MAUN DHYAN SADHNA SHIBIR – 19 | 05-10-2026 | NOON | KATREJ, PUNE.

15 Views
22 Min Read

सूक्ष्मतरं

​प्रभु का प्रेम सूक्ष्म ही नहीं, सूक्ष्मतर है। कभी ज़ोरदार आवाज़ आती है तो हमारे कान तुरंत उस को पकड़ लेते हैं। लेकिन आवाज़ बिल्कुल धीमी धीमी होती है, तब मन को, कान को एकाग्र बनाना पड़ता है। वैसे ही राग एकदम स्थूल है; उसको लेने के लिए कोई जागृति की ज़रूरत नहीं। वहाँ तो निद्रा भी चल जाएगी। पर परमप्रेम को लेने के लिए जागृति चाहिए।

​आप अभी जागृत हो; लेकिन ये जो जागृति है, ये तो ऊपर ऊपर की बात है। प्रभु कहते हैं उस अर्थ में आप अभी जागृत नहीं हो।

​जब आपका मन राग-द्वेष में न हो, अहंकार में न हो, तब आप जागृति में हो। जागृति का मतलब है मन की निर्मलता। शरीर ही नहीं, मन भी प्रभु की आज्ञा के मुताबिक चले, मन निर्मल हो, तब जो जागृति आए, उसमें ही परमप्रेम का अवतरण हो सकता है।


महासती रेवती जी के द्वार पर सिंह अणगार पधारे। ‘धर्म लाभ’ का आशीर्वाद दिया। ‘धर्म लाभ’ शब्द सुनते ही रेवती जी के आनंद का कोई ओर-छोर न रहा। वेष परमात्मा मेरे द्वार पर! अहोभाव के लय में… चार शब्द हमारी परंपरा में हैं: रूप परमात्मा, शब्द परमात्मा, वेष परमात्मा, अनुष्ठान परमात्मा।

मंदिर में हम जाते हैं, रूप परमात्मा के सान्निध्य में हम होते हैं। मैंने पहले कहा था कि प्रभु के रूप को देखने के लिए, प्रभु के दर्शन के लिए, तीसरी आँख खुलनी चाहिए। सद्गुरु तीसरी आँख खोल देते हैं। भगवद् गीता में श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन से, “दिव्यं ददामि ते चक्षुः।”

अर्जुन, मैं तुझे दिव्य चक्षु दे रहा हूँ। उस दिव्य चक्षु से तू परम रूप को निहार सकेगा।

तो सद्गुरु की कृपा के बिना परमात्म दर्शन की प्रक्रिया शुरू ही नहीं होगी। सद्गुरु तैयार हैं। आप तैयार हैं? आनंदघन जी भगवंत ने १५वे स्तवन में लिखा,

“प्रवचन अंजन जो सद्गुरु करे।”

जिस समय सद्गुरु तीसरी आँख को खोल देंगे, प्रवचन अंजन हृदय में कर देंगे, उसी क्षण तुम परमात्मा को देख सकोगे।

“हृदय नयन निहाळे जगधणी।”

लेकिन आनंदघन जी भगवंत ने लिखा है की सद्गुरु प्रवचन अंजन करे तो। मैं बहुत बार मेरे प्रवचनों में श्रोतावृंद से पूछता हूँ कि क्या सद्गुरु कंडीशनली (conditionally) खुल सकते हैं? सद्गुरु कंडीशन (condition) क्यों रखते हैं? सद्गुरु को तो अनकंडीशनली (unconditionally) बरस जाना चाहिए। ‘आ जा, तीसरा नेत्र खोल दूँ।’

लेकिन आनंदघनजी भगवंतने अशब्द मे बात अलग की। आनंदघनजी भगवंत कहते है की सद्गुरु तो तैयार हि होते है लेकिन साधक-भक्त तैयार होना चाहिए।

तो सद्गुरु को ड्यूल एक्शन (dual action) करना पड़ता है। पहले तो आपको तैयार करना पड़ता है। फिर आप तैयार हो गए तो शक्तिपात करने में तो एक सेकंड लगेगा। लेकिन जो समय लगता है, वो आपको तैयार करने में लगता है। अनगिनत जन्मों से सद्गुरु चेतना आपको तैयार करने में लगी है। आप तैयार नहीं हुए।

