प्रभु वीतराग भी हैं और भक्त-वत्सल भी हैं
जब हम प्रभु का दर्शन करते हैं, तब दो घटनाएँ आकार लेती हैं। एक संघटना है सुख की, दूसरी है आनंद की। जब हम परमात्मा के भक्त-वत्सल स्वरूप को देखते हैं, तब सुख नाम की संघटना घटित होती है। और जब हम प्रभु की स्वरूप-स्थिति का दर्शन करते हैं, तब आनंद नाम की संघटना घटित होती है।
प्रभु वीतराग भी हैं और भक्तों को चाहने वाले भी हैं। प्रभु के पास राग नहीं है; प्रेम तो है ही। राग अलग संघटना है, प्रेम अलग संघटना है। राग में तुम किसी पदार्थ को, किसी व्यक्ति को चाहते हो और बंध जाते हो। प्रेम में तुम मुक्त होते हो। प्रेम आत्मा का स्वभाव है। और स्वभाव तो मोक्ष में भी साथ रहता है।
आप अगर मासक्षमण या नौ ओली या उपवास भी नहीं कर सकते और आयंबिल छोड़ो, एकाशना भी नहीं कर सकते फिर भी अगर आपको मोक्ष में जाना है, तो शॉर्टकट यह रहा: मेरे पन को बदल डालो। मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा धन, मेरा मकान – इस मेरे को बदल कर मेरे भगवान, मेरे सद्गुरु कर दो। फिर मोक्ष कहाँ दूर है? मोक्ष ये रहा!
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना चोवीसी, प्रथम कंडिका: “मुख दिठे सुख उपजे, दरिशने अतिही आनंद लाल रे।”
जब हम प्रभु का दर्शन करते हैं, तब दो संघटनाएँ आकार लेती हैं। एक संघटना है सुख की, दूसरी है आनंद की। जब हम परमात्मा के ‘भक्त-वत्सल’ स्वरूप को देखते हैं, तब सुख नाम की संघटना पनपती है। और जब हम प्रभु की स्वरूप-स्थिति का दर्शन करते हैं, तब आनंद नाम की संघटना पनपती है। हमारे लिए प्रभु का एक ही रूप है, और वह है भक्त-वत्सलता का। प्रभु वीतराग भी हैं और भक्तों को चाहने वाले भी हैं।
आनंदघन जी भगवंत को एक भक्त ने पूछा था कि, “गुरुदेव, हम तो प्रभु को हृदय से, हमारे पूरे अस्तित्व से चाहते हैं, लेकिन क्या प्रभु हमें चाहते हैं?” तब आनंदघनजी भगवंत ने कहा कि, “हाँ, प्रभु तुम्हें चाहते हैं।” भक्त विचार में पड़ गया कि ‘प्रभु तो वीतराग हैं, तो प्रभु कैसे मुझे चाहते हैं?’ तब आनंदघनजी भगवंत ने कहा कि, “प्रभु के पास राग नहीं है, प्रेम तो है ही। राग अलग संघटना है, प्रेम अलग संघटना है। राग में तुम किसी पदार्थ को, किसी व्यक्ति को चाहते हो और बंध जाते हो। प्रेम में तुम मुक्त होते हो। प्रेम आत्मा का स्वभाव है।” तो आनंदघनजी भगवंत ने कहा कि प्रभु हमें चाहते हैं।
