Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 23-07-2026 | Pune Chaturmas

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पूरन मन, पूरन सब दीसे


महामहोपाध्याय यशोविजयजी महाराजा ने प्रभु की प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! तेरा तो मुझ पर असीम प्रेम है और तेरे असीम प्रेम से प्रोत्साहित होकर मैं भी तेरे प्रति प्रेम की धारा में बह रहा हूँ।” ‘मेरे प्रभु शुं प्रगट्यो पूरन राग’ और बाद में कहते हैं कि, “प्रभु! तेरे पर मेरा जो प्रेम है, उस प्रेम से जब मेरा हृदय छलक उठा, तब मेरा हृदय परिपूर्ण हो गया। मेरा मन पूर्ण हो गया।’ ‘पूरन मन, पूरन सब दीसे’ मन ऐसा मेरा पूर्ण हो गया कि इस संसार में कहीं भी मैं देखूँ, मुझे पूर्णता ही दिखती है। कोई भी व्यक्ति मुझे अपूर्ण नहीं दिखता। बहुत ही सुंदर मनोवैज्ञानिक आयाम में यह बात हुई है। हमें यदि दूसरा व्यक्ति अपूर्ण लगता है, तो इसका कारण एक ही है कि हम अपूर्ण हैं। हमारा मन अपूर्ण है। जब हमारा मन पूर्ण हो जाएगा, तो कोई भी व्यक्ति हमें अपूर्ण नहीं लगेगा।

जब मुझे प्रभु मिले, प्रभु का प्रेम मुझे मिला, और प्रभु के प्रेम से मेरा हृदय भर गया, उस क्षण से ही मेरी दुनिया बदल गई। कोई भी व्यक्ति कभी भी मुझे दोषयुक्त लगता ही नहीं। सब व्यक्ति सिद्धात्मा जैसे ही लगते हैं। आप सब भविष्य के सिद्ध आत्मा हैं।

मैं जब नमस्कार महामंत्र को रटता हूँ, तब आपको भी झुकता हूँ। ‘नमो लोए सव्व साहूणं!’ लोक में जो भी पंच महाव्रत धारी साधु-साध्वी हैं, सबको मेरा नमन। तो आप भी मेरे नमस्कार के क्षेत्र में आ गए। और जब मैं बोलता हूँ ‘नमो सिद्धाणं’, तब आप सब आ गए। आप सब भविष्य के सिद्ध हैं, आपको भी नमस्कार! तो यह ऐसा विज़न (Vision) प्रभु ने मुझे दिया कि एक भी व्यक्ति कभी भी मुझे दोषयुक्त नहीं लगे। सब व्यक्ति पूर्ण ही लगते हैं। आप भी पूर्ण हैं, ये भी पूर्ण हैं, वे भी पूर्ण हैं। सब पूर्ण हैं। अनंत-अनंत गुण आप सब में छिपे हुए हैं।

एक घटना मुझे याद आती है। पालिताणा में गुरुदेव अरविंद सूरी दादा की निश्रा में हमारा चातुर्मास था। आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वरजी भी हमारे साथ चातुर्मास में… बहुत आराधक आराधना करने के लिए आए थे। उनमें एक हिम्मतभाई बेड़ावाले भी थे। हिम्मतभाई बेड़ावाले श्रेष्ठ साधक गिने जाते थे। उनकी साधना ऐसी अद्भुत थी कि इस सुधर्मा पीठ पर बैठकर आचार्य भगवंत भी उनकी साधना की प्रशंसा करते थे। हिम्मतभाई राजस्थान में बेड़ा गाँव के निवासी थे। यूँ मुंबई रहते थे, लेकिन ‘बेड़ावाले’ कहलाते थे। बेड़ा के पास दादा का तीर्थ है तीन किलोमीटर दूर।

