MAUN DHYAN SADHNA SHIBIR – 19 | 02-10-2026 | MORNING | KATREJ, PUNE.

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प्रेमस्वरूपं

नारदजीने भगवत्प्रेम का वर्णन करते हुए कहा: अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपं। वर्णन करूँ तो भी कैसे करूँ! हमारी दुनिया में ऐसे कोई शब्द नहीं हैं जिन शब्दों में उसका वर्णन हो सके। Beyond the words, beyond the imagination.

और इस बात को समझने के लिए बिलकुल Appropriate उदाहरण दिया दूसरे सूत्र में: “मूकास्वादनवत्”। कोई Speechless व्यक्ति साकर खाए और आप उसको पूछो कि “कैसी लगी साकर?” तो वह गूंगा आदमी क्या बोलेगा? ऐसे ही नारद ऋषि कहते हैं कि भगवत्प्रेम की बात करने में मैं speechless हूँ। मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।”

और यही बात उन्होंने तीसरे सूत्र में लिखी: “प्रकाशते क्वापी पात्रे”। यह जो परम प्रेम है, वह उतरता है किसी अधिकारी व्यक्ति की चेतना में। अनगिनत जन्म हमारे हो गए, हम प्रभु के प्रेम को झेल नहीं पाए। अब प्रभु के प्रेम का, परम चेतना का अनुभव करना ही हमारे इस जन्म का अवतारकृत्य है।


कलापूर्णसूरी दादा से आचार्य रत्नसुंदरसूरी जी ने एक बार पूछा था कि, “गुरुदेव, आप प्रभु प्रेम की बात अक्सर कहते हो; आपने परम प्रेम का अनुभव क्षण-क्षण में किया, लेकिन मुझे परम प्रेम की कोई अनुभूति नहीं हुई है।”

दादा ने पूछा आचार्यश्री से कि तुम्हारी दीक्षा कैसे हुई? आचार्यश्री ने कहा, “मैं आबू अचलगढ़, पूज्यपाद गुरुदेव भुवनभानु सूरी महाराज के शिविर में गया था; गुरुदेव की दृष्टि मेरे पर स्थिर हुई, गुरुदेव की कृपा उतरी, गुरुदेव का प्रेम मेरे पर बरसा, और मैं दीक्षित हो गया।”

दादा ने आगे पूछा कि उस शिविर में कितने युवान थे? आचार्यश्री ने कहा, “करीबन २०० युवान होंगे।” तो दादा ने पूछा कि २०० युवान में से तुम्हारे गुरुदेव की दृष्टि तुम पर ही टिकी, तुम पर ही स्थिर हुई, इसका कारण क्या?

आचार्यश्री सोचने लगे, निरुत्तर हो गए। उन्होंने कहा, “गुरुदेव, इसका उत्तर मेरे पास नहीं है।” तब गुरुदेव ने कहा कि यही तुम पर बरसा हुआ प्रभु का प्रेम था। पहले प्रभु ने तुम्हें सिलेक्ट किया, बाद में तुम्हारे गुरुदेव ने तुम्हें सिलेक्ट किया।

आचार्यश्री ने कहा कि गुरुदेव, आप कहते हो, बिल्कुल सच बात अभी मुझे लगती है; कि प्रभु का प्रेम मेरे पर बरसा था, लेकिन मेरे पास परम प्रेम की अनुभूति नहीं थी।

उस समय गुरुदेव ने कहा था कि यह जो जन्म मिला है, सिर्फ परम प्रेम की अनुभूति के लिए मिला है। यदि परम प्रीति इस जन्म में नहीं हुई, प्रभु के प्रेम की अनुभूति हमने नहीं की, तो हमारा यह जन्म meaningless है।

नारद ऋषि को एक भक्त ने पूछा था कि गुरुदेव, प्रभु के प्रेम की आप बातें करते हो, लेकिन वह प्रेम कैसा होता है, थोड़ा वर्णन तो करो।

नारदऋषि ने प्रांजल संस्कृत में सूत्र दिए; अनुवाद करने में डर लगता है कि मूल का जो चार्म है, वह बिखर जाएगा। नारद ऋषि कहते हैं,

