Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 26-07-2026 | Pune Chaturmas

32 Min Read

सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति

पूर्ण प्रेम जब प्रभु से हो गया, तब भक्त सिद्ध हो जाता है। भक्त को भौतिक सिद्धियों से कुछ लेना-देना नहीं। भक्ति मिल गई, पूर्ण प्रेम प्रभु पर हो गया, तो भक्त सिद्ध हो गया! दूसरी किसी सिद्धि की अब आवश्यकता नहीं है।

उसे अमृत तत्त्व की प्राप्ति हो जाती है। जो अमर बना दे, वह अमृत। भक्त के लिए जीवन और मृत्यु की व्याख्या अलग है। विभाव में जाना, राग-द्वेष में जाना, यही है मृत्यु। और प्रभु में जीना, स्वभाव में जीना, यही है जीवन। प्रभु से पूर्ण प्रेम हो गया; अब भक्त की वैभाविक मृत्यु है ही नहीं।

अनंत जन्मों से एक प्यास लेकर हम चले हैं। आपने संपत्ति बहुत इकट्ठी की, पदार्थ बहुत इकट्ठे किए, फिर भी वह प्यास नहीं गई। जिस पानी से प्यास बढ़े, वह मीठा नहीं बल्कि खारा पानी है; ठंडे, मीठे जल से ही प्यास बुझेगी! प्रभु का पूर्ण प्रेम और प्रभु पर पूर्ण प्रेम जब मिलता है, तभी हम तृप्त होते हैं।


प्रभु के अपार प्रेम से प्रेरित होकर जब हमारा प्रेम प्रभु की ओर जाता है, तब क्या होता है? इसकी बात नारद ऋषि ने ‘भक्ति सूत्र’ में कही है—

“यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति।”

परम प्रेम जब मिल गया, पूर्ण प्रेम जब प्रभु से हो गया, तब भक्त सिद्ध बनता है, अमृत तत्त्व की प्राप्ति करने वाला होता है और तृप्त होता है। तीन बातें कहीं।

पहली बात, पूर्ण प्रेम मिलने पर भक्त ‘सिद्ध’ होता है। सब सिद्धियां मिल गईं। भक्त को भौतिक सिद्धियों से कुछ लेना-देना नहीं है। भक्त को तो सिर्फ प्रभु की भक्ति ही चाहिए। पूर्ण प्रेम, परम प्रेम यानी भक्ति। तो भक्ति मिल गई, पूर्ण प्रेम प्रभु पर हो गया, तो भक्त सिद्ध हो गया। सब सिद्धियां मिल गईं। अब दूसरी कोई सिद्धि की आवश्यकता नहीं है। देव आकर भी पूछेगा कि, “मैं आपको क्या दूँ?” तो भक्त कहेगा, “तेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जो मेरे काम में आए। मुझे जो चाहिए वो मेरे प्रभु से ही मिलेगा। दूसरा कोई मुझे कुछ भी दे नहीं सकता।” तो प्रभु का पूर्ण प्रेम मिला, सब सिद्धियां मिल गईं।

दूसरी बात कही, ‘अमृत तत्त्व’ की प्राप्ति हो गई। भक्ति अर्थात् अमृत। अमृत का अर्थ क्या? जो अमर बना दे, वो अमृत। भक्ति भक्त को अमर बना देती है। आनंदघनजी भगवंत ने कहा—

“अब हम अमर भए ना मरेंगे।”

प्रभु की भक्ति मिल गई, मैं अमर हो गया। अमृत तत्त्व की प्राप्ति मुझे हो गई। अब मिथ्यात्व में जाने का नहीं है। मेरे लिए वैभाविक मृत्यु है ही नहीं। भक्त के लिए जीवन की और मृत्यु की व्याख्या अलग है। विभाव में जाना, राग-द्वेष में जाना, यही है मृत्यु। और प्रभु में जीना, स्वभाव में जीना, यही है जीवन। तो भक्त कभी राग में नहीं जाएगा। और राग करेगा तो प्रभु से करेगा। राग तो ठीक है, प्रभु से ही करेगा। गुस्सा किससे करेगा? गुस्सा भी प्रभु से ही करेगा। आपको आता है? प्रभु से गुस्सा करना आता है आपको?