सद्गुरु क्या करते हैं? आपके हृदय को निर्मल बनाते हैं। और जिस क्षण आपका हृदय निर्मल बन गया, परम चेतना का अवतरण भी आपके भीतर हो जाएगा। दर्शन क्या? अवतरण। तो सद्गुरु चेतना अनंत जन्मों से आपके पीछे लगी हुई है। इस जन्म में भी लगी हुई है। आपके हृदय को निर्मल… निर्मल बनाना है।

इनिशियल स्टेज (initial stage) का काम गुरु चेतना का है। बाद का काम प्रभु चेतना का है। तो आपके हृदय को निर्मल बनाना, यह गुरु चेतना का काम है। आप यहाँ तो निर्मल बन भी जाओगे। इस हॉल में हैं, इस तीर्थ में आप हो, निर्मल बन भी गए हैं। मौन भी है तो अच्छा है। लेकिन शब्दों का मौन है न? विचारों का मौन तो नहीं आया है। हम शब्दों के मौन से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। हमें विचारों का मौन चाहिए। विचार-विहीन मौन।

तो यहाँ तो आप निर्मल हो गए। लेकिन बाहर जाएँगे, घर जाएँगे, निमित्तों की दुनिया में जाएँगे, तो निमित्तों का असर हो जाएगा। लोग मुझे बहुत बार कहते हैं कि ‘गुरुदेव, क्या करे? हम निमित्तवासी हैं, तो निमित्तों का असर तो रहेगा।’ ठीक है? अब मैं आपसे बात करूँ। दो निमित्त हैं। एक सरल निमित्त है, एक कठिन निमित्त है। ज़्यादा असर कठिन निमित्त का होगा। किसी ने कहा, ‘इसका काम अच्छा नहीं।’ तो सरल निमित्त हुआ। लेकिन किसी ने कह दिया, ‘इसको काम सौंपा था? इस आदमी को? निकम्मा आदमी है, कुछ समझता ही नहीं है। उसको काम सौंपा तुमने? तुम में बुद्धि है कि नहीं? तुमने क्यों ऐसे आदमी को काम सौंपा?’ तो असर किसका ज़्यादा होगा? बोलो। पिछले वाले निमित्त का। ठीक है?

तो दो निमित्त हैं। तो असर किसका ज़्यादा होता है? जो बलवान निमित्त होता है। एक सादा है, एक बलवान है। अब अलग निमित्तों की बात करें। प्रभु का शब्द, यह बलवान निमित्त है। और सामान्य आदमी का शब्द, वह सामान्य निमित्त है। बरोबर? सामान्य आदमी के शब्द, वो सामान्य निमित्त। और प्रभु के जो शब्द हैं, वो बलवान निमित्त। अब असर किसका होगा? बोलो।

सामान्य आदमी ने कुछ कहा, आपको बुरा भी लगा। लेकिन उस समय प्रभु के शब्द याद आ गए तो? प्रभु ने कहा, “उवसमेण हणे कोहं।” क्रोध का सामना कैसे करने का? शांति से, उपशम से, समभाव से। अब बलवान निमित्त कौन सा है? प्रभु के शब्द। असर किसका होगा? अभी तक ख़याल नहीं था। अब तो ख़याल आ गया। अब तो ख़याल आ गया कि बलवान निमित्त का असर ज़्यादा होता है। तो प्रभु के शब्द तो बलवान निमित्त हैं। उसका असर ज़्यादा होना चाहिए।

तो अब हमारा काम सरल हो जाएगा। हमने आपको निर्मल कर दिया। आप निर्मल ही रहोगे। क्रोध पनपेगा नहीं। अहंकार आएगा नहीं। हृदय निर्मल रहेगा। तो प्रभु का दर्शन हो जाएगा। प्रभु का अवतरण हो जाएगा।

तो रूप परमात्मा, शब्द परमात्मा, प्रभु के प्यारे शब्द, शब्द परमात्मा हैं। मैं बहुत बार कहता हूँ, “I have not to speak a single word. He has to speak.” मुझे कुछ बोलना नहीं। यशोविजय नाम की कोई संघटना ही नहीं है। तो बोलेगा कौन? प्रभु को ही बोलना पड़ेगा। He has to speak. और वह बोलेगा तो ही मज़ा आएगा। शब्द परमात्मा।  अनुष्ठान परमात्मा। हम सामायिक में बैठे हुए हैं, अनुष्ठान परमात्मा है। और प्रभु की प्यारी चद्दर जिसने ओढ़ी है, वे वेष परमात्मा हैं।