परंपरा में एक बहुत ही सुंदर कहानी आती है। प्रभु महावीर देव के शिष्य सिंह अणगार थे। एक दिन सिंह अणगार को विचार आया कि प्रभु की साधना को वेग से मुझे साधनी है। और ऐसी सिद्धि साधना की चाहिए तो एकांत में जाना होगा। प्रभु की आज्ञा ली, और सिंह अणगार जंगल में गए।
हमारे वहाँ दो जात की साधना पद्धतियाँ हैं। एक है गीतार्थ की साधना पद्धति, दूसरी है गीतार्थ की निश्रा की साधना पद्धति। जो गीतार्थ होते हैं, वो अपनी साधना को खुद निश्चित कर सकते हैं। गुरु कहते हैं, “अब तू गीतार्थ है। तेरी साधना को कैसे डेवलप (Develop) करना, अब वो तुझे ही देखना है।” लेकिन जो गीतार्थ नहीं हैं, वे गीतार्थ की निश्रा में ही साधना कर सकते हैं। हम सब गीतार्थ गुरु की निश्रा में साधना कर सकते हैं।
इसलिए आपके पास जो भी साधना हो, वो गुरुदत्त होनी चाहिए। समझो, रोज़ तीन घंटे साधना के लिए आप निकाल सकते हैं, तो आपको सद्गुरु के पास जाना होगा। और चरणों में पड़कर विनंति करनी होगी कि, “गुरुदेव, मुझे तीन घंटे मिलते हैं। तीन घंटों में मेरी साधना क्या होनी चाहिए?” तुम्हारी साधना तुम खुद कभी भी निश्चित नहीं कर सकते। आपकी साधना को गुरु ही सर्टिफाई (Certify) कर सकते हैं, गुरु ही डिसाइड (Decide) कर सकते हैं। गुरु कहेंगे, “एक घंटा प्रभु भक्ति में, एक घंटा स्वाध्याय में। सामायिक भी करो और सामायिक में स्वाध्याय करो।” और तीसरा जो घंटा है, वो प्रभु शासन की सेवा में, प्रभु शासन के गुरु भगवंतों की वैयावच्च में। सद्गुरु आपको निश्चित करके देंगे कि आपकी साधना का प्रारूप क्या होना चाहिए। तो गीतार्थ जो हैं, वो अपनी साधना खुद निश्चित कर सकते हैं। लेकिन जो गीतार्थ नहीं हैं, उन्हें गीतार्थ की आज्ञा से साधना करनी है।
सिंह अणगार गीतार्थ थे। प्रभु ने सिंह अणगार को अनुमति दी कि तू जंगल में जाकर तेरी साधना को डेवलप कर सकता है। पूरी साधना, सारी साधना डेवलप करो। सिंह अणगार जंगल में गए और साधना को घोंटने लगे। एक ही लक्ष्य था— एक जीवन मेरे पास है। कितने क्षण बाकी हैं जीवन के, मुझे पता नहीं है। लेकिन जीवन के एक-एक क्षण को प्रभुदत्त साधना से मुझे भर देना है। तो २४ घंटों उनकी साधना चल रही थी।
उस समय प्रभु के परम पावन देह पर गोशालक का उपसर्ग हुआ। उपसर्ग के कारण प्रभु की काया थोड़ी शिथिल बनी। तीर्थंकरों की काया कभी भी शिथिल नहीं होती। उसका तेज कभी भी घटता नहीं। लेकिन यह आश्चर्यकारक घटना घटी कि प्रभु को गोशालक के उपसर्ग से थोड़ी तकलीफ हुई। अब बात फैली— ‘प्रभु का स्वास्थ्य अच्छा नहीं।’ बात आगे बढ़ी— ‘प्रभु बहुत बीमार हैं।’ और सिंह अणगार के पास बात इस रूप में पहुँची कि ‘प्रभु नहीं हैं, प्रभु गए।’