मैं बहुत बार कहता हूँ। एक छोटा सा बच्चा, सात साल का। उसके कलीग (मित्र) के बर्थडे (Birthday) का रिसेप्शन (Reception) था, तो वो रिसेप्शन में गया। जिंदगी में पहली बार किसी रिसेप्शन में वो जा रहा था, तो उसे मालूम नहीं था कि सब नए कपड़े पहन कर आएंगे। वो बच्चा अपने रोज़ के जो कपड़े थे, वही पहन कर गया। सब बच्चों ने कहा, “अरे! ऐसे कपड़े पहन कर तू आया रिसेप्शन में? देख हमारे कपड़े कैसे हैं!” वो बच्चा शर्मिंदा हो गया, लेकिन घर पर आकर माँ से वो झगड़ता है। माँ से कहता है बच्चा,” मुझे तो ख्याल नहीं रहा कि रिसेप्शन में सब नए कपड़े पहन कर आते हैं। तुझे तो ख्याल था ना, तो तूने मुझे नए कपड़े क्यों नहीं पहनाए?” वह माँ से लड़ेगा।

तुम लड़ते हो चिंतामणि दादा से, गोड़ीजी दादा से? “तूने मुझे श्रावकपन में भेजा। तेरा शासन तूने मुझे दिया। अब श्रावक होने में कितने गुण होते हैं, वो तो तुझे ख्याल है, तो तूने वे गुण मुझे क्यों नहीं दिए?” झगड़े कभी प्रभु से? “श्रावक के पास परिग्रह परिमाण व्रत होता है, तो मैं इतना परिग्रही हूँ, तूने ब्रेक (Break) क्यों नहीं लगाई?” पूछा कभी प्रभु से? झगड़े प्रभु से कि “तू मेरा ख्याल क्यों नहीं रखता है?” हम भी प्रभु से झगड़ते हैं। प्रभु का सुरक्षा चक्र हमें ऐसा मिला है कि हम विभाव में जाते ही नहीं। लेकिन शायद कोई मुनि, शायद कोई साध्वी विभाव में पहुँच गई, तो प्रभु से झगड़ेगी। झगड़ते हो ना? कि “तूने मेरा ख्याल क्यों नहीं रखा? मैं विभाव में चली गई, तूने मुझे रोका क्यों नहीं? तूने ब्रेक क्यों नहीं लगाई?” झगड़ते हो? तो प्रभु के पास जाकर करते क्या हो? रोते भी नहीं, झगड़ते भी नहीं, तो करते क्या हो? तो ‘अमृतो भवति’ भक्ति मिली, पूर्ण प्रेम मिला – अमृत तत्त्व मिल गया!

औपनिषदिक परंपरा में एक सुंदर घटना आती है। याज्ञवल्क्य बड़े विद्वान ब्राह्मण थे। उनकी दो पत्नियां थीं। एक दिन उन्हें संन्यास लेने का विचार हुआ। दोनों पत्नियों को बिठाया और कहा कि, “मैं संन्यास लेने के लिए जा रहा हूँ। मेरी जो संपत्ति है, तुम दोनों में आधी-आधी बाँट देता हूँ और मैं संन्यासी हो जाता हूँ।” दो पत्नियों में से एक का नाम था मैत्रेयी। मैत्रेयी ने अपने पति से पूछा कि, “आप मुझे जो संपत्ति दोगे, क्या उस संपत्ति से मुझे अमृत तत्त्व की प्राप्ति होगी?” पूरी औपनिषदिक परंपरा में मैत्रेयी के वचन आज भी गूँज रहे हैं—

“येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्।”

“येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्।” ‘जो ये संपत्ति से अमृत तत्त्व की प्राप्ति नहीं होती है, उस संपत्ति का मुझे कोई काम नहीं। मुझे तो ऐसा तत्त्व चाहिए जिससे अमृत तत्त्व की प्राप्ति हो, मैं अमर हो जाऊँ। मैं विभाव में कभी भी जाऊँ नहीं। ना राग में जाऊँ, ना द्वेष में जाऊँ, ना अहंकार में जाऊँ।’ राग में जाना यह मृत्यु है। द्वेष में जाना यह मृत्यु है। अहंकार में जाना यह मृत्यु है। लेकिन प्रभु से राग करते हो तो अमृत तत्त्व मिलता है। प्रभु से द्वेष करते हो तो अमृत तत्त्व मिलता है। और अहंकार भी, ‘प्रभु मिले’ उसका करते हो, तो अहंकार से भी अमृत तत्त्व मिलता है।

