Reverence for life
अपने युग के साधनामनीषी गुरुदेव पंन्यास भद्रंकर विजय महाराज साहिब कहते थे कि अनंत जन्मों में हमने प्रभु के दो बड़े अपराध किए हैं : जड़ के प्रति राग किया और चैतन्य के प्रति द्वेष किया। आपकी घड़ी कोई चुराकर ले गया, तो उस व्यक्ति पर आपको द्वेष आएगा क्योंकि घड़ी पर राग था।
जड़ पर राग और चैतन्य पर द्वेष – दो बड़े अपराध हम अनगिनत जन्मों से करते आए हैं। अब इन अपराधों से मुक्त होने के लिए क्या करना है? चैतन्य के प्रति प्रेम और जड़ के प्रति उदासीन भाव। जड़ के प्रति राग नहीं, उदासीन भाव और चैतन्य के प्रति प्रेम।
अब आप ही सोचना कि आप राग की धारा में हैं या प्रेम की धारा में। यदि प्रभु का प्रेम हमने झेला है, तो अवश्य हम प्रेम की धारा में ही जाएँगे।
श्रीपाल रास की एक सुंदर घटना।
श्रीपाल जी धवल सेठ के लिए एक बार कहते हैं कि “ये तो मेरे उपकारी हैं।”
ओली जी के प्रवचनों में मैं श्रोतावृंद से पूछता रहता हूँ कि धवल सेठ ने श्रीपाल जी पर कौन-सा उपकार किया? अभी तक तो मुझे एक ही उत्तर मिला है। उत्तर ये मिला कि धवल सेठ के जहाज में बैठकर श्रीपाल जी विदेश यात्रा पर गए, तो ये धवल सेठ का उपकार है। मैं कहता हूँ, accepted (स्वीकार्य)। आपकी बात स्वीकार्य है।
लेकिन दूसरा कोई उपकार धवल सेठ का श्रीपाल जी पर लगता है? और इसी बिंदु पर, श्रीपाल जी की जो आध्यात्मिक दृष्टि थी, उसका खयाल आता है।
नवपदजी महाराज ने, सद्गुरुदेव ने, श्रीपाल जी की दृष्टि को विकसित की था। श्रीपाल जी के मन में एक अभीप्सा सतत भीतर रहती था। और अभीप्सा यह थी कि सम्यक् दर्शन मुझे प्राप्त हुआ है या होने वाला है। क्योंकि सम्यक् दर्शन मिले, तब ही तो जीवन सार्थक होता है।
अब ज्ञानी भगवंत ही कह सकते हैं कि सम्यक् दर्शन हुआ है या होने वाला है नजदीक में। लेकिन सम्यक् दर्शन की प्राप्ति के जो लक्षण बताए गए हैं शास्त्रों में, उस लक्षण से हमें भी पता चल सकता है कि मैं सम्यक् दर्शन के नजदीक होऊँगा। और एक लक्षण है समत्व। समत्व विकसित होना चाहिए। न किसी पर राग इतना, न किसी पर द्वेष इतना, न अपने पर अहंकार। समत्व की दृष्टि विकसित हुई है, तो हम मान सकते हैं कि सम्यक् दर्शन के नजदीक हम हैं।
अब श्रीपाल जी के लिए क्या हुआ? धवल सेठ ने श्रीपाल जी को समुद्र में फेंक दिया। लेकिन श्रीपाल जी का पुण्य तो श्रीपाल जी के साथ था। विमलवाहन देव आ गए, किनारे पर पहुँच भी गए, और नजदीक का जो राज्य था, उस राज्य का अधिकारी भी वे बन गए।
और धवल सेठ घूमते-घूमते वहाँ आए। उन्हें वहाँ व्यापार करना था, तो राजा की अनुमति लेने के लिए आए। वहाँ देखा तो श्रीपाल पास में बैठे हुए हैं। अरे, ये कहाँ से आ गया? उसको तो समुद्र में फेंका था। साला, जिंदा रह गया।
लेकिन उस समय धवल सेठ को देखने पर श्रीपाल जी के मन में तनिक भी द्वेष की रेखा प्रज्वलित नहीं होती। इतनी ही प्रसन्नता, इतना ही प्रेम धवल सेठ पर।