जब सुना प्रभु नहीं हैं, सिंह अणगार सिसक-सिसक कर रोने लगे। “यदि प्रभु ही नहीं हैं, तो मेरे जीवन का पूरा आधार गया! और बिना आधार मैं कैसे टिक पाऊँगा?” रो रहे हैं। “प्रभु गए नहीं, मेरा जीवन गया, मेरा आधार गया।”
प्रभु के केवलज्ञान में यह घटना प्रतिबिंबित होती है। प्रभु ने गौतम स्वामी को बुलाया और कहा, “गौतम! दो मुनियों को वहाँ भेजो जहाँ सिंह अणगार साधना कर रहा है। और दो मुनि वहाँ जाकर सिंह अणगार से कहें कि प्रभु तुम्हें बुला रहे हैं।”
दो मुनिराज तुरंत ही विहार करके निकले। सिंह अणगार जहाँ थे, वहाँ आ रहे हैं। दूर से सिंह अणगार ने देखा, दो मुनिराज आ रहे हैं। अब तो बात हृदय में पक्की हो गई कि प्रभु चल बसे हैं और उसी समाचार को देने के लिए दो मुनिराज यहाँ आ रहे हैं। लेकिन जब मुनिराज आए, उनके चेहरे पर स्मित था। तब सिंह अणगार को लगा कि बात कुछ अलग है। यदि प्रभु गए हुए हैं, तो मुनिराज के चेहरे पर स्मित नहीं हो सकती। और दोनों मुनिराजों ने सिंह अणगार को वंदना करके कहा कि, “प्रभु आपको बुला रहे हैं। प्रभु! प्रभु विद्यमान हैं। प्रभु जीवंत हैं। अरे! प्रभु जीवंत हैं, विद्यमान हैं, समवसरण में देशना दे रहे हैं और आपको बुला रहे हैं।”
अब सिंह अणगार स्वस्थ हो गए। ‘प्रभु हैं, तो फिर दूसरी कोई बात नहीं!’ गए प्रभु के पास। प्रभु को देखे। कितना आनंद हुआ होगा! आज सुबह आप प्रभु के दर्शन के लिए गए थे, कितना आनंद आया था वहाँ! “मेरे प्रभु, मेरे प्रभु!” मैं बहुत बार कहता हूँ, “चिंतामणि दादा नहीं कहना, गोड़ी पार्श्वनाथ दादा नहीं कहना, मेरे भगवान” कहना। कि “मेरे भगवान!” अभी तक अनगिनत जन्मों में मेरा परिवार था, मेरा घर था, मेरी ऑफिस थी। अब मेरे भगवान हैं, मेरे सद्गुरु हैं, मेरे प्रभु का शासन है। “मेरे” पन को बदल दो।
मोक्ष के लिए शॉर्टेस्ट कट (Shortest cut) कौन सा है? एक आदमी ने मुझे पूछा था कि, “साहब! मोक्ष में जाना है। न मासक्षमण करना है, न सोलभत्ता करना है। उपवास नहीं कर सकता हूँ। आयंबिल की तो बात छोड़ो, एकाशना भी नहीं कर सकता हूँ। और मुझे मोक्ष में जाना है, तो शॉर्टेस्ट कट मुझे बताओ।” मैंने उसे बताया था। आपको बताऊँ? चाहिए? शॉर्टेस्ट कट— “मेरे” पन को बदल डालो। ‘मेरा घर नहीं, मेरा जीना नहीं, मेरा परिवार नहीं, मेरे भगवान, मेरे सद्गुरु!’ “मेरे” पन को बदल डालो। मोक्ष ये रहा! मोक्ष दूर है? मोक्ष ये रहा! ‘मेरे भगवान!’