एक स्तवना में एक महापुरुष ने बहुत अच्छी बातें प्रभु से कहीं। प्रभु से उन्होंने कहा कि, “प्रभु! तू तो सिद्धशिला पर बैठ गया है। मैं चौदह राजलोक में भ्रमण करता हूँ, मैं बड़ा हूँ!” फिर कहा, “तू निर्गुण, मैं तो गुणधारी!” लोग समझते नहीं हैं तो बदल देते हैं— ‘मैं निर्गुण, तू गुणधारी’।  प्रभु निर्गुण? और मैं गुणवान? ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन ये गुण सत्त्व, रजस् और तमस् गुण की बात है। रजस् यानी कि राग, तमस् यानी कि द्वेष, और सत्त्व यानी कि शुभ कार्य किया उसका भी अहंकार। तो प्रभु निर्गुण हैं। राग, द्वेष, अहंकार से पर हैं। हम तीनों गुणों से युक्त हैं। तो “प्रभु तू निर्गुण है, मैं गुणवान हूँ। बोल, मैं तुझसे बड़ा हूँ कि नहीं?” फिर कहा, “ये तो ठीक बात है। लेकिन एक बात तो ऐसी है कि उसमें तो मैं तुझसे बड़ा हूँ ही! बड़ा ही हूँ! कौन सी बात में? तेरे सिर पर कौन है? बोल! तेरे सिर पर कोई नहीं और मेरे सिर पर तू है। बोल मैं बड़ा कि नहीं!”

तो अमृत तत्त्व की प्राप्ति प्रभु से होती है। तो मैत्रेयी ने कहा कि, “संपत्ति से अमृत तत्त्व की प्राप्ति नहीं होती है, तो मुझे संपत्ति का कोई काम नहीं। मैं भी आपके साथ संन्यासिनी हो जाऊँगी।” और पति के पीछे-पीछे मैत्रेयी भी संन्यासिनी हो गई, क्योंकि उसे अमृत तत्त्व की प्राप्ति चाहिए थी। तो सिद्धियां मिलती हैं पूर्ण प्रेम से। अमृत तत्त्व मिलता है पूर्ण प्रेम से।

और तीसरी बात कही— ‘तृप्तो भवति।’ प्रभु का पूर्ण प्रेम जब मिलता है, तब हम तृप्त हो जाते हैं। प्यास लगी थी, ठंडा और मीठा जल मिला। मीठा पानी, ठंडा पानी, प्यास शांत हो गई, तुम तृप्त हो गए। तो प्रभु का पूर्ण प्रेम और प्रभु पर पूर्ण प्रेम जब मिलता है, तब हम तृप्त होते हैं। एक बात आप समझो, अनंत जन्मों से हम प्यासे हैं। अनंत जन्मों से प्यास लेकर हम चलते हैं। अभी तक आपको ख्याल नहीं कि प्यास कौन से कारण से है? प्यास का कारण क्या है? आपने सोचा, ‘संपत्ति कम है, इसलिए मैं तृप्त नहीं होता हूँ। संपत्ति ज़्यादा इकट्ठी करूँ।’ संपत्ति बहुत इकट्ठी हुई, प्यास गई नहीं। पदार्थ बहुत इकट्ठे किए, प्यास नहीं गई। और प्यास जाने वाली भी नहीं है। क्या अनुभव है आपका? बोलो।

आज का मनोवैज्ञानिक कहता है कि आज के आदमी ने घर को गोडाउन (Godown) में बदल डाला है। इतनी चीज़ों का अंबार घर में खड़क (लगा) दिया है कि दो मेहमान आएं तो रहने की जगह नहीं है। घर को गोडाउन में पलट दिया है, लेकिन प्यास नहीं गई। तो आपने कभी सोचा कि संपत्ति इतनी हुई, प्यास जाती नहीं है; पदार्थ इतने इकट्ठे हुए, प्यास जाती नहीं है, तो प्यास है किस कारण से? सोचा आपने कभी?

कभी सोचा आपके पूर्वजों के पास कितने पैसे थे? १०० वर्ष पहले लाख रुपए हैं, ओहो! वो तो लखपति हो गए! बड़ी बात कहलाती थी। आज करोड़पति हो तो भी इसकी कोई गिनती नहीं है। अरे, पाँच करोड़ में क्या? तीन-चार करोड़ का तो घर आता है, फ्लैट (Flat) आता है। फिर कार लेंगे, फिर ये लेंगे, फिर वो लेंगे… तो पाँच करोड़ से क्या होगा? तो संपत्ति इतनी इकट्ठी हुई। प्यास गई कि प्यास बढ़ी? क्या हुआ? बढ़ी। तो भी आप सोचते नहीं। पानी पीते हो और प्यास बढ़ती है, तो समझ लेना चाहिए कि ये मीठा पानी नहीं है, लेकिन सॉल्ट (Salt) युक्त खारा पानी है। तो खारे पानी से प्यास मिटती नहीं। तो आपने जो इकट्ठा किया है, उससे आपको तृप्ति नहीं मिलती है। और हमारे पास तृप्ति है। हमारे चहेरे पर दिखती है तृप्ति? आप आएंगे पूछने के लिए, साहेबजी क्या खप है? हम कहेंगे कुछ भी नहीं…| “खप नहीं” यह हमारा सूत्र है, नहीं चाहिए… नहीं चाहिए… नहीं चाहिए…