हिम्मत भाई बेड़ा गए थे। बेड़ा संघ के अग्रणी श्रेष्ठी हिम्मत भाई! एक दिन शाम को वे दादा तीर्थ गए, स्नान किया, प्रभु की पूजा की और एक खंभे के पीछे खड़े रहकर उन्होंने कायोत्सर्ग ध्यान शुरू किया। अँधेरा हुआ, पुजारी आया और उसने आरती, मांगलिक दीवा उतार लिया और देरासर मांगलिक कर दिया। खंभे के पीछे हिम्मतभाई थे, दिखे नहीं। हिम्मतभाई मंदिर में और मंदिर मांगलिक! पूरी रात हिम्मतभाई कायोत्सर्ग ध्यान में रहे, खड़े-खड़े! ऐसे तो हमारे जिनालय सुबह ५:०० बजे खुल जाते हैं, लेकिन ये तो जंगल में आया हुआ तीर्थ था। कोई यात्री आए तो ठीक है, सुबह ५-६ बजे खुल जाए। वरना पुजारी १०-११ बजे आता बेड़ा से, और मंदिर खोलकर पूजा करके मांगलिक कर देता।

१० बजे पुजारी आया। उसने मंदिर खोला, तब देखा कि हिम्मतभाई अंदर थे। वह तो घबरा गया! ‘ये बड़े ट्रस्टी, संघ के प्रमुख और ये भीतर थे! और मैंने शाम को देरासर मांगलिक कर दिया था!’ पुजारी तो हिम्मतभाई के पैरों में पड़ गया कि, “साहब! मेरी भूल हो गई। मैंने आपको देखा नहीं और मंदिर मांगलिक कर दिया था” तब हिम्मतभाई ने क्या कहा? “ज़रा भी घबरा मत। तेरे कारण तो पूरी रात कायोत्सर्ग ध्यान हुआ! तू तो बड़ा उपकारी है।” ये दृष्टि थी! “तूने ही मुझे पूरी रात कायोत्सर्ग ध्यान कराया।”

आपको भी क्या करना है? विज़न को ही घुमाना है। ट्विस्ट (Twist) करना है। अभी तक विज़न ये है कि ‘मैं ही अच्छा हूँ, दूसरे सब बुरे हैं।’ दुनिया में श्रेष्ठ कौन? पूरी दुनिया में श्रेष्ठ आदमी कौन? आप! ‘मैं ही दुनिया में श्रेष्ठ आदमी हूँ। दूसरे तो ठीक हैं। दूसरे भी अच्छे मनुष्य हो सकते हैं, लेकिन कब? जब वे मेरे अहंकार को सहलाएं, तब। जो मेरे अहंकार को नेगलेक्ट (Neglect) करते हैं, वे अच्छे नहीं हैं। अच्छे तो वे ही हैं जो मेरे अहंकार को सहलाते हैं।’ दुनिया के केंद्र बिंदु आप हो!

अब आज एक सूत्र आपको मैं सुनाऊँ। और ये सूत्र आपको याद रखना है— ‘दुनिया में सब लोग अच्छे ही हैं। बुरा है तो एक मैं हूँ।’ दुनिया में सब लोग अच्छे ही हैं। यदि कोई बुरा है, तो सिर्फ वह मैं ही हूँ। ये सूत्र आप रट लो। तो आप निश्चय से जिनशासन में आ सकते हो। व्यवहार से आप जिनशासन में ही हैं, लेकिन निश्चय से जिनशासन में प्रवेश कब मिलेगा? जब ये सूत्र आपके भीतर घुल जाएगा, तब। आपके भीतर तो घुल ही गया है— ‘सब अच्छे हैं। सब अच्छे। बुरा है कोई भी तो सिर्फ मैं ही हूँ।’ एक यशोविजय ही बुरा हो सकता है, बाकी दुनिया के सब लोग अच्छे ही हैं। प्रभु ने मुझे यह विज़न दिया है, और मैं प्रभु का बहुत-बहुत ऋणी हूँ कि प्रभु तूने मुझे यह विज़न दिया, यह दृष्टिकोण दिया। वरना मैं भी अतीत की यात्रा में ऐसा ही था जैसे सामान्य लोग होते हैं कि ‘मैं ही अच्छा हूँ, कोई अच्छा नहीं है। अच्छा हो तो सिर्फ मैं ही हूँ।’