और मैं आनंद के साथ कहूँगा, गर्व के साथ कहूँगा कि आपके पास प्रभु के पर जो प्रीति है, आपके परिवार से भी ज्यादा प्रीति आपके प्रभु पर है। पचास लाख के गहने श्राविका के लिए बाद में आप लाओगे, लेकिन पहले प्रभु को सोने का मुकुट चढ़ाओगे। आपके हृदय में प्रभु पर की प्रीति इतनी बस गई है।
आज मासक्षमण तप का पुंजणा है। मासक्षमण तप कैसे हुआ? कैसे हुआ? प्रभु पर से प्रीति से हुआ। प्रभु पर प्रीति! ‘मेरे प्रभु ने कहा है।’ मेरा लगाव मेरे शरीर पर है। लेकिन मेरे प्रभु कहते हैं कि मासक्षमण करना चाहिए। तो आपकी इच्छा से भी आपने प्रभु की आज्ञा का महत्व ज्यादा अंकित किया, तब मासक्षमण होता है। ऐसे कोई मासक्षमण होता नहीं। शरीर कहता है पारणा करो। पाँच उपवास हुए, छह उपवास हुए, सात उपवास हुए। पित्त ही पित्त, वोमिटिंग (Vomiting) ही वोमिटिंग! डॉक्टर (Doctor) कहता है पारणा कर लो। परिवार वाले कहते हैं पारणा कर लो। यह शरीर कहता है पारणा कर लो। लेकिन प्रभु कहते हैं कि मासक्षमण करने का है।
तो मासक्षमण वालों को पूछो, किनकी आज्ञा मानी? प्रभु की आज्ञा मानी! डॉक्टर कहे, डॉक्टर की और खुलती बात है। परिवार वाले कहें, परिवार का प्रेम है। शरीर कहता है, तो शरीर तो कहेगा ही। लेकिन मेरे प्रभु क्या कहते हैं? मुझे यही करना है जो मेरे प्रभु कह रहे हैं।
दीक्षा का मतलब यही है। हम क्या करेंगे? प्रभु ने हमारे लिए जो आज्ञाएँ दी हैं, उनका पालन हम करेंगे। शरीर कहेगा, “रात है, प्यास लगी है।” अरे, प्यास लगी तो भले लगी। शरीर बीमार हो गया। डॉक्टर आए, “डिहाइड्रेशन (Dehydration) हो गया है, पानी पीना पड़ेगा।” नहीं, पानी नहीं पिएँगे, मर जाएँगे। इस शरीर को भी डायबिटीज़ (Diabetes) होता है। एक मुनि के शरीर को भी डायबिटीज़ होता है। और कभी रात को डायबिटीज़ बिल्कुल नीचे उतर जाता है, ३० पॉइंट, ३५ पॉइंट (Point)। डॉक्टर कहेंगे, “अब तो जी नहीं पाओगे। बिस्किट खाओ, ग्लूकोज़ खाओ, वरना मर जाओगे।” तो एक मुनिराज कहेंगे, “मर जाएँगे तो शान से मर जाएँगे, लेकिन हमारे प्रभु की जो आज्ञा है, उसका पालन हम करने वाले हैं।” शरीर जाए तो जाए, कोई चिंता की बात नहीं। लेकिन मेरे प्रभु की आज्ञा जो है, उसका पालन मुझे करना है।
सिंह अणगार ने प्रभु को देखे। आँखें आँसू से भर आईं। प्रभु का दर्शन करते हैं? कोरी-कोरी आँखों से, कि भीगी-भीगी आँखों से? बोलो। कैसे दर्शन करते हो? मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं आप और आँख से आँसू निकल जाएँगे। ‘मेरे प्रभु, मेरे प्रभु!’ यह मेरे प्रभु न होते, तो मैं कहाँ होता? मैं बहुत बार कहता हूँ, “यदि प्रभु का शासन मुझे नहीं मिला होता, तो मैं कहाँ होता? मैं संसार में भटकता आदमी होता। यह प्रभु का शासन, इसका उपकार, कि शासन ने मुझे यहाँ तक रख दिया। शासन न होता, प्रभु न होते, तो मैं न होता। शासन और प्रभु, यही मेरे अस्तित्व के पर्याय हैं।
सिंह अणगार प्रभु को देखते हैं। आँखों से हर्ष के आँसू बहते हैं। ‘मेरे प्रभु, मेरे प्रभु, मेरे प्रभु! बस मेरे प्रभु हैं, अब कोई चिंता की बात नहीं।’ लेकिन एक बात तो थी ही कि प्रभु का शरीर शिथिल हुआ था। थोड़ा कृश हुआ था, पतला हुआ था। अब वेदना के आँसू से आँखें भर आईं, ‘मेरे प्रभु का शरीर और ऐसा?’