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपं।।

मूकास्वादमवत्‌।।

प्रकाशते क्वापि पात्रे ।।

पहला सूत्र: अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपं।। भगवत प्रेम का वर्णन कैसे करूँ? करूँ, तो भी कैसे करूँ? हमारी दुनिया में ऐसे कोई शब्द नहीं हैं जिन शब्दों में उसका वर्णन हो सके। Beyond the words, beyond the imagination.

appropriate उदाहरण दिया दूसरे सूत्र में: “मूकास्वादनवत” इसी सूत्र का अनुवाद कबीर जी ने हिंदी भाषा में किया: “गूंगे केरी सरकरा”

Speechless आदमी था, गूंगा। साकर खायी, पूछा जाए, “कैसी लगी साकर?” Speechless आदमी क्या बोलेगा? ऐसे ही भगवत प्रेम की बात करने में नारद ऋषि कहते हैं, “मैं speechless हूँ। मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।”

मेरी भाषा में कहूँ तो, नारद जी ने कहा था, “I can’t say it, but you can experience it।” I can’t say it, but you can experience it।

और यही बात उन्होंने तीसरे सूत्र में लिखी: “प्रकाशते क्वापी पात्रे।”

यह जो परम प्रेम है, उतरता है किसी अधिकारी व्यक्ति की चेतना में। प्रभु का प्रेम हर क्षण बरस रहा है। ऐसा कोई क्षण नहीं, जिस क्षण में प्रभु का प्रेम न बरस रहा हो। ऐसा कोई सेकंड नहीं, जिसमें प्रभु का प्रेम न बरस रहा हो। लेकिन हम उसे झेल नहीं पाते। अनगिनत जन्म हमारे हो गए, हम प्रभु के प्रेम को झेल नहीं पाए।

इसीलिए दोबारा कहूँगा कि इस जन्म का अवतार-कृत्य एक ही है: प्रभु के प्रेम को स्वीकारना। वह बरस ही रहा है। तुम धर्मशाला के, तुम्हारे कमरे में से यहाँ आए। हवा का स्पर्श हुआ था, धूप का स्पर्श हुआ था, परमात्मा का स्पर्श हुआ था?

हम विज्ञान में पढ़े हुए हैं कि ऑक्सीजन के महासागर में हम रहते हैं। आज एक बात और जोड़ दो कि परम चेतना के महासागर में भी हम जीते हैं। हम छोटी सी तरंग हैं, परम चेतना के समंदर की।

मैक्रोहान बड़ा तत्वचिंतक हुआ। उसने एक रूपक कथा लिखी है:

“दरिये में रहती हुई एक छोटी मछली,

बड़ी मछली से पूछती है कि समंदर कैसा होता है?”

समंदर की बातें बहुत सुनी हैं। उसमें आरो होते हैं, अवरोह होते हैं, तरंगे होती हैं, गर्जनाएँ होती हैं। जरा समंदर की बात तो करो।

तब बड़ी मछली ने कहा,

“समंदर? जिसमें हम रहते हैं, वही तो समंदर है। दूसरा समंदर कौन सा?”

तब छोटी मछली की comment थी कि यह समंदर है? यह तो पानी है।

वह छोटी मछली समंदर में रहती थी या पानी में, वह वह जाने। हम सिर्फ ऑक्सीजन के महासागर में ही नहीं रहते, हम परम चेतना के समंदर में भी रहते हैं। हमारे इर्द-गिर्द सिर्फ परम चेतना का समंदर है।

हम अंजनशलाका करते हैं न – प्राण प्रतिष्ठा, तब क्या करते हैं? यह जो कॉस्मस में व्याप्त परम चेतना है, उसे पकड़कर मूर्ति में हम केंद्रित करते हैं। और एक झरना निर्मित होता है, सहस्रार से यहाँ से मूर्ति में परम चेतना प्रविष्ट होती है, और नव चैतन्य केंद्रों से परम चेतना निकलती है।

इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि भक्त की डिक्शनरी में, भक्त की वोकैबुलरी में, मूर्ति शब्द का अस्तित्व ही नहीं है। मूर्ति तो जयपुर से तुम लाए तब तक। जब प्राण प्रतिष्ठा हो गई, अंजनशलाका हो गई, भगवान हो गये।

तो नारद ऋषि कहते हैं, “प्रकाशते क्वापी पात्रे।” You can experience it। मैं उस परम चेतना की बातें शब्दों में नहीं कर सकता हूँ, लेकिन तुम परम चेतना का अनुभव कर सकते हो। और इस परम चेतना के अनुभव के लिए ही यह जन्म है।

प्रभु महावीर देव जब विचरते थे, उस समय उनके एक शिष्य थे, सिंह अणगार। एक दिन उन्होंने प्रभु के पास विनती प्रस्तुत की कि प्रभु, क्या मैं जंगल में साधना के लिए जा सकता हूँ? प्रभु ने अनुमति दी।

हमारे वहाँ दो प्रकार की साधना पद्धतियाँ हैं: एक गीतार्थ की साधना पद्धति, दूसरी गीतार्थ की निश्रा की साधना पद्धति। जो महापुरुष ज्ञानी हैं, उनके लिए यह बात है कि वे स्वयं अपनी साधना को निश्चित कर सकते हैं। लेकिन हम अज्ञानी हैं, निपट अज्ञानी हैं। तो हमारी साधना कैसी हो, यह सद्गुरु निश्चित करेंगे। तो एक गीतार्थ की साधना, एक गीतार्थ की निश्रा की साधना।

सिंह अणगार गीतार्थ थे। तो प्रभु ने अनुमति दी कि तुम जंगल में जाकर साधना को सघन बना सकते हो।

मुझे ईर्ष्या आती है, जंगल में जाकर साधना करने वाले महामुनियों की। गुहा में जाकर साधना करने वाले महामुनियों की। एकांत में सिर्फ हम हैं, और प्रभु हैं। मज़ा ही मज़ा।

हिम्मतभाई बेड़ा वाले, चंद्रकांत भाई, प्राणलाल भाई, सब बद्री की यात्रा के लिए जा रहे थे। एक जगह पर समाचार मिला कि पास में ही एक संत रहते हैं। कार को रोड पर रखकर वे सब संत के दर्शन के लिए गए।

एक छोटी सी गुहा। एक आदमी पूरा सो भी न सके, इतनी छोटी गुहा। और उसमें एक संत रहते थे। दर्शन किया। आश्चर्य तो हुआ कि हिमालय में बहुत बड़ी गुहाएँ हैं। तो यह संत इतनी संकरी गुहा में क्यों? तो प्रश्न किया कि आप इतनी संकरी गुहा में क्यों?

तब संत ने कहा, “क्यों? बड़ी गुहा का क्या काम है? मैं और मेरे भगवान, दो तो यहाँ रहते हैं, फिर तीसरे का काम भी क्या है?”

एकांत में हम होते हैं, और प्रभु होते हैं। प्रभु की निर्मल चेतना, यह हमारा लक्ष्य बिंदु है। और हम हमारी चेतना को निर्मल बनाने की कोशिश में लगेंगे।

तो सिंह अणगार साधना के लिए प्रभु की आज्ञा को लेकर जंगल में गए। जंगल में उनकी साधना develop हो रही है।

यहाँ क्या हुआ? कि प्रभु पर गोशालक का उपसर्ग हुआ। गोशालक ने तेजोलेश्या प्रभु पर रखी। उसके प्रभाव से प्रभु की काया थोड़ी शिथिल बनी।

अब बातें ऐसी चली कि प्रभु बहुत बीमार हैं। बहुत, बहुत, बहुत। और आगे बात चली कि प्रभु नहीं हैं। प्रभु गए।