इलाची कुमार केवलज्ञानी कैसे हुआ? मुनिराज को देखकर! मुनिराज गोचरी वोहरने (वहोराने) के लिए आए हैं। भाव से बहन वोहरा ही रही है। मुनिराज कहते हैं, “नहीं, ये नहीं चाहिए, ये नहीं चाहिए, ये नहीं चाहिए!” और इलाची को हुआ कि कहाँ ये मुनिराज! और कहाँ मैं! मैं कहता हूँ, “ये चाहिए, ये चाहिए, ये चाहिए,” और मैं दर-दर भटक रहा हूँ। और ये मुनिराज कितने सुखी हैं, कितने तृप्त हैं! उनको कुछ भी चाहिए ही नहीं!

बोलो, जिसको बहुत चाहिए, वो तृप्त? या जिसको कुछ भी न चाहिए, वो तृप्त? तृप्त कौन? आपकी परिभाषा में बोलो। तृप्त कौन? सुखी कौन? बस, अब बहुत हो गया, अब ज़्यादा नहीं चाहिए।

भोजन के लिए बैठे हैं, पाँच-छह रोटियाँ और सब्ज़ी ले ली। फिर सातवीं रोटी आई। “नहीं, अब नहीं, अब नहीं चाहिए!” ‘अब नहीं चाहिए’ का मतलब क्या हुआ? तृप्त हो गया, अब नहीं चाहिए। लेकिन “आने दो, आने दो, आने दो,” तो क्या हुआ? तृप्त नहीं है। तो आपकी परिभाषा क्या है? “आने दो, आने दो, आने दो!” और हम क्या कहेंगे? “खप नहीं, खप नहीं! चाहिए नहीं, चाहिए नहीं, चाहिए नहीं।”

तो बात यह है कि परमात्मा की प्यास लेकर हम… हम अनगिनत जन्मों से भटक रहे हैं। जब तक परम चेतना नहीं मिलेगी, परमात्मा नहीं मिलेंगे, तब तक हम तृप्त नहीं होंगे। परमात्मा का प्रेम मिल गया, परमात्मा पर प्रेम हो गया, अब हम तृप्त हो गए। अब कुछ नहीं चाहिए। परमात्मा का प्रेम मिल गया और प्रेम से हृदय भर गया। तो क्या हुआ?

तृप्त हुए तब- ‘पूरन मन पूरन सब दीसे, नहीं दुविधा को लाग’

मन पूर्ण हो गया। ऐसा पूर्ण हुआ मन कि जहाँ भी देखो, पूर्णता ही दिखती है। उपनिषद का एक शांति मंत्र है:

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। आप को सब पूर्ण लगे! अभी आपको क्या लगता है? आप अपूर्ण हैं। “इसमें ये दोष है,” “ये तो अहंकारी है,” “ये तो क्रोधी है”—ये क्यों दिखता है? आप अपूर्ण हैं। जब आपका मन पूर्ण हो जाएगा, सब पूर्ण-पूर्ण -पूर्ण दिखेगा। तो पूरण मन! यह भी पूर्ण, वह भी पूर्ण। पूर्ण से पूर्ण बढ़ता है, और पूर्ण में से पूर्ण को खींच लो, तो भी पूर्ण अवशिष्ट रहता है। पूर्ण, पूर्ण ही है। तो मन को पूर्ण बनाना है।