तब श्रीपाल जी को लगा कि समत्व मेरे भीतर है। लेकिन मेरे भीतर समत्व है, उसकी परीक्षा तो धवल सेठ ने की। तो धवल सेठ मेरे गुरु हुए। जो परीक्षक होते हैं, वे तो गुरु होते हैं। तो गुरु तो उपकारी है ही।
इससे भी आगे जाएँ। तो श्रीपाल जी की दृष्टि इससे भी आगे गई थी। धवल जी को गुरु के रूप में स्वीकारो और गुरु के प्रति प्रेम भाव आवे, ये तो सामान्य बात है। श्रीपाल जी के पास ‘Reverence for the life’ (जीवन के प्रति आदर) था। चैतन्य के प्रति समादर। Reverence for the life. जहाँ-जहाँ चैतन्य है, वहाँ मेरा प्रेम है।
तो श्रीपाल जी का प्रेम इतना फैल गया था कि जहाँ चैतन्य है, वहाँ मेरा प्रेम है। मैंने पहले कहा था, जड़ के प्रति जो है, वो राग है। चैतन्य के प्रति जो है, वो प्रेम है। Feeling (भावना) है, लेकिन दो feelings अलग हैं। पदार्थ के प्रति आकर्षण है, तो उसका नाम राग। किसी व्यक्ति के प्रति आपका आकर्षण है, वो आकर्षण दो parts (हिस्सों) में भिन्न-भिन्न हो जाएगा। यदि आपका आकर्षण उसके शरीर के प्रति है, तो वो राग है। और आपका आकर्षण उसके गुणों के प्रति है, तो वो प्रेम है। गुण यानी कि चैतन्य।
हरिभद्रसूरी महाराज साहिब ने साधना का प्रारंभ गुणानुराग से किया है। जब तक दूसरों के गुणों के प्रति हमारा अनुराग नहीं है, तब तक हमारी साधना का प्रारंभ नहीं हुआ है।
एक सामान्य आदमी है, वो भी राग और द्वेष की धारा में बहेगा। एक साधक है, वो भी यदि राग और द्वेष की धारा में बहता है, तो सामान्य आदमी में और साधक में फर्क क्या पड़ा? What’s the difference? फर्क यह है कि तुम्हारा आकर्षण किसी व्यक्ति के शरीर प्रति नहीं है। तुम्हारा आकर्षण उस व्यक्ति के गुणों के प्रति है। तो गुणानुराग आया, तो समझो कि पहली दृष्टि आपको मिली।
सम्यक् दर्शन कब होता है? सुबह मैंने कहा था, पाँचवीं दृष्टि मिले तो। लेकिन पहली दृष्टि में गुणानुराग चाहिए। जहाँ-जहाँ गुण देखो, वहाँ-वहाँ प्रेम झलके। तो ये जो प्रेम हुआ, वो चैतन्य के प्रति आपका प्रेम हुआ। Reverence for the life. जहाँ चैतन्य है, वहाँ मेरा प्रेम है। जड़ के प्रति प्रेम है, तो वो राग है। राग और प्रेम, दो अलग हो गए।
अब आप ही सोचना कि आप राग की धारा में हैं या प्रेम की धारा में। यदि प्रभु का प्रेम हमने झेला है, तो अवश्य हम प्रेम की धारा में जाएँगे।
एक घटना मुझे याद आती है। मुंबई में एक युवान ने सोलह उपवास किए थे। और पर्युषण के पारने के दिन उसका पारणा आता था। पत्रिकाएँ छपवाई गईं, संबंधियों को भिजवाई गईं। एक संबंधी पालनपुर में रहते थे। वे बड़े श्रावक थे। प्रभु के भक्त। पर्युषण में वे चौसठप्रहरी पौषध में थे। पत्रिका मिली, लेकिन सोचा कि पारने के दिन तो मैं पहुँच सकता नहीं। चौसठप्रहरी पौषध है। और संघ में भी अग्रणी थे। पारणा, फिर रथयात्रा, फिर तपस्वियों का सन्मान, चैत्य परिपाटी, बहुत से कार्यक्रम थे। तो सोचा कि सब कार्यक्रम निपटाकर मुंबई अवश्य जाऊँगा। इस युवान ने, मेरे संबंधी ने, सोलह उपवास किए हैं, तो उसकी अनुमोदना अवश्य करनी है।