तो हिम्मतभाई बेड़ा वाले उस पालिताणा के चौमासे में थे। भादरवा (भाद्रपद) महीने में आयंबिल की एक ओली उनकी पूर्ण हुई। वह ७८वीं ओली थी। अपन तो ओली के अंतिम दिन होते हैं ना, तो पारणे के दिन कैलेंडर में देख रखते हैं कि पारणा कब है। हिम्मतभाई ने सोचा कि आयंबिल अच्छे रूप से हो रहा है, सब साधना हो रही है, तो फिर पारणा करने की आवश्यकता क्या है? ‘नई ओली सीधी स्टार्ट (Start) कर दूँ। ७८ हो गई, तो ७९वीं ओली शुरू कर दूँ।’

तो जिस दिन नई ओली शुरू करनी थी, उस दिन प्रभु के पास गए। प्रभु से कहा, “प्रभु! तेरी कृपा से यह ओली परिपूर्ण हो रही है, तेरे चरणों में मैं अर्पित करता हूँ।” ये हमारी जिनशासन की एक बहुत सुंदर विधि है। जो भी साधना हम करें, साधना जब भी पूर्ण हो, प्रभु के चरणों में उस साधना को हम समर्पित करें। आप शक्रस्तव तो बोलते होंगे कभी – कभी? शक्रस्तव के अंत में आता है यह,”गृहाणास्मत् कृतं जपम्”

शक्रस्तव बोलने के बाद १०८ बार ‘ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं नमः’ का जाप किया जाता है। जाप करने के बाद हम प्रभु से कहते हैं— “गृहाणास्मत् कृतं जपम्।” प्रभु! मैंने जो जप किया, उस जप को आप स्वीकार कर लो। ‘मैं आपके चरणों में जप को समर्पित करता हूँ। जप का पुण्य मेरे पास रहे, कोई दिक्कत नहीं। जप की निर्जरा मेरे पास रहे, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन जप का कर्तृत्व मेरे पास नहीं रहा।’ मैंने जप किया। जप तो है थोड़ा, पर अहंकार होगा इतना! ‘मैंने जप किया!’

हमारी साधना में सबसे बड़ा अवरोध अहंकार का है। साधना तो थोड़ी होती है, अहंकार बहुत बड़ा होता है— ‘मैंने यह किया।’ बस, प्रभु का शासन हमें मिला है। तो प्रभु शासन का यह केंद्रवर्ती सिद्धांत है कि जो कुछ भी अच्छा हुआ, प्रभु की कृपा से हुआ, प्रभु के प्रेम से हुआ। मैं क्या कर सकता हूँ? मैं तो अशक्त आदमी हूँ। मैं राग में या द्वेष में जा सकता हूँ। ‘साधना मैं कर सकता हूँ?’ तुम साधना कर सकते हो? साधना अपन नहीं कर सकते। साधना तो प्रभु ही करवाते हैं। राग और द्वेष में हम जाते हैं, वहाँ प्रभु नहीं करवाते। एक आदमी ने मुझे पूछा था कि ‘सब प्रभु करवाते हैं, तो राग और द्वेष वो कौन करवाता है?’ मैंने कहा, ‘वो तू करता है!’ अच्छी बात जो है, वो प्रभु की कृपा से होती है। राग और द्वेष तो हम भी करते हैं, अनंत जन्मों से करते आए हैं। तो साधना प्रभु ही करवाते हैं।

अजित-शांति स्तोत्र के अंत में नंदिषेण मुनि ने कहा—”मम य दिसऊ संजमे नंदिं” ‘प्रभु, ये रत्नत्रयी तूने दी, साधना तूने दी। अब साधना का आनंद भी तुझे ही देना है।’ साधना भी प्रभु देते हैं, साधना का आनंद भी प्रभु देते हैं। आपके पास साधना है, साधना का आनंद कितना है? एक लाख रुपए मिल गए, कितना आनंद होगा? अब तो लाख रुपया क्या, करोड़ रुपए की लॉटरी लग जाए तो रोम-रोम खिल जाएगा कि ‘करोड़ रुपए मिल गए!’ लेकिन एक सामायिक हुआ, तो माताओं से पूछो, एक सामायिक का कितना आनंद? एक करोड़ की लॉटरी लगी उससे भी ज़्यादा आनंद! बोलो, कितना आनंद होता है? सामायिक की कीमत तो होती ही नहीं, हो भी नहीं सकती, अमूल्य है। तो साधना आपके पास है, साधना का आनंद कितना है?