फिर आप शांति से बैठ जाएँगे। आप निश्चित कर लेंगे कि कितने पैसे चाहिए? १० करोड़, २० करोड़, २५ करोड़, निश्चित करो, और आज नियम ले लो कि इतना हो जाए तब बैठ जाने का, फिर बिज़नेस (Business) नहीं करने का। ये अंबानी सब्ज़ी मार्केट (Market) में भी दाखिल हो गए! अरे भाई, सब्ज़ी मार्केट को तो छोड़ तू! इतने पैसे तेरे पास हैं, मुकेश के पास, कहाँ रखना वो सवाल है! और सब्ज़ी का भी बिज़नेस करना है? कुछ तो छोड़ तू! लेकिन नहीं, एक ही बात—”अभी चाहिए, अभी चाहिए, अभी चाहिए।” मुकेश अंबानी का गणित क्या है? और अदानी का भी गणित क्या होगा? “अभी तो ५ लाख करोड़ है, ५ लाख करोड़ ही है! क्या ज़्यादा है कुछ?” आपको ज़्यादा लगेगा, उसको ज़्यादा नहीं लगेगा। ५ लाख करोड़ से क्या होता है? १० लाख करोड़ की ओर जाओ। १० लाख करोड़ हो जाएँगे तो कहेंगे, “१० लाख करोड़ से क्या होगा? १५ लाख करोड़ चाहिए।”

तो परम चेतना की प्यास को लेकर हम चले हैं। जब परमात्मा मिल गया, परमात्मा का प्रेम मिल गया, हम तृप्त हो जाएँ। पूरण मन! फिर कुछ नहीं चाहिए। आनंद ही आ रहा है।

अपने युग के साधना मनीषी, पन्यास प्रवर भद्रंकर विजय जी महाराज साहब के गृहस्थ शिष्य ऋषभदास जी थे। ऋषभदास जी चेन्नई में रहते थे। बच्चों को बिज़नेस सौंप दिया था। ठीक है, कभी-कभार जाते थे फैक्ट्री (Factory) पर। बाकी सब छोड़ दिया था। और निवृत्ति में स्वाध्याय, चिंतन और अनुभूति करते रहते थे। एक दिन वे कार (Car) में अपने घर से फैक्ट्री जा रहे थे। बीच में थोड़ा भाग अनडेवलप (Undeveloped) था। एक वृक्ष था। उसके नीचे एक संत बैठे हुए थे। तो ऋषभदास जी वहाँ गए। हिंदू संत थे। शाता पूछी, “शाता में हो आप?”

संत ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा, “अरे बहुत साता में! बहुत साता में!”

हम तो साता में ही होते हैं। अपने पास दो शब्द हैं: सुख, साता। आप पूछते हैं, “सुख-साता में आप विराजमान हो?” सुख का अर्थ है— शरीर में व्याधि न हो, शरीर निरोगी हो। और साता का अर्थ है— मन प्रसन्न हो। तो हमारे शरीर में रोग कभी-कभी होता है, हो सकता है, लेकिन मन हमारा प्रसन्न ही होता है। इसीलिए आनंदघन जी भगवंत ने कहा है:

“चित्त प्रसन्ने पूजन फल कह्यु”

हम प्रभु की आज्ञा का पालन करते हैं। उसका मापदंड क्या? मापदंड एक ही है कि हमारा चित्त प्रसन्न होना चाहिए। आप भी प्रभु की आज्ञा का पालन करते हो। चित्त प्रसन्न है ना? कोई चिंता नहीं है मन में, कोई चिंता नहीं! चिंता आप क्यों रखते हो? प्रभु को क्यों नहीं सौंप देते हो?

एक खेड़ूत (किसान) था। तो एक दिन खेत से घर आ रहा था। गाँव में घर में भी गाय थी, भैंसें थी। तो उनके लिए घास ले जाने का था। पाँच मन (मण/वज़न) घास की गठरी बाँधी। बैठने के लिए घोड़ा था। घोड़े पर वह सवार हुआ और अपने सिर पर घास की गठरी रखी! वह तो खुद घोड़े पर बैठा, और घास की गठरी कहाँ रखे? सिर पर! जो भी रास्ते में मिले, वो पूछे, “अरे! गठरी को सिर पर क्यों रखा है?”

तो वह कहता, “क्या सब भार घोड़ा उचकेगा (उठाएगा)? सब भार घोड़ा उचकेगा? मेरा पाँच मन का वज़न है, वह भी घोड़ा उचकेगा, और घास का वज़न भी घोड़ा उचकेगा? मैं भी थोड़ा उचक लूँ!”

“लेकिन तू घोड़े पर सवार है, तू सिर पर बोझ उचक ले, तो भी बोझ जाएगा कहाँ? घोड़े पर ही जाएगा!”

