” लेकिन अहंकार कहता है: “मैं हारूँगा कभी? मैं हारने वाला हूँ?” और प्रोफेसर ने कहा देहातीसे, “पहले तुम पूछो।” तो उसने पूछा: “एक पक्षी है, उसकी दो चोंच हैं और तीन पैर हैं, उसका मुँह गुलाबी है।”

प्रोफेसर तो विचार में ही पड़ गया! तीन पैर वाला पक्षी? और दो चोंच? हमारे भारत में बहुत बड़े पक्षीविद् हो गए सालिम अली और उन्होंने ‘बर्ड एन्साइक्लोपीडिया’ (Bird Encyclopedia) लिखा है। प्रोफेसर को बर्ड वॉचिंग (Bird watching) का शौक था, तो वे जंगल में भी घूमे थे और सालिम अली का बर्ड एन्साइक्लोपीडिया पी लिया था। अब मन में विचार करें: “तीन पैर वाला और दो चोंच वाला पक्षी! ऐसा तो कोई है ही नहीं!”

अब प्रोफेसर हार गए, पाँच मिनट का समय था। पाँच मिनट में कोई उत्तर आया नहीं, ५०० रुपये का नोट दिया: “मैं हार गया।” देहाती आदमी ने बड़े ठाठ से ५०० रुपये का नोट अपनी जेब में डाल दिया। अब प्रोफेसर का वारा था। प्रोफेसर ने कहा: “दूसरा कोई प्रश्न नहीं, यही प्रश्न है, यह पक्षी कौन है बोल?” तो उसने कहा: “साहब मुझे भी पता नहीं है, लो १० रुपये!” मुझे भी पता नहीं!

तो जो विचार-शैली अहंकार से युक्त है वह बुद्धि है। “अरिहंत चेइयाणं” में हम क्या कहते हैं? ‘सद्धाए मेहाए’ – श्रद्धा के बाद मेधा। जब श्रद्धा आ गई, अब विचार-शैली जो भी आपके पास है वह मेधा है, वह बुद्धि नहीं है, मेधा है। तो मेधा आपके पास है कोई दिक्कत नहीं, प्रज्ञा है कोई दिक्कत नहीं, लेकिन बुद्धि नहीं चाहिए।

तो उपनिषदों ने कहा: “आचार्यो ही मृत्यु:” तुम्हारी बुद्धि और तुम्हारा अहंकार, इस साधना में प्रवेशने के लिए अवरोध रूप हैं। इसलिए सद्गुरु के पास जब तुम जाओगे, तब वह तुम्हारी बुद्धि को छीन लेंगे, तुम्हारे अहंकार को छीन लेंगे। तुम तैयार हो? अहंकार दे देने को, मुझे तैयार हो? और अपनी तो परंपरा कितनी सुंदर है! गुरु के पास आप आते हैं, कितने भाव से वंदना करते हैं, अहंकार तो होता ही नहीं। होता है अहंकार? अहंकार होता है? नहीं। सब नीचे रख कर आते हो, क्यों? नीचे का मतलब क्या? सब नीचे छोड़ दिया, बुद्धि, अहंकार सब कुछ! फिर लौटते समय लेकर जाओगे कि यहाँ रखकर जाओगे? उपाश्रय में आएंगे तब तो निश्चित है, बुद्धि और अहंकार को नीचे रखकर आएंगे, लेकिन लौटते समय क्या करेंगे? लेकर जाएंगे कि रखकर जाएंगे?

यहाँ हमारे पास डस्टबिन (Dustbin) बहुत बड़ा है! आपका जितना भी कचरा हो न, वह कचरा डाल देना यहाँ। अपनी परंपरा में एक शब्द आता है ‘गुरु दक्षिणा’। गुरु ज्ञान देते हैं तो शिष्य क्या करता है? गुरु को कुछ समर्पित करता है, उसको हम गुरु दक्षिणा कहते हैं। अब गुरु हैं यह, जिसको तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए। तुम्हारा कुछ भी नहीं चाहिए हमें, लेकिन तुम्हारा कचरा हमें चाहिए! “साहबजी, सिगरेट पीता हूँ,” डाल दे यहाँ! नियम ले ले, सिगरेट नहीं पीने का। एक भी व्यसन आप दूर करोगे, हम राज़ी होंगे। तो यहाँ डस्टबिन बड़ा है, समझ गए?

आपका कचरा ही हमें चाहिए। आपकी संपत्ति नहीं, उसको तो हम छोड़कर आए। अभी तो जो युवान और युवतियाँ दीक्षा लेते हैं, एमबीए (MBA) पढ़ी हुई बच्चियाँ, सीए (CA) और एमबीए पढ़ा हुआ युवक ख़ानदान घर का, वेल-सेट फैमिली (Well-set family) से आया हुआ दीक्षा लेता है, तो संपत्ति को छोड़कर लेता है दीक्षा। तो तुम्हारी संपत्ति हमें नहीं चाहिए, लेकिन तुम्हारा कचरा चाहिए! लोगे कचरा? रोज़ एक नियम ले लेना, बोलो? अपने वहाँ एक नियम है, व्याख्यान के बाद पच्चक्खाण होता है। पच्चक्खाण का मतलब यह है कि गुरुदेव ने इतना ज्ञान दिया तो गुरु दक्षिणा में कुछ नियम लेना चाहिए।

एकासना-बियासना हो और पच्चक्खाण लो, वह तो ठीक है, आप चाय-पानी पीकर आए हैं, नाश्ता करके आए हैं, तो भी आप नियम ले सकते हैं। आज दोपहर को थाली धोकर पियोगे, इतना भी नियम ले लो, तो गुरु दक्षिणा आपने दे दी! आज मैं सिगरेट नहीं पियूँगा, इतना भी नियम आपने ले लिया, तो आपने गुरु दक्षिणा दे दी!

तो आज का हमारा सूत्र था – ‘विस्मयो योगभूमिकाः।‘ जब आश्चर्य हमारे मन में पैदा होता है, तब कॉन्शियस माइंड खिसक जाता है तो हम प्रकट होते हैं। और जब हम प्रकट होते हैं तब प्रभु के दर्शन का भी आनंद आता है, साधना का भी आनंद आता है। ऐसे साधना के आनंद में आगे बढ़ें, यही आशीर्वाद!

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