दस दिन के बाद पालनपुर से वे मुंबई गए। बॉम्बे सेंट्रल, रात को दस बजे उतरे। पास में ही संबंधी का घर था। टैक्सी करके वहाँ पहुँचे। घर में गए, प्रणाम आदि व्यवहार हुआ।
अब जिस युवान ने सोलभत्ता किया था, उस युवान की रूटीन लाइफ (routine life) शुरू हो गई थी। तो रोज़ रात को दस बजे वो आता था जॉब (job) से। आज भी दस बजे आया था। हाथ-पैर-मुँह धोकर डाइनिंग टेबल (dining table) पर बैठा था और गरम भाखरी और साग खा रहा था।
रात को सवा दस बजे वो युवान गरम भाखरी और साग खा रहा है और उसके सोलह उपवास की अनुमोदना के लिए पालनपुर वाले भाई आए थे। अब मैं आपसे पूछूँ, आप ही हो और ऐसी घटना घटित हुई, तो आपके मन में क्या विचार आएँगे? लो, सोलभत्ता उपवास किया! अरे, सोलह दिन तू भूखा रह सका और अब रात को खा रहा है? तुझे शर्म नहीं आती? मन में विचार आ जाते? क्योंकि हमारी दृष्टि दोष पर ही जाती है।
एक सूत्र मैं आपसे कहूँ। दूसरी व्यक्ति में दोष है और इसलिए आपको दिख रहे हैं, ऐसा कभी नहीं मानना। आप दोष दृष्टि वाले हैं, इसलिए आपको दोष दिख रहे हैं। मेरे चश्मे के ग्लास में स्पॉट्स (spots) हैं, तो मुझे फर्श पर स्पॉट्स दिखेंगे। लेकिन फर्श पर स्पॉट्स नहीं हैं। स्पॉट्स कहाँ हैं? मेरे चश्मे के ग्लास में हैं। तो मुझे ग्लास साफ करने चाहिए। फर्श साफ करने की आवश्यकता नहीं है। तो दोष दृष्टि को लेकर अनगिनत जन्मों से हम घूम रहे हैं।
निश्चय से प्रभु शासन हमें मिला है, ऐसा कब हम कह सकते हैं? जब हम गुणरागी हुए। दोष दृष्टि हमारे पास नहीं है, गुण दृष्टि हमारे पास है, तो हम कह सकते हैं कि हमारा निश्चय से जिन शासन में प्रवेश हुआ है।
मैं बार-बार कहता हूँ, एक भी व्यक्ति दोष युक्त है ही नहीं। दोष युक्त कोई भी है, तो मैं हूँ। ऐसा यदि तुम मान सको, तो ही जिन शासन में तुम्हारा प्रवेश हुआ है।
तो पालनपुर वाले भाई तो उस युवान के चरणों में लेट गए। पैरों में पड़ गए। वो खा रहा है, रात को सवा दस बजे। और पालनपुर वाले भाई, उनके पैरों में लेट गए। कि “वाह, तुमने सोलह उपवास किए थे, बहुत सुंदर।”
युवान शर्मिंदा हो गया। उसका भोजन पूरा हुआ, फिर सब बैठे। तब पालनपुर वाले भाई ने कहा, क्या दृष्टि थी उनकी! उन्होंने युवान से कहा कि, “क्या प्रभु का शासन हमें मिला है! गुरुदेव का पच्चक्खाण, आपका संकल्प और प्रभु की कृपा। आपने सोलह उपवास कर लिए।”
कोई भी साधना की सिद्धि करनी है, तो तीन तत्व की आवश्यकता है। प्रभु की कृपा, सद्गुरु के आशीष और साधक का संकल्प। दो तो चालू ही हैं। प्रभु की कृपा, प्रभु का प्रेम बरस ही रहा है। हमारा भी आशीर्वाद ही है। आपका संकल्प।
तो पालनपुर वाले भाई ने कहा कि, “प्रभु की कृपा, सद्गुरु का आशीर्वाद, सद्गुरु का पच्चक्खाण और आपका संकल्प और आपने सोलह उपवास कर लिए। क्या ताकत है सद्गुरु के पच्चक्खाण की! और क्या ताकत है आपके संकल्प की!”