ऐसे ही, परम चेतना ने आपको अपने हाथ में रखा हुआ है। अब आप अपने सिर पर चिंता का बोझ रखेंगे, तो बोझ जाएगा कहाँ? जाएगा कहाँ? परम चेतना पर ही जाएगा! तो घोड़े पर ही गठरी रख दो। प्रभु को ही सौंप दो कि, “प्रभु! ये समस्या है।” मैं बार-बार कहता हूँ, संसार में आप हो, कोई भी समस्या हो, तो समस्या के बॉल (Ball) को प्रभु की कोर्ट (Court) में फेंक देना। फिर प्रभु का जो भी उत्तर आएगा, वो शानदार ही होगा। प्रभु का उत्तर कैसा होगा? अपन को दूसरा कुछ नहीं करना है। समस्या का बॉल प्रभु की कोर्ट में फेंक देने का। “ये समस्या है। तुझे मैं सौंप देता हूँ। क्या करना है, तू जान! मैं नहीं जानूँगा।” जब तक आप समस्या को प्रभु की कोर्ट में नहीं फेंकेंगे, तब तक प्रभु काम कैसे करेंगे? आप डॉक्टर (Doctor) के चेंबर (Chamber) में ही नहीं जाएँगे, तब डॉक्टर क्या करेंगे? आप डॉक्टर के चेंबर में जाएँगे, अपने शरीर को बताएँगे, फिर डॉक्टर कहेगा कि “ऐसा करना है, ऐसा नहीं करना है।” लेकिन आप चेंबर में ही नहीं जाएँगे, तो डॉक्टर क्या करेगा? आप प्रभु को केस (Case) सौंपेंगे ही नहीं, तो प्रभु क्या करेंगे? तो जो भी समस्या हो, प्रभु की कोर्ट में बॉल फेंक दो।

मेरे पास बहुत मुमुक्षु आते हैं। कभी-कभी अवढव (असमंजस/Out of focus) में होते हैं। दीक्षा लेनी, न लेनी, ५०-५०% होते हैं, तब निर्णय लेने में हिचकिचाते हैं। तब मैं कहता हूँ कि तू क्यों चिंता करता है? प्रभु की कोर्ट में बॉल फेंक दे। प्रभु को कह दे कि, “तेरे मार्ग पर मुझे ले जाना है, तो तेरे मार्ग पर ले जाना। नहीं ले जाना है, तो मैं संसार में पड़ा हूँ। जो करना हो, वो कर।” प्रभु को कह दो। He is Almighty. प्रभु सर्वशक्तिमान है। तो सर्वशक्तिमान को अपना सब कुछ कार्य सौंप दे।

मैं तो बिल्कुल निश्चिंत आदमी हूँ। अगले एक क्षण की चिंता मुझे नहीं है। जो भी क्रमबद्ध पर्याय खुलेगा, उसे देख लेंगे, मज़े से देख लेंगे। कोई एक्सपेक्टेशन (Expectation) नहीं है कि कैसे पर्याय खुलना चाहिए। आपकी तकलीफ़ क्या है? आप पहले से निश्चित करके बैठते हो कि ये घटना ऐसे ही घटित होनी चाहिए। अब आपका कोई पुण्य ऐसा नहीं है कि घटना बदल जाए। घटना वैसे ही रूप में घटित होगी, जिस रूप में वह घटित होने वाली है। और आप नाराज़ हो जाएँगे, “घटना ऐसे क्यों घटित हुई?” अरे भाई! घटना को घटित होने दो। तुम उसको देख लो। मैं बहुत बार कहता हूँ— घटना को घटित होने की स्वतंत्रता है, तो उसके अर्थघटन (Interpretation) की स्वतंत्रता तुम्हारे पास नहीं है? अर्थघटन तुम कर लो! घटना का अर्थघटन कैसे करना, वो तुम्हारे हाथ में है।

सुभाषचंद्र बोझ एक सभा में भाषण कर रहे थे। उस समय कांग्रेस (Congress) में भी विभाजन था। दो पार्ट (Part/गुट) थे। तो जो सुभाष के विरोधी थे, वे भी सभा में आए हुए थे। एक विरोधी ने हाथ में जूता लिया और सुभाष की ओर फेंका। सुभाष के पैरों के सामने वो जूता पड़ा। दूसरा कोई आदमी होता तो इस घटना से प्रभावित हो जाता। “अरे! मैं इतना प्रभावशाली प्रवचन दे रहा हूँ और ऐसा भी कोई आदमी है जो मुझे जूता मारे!” आपको ऐसी घटना प्रभावित कर जाती है। लेकिन ये सुभाष थे! प्रवचन चालू रखा। बाद में धीरे से झुके, उस जूते को हाथ में लिया और कहा कि, “वाह! जूता तो बहुत सुंदर है। मैं पहनता हूँ, इससे भी ज़्यादा अच्छा जूता है। अब मैं उस सज्जन को विनती करता हूँ कि एक जूता आपने फेंक दिया, तो दूसरा जूता आपके लिए निकम्मा ही है। एक जूते का आप क्या करोगे? तो दूसरा जूता भी यहाँ फेंक दो। तो मेरे जूने (पुराने) जूते जो हैं, उनको यहाँ रखकर, नए जूते पहन कर यहाँ से चलूँ।”