‘श्रीपाल रास’ में मयणा सुंदरी की एक बड़ी सुंदर स्टेटमेंट (Statement) आती है। मयणा सुंदरी पूजा करने के लिए जाती है। प्रभु के अंगों का स्पर्श हो… प्रभु का स्पर्श! ये चिंतामणि दादा या गोड़ीजी दादा हैं, तो मूर्ति नहीं हैं। साक्षात भगवान हैं। मूर्ति तो कहाँ तक है? जब आप जयपुर से लाए, तब तक। जब उस पर प्राण-प्रतिष्ठा हुई, अंजनशलाका हुई, तभी भगवान हो गए।

प्राण-प्रतिष्ठा में हम क्या करते हैं, मालूम है आपको? पूरे विश्व में परम चेतना फैली हुई है। उपाध्याय यशोविजयजी महाराज ने ‘पंचविंशतिका’ में लिखा— “व्यक्तया शिवपदस्थोЅसौ, शक्त्या जयति सर्वग:।” व्यक्ति रूपी परमात्मा सिद्धशिला पर हैं। लेकिन शक्ति रूप से पूरे ब्रह्मांड में परमात्मा हैं। तो ये जो परम चेतना ब्रह्मांड में फैली हुई है, उसको आचार्य भगवंत अपनी चारित्र शक्ति से, मंत्र शक्ति से खींचते हैं और खींचकर मूर्ति में प्रक्षिप्त करते हैं। एक झरना चालू होता है। यहाँ से परम चेतना मूर्ति में दाखिल होती है और नव अंगों से बाहर निकलती है। तो आप जब पूजा करते हैं, तब परम चेतना का स्पर्श करते हैं।

अब प्रभु का स्पर्श… परम चेतना का स्पर्श क्या होगा, बोलो तो? रोंगटे खड़े हो जाएंगे। मयणा सुंदरी ने पूजा की। फिर चैत्यवंदन किया। फिर घर पर गई। एक घंटे के बाद घर पर जाकर सासू माँ से मयणा सुंदरी ने कहा कि, “माँ! आज तो पूजा में ऐसा भाव आया, ऐसा भाव आया कि प्रभु के स्पर्श को एक घंटा बीत गया है, फिर भी मेरा रोंआ-रोंआ अभी खिला हुआ है। एक भी रोंआ बैठा नहीं। रोम-रोम पुलकित हो गए।” और कब? प्रभु के स्पर्श के एक घंटे बाद! आप प्रभु का स्पर्श करते हैं, उस समय रोंगटे खड़े होते हैं? कुछ होता है भीतर?

मैंने एक प्रवचन में पूछा था कि प्रभु तो एनर्जी (Energy) हैं। परम चेतना, परम शक्ति, एनर्जी! उस एनर्जी का आपने स्पर्श किया, तो आपके भीतर कुछ ना कुछ होना चाहिए। कुछ होता है? सामने एक भावक बैठा था। उसने कहा, “शायद कुछ नहीं होता है। बस ऐसे ही पूजा कर लेते हैं। कुछ होता नहीं है अभी तक। ना आँख से आँसू झरते हैं, ना रोंआ खिल उठता है, ना भीतर कुछ होता है।” उसने पूछा कि, “साहब, आप तो कहते हो प्रभु एनर्जी हैं, शक्ति हैं, और हमने उसका स्पर्श किया, तो फिर कुछ हमारे भीतर होता क्यों नहीं? कुछ ना कुछ तो होना चाहिए।”

तब मैंने कहा कि, “इलेक्ट्रीशियन (Electrician) है, उसको इलेक्ट्रिक वायरों से काम पड़ता है। वह लकड़ी के स्लीपर (Slippers) पहनकर लाइव (Live) वायरों को टच करेगा, फिर भी कुछ नहीं होगा। क्योंकि वायर बिजली और उसके बीच अवरोधक तत्व आ गया। ऐसे ही आप प्रभु का स्पर्श करते हो, लेकिन प्रभु और आपके बीच एक अवरोधक तत्व आ जाता है। और वह अवरोधक तत्व है— विचार! आप भगवान के पास जाते हो, गभारे (गर्भगृह) में जाते हो, फिर भी विचार प्रभु के नहीं होते। विचार संसार के होते हैं। तो ये जो विचार हैं, वो अवरोधक हो जाते हैं।” तो उस भावक ने पूछा कि, “गुरुदेव! हमें क्या करना चाहिए उस अवरोध को हटाने के लिए?” तब मैंने एक प्रैक्टिकल मार्ग उसको दिया।