अब देखो, प्रभु कितने भक्त-वत्सल हैं! प्रभु कहाँ हैं? वीतराग अवस्था में। शरीर से पर, मन से पर, सबसे पर हैं। ऐसे प्रभु कितने भक्त-वत्सल हो रहे हैं! सिंह अणगार को प्रभु कहते हैं, “अच्छा, मेरा शरीर ठीक नहीं है, तू नाराज़ हो गया? नाराज़ मत होना। प्रभु और शरीर की बात करें? तू ऐसा कर, रेवती श्राविका के घर पर जा। रेवती श्राविका ने अपने लिए औषधि-पाक बनाया है। उस औषधि-पाक को वोहर कर तू आजा। मैं उस औषधि को वापरूँगा और मेरा शरीर पुनः स्वस्थ हो जाएगा।” यह प्रभु की भक्त-वत्सलता!
तो “मुख दिठे सुख उपजे, दरिशने अतिही आनंद लाल रे।” प्रभु की भक्त-वत्सलता का संबंध सुख के साथ है। और प्रभु की वीतराग दशा का संबंध हमारे आनंद के साथ है। एक बार, मैं इसी स्तवना पर बोल रहा था— “दरिशने अतिही आनंद लाल रे।” तब एक भावक ने मुझे पूछा कि, “गुरुदेव! प्रभु का दर्शन अपन करें तो इतना तो आनंद भीतर छा जाएगा कि हम कहेंगे कि प्रभु का दर्शन किया और अत्यंत, अत्यंत, अत्यंत आनंद आया। लेकिन यशोविजयजी महाराज ने एक ही बार ‘अति ही’ शब्द क्यों यूज़ (Use) किया?”
प्रश्न बहुत सुंदर था। कभी-कभी आपके प्रश्न इतने सुंदर होते हैं कि हम खुश हो जाते हैं। एक दिन ऐसा हुआ था। चैत्र सुद तेरस का दिन। प्रभु महावीर का जन्म कल्याणक। उस दिन प्रवचन में मैं प्रभु के अभिषेक का वर्णन कर रहा था। मैं प्रभु के अभिषेक का वर्णन कर रहा था कि प्रभु का अभिषेक जब होता है, तब इंद्र को कितना आनंद आता है। सौधर्मेन्द्र, ईशानेन्द्र, चौंसठ इंद्र इकट्ठे हुए हैं। प्रभु का अभिषेक चल रहा है। और इंद्र को विचार आया कि ‘नन्हे-मुन्ने प्रभु हैं और अभिषेक का जल इतने वेग से प्रभु के शरीर पर पड़ रहा है, तो प्रभु का शरीर उसे झेल पाएगा?’ अब इंद्र जितने भी होते हैं ने, वो सम्यक् दृष्टि होते हैं। उन्हें यह मालूम है कि तीर्थंकरों का बल अनंत चक्रवर्तियों से भी आगे है। तो काया छोटी हो या बड़ी हो, यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन यह प्रश्न हुआ।
प्रभु ने उत्तर कैसे दिया? महापुरुष होते हैं ना, वो शब्द से उत्तर नहीं देते। प्रभु ने अपना पैर इंद्र के उत्संग से नीचे उतारा। अंगूठे को टच (Touch) किया मेरु पर्वत को और मेरु पर्वत कांपने लगा। प्रभु का पैर का अंगूठा मेरु को टच हुआ और मेरु पर्वत कांप उठा। तब इंद्र को मालूम हुआ, ‘ओ! यह तो तीर्थंकर भगवन्त हैं। उनका बल तो अमाप है।’