सिंह अणगार के पास, जंगल में, एक राहदारी से यह बात आई कि प्रभु अब नहीं हैं। और क्या मनोस्थिति सिंह अणगार की हुई है। सिसक-सिसक कर रोने लगे। फूट-फूट कर रोए। यदि प्रभु ही नहीं हैं, तो मेरे जीवन का क्या अर्थ है? प्रभु ही तो जीवन हैं। प्रभु ही तो मेरे प्राण हैं। प्रभु ही तो सब कुछ हैं। यदि प्रभु नहीं हैं, प्रभु गए, तो मेरे जीवन का क्या अर्थ रहा? सिसक-सिसक कर रोते हैं।

प्रभु तो विद्यमान हैं। अपने केवलज्ञान से प्रभु इस दृश्य को देखते हैं। और प्रभु ने गौतम स्वामी को बुलाया।

गौतम, दो मुनियों को तुरंत भेजो, जहाँ सिंह अणगार साधना कर रहा है। और दो मुनि वहाँ जाकर सिंह अणगार से इतना ही कहें कि प्रभु तुम्हें याद कर रहे हैं। प्रभु तुम्हें बुलाते हैं।

दो मुनि रात जंगल में गए। सिंह अणगार ने दूर से आते हुए दो मुनियों को देखा। अब तो उनके मन में बात निश्चित हो गई कि प्रभु गए ही हैं। और यह समाचार देने के लिए कि मुनिराज आ रहे हैं।

लेकिन मुनिराज आए, उन्होंने सिंह अणगार को वंदन किया, और कहा कि प्रभु आपको बुलाते हैं। प्रभु आपको याद कर रहे हैं।

प्रभु बुलाते हैं मुझे! तो प्रभु हैं? प्रभु हैं! अरे! प्रभु हैं, समवसरण में देशना देते हैं। आपको किसी ने कहा कि प्रभु नहीं हैं? प्रभु हैं, आपको बुलाते हैं। और सिंह अणगार स्वस्थ हो गए।

प्रभु के पास पहुँचे। प्रभु को देखा। प्रभु के प्रेम को देखा।

हमारी दीक्षा कैसे होती है, आपको मालूम है? आपको भी लेनी है न? Future planning तो यही है न? तो आपको यह जानना चाहिए।

चौथे पंचसूत्र में भगवान हरिभद्रसूरि ने कहा कि प्रव्रज्या, दीक्षा बाद में आती है। पहले अभिव्रज्या आती है। पहले अभिव्रज्या, बाद में प्रव्रज्या।

अभिव्रज्या का अर्थ है, परमात्मा का सम्मोहन। परमात्मा के प्रेम में तुम इतने डूब गए, इतने डूब गए कि प्रभु के बिना एक क्षण तुम नहीं रह सकते। और तब दीक्षा होगी।

जब तक हमारा पूरा अस्तित्व प्रभु के रंग में रंगा नहीं जाता, तब तक दीक्षा नहीं होती।

मीरा ने भी कहा था,

“लाल न रंगाऊँ, हरी न रंगाऊँ,

तेरे ही रंग में रंग ले चुनरियाँ।”

न लाल रंग चाहिए, न हरा रंग चाहिए। प्रभु, तेरे ही रंग में मेरे अस्तित्व को रंग देना है।

और फिर मीरा ने कहा, “ऐसा ही रंग दो। ऐसा ही रंग दो कि रंग नाही छूटे। धोबीया धुए चाहे सारी उमरियाँ।” प्रभु, ऐसा रंग आपका मेरे अस्तित्व पर लग जाए कि कभी भी वह रंग जा न सके। प्रभु का रंग।

हमारा अस्तित्व पूर्णतया प्रभुमय हो जाए। तो अभिव्रज्या का अर्थ यह है कि तुम्हारा व्यक्तित्व, तुम्हारा अस्तित्व, पूरा का पूरा प्रभुमय हो जाए।

दो शब्द मैंने कहे, व्यक्तित्व, अस्तित्व। जब तुम प्रभुमय नहीं हो, तब तुम्हारा व्यक्तित्व है। तुम अकेले हो। जब तुम्हारी चेतना प्रभुमय हो गई, तो तुम्हारी चेतना फैल गई। पूरे ब्रह्मांड में। एक अस्तित्व तुम्हें मिल गया। इकाई नहीं, पूर्ण अस्तित्व।