मैंने कहा, “गभारे के बाहर थोड़ी देर खड़े रहना और प्रभु से प्रार्थना करना और सोचना कि ‘ये प्रभु जयपुर से नहीं आए हैं। प्रभु सिद्धशिला से आए हैं। प्रभु कहाँ से आए? चिंतामणि दादा कहाँ से आए? जयपुर से नहीं आए। सिद्धशिला पर से आए हैं। Oh! भगवान सिद्धशिला से मेरे लिए यहाँ आए हैं! सात राजलोक का विहार करके पर्सनली फॉर मी (Personally for me), पर्सनली फॉर अस (Personally for us)। पुणे वालों के लिए प्रभु सात राजलोक का विहार करके यहाँ आ गए हैं!’ अब फिर आप गभारे में जाएंगे, कितना भाव उमड़ेगा! “ओह! प्रभु मेरे लिए, Personally for me यहाँ आए!” भाव कितना बढ़ जाएगा!

आपके गुरुदेव हैं। आपको चैत्र महीने की ओली करानी है, पुणे में। आप गुरुदेव को विनती करेंगे। गुरुदेव सूरत की ओर हैं, गुजरात में। तो आप वहाँ जाएंगे— “साहेब, चैत्र महीने की ओली, उसका लाभ मुझे मिला है। आपकी निश्रा में करानी है। आप पधारो।” तो गुरुदेव ने कहा, “अरे, मेरा अगला चातुर्मास भी सूरत में निश्चित हुआ है। अब मैं पुणे तक आऊँ और फिर पुणे से सूरत आऊँ? इतना लंबा विहार? कोई भी महात्मा हों आस-पास में, उनके पास ओली करा लो।” आप कहेंगे, “नहीं गुरुदेव, आप मेरे गुरुदेव हैं, आपको पधारना पड़ेगा।” और गुरुदेव कृपा कर दें और पधार भी जाएं, आप क्या सोचेंगे? “मेरे गुरुदेव ६०० किलोमीटर विहार करके यहाँ आए और ६०० किलोमीटर जाएंगे। १२०० किलोमीटर मेरे गुरुदेव मेरे लिए चले!” कितना भाव उमड़ेगा!

गुरुदेव तो १२०० किलोमीटर चले, भगवान कितना चले, वो तो देखो! भगवान तो सात राजलोक चले! फिर कितना भाव उमड़ेगा! फिर प्रभु का स्पर्श करो— “ओह भगवान! मैं तो सिद्धशिला पर कब आऊँगा? और जब आऊँगा सिद्धशिला पर, तब आपका पूजन मैं नहीं करूँगा, आपके जैसा हो जाऊँगा।” धनपाल कवि ने ‘ऋषभ पंचाशिका’ में कहा— “होही मोहुच्छेओ, तुह सेवाए धुव त्ति नंदामि , जं पुण न वंदिअव्वो, तत्थ तुमं तेण झिज्जामि” “प्रभु! तेरी सेवा मैं करता हूँ तो मोहनीय का क्षय होगा और मैं मोक्ष में आ जाऊँगा, इसका आनंद है। लेकिन मोक्ष में आने पर तेरी सेवा छूट जाएगी, उसका दर्द है! कि वहाँ मैं तेरी पूजा नहीं कर सकूँगा! वहाँ शरीर ही नहीं है। तेरा भी शरीर नहीं है। मेरा भी शरीर नहीं है। कैसे शरीर का मैं स्पर्श करूँगा? तेरी सेवा छूट जाएगी।”

तो जब सिद्धशिला पर हम जाएंगे, तब स्पर्श नहीं होगा। स्पर्श अभी ही होगा। और प्रभु, तू आ गया और रूपी होकर आ गया! तू अरूपी है, लेकिन मेरे लिए तूने रूप को धारण किया। और तेरे रूप की मैं पूजा कर सकता हूँ। प्रभु मेरे लिए कितना सुनहरा अवसर यह है! आप पूजा करते जाएंगे, आपकी आँख से आँसू झरते जाएंगे— “मेरे प्रभु! मेरे प्रभु! मेरे प्रभु!”