रेवती जी ने धर्मलाभ की आवाज़ सुनी। हृदय में आनंद-आनंद हो गया। मेरे भगवान के परमात्मा… वेष परमात्मा मेरे द्वार पर! पधारो, पधारो।

सिंह अणगार भीतर आए। रेवती जी ने कहा, “साहेबजी, यह लो। साहेबजी, यह लो।”

उस समय सिंह अणगार ने कहा कि, “मैं सिर्फ तुमने तुम्हारे लिए जो औषधि बनाई है, उसे वोहरने के लिए आया हूँ। प्रभु के लिए उसकी आवश्यकता है।”

अब तो रेवती जी का रोम-रोमा नाच उठा। ऐसे तो महाराज साहेब वोहर कर जाते हैं। लेकिन प्रभु उसमें से कुछ लेंगे या नहीं लेंगे, वो तो कैसे मालूम हो? लेकिन ये तो कह रहे हैं कि ‘प्रभु के लिए वोहरने के लिए आया हूँ।’ रोया-रोया खिल उठा। ‘मैं वोहराऊँगी और मेरे प्रभु उसको लेंगे। आहार में लेंगे। मेरे प्रभु के मुख में मेरे हाथ से दी गई औषधि जाएगी।’ क्या प्रेम होगा प्रभु पर!

लेकिन मैंने पहले दिन कहा था कि हमारे हृदय में प्रभु पर जो प्रेम है, उस प्रेम की गंगा का गंगोत्री पॉइंट प्रभु का प्रेम है। प्रभु का प्रेम हम पर बरसा, हमने उसे झेला, तभी हमारे हृदय में प्रेम की गंगा शुरू हुई। रेवती जी ने औषधि वोहराई।

ऐसी औषधि थी कि एक दिन में एक चम्मच से ज़्यादा कोई ले न सके। एक चम्मच औषधि वोहराने में कितने सेकंड लगते? बोलो। कितने सेकंड लगते? चार सेकंड, पाँच सेकंड, कितने सेकंड? उन पाँच सेकंड में कैसी तो भावधारा बही होगी कि तीर्थंकर नाम कर्म रेवती जी ने उस क्षण में निश्चित कर लिया। और यह परम प्रेम रेवती जी के लिए अखंड हो गया।

चौथा विशेषण परम प्रेम का था अविच्छिन्नं। परम प्रेम अखंड होता है। अस्तित्व के स्तर पर एक बार प्रभु का प्रेम टच (touch) हो गया। बस हो गया सो हो गया। अब अनंत समय तक तुम प्रभु-प्रेम की धारा में बहोगे। अविच्छिन्नं!

और परम प्रेम का पाँचवाँ विशेषण है  सूक्ष्मतरं। राग स्थूल है। प्रभु का प्रेम सूक्ष्म भी नहीं, सूक्ष्मतर है। आवाज़ ज़ोरदार आती है तो हमारे कान तुरंत उस आवाज़ को पकड़ लेते हैं। लेकिन आवाज़ बिल्कुल मध्यम होती है, बिल्कुल मध्यम, तब मन को, कान को एकाग्र बनाना पड़ता है। तो राग स्थूल है। राग को लेने के लिए कोई जागृति की ज़रूरियात नहीं। वहाँ तो निद्रा की ही ज़रूरियात है।

तुम जागृत कब होते हो? प्रभु ने आचारांग सूत्र में कहा:

“सुत्ता अमुणी, मुणिणो सययं जागरंति।”

प्रभु कहते हैं, “सुत्ता अमुणी।” जो गृहस्थ है, वो सुषुप्त ही है। सोते हुए ही है। और प्रभु ने कहा, मेरे मुनि, मेरी साध्वियाँ सतत जागृत होती हैं। “सययं जागरंति।”