तो अभिव्रज्या का अर्थ यह है कि हमारा व्यक्तित्व प्रभुमय ऐसा हो जाए कि व्यक्तित्व व्यक्तित्व न रहे, अस्तित्व में बदल जाए।

और अभिव्रज्या हो गई, फिर प्रव्रज्या। फिर तो तुरंत प्रव्रज्या। प्रभु के बिना हम रह ही नहीं सकते। तो प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाएँ।

तो “प्रकाशते क्वापी पात्रे।” नारद ऋषि कहते हैं कि कोई पात्र में प्रभु के प्रेम का अवतरण होता है।

सिंह अणगार की बात इसलिए कह रहा हूँ कि प्रभु के प्रेम को उन्होंने कैसे झिला। तो सिंह अणगार प्रभु के प्रेम से तो दीक्षित हुए थे। प्रभुमय पूरा अस्तित्व उनका था। प्रभु को देखे, आश्वस्त हुए, प्रभु हैं। और प्रभु के मुँह पर यही प्रेम झलकता था। प्रभु की आँखों में प्रेम ही प्रेम था।

आप कहेंगे कि सिंह अणगारके सामने तो साक्षात प्रभु थे। हमारे सामने साक्षात प्रभु कहाँ हैं? मंदिर में हैं, वह साक्षात प्रभु ही हैं। महाविदेह में सीमंधरदादा विराजमान हैं। और आपके जिनालय में भी सीमंधरदादा विराजमान हैं। तो महाविदेह में विराजमान सीमंधरदादा से जो काम हो सकता है, वही काम जिनालय में प्रतिष्ठित सीमंधरदादा से होता है। There is no difference।

स्थापना, निक्षेप हम कहेंगे, लेकिन परम चेतना का जो अवतरण हुआ है, उस अवतरण के संदर्भ में प्रभु साक्षात प्रभु हैं। मूर्ति नहीं हैं, प्रभु ही हैं।

अब सिंह अणगारने देखा कि प्रभु हैं, यह तो आश्वासन की बात है। लेकिन प्रभु का शरीर शिथिल हो गया है। आँख में आँसू भर आए। मेरे प्रभु की काया, और इतनी शिथिल? क्या प्रेम होगा प्रभु पर?

आप पूजा करने के लिए जाते हो, क्या वाला कूँची आप घिस सकते हो? एक खुरदुरी वाला कूँची। मेरे प्रभु को इसका स्पर्श कैसे हो सकता है? प्रभु का अंगलोछणा आप use करते हो, ऐसे use हो सकते हैं? कैसे कोमल-कोमल वस्त्र होने चाहिए? मेरे प्रभु हैं!

तो सिंह अणगारकी आँखों से आँसू बह रह है। मेरे प्रभु की काया इतनी शिथिल हो गई। तब प्रभु क्या कहते हैं? याद रखो, तेरहवें गुणस्थानक पर, वीतराग बने हुए परमात्मा हैं। और कितने भक्तवत्सल हैं।

प्रभु कहते हैं, मेरी काया शिथिल हो गई है, इसलिए तुझे दर्द होता है। तू एक काम कर, रेवती श्राविका के द्वार जा। और रेवती श्राविका ने अपने लिए जो औषधि बनाई है, वह तू वोहर कर आ, मैं उसे वापरूँगा, और मेरी काया भली-चंगी हो जाएगी।

कहाँ वीतराग परमात्मा, और कहाँ ये भक्तवत्सल?

एक साधक ने, पन्यास गुरुदेव, अपने युग के साधना-मनीषि भद्रंकरविजय महाराज साहिब से पूछा था कि गुरुदेव, प्रभु तो वीतराग है। तो वीतराग प्रभु प्रेम कैसे बरसा सकते हैं?