एक शॉर्टकट (Shortcut) आपको दिखाऊँ? आपको शॉर्टकट चाहिए मोक्ष का? अरे शॉर्टकट भी जाने दो, शॉर्टेस्ट कट (Shortest cut)! ‘मेरा घर, मेरी ऑफिस, मेरा परिवार’— इसमें ‘मेरापन’ जो घोंटा है। अब क्या करना है? ‘मेरे भगवान, मेरे सद्गुरु, मेरे प्रभु का शासन।’ मेरेपन को यहाँ ला दो। जो ‘मेरापन’ संसार में था, उस मेरेपन को प्रभु के पास ला दो। शॉर्टेस्ट कट! मोक्ष ये रहा! मोक्ष कहाँ दूर है? मोक्ष दूर नहीं।

तो “गृहाणास्मत् कृतं जपम्”— प्रभु, मैंने जप किया, जप का पुण्य मेरे पास हो, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन जप का कर्तृत्व मेरे पास ना हो। जप तूने करवाया है, मैंने नहीं किया। एक बात मैं आपसे कहूँ? एक आराधना करने का विचार आपको आया, वो भी प्रभु की कृपा से आया। ‘ललित विस्तरा’ सूत्र की पंजिका में कहा हुआ है— ‘एकोऽपि भावः तीर्थकरप्रसादादेव लभ्यते।’ (‘भगवत्प्रसादलभ्यत्वात् कुशलाशयस्य’) एक भी सुंदर विचार, एक भी सुंदर भाव आपको कब आए? जब प्रभु की कृपा आप पर उतरे, तब। तो मासक्षमण करने का विचार भी प्रभु देंगे और मासक्षमण भी प्रभु करवाएंगे। आपको तो कुछ भी करना नहीं है। आपको तो फोटो छपवाना है पत्रिका में! लोगों की अनुमोदना के लिए। आप तो समझते हैं, ‘मैंने मासक्षमण किया ही नहीं, प्रभु ने करवाया है। लेकिन दूसरों को अनुमोदना मिले, इसलिए संघ वाले फोटो छापेंगे, तो आप छपवा भी देंगे।’ लेकिन आप मानेंगे कि मैंने मासक्षमण नहीं किया।

माताओं से कहूँगा, मासक्षमण का विचार भी प्रभु देते हैं और मासक्षमण भी प्रभु करवाते हैं। इन साध्वीजी से पूछना कभी कि आपकी दीक्षा कैसे हुई? तो वे कहेंगी, “दीक्षा का भाव प्रभु ने दिया। प्रभु की भक्ति करती थी और प्रभु ने विचार दिया कि मेरे मार्ग पर आ जा बेटा। तो प्रभु ने दीक्षा का भाव दिया और प्रभु ने मुझे उसके मार्ग पर चलाया। मैंने कुछ नहीं किया।” दीक्षा जैसी साधना प्रभु ने दी। मासक्षमण प्रभु करवाएंगे। पुराने युग में फोटोग्राफर होते थे। लोग स्टूडियो में फोटो खिंचवाने के लिए जाते थे। अब तो घर-घर पर फोटोग्राफर हो गए हैं।  मोबाइल वाले! उस समय फोटोग्राफर कहता था— “स्माइल प्लीज़! (Smile please!) हँसता मुख रखो। दूसरा सब मैं सँभाल लूँगा। तुम हँसता मुँह रखो।” ऐसे हम भी कहेंगे— “प्रभु भाव देंगे। प्रभु मासक्षमण करवाएंगे। आपको तो सिर्फ हाथ जोड़ने का है, पच्चक्खाण लेने का है। आपको दूसरा कुछ नहीं करना। ३१ तारीख को हमारे पास आ जाइएगा सुबह ५:३० बजे, और प्रभु के सामने विधि कराकर आपको मंगल मुहूर्त में पच्चक्खाण देंगे। बस आपको पच्चक्खाण ले लेना है। दूसरा कुछ करना नहीं है। सब प्रभु करवा देंगे।”

छोटे-छोटे बच्चे मासक्षमण करते हैं। सिद्धीतप करते हैं। इस बाल मुनिराज को देखो। इतनी छोटी उम्र में दीक्षा! लेकिन कितने आनंद में हैं। पूरे दिन देखो, नाचते रहते हैं। मज़ा में। क्यों भाई मज़ा? यहाँ तो आनंद ही आनंद है!