अब मैं व्याख्यान में आगे बढ़ रहा था। एक भावक ने मुझे पूछा कि, “गुरुदेव! अनंत तीर्थंकरों के अभिषेक मेरु पर्वत पर हो गए। किसी भी इंद्र को जो प्रश्न नहीं हुआ, वो प्रश्न प्रभु महावीर के अभिषेक के समय पर इंद्र महाराज को क्यों हुआ?” आपका हुआ यह प्रश्न कभी? कल्पसूत्र सुनते हो? यह प्रश्न हुआ था आपको? मैंने कहा कि, “वाह! इतना अच्छा प्रश्न तूने पूछा, बहुत सुंदर!” मैंने उत्तर में कहा कि, “ऐसा हो सकता है कि पूर्व जन्म का स्नेहानुबंध इंद्र महाराज का प्रभु के साथ था। और स्नेह के कारण यह शंका हुई।” आपको मालूम होगा, किसी के ऊपर स्नेह है ने, तो जिस पर स्नेह है, वो दुर्बल है, ऐसी शंका हमारे मन में उठती है।
सौ बरस पहले की एक घटना है। एक लड़का, युवान लड़का, गुजरात से मुंबई जा रहा था। उस समय मुंबई तो फॉरेन (Foreign) जैसा लगता। अब तो अंबानी ने एक सूत्र दिया, ‘सारी दुनिया कर लो मुट्ठी में’। तुमने पूरी दुनिया मुट्ठी में कर ली, लेकिन तुम्हारी आत्मा तुमने मुट्ठी में नहीं की! पूरी दुनिया कर ली, तुम ही बच गए! तो लड़का मुंबई जा रहा था। उस समय मोबाइल (Mobile) फोन तो थे नहीं, लैंडलाइन (Landline) फोन था। तो पिता ने कहा था कि, “बॉम्बे सेंट्रल (Bombay Central) पर तू उतरे, पहला काम यह करने का कि टेलीफोन से मुझे समाचार देने का।” अब पाँच बजे शाम गाड़ी बॉम्बे सेंट्रल पहुँचती है। पौने पाँच के समय पर फोन के पास पिता बैठ गए। ४:५५, ५:००, पाँच पर ५, पाँच पर १०, पाँच पर १५… फोन आता ही नहीं!
तब यह पिता विचार में पड़ जाता है, “क्या हुआ होगा? गाड़ी पाँच बजे बॉम्बे सेंट्रल पहुँच जाती है। और मैंने बच्चे को कहा है कि तुरंत ही फोन करना। सवा पाँच बज गए, फोन नहीं आया उसका। तो क्या गाड़ी को एक्सीडेंट (Accident) हुआ होगा? क्या हुआ होगा?” कभी जिस गाड़ी की कोई चिंता नहीं की है, आज क्यों चिंता कर रहे हैं? “मेरा लड़का उसपे सफ़र कर रहा है।” जहाँ स्नेह है, वहाँ शंका होती है। तो मैंने कहा कि इंद्र महाराज को पूर्व जन्म से प्रभु के पर स्नेहानुबंध है। और उस स्नेह के कारण प्रभु की शक्ति पर शंका होती है।
ऐसा ही प्रश्न मुझे पूछा गया कि “दरिसने अतिही आनंद लाल।” एक बार ‘अति’ शब्द क्यों यूज़ किया? हम भी कहते हैं, ‘अति, अति, अति, अति आनंद आया!’ तो मैंने कहा कि प्रभु के दर्शन पर इतना आनंद भीतर छा गया है कि सौ बार ‘अति’ शब्द का प्रयोग करो, तो भी तुम भीतर के आनंद को व्याख्यायित नहीं कर सकते। इसलिए शब्द की अशक्ति को दिखाने के लिए एक बार ‘अति’ शब्द यूज़ करके छोड़ दिया। कि सौ बार यूज़ करूँ, तो भी बात यही है कि भीतर का जो आनंद है, वो तो व्याख्यायित नहीं होगा। तो हमें इस धारा में जाना है कि प्रभु के साथ हमारी इंद्रियाँ और मन जुड़ें, तब सुख नाम की संघटना पैदा होती है। और प्रभु की वीतराग दशा का दर्शन हो, तब आनंद नाम की संघटना पैदा होती है। वो आनंद कैसा होता है, उसकी बात हम आगे करेंगे।