पालनपुर वाले भाई ने कहा कि, “तुम सुबह आठ बजे नाश्ता करके जॉब पर जाते होंगे। वहाँ पर बारह, साढ़े बारह बजे टिफिन में जो रोटी-साग है, वो आप खाते होंगे। फिर तीन बजे चाय पीते होंगे। पाँच बजे बिस्किट्स, फ्रूट्स, थोड़ा नाश्ता करते होंगे। फिर भी आपको रात को दस बजे खाना पड़ता है। और ऐसे आप। और आपने सोलह उपवास किए! धन्यवाद है आपका।”
ये दृष्टि नहीं है? पालनपुर वाले भाई ने कहा कि, “मुझे तो उपवास की हैबिट (habit) है। चेन्नई जाना है, तो मैं चौविहारा अट्ठम कर लेता हूँ। कभी-कभी चौविहारी अट्ठाई कर लेता हूँ। लेकिन ये तो मेरी बात है। आपने ये सोलह उपवास किए, आप बड़भागी हो।”
ये क्या था बोलो? ये गुणराग था। चैतन्य के प्रति प्रेम।
सभी आत्माओं में गुण है ही। आप देख सकते हैं, तो आपको दिखेंगे। हैं ही। सभी आत्माओं में गुण है।
एक बार मैं पालिताणा से विहार कर शंखेश्वर की ओर जा रहा था। रास्ते में लखतर गाँव आता है। लखतर में हमारा जिनालय भी है, उपाश्रय भी है। हम जब वहाँ गए, तब महात्माएँ बहुत थे। तो अपना मूर्ति पूजक का जो उपाश्रय था, उसमें महात्मा बहुत ठहरे हुए थे। तो स्थानकवासी उपाश्रय में हमें उतारा गया। हम वहाँ उतरे। स्थानकवासी उपाश्रय रोड पर था। नवकारशी करके मैं द्वार के पास बैठा था कुर्सी पर। स्वाध्याय कर रहा था।
उस समय मेरी दृष्टि पड़ी, फुटपाथ पर एक मोची भाई बैठे थे। नन्हा सा बॉक्स (box), उसमें सामग्री सब। और एक काम कर रहे थे। जहाँ उन्होंने देखा कि उपाश्रय खुला है, तो उपाश्रय में आए मोची भाई। और महात्माओं से विनति की, “आप विहार कर रहे हो, आपके जो मोजे हैं, फट गए होंगे, मुझे लाभ दो।” सभी के मोजे ले गए। किसी ने मना किया तो भी आग्रह करके ले गए। शाम चार बजे सब मोजे ठीक करके लेकर के आए। और जिस-जिस महात्मा के थे, उसको प्रेम से दिए।
उस समय एक भक्त बाहर से वंदन के लिए आए थे। उन्होंने ये मोची भाई के भाव देखे। कि वाह, कितने भाव हैं! तो भक्त ने, गुरु भक्त ने, दो हजार रुपये का नोट निकाला। और मोची भाई को कहा कि, “प्रेम से देता हूँ, आप स्वीकारो।”
तो मोची भाई ने कहा कि, “महात्माओं की सेवा का बदला कभी भी मैं नहीं ले सकता हूँ। महात्माओं की सेवा जो है, वो तो सेवा अपने धर्म के लिए करनी चाहिए। और इसका कोई बदला नहीं हो सकता। मैं आपका ये नोट स्वीकार नहीं सकता हूँ। आपको कुछ देना ही है, तो सामने मेरा बॉक्स है, वहाँ जाओ। आपके बूट का पॉलिश (polish) कर दूँगा। फिर आपको जो भी देना हो, वो देना। लेकिन महात्माओं की सेवा मैंने की है, उसका बदला तो मैं लूँगा ही नहीं।”
एक सामान्य आदमी, सेवा का कितना भाव!