तब पन्यासजी भगवंतने, आनंदघनजी भगवंत की स्तवना का एक पाठ प्रस्तुत किया था। आनंदघनजी भगवंत की १५वीं स्तवना में एक पंक्ति आती है,

“दौड़त दौड़त दौड़ियो, जेती मननी रे दौड़, प्रेम प्रतीत विचारो ढूँकड़ी।”

प्रभु का प्रेम तुम पर बरस रहा है, इसकी अनुभूति तुममें मैं दूँ, ऐसा आनंदघनजी भगवंत कहते हैं। और पन्यासजी भगवंत, आनंदघनजी भगवंत को quote कर रहे हैं। तो आनंदघनजी भगवंत ने क्या कहा? “प्रेम प्रतीत विचारो ढूँकड़ी।” ढूँकड़ी अर्थात नजदीक। प्रभु तुम्हें चाह रहे हैं। प्रभु तुम्हें प्रेम कर रहे हैं, इसकी अनुभूति मैं तुम्हें दूँ।

बोलो, अनुभूति है तुम्हारे पास? प्रभु का प्रेम तुम पर बरस रहा है। अनुभूति है? बोलो न, कि प्रभु का प्रेम न बरसता होता, तो हम दीक्षित कैसे होते?

तो आनंदघनजी भगवंत ने कहा, “दौड़त दौड़त दौड़ियो, जेती मननी रे दौड़।” साधना मार्ग में एक भी व्यक्ति, एक इंच, एक सेंटीमीटर, या थोड़ा किलोमीटर, चल सकता है, उसका कारण एक ही है कि प्रभु उसे चाहते हैं। यदि प्रभु का प्रेम उस व्यक्ति को न मिले, तो वह व्यक्ति एक इंच, एक सेंटीमीटर, साधना मार्ग में चल नहीं सकता।

तुम सब साधना मार्ग में चल सकते हो। प्रभु के प्रेम में डूबने के लिए यहाँ आए हो। मैं तुम्हें पूछूँगा कि प्रभु के प्रेम में तुम डूबोगे, या वह डूबाएगा? बोलो तो? हम कुछ भी नहीं कर सकते। हमारे पास साधना मार्ग का कर्तृत्व बिल्कुल नहीं है। प्रभु के पास ही कर्तृत्व है।

तो पन्यासजी भगवंत ने, आनंदघनजी भगवंत को quote किया कि आनंदघनजी भगवंत कहते हैं कि प्रभु का प्रेम तुम पर बरस रहा है।

अब उस भक्त ने आगे पूछा कि गुरुदेव, एक ओर तो प्रभु वीतराग है, और दूसरी ओर कहते हो प्रेम बरसाते हैं, यह कैसे बन सकता है?

तब पन्यासजी गुरुदेव ने राग और प्रेम की व्याख्या बताई। राग में तुम लेने वाले हो, प्रेम में तुम देने वाले हो। राग में पीड़ा ही पीड़ा है, प्रेम में आनंद ही आनंद है। हमारे पास आनंद है। क्यों आनंद है? राग नहीं है, प्रेम है।

राग में तुम बंध जाते हो, यह मुझे चाहिए, और यह न मिले तो? पीड़ा ही पीड़ा। हम कहेंगे, हमें कुछ नहीं चाहिए। हम तो देने वाले हैं, सबको प्रेम देंगे। और वह भी प्रेम मेरा नहीं, मेरे घर का नहीं है, प्रभु ने जो दिया है, वही मैं तुम्हें दे रहा हूँ। मेरा कुछ नहीं है। मैं तो अकिंचन हूँ। प्रभु ने मुझे प्रेम दिया, और प्रभु ने कहा कि कंजूस मत होना। जो मैंने दिया है, सबको बाँटो।

हमारी परंपरा में दो शब्द आते हैं, सिद्धि और विनियोग। जिस तत्व की सिद्धि, जिस महापुरुष के पास होती है, उस महापुरुष को विनियोग करने की प्रभु की आज्ञा है। विनियोग का अर्थ है, दूसरों को देना।

समभाव की सिद्धि, कोई महापुरुष के पास है, आप उनके पास जाओगे, आपको समभाव मिल जाएगा। ऐसा कहा जाता है कि अहिंसा की सिद्धि, जिस महापुरुष के पास है, तुम उनके चरणों में बैठो, हिंसा के विचार तुम कर नहीं सकोगे।