तो हिम्मतभाई बेड़ा वाले ने प्रभु से कहा कि, “प्रभु! तूने ओलीजी करवाई, तेरे चरणों में मैं समर्पित करता हूँ। और आज से नई ओली शुरू करनी है, वो भी तेरी कृपा से होगी। मुझसे कुछ नहीं होगा, तेरी कृपा से होगा।”

शाहपुर में उपधान था मेरा। एक आदमी बीच उपधान में मुझे मिला कि, “साहेबजी! मैंने फॉर्म भरा था, फॉर्म पास होकर आ गया था। मैंने बिस्तर-बोरिया बाँध लिया था। रात की गाड़ी में मैं निकल कर मुंबई से शाहपुर आने वाला था। कार में सामान मैं रख रहा था, उसी समय मोबाइल बजा और मेरे एक संबंधी, उनको हार्ट अटैक (Heart attack) आ गया। आईसीयू (ICU) में उनको एडमिट (Admit) कराया गया हॉस्पिटल में। तो बोरिया-बिस्तर लेना पड़ा पीछे और उनकी सेवा में मैं लग गया। पहले मुहूर्त में नहीं आ सका उपधान में, न दूसरे मुहूर्त में आ सका।” सब निश्चित था, लेकिन प्रभु की कृपा नहीं मिली तो मैं नहीं आ सकता। आपका निर्णय कुछ महत्व का नहीं है, प्रभु की कृपा ही महत्व की है। तो प्रभु पर छोड़ दो, प्रभु करवाएंगे।

तो हिम्मतभाई ने कहा, “नई ओली भी आपकी कृपा से होगी।” फिर गुरुदेव के पास आए। गुरुदेव का वासक्षेप लिया कि, “आप शक्तिपात करो, मेरी ओली सुचारु रूप से संपन्न हो।” इतना तो आप भी करते होंगे। लेकिन हिम्मतभाई ने एक कदम ज्यादा उठाया। पन्ना-रूपा धर्मशाला में पालिताणा में उनकी आराधना चलती थी, गुरुदेव की निश्रा में। तो वहाँ जितने आराधक थे, उन सब आराधकों को उस दिन अपने वहाँ एकाशने के लिए आमंत्रित किया। बड़ा हॉल रखा सबके लिए, और सबको एकाशने के लिए आमंत्रित किया। करीब ५०० से ज्यादा यात्रिक थे, सब आ गए। हिम्मत भाई खुद परोसने लगे। ७८ आयंबिल हुए, फिर एक उपवास, आज का आयंबिल अभी करना है… और वे खुद परोसते हैं! एकाशना हो गया सबका।

फिर हिम्मत भाई हाथ जोड़कर कहते हैं, “आज मेरी नई ओली स्टार्ट (Start) हो रही है। आप सब मुझे आशीर्वाद दो कि मेरी ओली सुचारु रूप से संपन्न हो।” सब आराधकों की आँखों में आँसू आ गए! आराधकों ने कहा, “हिम्मत भाई! कहाँ आप, कहाँ हम! आपकी आराधना की अनुमोदना आचार्य भगवंत सुधर्मा पीठ पर से करते हैं। और हम तो सामान्य साधक हैं। आप हमें आशीर्वाद दो। हम क्या आपको आशीर्वाद दें?” तब हिम्मतभाई ने कहा, “आप कौन हो? आप अनुष्ठान-परमात्मा हो।” क्या शब्द गढ़ा! अनुष्ठान-परमात्मा। ‘परमात्मा ने दिया हुआ अनुष्ठान जो करते हैं श्रावक और श्राविका, वे अनुष्ठान-परमात्मा हैं।’ “आप सब अनुष्ठान-परमात्मा हैं। और आपके आशीर्वाद के बिना मेरी तपश्चर्या, मेरी साधना सुचारु रूप से संपन्न नहीं हो सकती।”