आपकी दृष्टि होनी चाहिए बस। आपके वहाँ काम करने वाले कर्मचारी में भी आपको गुण संपत्ति दिखेगी।
एक शाम मेरी विहार यात्रा चल रही थी। रोड के पास एक प्याऊ थी। मैं व्हीलचेयर (wheelchair) में बैठा था। तो व्हीलचेयर को धकाने वाला जो आदमी था, उसे प्यास लगी थी। तो उसने व्हीलचेयर प्याऊ के पास ली। प्याऊ वाले ने देखा कि संत आ रहे हैं। मैं देख रहा, उसने थाली ली, पोछी, गिलास लिया, पोछा, उसमें पानी भरा, गिलास में। और भगवान के पास नैवेद्य का थाल लेकर आप जाते हो, और जो भाव होता है आपके चेहरे पर, ऐसा भाव उसके चेहरे पर था। और मेरे पास आया, “लो भगवन्, ये पानी।”
तब चेयर वाले ने कहा कि, “साहिब तो ये पानी नहीं ले सकते। उनके लिए तो गर्म पानी हमारे पास है। लेकिन मुझे प्यास लगी है, मुझे पीना है।”
तो प्याऊ वाला कहता है, “अरे तुम भी भगवान हो न। भगवान की सेवा करते हो, तुम भी भगवान हो, तो तुम भी लो, पियो।”
Reverence for the life. जहाँ चैतन्य है, वहाँ आपका प्रेम जाना चाहिए। अभी तक जड़ पर ही राग किया है। सोचो तो, क्या किया? वस्त्र पर राग है, घड़ी पर राग है, जड़ पर ही राग है। चैतन्य पर द्वेष है।
अपने युग के साधना मनीषी, गुरुदेव पंन्यास भद्रंकर विजय महाराज साहिब कहते थे कि हमने प्रभु के दो बड़े अपराध किए हैं। कौन से अपराध? जड़ के प्रति हमने राग किया, चैतन्य के प्रति हमने द्वेष किया।
आपकी घड़ी कोई लेकर गया, चुराकर, आप क्या करेंगे? उस पर द्वेष आएगा। द्वेष क्यों आया? घड़ी पर राग था तो। तो जड़ पर राग है, चैतन्य पर द्वेष है।
तो पंन्यास जी भगवंत कहते हैं कि प्रभु के दो बड़े अपराध हम अनगिनत जन्मों से करते आए हैं। अब इन अपराधों से मुक्त होना है। तो क्या करना है? चैतन्य के प्रति प्रेम और जड़ के प्रति उदासीन भाव। जड़ के प्रति राग नहीं, उदासीन भाव। और चैतन्य के प्रति प्रेम।
तो प्रभु का प्रेम श्रीपाल जी ने कैसा लिया? कि धवल सेठ पर भी प्रेम आता है। अंत में तो धवल सेठ श्रीपाल जी का खून करने के लिए आते हैं, मारने के लिए। नहीं मार सके, वे ही मर गए। धवल जी मर गए। लेकिन उस समय श्रीपाल जी रो रहे हैं कि ऐसे उपकारी आत्मा और चले गए। ऐसे उपकारी व्यक्ति चले गए।
क्या आप सोच भी सकते हो? किसी ने चाटा लगाया, तो उस पर प्रेम करोगे? क्यों नहीं करोगे? चाटा तो जड़ को मारा है। और मारा भी किसने? जड़ ने मारा। अब देखो, चैतन्य ने नहीं मारा है। उसके द्वेष ने मारा है। तो द्वेष जड़ है। राग जड़ है। तो मारा किसने? जड़ ने मारा। जड़ को मारा। तो उसमें चैतन्य को क्या लेना-देना? तो आप क्यों झुंझलाते हो इसमें?