सत्य की सिद्धि, कोई महापुरुष ने की है, तुम निश्चित करके आओ कि वहाँ जाकर झूठा बोलना है। लेकिन जिस महापुरुष ने सत्य की सिद्धि की है, उनकी aura field में तुम बैठोगे, तुम असत्य बोल नहीं पाओगे। तुम्हारी ताकत ही नहीं है। इसलिए सद्गुरु के aura field का बहुत ही महत्व है। सद्गुरु ने सिद्धि की है, तुम उनके aura field में बैठो, तुम्हें सिद्धि मिल जाएगी।

तो प्रभु ने जो प्रेम दिया है, उस प्रेम को मुझे बाँटना है। पाँच वर्ष पहले मैं कहता था कि प्रभु ने मुझे आनंद दिया है, और मैं शब्दों को बाँटने वाला नहीं हूँ, मैं आनंद को बाँटने वाला हूँ। लेकिन जब प्रभु के प्रेम का अनुभव हुआ, अभी-अभी, थोड़े समय पूर्व, तब से मेरी भाषा शैली बदल गई। अब मैं कहता हूँ कि मुझे प्रेम ही बाँटना है। मेरे पास दूसरा कुछ है ही नहीं अब। शब्द भी क्यों मैं बोलता हूँ, आपको खींच रहा हूँ। ऐसे तो आप ताग में कैसे आओगे? मैं कहूँगा कि मैं मौन में बैठूँगा, आप कौन आओगे? बोलना, यह तो तुम्हें खींचने के लिए एक साधन है। मुझे शब्द नहीं देने हैं, प्रभु का प्रेम तुम्हें देना है। और उस प्रभु के प्रेम का स्पर्श तुम्हें हो जाए।

तो पन्यासजी भगवंत ने कहा कि प्रभु वीतराग है, लेकिन पूर्ण प्रेम से भरे हुए हैं। आनंदघनजी को quote किया, कलिकालसर्वज्ञ हेमचन्द्रचार्य को quote किया। हेमचन्द्रचार्य कहते हैं, कल ही मैंने कहा था, “तुम अकारण वत्सल हो।” प्रभु, तेरा प्रेम बरस ही रहा है, कोई कारण नहीं।

संसार में जितने भी प्रेम हैं, सकारण हैं। यह मेरा बच्चा है, यह मेरा भाई है, यह मेरी बहन है, यह मेरी माँ है। सकारण प्रेम है। निष्कारण प्रेम नहीं है। प्रभु के पास जो प्रेम है, वह निष्कारण प्रेम है। क्योंकि प्रेम बरसवाना, वह प्रभु का स्वभाव है।

तो अपने लिए तो बहुत ही आनंद की बात होगी कि प्रभु बरस ही रहे, बरस ही रहे। अब उसको स्वीकार करना, इतनी ही साधना है।

इसलिए मैं कहता हूँ कि हमारी साधना का composition क्या? 99% grace, 1% effort। 1% effort यही है कि प्रभु के प्रेम को हम स्वीकारें। हमारे अस्तित्व में, हम प्रेम को बिल्कुल प्रविष्ट कर दें। फिर जो करना है, सो प्रभु का प्रेम करेगा, तुम्हें कुछ नहीं करना है। You have not to do anything absolutely. He has to do.

और अपन करेंगे तो भी क्या करेंगे? अपन राग-द्वेष में झूमने वाले आदमी, कुछ करेंगे तो भी क्या करेंगे? या तो राग में जाएंगे, या द्वेष में जाएंगे, या अहंकार में जाएंगे, या ईर्ष्या में जाएंगे।

तो साधना मार्ग में, हमें कुछ करना नहीं है। बस प्रभु के प्रेम को स्वीकारना है। और प्रभु का प्रेम मिल गया, साधना की गाड़ी दौड़ी। चली नहीं, दौड़ी। दौड़ना है न? कि चलना है? तुम्हारा तो चलना भी कैसा होता है? अषाढ़ सूदी चौदस से गाड़ी शुरू होती है, और पारणा पाँचम के दिन वहाँ फिर ठहर जाती है। फिर अगली अषाढ़ सूदी चौदस आएगी, तब गाड़ी चलेगी।