घटना घट गई, लेकिन उसका अर्थघटन कैसे करना? अनुवाद कैसे करना, वो हमारे हाथ में है।

आप क्या करते हैं? समाज ने जो अर्थघटन किया है, उसी अर्थघटन से आप चलते हो। “ऐसे शब्द अच्छे हैं। ऐसे शब्द बुरे हैं। ऐसे कर्तव्य अच्छे हैं। ऐसे कर्तव्य बुरे हैं।” समाज ने कहा, आपने स्वीकार कर लिया। तो समाज का, सोसाइटी (Society) का एक मास हिप्नोटिज़्म (Mass Hypnotism) आपके ऊपर चल रहा है। आपका कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है या नहीं? मुझे तो संदेह है! आपका कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है? कोई स्वतंत्र चिंतन है? या समाज जो कहे, वो ही आप स्वीकार लेते हो? समाज ने कहा ‘ये अच्छा’, आप कहेंगे ‘ये अच्छा’। समाज कहेगा ‘ये बुरा’, आप कहेंगे ‘बुरा’।

मैं पालीताणा के पास हस्तगिरि तीर्थ में था। राजस्थान से थोड़े भक्त पालीताणा आए थे। शत्रुंजय गिरिराज की यात्रा उन्होंने की। बाद में उनको मालूम हुआ कि गुरुदेव हस्तगिरि तीर्थ में हैं, तो वे लोग हस्तगिरि आए। ऊपर यात्रा करके आए। ११:३०-११:४५ बजे मेरे पास बैठे। अब हस्तगिरि तीर्थका उद्धार का कार्य मुनि श्री महाराज साहब के तत्त्वावधान में हो रहा था। और श्रेष्ठी थे कांतिभाई पटनी, जिन्होंने अपना सब कुछ धन तीर्थोद्धार में लगा दिया था। मुंबई का अपना फ्लैट (Flat) भी तीर्थ के लिए बेच दिया था, और हस्तगिरि में ही रहते थे। उनको मालूम हुआ कि साहेबजी के पास भक्त आए हुए हैं, तभी दौड़ते आए और भक्तों को विनती की कि, “आप भोजनशाला में भोजन के लिए पधारो। आप गुरुदेव के भक्त हो। आप मेरे मेहमान हो, आप पधारो।”

तो राजस्थानी भक्तों ने कहा, “नहीं-नहीं, हम तो पालीताणा उतरे हैं। तखतगढ़ धर्मशाला में! वहाँ कह कर आए हैं कि भोजन वहाँ ही लेंगे। तो वहाँ जाकर ही भोजन लेंगे। यहाँ नहीं खाएँगे।”

कांतिभाई गए, तभी मेरी गोचरी आ गई। तो मैंने कहा, “मेरी गोचरी आ गई है, तुम्हें भी भोजन ले लेना था, तो तुम्हारा भी काम हो जाता, मेरा भी हो जाता!”

तो उन्होंने कहा, “साहेबजी! हमने जो कहा था ना कि तखतगढ़ कह कर आए हैं, वो सब गप्पा (झूठ) था! कुछ कह कर नहीं आए हैं। लेकिन यहाँ तो भोजन नहीं ही लेंगे।”

मैंने पूछा, “क्यों?”

तो उन्होंने कहा, “ये गुजराती टेस्ट (Taste) का भोजनशाला है! तुअर की दाल होगी तो उसमें गुड़ होगा। टमाटर की सब्ज़ी होगी तो उसमें गुड़ होगा। हमें तो तीखी दाल (Spicy) चाहिए। मीठी दाल हमें नहीं चाहिए!”