अब सतत जागृति तो कैसे रहेगी? हम भी सोते हैं। लेकिन यहाँ बहुत गहरी बात है। सोता कौन है? जो थक जाता है, वो सो जाता है। शरीर थकता है। कॉन्शियस माइंड (conscious mind) भी थकता है विचार करके। तुम कहाँ थकते हो? हम नहीं थकते हैं। शरीर थकता है तो शरीर सो जाएगा। कॉन्शियस माइंड थक गया है तो वह सो जाएगा। हम तो चैतन्य हैं। आनंदघन! हमें सोने की आवश्यकता नहीं।

मैंने ११ वर्ष की उम्र में दीक्षा ली। सियाले में दीक्षा हुई थी। रात को मैं संथारे में सोता था और सुबह तीन फुट दूर निकलता था। संथारा यहाँ, मैं वहाँ। अब चातुर्मास शुरू हुआ। अषाढ़ सुदी चौदस को। गुरुदेव सोचने लगे, “इसको पाट पर सुलाएँगे तो धड़ाम करके गिरेगा। रोज़ संथारे से बाहर निकलता है। तो पाट पर क्या होगा इसका?”

लेकिन विधि तो विधि है। पाट पर सोना ही पड़ता है। तो मेरे लिए बहुत ही छोटी, हाइट (height) मे कम, चार इंच की, पाँच इंच की हाइट वाली पाट चुनी। और उसके दोनों ओर ब्लैंकेट (blanket) भी रख दी। जिससे मैं गिर जाऊँ तो ब्लैंकेट पर। लेकिन पूरे चौमासे में एक बार भी मैं पाट से नीचे नहीं गया। क्योंकि सोते समय मैंने अपने कॉन्शियस माइंड को आर्डर (order) दिया था कि, ‘अब जो हिला-डुला तो नीचे पड़ जाएगा।’ तो शरीर सोया था। कॉन्शियस माइंड सो गया था। जगता था कौन? मैं जगता था।

तुम सम्मेतशिखर की यात्रा में जाओ। छोटी-सी बर्थ (berth) हो। बर्थ पर रात को लेट जाते हो। नीचे नहीं पड़ते हो। क्यों? ऐसे तो पलंग में सोते-सोते यहाँ से यहाँ, यहाँ से वहाँ होते हो। लेकिन छोटी सी बर्थ से नीचे नहीं गिरते हो। क्यों नहीं गिरते हो? कोई जगने वाला है। कोई सोने वाला है, कोई जगने वाला है। शरीर सोता है, कॉन्शियस माइंड सोता है, हम जगते हैं।

तो प्रभु ने कहा, “मुणिणो सययं जागरंति।” अब ये जो जागृति की बात है, ये तो ऊपर की बात है। आप अभी जागृत हो। लेकिन प्रभु कहते हैं, उस अर्थ में आप जागृत हो अभी? आपका मन राग-द्वेष में न हो, अहंकार में न हो, तो आप जागृति में हो। जागृति का मतलब यह है, मन की निर्मलता। शरीर ही नहीं, मन भी प्रभु की आज्ञा के मुताबिक चलना चाहिए।

तो रेवती जी के पास अखंड प्रेम था और वह प्रेम सूक्ष्मतर भी था। तो प्रभु-प्रेम को पाँच विशेषण दिए गए:

गुणरहितं, कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं, अविच्छिन्नं, सूक्ष्मतरं।

इसी संदर्भ में थोड़े हटकर कबीर जी अपने पद के प्रारंभ में लिखते हैं: “भक्ति का मार्ग झीना झीना रे।” सूक्ष्म है। राग स्थूल है, प्रेम सूक्ष्मतर है। इसलिए प्रभु-प्रेम को यदि पाना है तो हृदय को निर्मल बनाना होगा। और इसीलिए पद में आगे कहते हैं: “नहिं अचाह, नहिं चाहना, चरनन लय लीना रे।”

भक्तियोग का मार्ग झीना है, सूक्ष्म है। तो सूक्ष्म मार्ग को प्राप्त करने के लिए क्या करने का? तो बहुत सुंदर बात कही। नहिं अचाह – कहीं पर द्वेष नहीं। नहिं चाहना –  राग भी नहीं है। नहिं अचाह, नहिं चाहना। अब अहंकार भी नहीं है। तो क्या आएगा? समर्पण आएगा। चरनन लय लीना रे।