ये क्या था? पूर्ण मन! हिम्मत भाई हमारे युग के महान गुरुदेव पन्यास प्रवर भद्रंकरविजय महाराज साहेब के गृहस्थ शिष्य थे। और इसलिए उनके हृदय में ये भाव उमड़े थे कि ‘सब अच्छे हैं। सब अच्छे हैं। मैं ही अच्छा नहीं हूँ।’ “मैं बड़ा साधक हूँ”, ऐसा भाव हिम्मतभाई के हृदय में कभी नहीं आया।

एक बात सोचना। साधना श्रेष्ठ करना। लेकिन कभी भी सोचना नहीं कि मैंने श्रेष्ठ साधना की। दूसरों की साधना जो है, उसको श्रेष्ठ समझना। तुम्हारा पौषध है, दूसरे व्यक्ति की सामायिक है, एक सामायिक की अनुमोदना करना। हमारे धर्म की अनुमोदना हमें नहीं करनी है। ‘पंचसूत्र’ में अनुमोदना की बात आई, तब हरिभद्र सूरि महाराज ने टीका में लिखा— “परकृत सुकृतानां अनुमोदना”। सुकृत की अनुमोदना करने की, लेकिन अपने सुकृतों की नहीं। दूसरों के सुकृतों की अनुमोदना करनी। “मैंने संघ निकाला था, मैंने अठ्ठाई कराई थी”, ऐसी कोई अनुमोदना नहीं करनी। ये तो अहंकार में आ जाएगी।

दूसरों के जो सुकृत हैं, उसकी अनुमोदना करनी है। और उसकी अनुमोदना का फल कितना? तुम साधना करो, दूसरों के पास कराओ, या दूसरों की साधना की अनुमोदना करो… तीनों का फल एक सरखा (समान) है, ऐसा प्रभु ने कहा है। तो “परकृत सुकृतानां अनुमोदना”— दूसरों के जो सुकृत हैं, उसकी अनुमोदना करनी है। रोज़ अनुमोदना करते हो? सब साधु – साध्वीकी? श्रावक – श्राविकाकी? मार्गस्थ लोगकी? प्रभु के मार्ग पर जो आए हैं, उन सब की अनुमोदना रोज़ होती है? “प्रभु मुझे मिले, ये अनुमोदना का भाव मिला।” अब किसी बाल-मुनि को देखता हूँ, किसी बाल-साध्वी को देखता हूँ, उपधान में कोई छोटे बच्चे को देखता हूँ, मेरी आँखें नम हो जाती हैं कि ‘प्रभु की कैसी कृपा है कि इतने छोटे-छोटे बच्चे प्रभु की साधना में लगे हुए हैं।’ तो ये जो अनुमोदना है, बहुत ही सुंदर है।

तो हिम्मतभाई के पास ये अनुमोदना थी, और इसलिए उन्होंने कहा कि “आप सब अनुष्ठान-परमात्मा हैं। आपका अनुष्ठान बहुत ही सुंदर है। आप परम पावन पालिताणा में आए हो। पूरा दिन आप साधना करते हो। आप अनुष्ठान-परमात्मा हो। आपके आशीर्वाद के बिना मेरी साधना आगे नहीं चलेगी। आपको आशीर्वाद देना ही पड़ेगा।” ये क्या है? पूरण मन!

मन पूर्ण जब हो जाता है, तब दूसरों की साधना हमें पूर्ण लगती है। वरना हम दूसरों की साधना में कहाँ-कहाँ गलतियां हैं, वो देख लेंगे। “क्या खमासमण दिया? खड़ा होकर करता है या बैठे-बैठे देता है… अरे बैठे-बैठे देता है! तू बैठे-बैठे १०० देता है? तेरे से तो अच्छे हैं ना! तो अनुमोदना कर। क्यों अनुमोदना से वंचित होता है?”

तो महोपाध्यायजी ने कहा— “पूरन मन, पूरन सब दीसे।” प्रभु का प्रेम जब हृदय में भर जाता है, तब मन पूर्ण हो जाता है। आप सबका मन पूर्ण हो जाए और आपको सब जगह पूर्णता ही पूर्णता दिखे, ऐसा आशीर्वाद!

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