आप जड़ हो या चैतन्य, आज निश्चित करो। आप कौन? तुम शरीर हो या शरीर से पर हो?
You are the bodiless experience. You are the nameless experience. You are the mindless experience.
शरीर तुम नहीं हो। शरीर तो तुम्हारा घर है। जिंदगी एक किराये का घर है। एक दिन तो निकलना पड़ेगा। मौत जब तुमसे आवाज देगी, तब घर से निकलना पड़ेगा। ये तो तुम्हारा घर है, ये तुम हो।
संत रविदास को पूछा गया था कि सद्गुरु की व्याख्या क्या होती है? सद्गुरु की व्याख्या। तब रविदास जी ने कहा, “घर में घर दिखलाई दे, वो सद्गुरु हमारा।” इस घर में जो आत्म तत्व है, चैतन्य है, उसे जो दिखावे, वे सद्गुरु। “घर में घर दिखलाई दे, वो सद्गुरु हमारा।”
तो हमारा तो काम ही एक है? कि तुम यह नहीं हो। एक माला जपनी चाहिए। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं शरीर नहीं हूँ। भोजन के लिए बैठते हो, तब सोचते हो, कौन खा रहा है? तुम तो सिर्फ देखने वाले हो। तुम खाने वाले नहीं हो। खाने वाला तो ये शरीर है। कैलोरी (calorie) किसको चाहिए? शरीर को चाहिए। चैतन्य को नहीं चाहिए। चैतन्य तो अनाहारी है। उसको आहार नहीं चाहिए। तो तुम खा रहे हो या तुम्हारा शरीर खा रहा है?
साधक की भाषा है, भाषा बदल जानी चाहिए। बुखार आए, तब आप क्या कहेंगे? मुझे बुखार आया, ऐसा कहेंगे? या इसको बुखार आया, ऐसा कहेंगे? मुझे कहाँ बुखार आया? बुखार तो इसको आया।
धर्मधुरंधरसूरी महाराज, नेमिसूरी महाराज के समुदाय के विद्वान प्रमुख आचार्य भगवंत। उनके गले का कैंसर हुआ था। साहिब जी अहमदाबाद में विराजमान थे। मेरा अहमदाबाद जाने का हुआ। मैं साहिब जी के पास गया, शाता पूछी। और मैंने कहा, “आप तो कितने स्वस्थ थे, आपको ये कैंसर हो गया।”
तब उन्होंने मुझे झाड़ा कि, “यशोविजय, तू बोल रहा है? कैंसर मुझे कहाँ है? ये तो शरीर को है। मैं तो आनंद घन आत्मा हूँ। मेरा आनंद तनिक भी कम नहीं हुआ है। मैं तो सिर्फ आनंद में हूँ।”
कैंसर किसको होता है? शरीर को होता है। शरीर जाने वाला है। आनंदघन जी भगवंत ने कहा, “नाशी जासी, हम स्थिर वासी, चोखे वै निखरेंगे”। मृत्यु होगी तो क्या होगा? नाशी जासी, नाशवंत है, वो यहाँ पड़ा रहेगा। हम अनंत की यात्रा पर चलेंगे।
हम शरीर थोड़े हैं? हम चैतन्य हैं, हम आनंदघन हैं। तो जहाँ चैतन्य, वहाँ प्रेम। ये सूत्र श्रीपाल जी का था। और अब आपका भी है। ठीक?
अब राग नहीं, प्रेम। जड़ पर होता है वो राग। चैतन्य पर होता है वो प्रेम। प्रभु हमारे चैतन्य को चाहते हैं। इस जड़ को नहीं चाहते। प्रभु का प्रेम हम पर है। हम साधना में आगे बढ़ते हैं। सद्गुरु भी राजी हैं, प्रभु भी राजी हैं।
तो जहाँ चैतन्य, वहाँ प्रेम। और इसी प्रेम का अनुभव प्रैक्टिकली (practically) अब करेंगे।