तो दौड़ना है। प्रभु दौड़ाएंगे। इसलिए प्रभु की साधना को मैं backseat journey कहता हूँ। Backseat journey। कार में पीछे बैठ जाओ, बस। कुछ करना नहीं है। शॉफर को कह दिया, यहाँ जाना है, शॉफर गाड़ी चलाकर ले जाएगा। Backseat journey।

तो यह पहले तो आपके मन में निश्चित करना है, कि प्रभु के प्रेम को पाना है।

कल शाम और आज सुबह, महावीर प्रभु के चरणों में बैठे थे। जब भी महावीर प्रभु के चरणों में हम बैठे, तब कलिकालसर्वज्ञ ने सकलार्हत में जो गाथा सूत्र किए हैं, उसमें से एक गाथा सूत्र याद आना चाहिए।

कृतापराधेSपि जने, कृपामन्थरतारयो:।

प्रभु की साधना काल का यहाँ वर्णन आया। एक अनाड़ी आदमी, प्रभु के कान में कीलें ठोक रहा है। और उस समय, प्रभु की आँखें नम होती हैं, प्रभु की आँखों से आँसू बहते हैं।

मेरे प्रभु की आँखों में आँसू? क्यों आँसू आए? आँसू क्यों आए?

प्रभु ने सोचा कि यह तो मेरा मित्र है। अपने कान में कीलें ठोकने वाले को प्रभु अपना मित्र समझते हैं! यह मेरा मित्र है, यह मेरा उपकारी है कि मेरा जो कर्म है, उससे बिखर रहा है। लेकिन अभी-अभी, अशुभ विचारों में, यह आदमी है, कर्म बंध कर रहा है, और उस कर्म बंध से क्या वह दुर्गति में जाएगा? क्या यह प्रभु का प्रेम! सोचो तो!

कान में कीलें ठोकने वाले पर भी प्रभु का यह प्रेम! कि यह क्या दुर्गति में जाएगा? यह नर्क में जाएगा? नहीं, मेरा मित्र है, मेरा उपकारी है, वह तो सद्गति में जाना चाहिए। दुर्गति में कैसे जाए?

तो प्रभु की आँखें छलछलाईं। प्रभु की आँख में आँसू आए। प्रेम के आँसू थे। कीलें ठोकने वाले पर, मेरे प्रभु का प्रेम था।

और कोई कान में कड़वा शब्द बोल दे, तो उस पर आपका प्रेम होगा, बरोबर? अब बोलो। कान में कीलें ठोकने वाले पर प्रभु का प्रेम। हम इतनी ऊँचाई तक तो नहीं पहुँच सकते, लेकिन हमारे कान में कोई कड़वा शब्द बोल दे, तो हम प्रेम से enjoy करें। नहीं होगा?

प्रभु का प्रेम स्वीकारना है। और प्रभु का प्रेम आप झेलोगे, आपका जीवन पूरा का पूरा बदल जाएगा। आपके घर में स्वर्ग उतरेगा। अभी आपका घर कैसा है, मुझे मालूम है। public में कोई कहने की आवश्यकता नहीं। आप भी जानते हैं, मैं भी जानता हूँ। लेकिन आपके घर को आप स्वर्ग बना सकते हो, यदि प्रभु के प्रेम को आपने स्वीकार कर लिया।

तो theorecally, प्रभु के प्रेम को स्वीकारने की बातें कीं, practical में, अब यही बात करनी है कि पूरे विश्व में, पूरे cosmos में, पूरे ब्रह्मांड में, परमात्मा का प्रेम ही प्रेम छलक रहा है। हमारे इर्द-गिर्द, दूसरा कुछ नहीं है, परम चेतना का प्रेम है। उस प्रेम के साथ हमें जुड़ना है।

तो इसलिए हम ध्यानाभ्यास शुरू करें। आँखें बंद।

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