मैं बहुत बार कहता हूँ, एक समर्पण हमारे पास हे, फिर हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं। We have not to do anything absolutely. एक समर्पण आ जाए प्रभु चरणों के प्रति, सद्गुरु चरणों के प्रति। प्रभु ही तो सद्गुरु देते हैं। हम सद्गुरु को कहाँ माँगते हैं? प्रभु के पास। “सुहगुरु जोगो।”

अब सद्गुरु क्या करेंगे? समझो कि आपने समर्पण कर दिया सद्गुरु के चरणों में। तो सद्गुरु क्या करेंगे? पहली बात, आपके लिए एप्रोप्रियेट (appropriate) साधना कौन सी है? वो सद्गुरु निश्चित करेंगे। आपकी एप्रोप्रियेट साधना सद्गुरु निश्चित करेंगे और आपको देंगे। समझो कि आप स्वाध्याय की धारा में दो-तीन जन्म से बहकर आए हो। तो सद्गुरु इस जन्म में भी आपको स्वाध्याय की धारा में आगे बहाएँगे। एक साधक मेरे पास आया। चार जन्म से वह वैयावच्च की धारा में बह रहा है। मैं उसकी जन्मांतरीय धारा का आकलन न कर सकूँ और मैं उसे स्वाध्याय की धारा दूँ, तो गुरु के रूप में मैं टोटली फेल (totally fail) हूँ। मुझे किसी भी रूप से जानना चाहिए कि इसकी जन्मांतरीय साधना कौन सी है। तुम कोई नए योगी तो नहीं हो। जूने (पुराने) योगी हो। तो सद्गुरु पहला काम यह करेंगे कि आपकी जन्मांतरीय धारा का आकलन करके आपकी साधना की धारा निश्चित करके आपको वही साधना देंगे।

दूसरा काम सद्गुरु यह करेंगे कि इस साधना को कैसे दृढ़ बनानी, सुदृढ़ बनानी है, कैसे घोंटनी है, वह सद्गुरु समझाएँगे। धन्ना मुनि और शालिभद्र मुनि को वैभारगिरि की गुहा में भेजे गए थे। क्यों? साधना को सुदृढ़ करने के लिए। हमारी एक ज़िम्मेदारी है। पंचसूत्र में लिखा है, चौथे पंचसूत्र में: “आयओ गुरु बहुमाण।”। सद्गुरु-समर्पण तुम्हारे पास है तो सद्गुरु की ज़िम्मेदारी है, वे मोक्ष आपको देंगे। हमारा वचन यशोविजय का नहीं, सद्गुरु चेतना का। आप किसी भी जन्म में हो, सद्गुरु चेतना वहाँ होगी। तो सद्गुरु चेतना का आपको वचन है कि सद्गुरु चेतना आपको मोक्ष तक पहुँचाएगी। हमारा क़ौल है। इसलिए साधना दी। अब साधना को सुदृढ़ कैसे करें, वो सद्गुरु समझाएँगे।

तीसरी बात, साधना को सुदृढ़ करने के लिए सद्गुरु एक एटमॉस्फियर (atmosphere) देंगे। वातावरण। सद्गुरु कहेंगे, “मेरे पास आधा घंटा तुझे ऐसे ही बैठना है।” सद्गुरु क्यों बिठाते हैं? एटमॉस्फियर देने के लिए। ऐसा एटमॉस्फियर देंगे कि आपकी साधना अनायास अपलिफ्टेड (uplifted) हो जाएगी।

और चौथी बात जो गुरु करते हैं, वह यह है कि आपकी साधना में कहीं भी अवरोध आ गया तो उस अवरोध को सद्गुरु हटाएँगे।

साधना देना गुरु का कार्य। साधना कैसे सुदृढ़ बनानी, वो समझाना सद्गुरु का कार्य। साधना के लिए एटमॉस्फियर देना, वो सद्गुरु का कार्य। और साधना में अवरोध आए तो उन्हें हटाने का काम भी सद्गुरु करते हैं। आपने सिर्फ समर्पण कर दिया। सब बात गुरु ने सँभाली। और जब तक आपका समर्पण नहीं है, तब तक पहुँचे हुए गुरु भी आपके लिए कुछ भी नहीं कर सकते।