और अब ये कौन नक्की (तय) करता है कि तुअर की दाल मीठी होनी चाहिए? तुअर की दाल तीखी होनी चाहिए? ये निश्चित तुमने तो नहीं किया है! समाज ने किया है। जिस समाज में तुम जन्मे, तो समाज ने कहा कि तुअर की दाल तो मीठी होनी चाहिए। गुजराती भी होगी तो उड़द की दाल और मूँग की दाल होगी, उसमें गुड़ नहीं डालेंगे। तुअर की दाल में अवश्य डालेंगे। और राजस्थानी तुअर की दाल में भी गुड़-शक्कर नहीं डालेंगे। तीखी ही चाहिए, मीठी नहीं! तो ये कौन नक्की करता है? समाज नक्की करता है। तो आपका जो निर्णय है, वो आपका है या समाज का है?

समाज कहेगा ‘ये आदमी सुखी है।’ क्यों? “बड़ा बंगला है, या बड़ा लग्ज़ूरियस फ्लैट (Luxurious Flat) है, तो ये आदमी सुखी है!” और अभी तो गुरुवार पेठ में रहता है और जूना (पुराना) घर है, तो सुखी नहीं! कहीं आगे जाना ही पड़ेगा। मुंबई में कोई पूछे:

“अरे! कहाँ से आए हो?”

“वालकेश्वर से।”

“ओहो! बैठो बेटा, कुर्सी पर बैठो, कुर्सी पर!”

“कहाँ से आए?”

“वसई-विरार से।”

“ठीक-ठीक है। बैठो।”

तो मनुष्य की कीमत है? या उसके स्थान की, उसके पैसे की कीमत है? तो समाज का जो गणित है, समाज का जो निर्णय है, वो आपका निर्णय नहीं होना चाहिए। आपका एक स्वतंत्र निर्णय होना चाहिए। समाज कहेगा ‘ये सुखी है, क्योंकि पैसा ज़्यादा है,’ और आपका अभिप्राय क्या है? “पैसे जैसे बढ़ें, वैसे अशांति बढ़े? या शांति बढ़ी? ठीक है, आप संसार में हो, परिवार है, संपत्ति थोड़ी चाहिए, लेकिन कितनी चाहिए? कितनी चाहिए, वो निर्णय करो। लेकिन समाज तो कहेगा, “जितनी ज़्यादा, जितनी ज़्यादा, जितनी ज़्यादा… उतने तुम बड़े श्रीमंत!” और लोग दौड़ते ही जाएँगे, दौड़ते ही जाएँगे। एक रेस (Race) लगेगी समाज में, ‘फर्स्ट (First) नंबर कौन आएगा?’

एक ओर तो हम निर्ग्रंथ मुनि को पूजते हैं, जिसके पास कुछ नहीं है। वे हमारे आदर्श हैं। दूसरी ओर आदर्श कौन है? कौन है? श्रीमंत, पैसे वाला! तो आपका निश्चित रूप से आदर्श कौन? निश्चित रूप से आदर्श कौन हो— मुनि या श्रीमंत? जिसके पास एक भी पैसा नहीं है, वो आदर्श सुखी है आपके मन में, या जिसके पास ज़्यादा पैसा है, वो सुखी है? सुखी की बात करता हूँ। पैसा ज़्यादा आपके पास हो, मुझे कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि आपके पैसे शासन के ही पैसे हैं। आपके पैसे कहाँ जाएँगे? शासन के लिए यूज़ (Use) होंगे। तो पैसे से मुझे कोई दिक्कत नहीं। मैं तो ये पूछता हूँ कि सुखी कौन? जिसके पास एक पैसा भी नहीं वो सुखी, या जिसके पास बहुत पैसे हैं, वो सुखी? सुखी कौन?

कल विचार करके आएँगे? विचार करेंगे कुछ, होमवर्क (Homework) करेंगे? बच्चा तो होमवर्क करता है स्कूल (School) से आकर, आपको भी होमवर्क करना है। आज तो संडे (Sunday) है, टाइम मिलेगा… तो होमवर्क करेंगे— ‘सुखी कौन?’ बस इतना!

ऋषभदास जी संत के चरणों में पड़ते हैं और कहते हैं, “शाता में?”

संत कहते हैं, “परम साता में! मज़ा ही मज़ा है यहाँ, मज़ा-मज़ा!” कुछ है नहीं, पेड़ के नीचे बैठे हुए हैं। एक वस्त्र नीचे है, एक वस्त्र ऊपर है। दूसरा कुछ पास में भी नहीं है, और सुखी हैं! तो आप आज सोच कर, कल निश्चित करके आना कि सुखी कौन है? ठीक है? तो कल आपका पेपर (Paper) शुरू होगा। ‘नीट’ (NEET) की परीक्षा तो पहले फेल हो गई, अपनी परीक्षा फेल नहीं होगी। कल पेपर होगा ही।

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