आप हॉस्पिटल (hospital) में जाएँगे ही नहीं, तो डॉक्टर क्या करेंगे? हॉस्पिटल में जाएँगे, डॉक्टर से कह देंगे, ‘साहब, जो करना हो सो करो। मुझे निरोगी बना दो।’ डॉक्टर बना देंगे। लेकिन तुम तुम्हारे घर पर हो। डॉक्टर क्या करेंगे? डॉक्टर को भी तुम्हें समर्पित होना पड़ता है। तो सद्गुरु को तुम समर्पित हो गए। बस सद्गुरु कह देंगे, ‘मोक्ष ले। यह रहा।’ मोक्ष कोई दूर की घटना है? मोक्ष यह रहा।

तो नहिं अचाह, नहिं चाहना, चरनन लय लीना रे। चरणों में समर्पित हो जाना है। तुम न रहो, वे रहें, इसका नाम समर्पण। One plus one equal to one, इसका नाम समर्पण। शिष्य रहते हैं कभी? शिष्याएँ कभी रहती हैं? होती ही नहीं हैं। तब तो गुरु होते हैं। तुम भी हो और गुरु भी हो, तो क्या होगा? कुछ नहीं होगा। तुम्हारी इच्छाएँ बिल्कुल नहीं। तुम नहीं हो। तुम्हारा अहंकार नहीं है। तुम्हारी इच्छाएँ नहीं हैं। केवल सद्गुरु, केवल सद्गुरु की आज्ञा है। तो क्या हुआ? सद्गुरु योग हुआ।

तुम न रहो, गुरु रहें। तुम न रहो, प्रभु रहें। आपके मन में एक प्रश्न कभी-कभी उठता होगा कि क्या प्रभु नहीं मिले होंगे अतीत की यात्रा में? सद्गुरु नहीं मिले होंगे? मिले थे। लेकिन हमने क्या किया? ‘हम भी रहेंगे, तुम भी रहो।’

इस जन्म में तो ऐसा नहीं है? इस जन्म में भी ऐसा है। “गुरुदेव, हम भी रहेंगे। हमारी इच्छाएँ भी रहेंगी। थोड़ी-थोड़ी आपकी आज्ञा भी।”

चरनन लय लीना। चरणों में समर्पित हो जाना है। एक समर्पण नहीं हुआ। कितने जन्मों में कितनी साधना हमने की। क्या पहली बार जिनशासन मिला है? पहली बार ये साधना मिली है? कितने जन्मों में प्रभु शासन मिला! प्रभु की साधनाएँ मिलीं। अरे, इस जन्म में प्रभु की चद्दर नहीं मिली है, अतीत की यात्रा में तो प्रभु की चद्दर भी मिली थी। याद नहीं है? तो भी हमारा संसार चालू ही है। क्यों? समर्पण नहीं हुआ।

शास्त्रों ने स्पष्ट कहा, मासक्षमण एक साधक अपनी इच्छा से करता है, गुरु आज्ञा बिना, तो वो अधर्म है। और नवकारशी का पच्चक्खाण गुरु आज्ञा से करता है, तो वो धर्म है। क्योंकि तुम्हारी इच्छाएँ समाप्त कर दीं। यहाँ भी तुम इच्छाएँ लेकर आओगे—’ऐसा मुझे करना है, ऐसा मुझे करना है।’ तो “मैं” तो रह गया। उस “मैं” को तो निकालना है। ‘गुरुदेव, मैं खाली होकर आया हूँ। कोई इच्छा नहीं है। आप जो भी दो।’

समझो कि अष्टमी का दिन है। आप पौषध में हो। राई-मुहपत्ती आपने की। अंत में पच्चक्खाण का आदेश आता है। अब आप घर से निश्चित करके आए हो। घर पर कह कर आए हो, ‘आज तो मेरा आयंबिल है। कुछ खटपट मेरे लिए करनेकी नहीं। आयंबिल शाला में आयंबिल कर लूँगा।’ निश्चित करके आए हो। आदेश कौन सा माँगेंगे? ‘इच्छाकारेण संदिसह भगवन्! पसाय करी पच्चक्खाण का आदेश देना जी।’ क्यों ‘आयंबिल के पच्चक्खाण का आदेश देना जी’, ऐसा क्यों नहीं बोलते?

पच्चक्खाण आज की साधना है और साधना गुरुदत्त ही होनी चाहिए। तो चरनन लय लीना। एक समर्पण आ गया तो परम प्रेम मिल गया। तो उसी परम प्रेम का अब प्रैक्टिकल।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *