Kumarpal Maharaja Ni Prarthna | 19-06-2026 | Pune

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प्रभु का प्रेम

हम निमित्तवासी हैं। कभी कभी क्रोध आ भी जाएगा। लेकिन क्रोध से दुर्गति होती है, नरक में जाना पड़ता है और प्रभु की आज्ञा है कि प्रेम से रहो – जैसे ही यह जागृति आ गई, क्रोध आया और गया! Touch and go!

इस चातुर्मास में न तो मुझे वाचना देनी है, न मुझे प्रवचन देने हैं; सिर्फ प्रभु का प्रेम जो मैंने Enjoy किया है, वो प्रेम आपको देना है। वाचना प्रभु देंगे, प्रवचन प्रभु देंगे; मेरा काम क्या? आप सबको प्रेम देना!

रोज हम मंदिर जाते हैं; इसीलिए जाते हैं कि प्रभु का प्रेम जो बरस रहा है, उस प्रेम को हम झेलें, Enjoy करें। प्रभु का प्रेम झेल लिया आपने, तो आपका हृदय निर्मल-निर्मल हो जाएगा। मेरे देखे इस जन्म में हमारा लक्ष्य यही है कि हम हमारे हृदय को निर्मल बनाएं।


हमारी सुबह प्रार्थना से शुरू होगी। अपने इस युग को मैं प्रार्थना का युग कहता हूँ —The Age of the Prayer। प्रार्थना इतनी तो स्पीड से काम करती है कि तुम स्विच ऑन (Switch on) करो, लैंप (Lamp) जल उठेगा, लेकिन बीच में प्रति प्रति प्रति सेकंड लगते हैं। प्रार्थना On the very moment एक्टिवेट (Activate) होती है।

सैन फ्रांसिस्को में एक मंदिर है। उस मंदिर को ‘प्रार्थना का मंदिर’ कहा जाता है। पूरे देश से लोगों की प्रार्थना वहां प्रभु के चरणों में समर्पित होती है। कितने ही कर्मचारी बैठे हुए हैं। फोन आया, कर्मचारी प्रभु के पास जाएगा और कहेगा, “प्रभु! फलां आदमी आपको ये प्रार्थना कर रहा है।”

एक दिन ऐसा हुआ, 80 वर्ष की एक मां उसका टेलेक्स (Telex) प्रार्थनाका, मंदिर में उतरा। टेलेक्स में मां ने लिखा था कि, “प्रभु! आज सुबह मेरे बच्चे ने मुझसे कहा कि मां मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं, उनको बेडरूम अलग से देना होगा तो तेरी व्यवस्था इस फ्लैट में नहीं हो सकेगी, तेरे लिए गेस्ट हाउस (Guest House) में व्यवस्था कर दी है।” मां ने टेलेक्स में आगे लिखा हुआ था कि, “प्रभु! मेरा बच्चा बहुत ही श्रीमंत है। उसकी इच्छा हो जाए कि मां को साथ में ही रखना है, तो एक बड़ा बंगला भी वो ले सकता है। दूसरा फ्लैट भी वो ले सकता है। लेकिन इसके मन में ये इच्छा आप पैदा कर दो कि मां के साथ में ही उसे रहना है। मुझे अकेला नहीं फायेगा । मुझे मेरी फैमिली (Family) के साथ ही रहना है।”

टेलेक्स पहुंचा। कर्मचारी टेलेक्स को लेकर प्रभु के पास गया और प्रभु से कहा कि, “ये मां आपसे प्रार्थना कर रही है कि बच्चे का मन पलट जाए।” फिर कर्मचारी अपनी जगह पर आया। मां का फोन नंबर था, तो उसने फोन जोड़ा और मां से कहा कि, “आपका टेलेक्स मिल गया है और प्रभु से मैंने प्रार्थना कर दी है।” उस समय मां की आवाज आई, “अरे! मेरी प्रार्थना प्रभु ने सुन ली। अभी-अभी मेरे बच्चे ने कह दिया कि मां बाजू वाला फ्लैट मिल जाता है, मैं ले लेता हूँ और तुझे मेरे साथ ही रहने का है।”

प्रार्थना ऑन द वेरी मोमेंट सक्रिय होती है! हम प्रभु से प्रार्थना करेंगे कि प्रभु तेरी कृपा से मनुष्य जन्म मिला। तेरी कृपा से पांच इंद्रियां मिली, मन और बुद्धि मिली।

हमारी दीक्षा क्यों हुई आपको मालूम है?

आपको भी लेनी है ना? चातुर्मास उतर जाए इतनी वार है, फिर होलसेल में पुणे में दीक्षा! ठीक?

तो हमारी दीक्षा कैसे हुई? एक ही बिंदु पर। और ये बिंदु यह था कि प्रभु ने जन्म दिया, प्रभु ने शासन दिया, प्रभु ने साधना दी। सब कुछ प्रभु ने दिया है। तो प्रभु ने जो दिया है, उसका उपयोग मैं मेरी इच्छा से कैसे कर सकता हूँ? और यही बात मन में उभरी कि प्रभु, जो तेरी आज्ञा है, उस आज्ञा के मुताबिक मुझे दौड़ना है।

आज से हम एक बड़ी सुंदर प्रार्थना शुरू कर रहे हैं। सूरदास जी ने प्रभु से प्रार्थना में कहा था… सूरदास जी प्रभु को निहार रहे हैं और सूरदास जी ने कहा कि, “प्रभु! तू है रूप का एक्सट्रीम पॉइंट (Extreme Point), और मेरे पास दो आंखें हैं, मैं तेरे रूप को कैसे निहारू?” और सूरदास जी ने जो प्रार्थना की है, अद्भुत! सूरदास जी कहते हैं प्रभु से:

“लोचन रोम-रोम प्रति मांगू।”

प्रभु! मैं दूसरा कुछ नहीं मांगता हूँ। एक ही चीज मांगता हूँ, मेरे एक-एक रोम पर, एक-एक रोएं पर आंख हो जाए, बस मैं तुझे निहारा ही करूं, निहारा ही करूं! और फिर उन्होंने कहा है:

“जिन आंखिन में नवी रूप बस्यो,

उन आंखिन से अब देखियो क्या।”

जर्मन कवि रिल्के (Rilke) की एक प्रार्थना है: Put out my eyes, if that can see you। इस पंक्ति का ही अनुवाद सूरदास जी देते हैं:

“जिन आंखिन में नवी रूप बस्यो,

उन आंखिन से अब देखियो क्या।”

आंखें दो हैं हमारे पास। संसार को देख लिया। क्या है नया? यही दो पैर वाले और दो हाथ वाले मनुष्य हैं। संसार को तो देख लिया, अब प्रभु का दर्शन करना है। आज सुबह आप सबने प्रभु के दर्शन किए होंगे। एक प्रश्न आपसे पूछूं? मेरा प्रवचन ऐसे ही चला जाएगा, आपके साथ बातचीत करता जाऊंगा, आगे चलता जाऊंगा। तो एक प्रश्न है… आज आपने प्रभु के दर्शन किए, भीगी-भीगी आंखों से या कोरी-कोरी आंखों से?

मंदिर में हम जाते हैं, सीढ़ियां चढ़ते हैं, प्रभु को निहारते हैं और आंखों से आंसू की धारा शुरू हो जाती है। “प्रभु! तू मुझे मिल गया!” भक्तियोगाचार्य भी प्रभु के दर्शन को दुर्लभ कहते हैं। आनंदघनजी भगवंत ने कहा है: दर्शन दुर्लभ… प्रभु का दर्शन दुर्लभ है। लेकिन सुलभ कृपा थकी… जब प्रभु की कृपा उतर जाती है, हम प्रभु का दर्शन कर सकते हैं। तो हमारे पास भीगी-भीगी आंखें हैं, हम प्रभु का दर्शन करें। ये दर्शन की, ये प्रार्थना की ताकत कितनी है?

आज एक प्रार्थना को शुरू कर रहा हूँ। कुमारपाल महाराजा ने प्रभु के सामने जो प्रार्थना पेश की है, उसी को मैं दोहराना चाहता हूँ। कुमारपाल महाराजा कहते हैं:

“कदा त्वदाज्ञाकरणाSSप्ततत्त्व” 

प्रभु! ऐसा समय कब आएगा जब तेरी आज्ञा का पालन मैं करता होऊंगा और नाचता होऊंगा। संगीत और नृत्य भक्ति की सुपर्ब टेक्निक्स (Superb Techniques) हैं। सुपर्ब! सुपर्ब इस अर्थ में कि संगीत की एक्सट्रीम (Extreme) पलों में और नृत्य की एक्सट्रीम पलों में, न तो संगीतकार रहता है न नर्तक रहता है। केवल रहता है संगीत, केवल रहता है नृत्य।

मीरा को किसी ने पूछा था कि तुम इतना नाचती हो, थकती नहीं? तब मीरा ने क्या कहा था? अपन शायद ऐसा कहें कि ‘उसकी कृपा से मैं नाचता हूँ, कैसे थकान लगेगी?’ लेकिन मीरा ने कहा, “I am not dancing. He is dancing”। मैं कहां नाचती हूँ? मैं नाचती हूँ तो थकने की बात आए। मैं नाचती ही नहीं हूँ। He is dancing! और यही बात मैं बार-बार कहता हूँ। ‘I have not to speak a single word. He has to speak’। हम चुप हो जाएं, प्रभु हमारे कंठ का उपयोग करेंगे। लेकिन आप बोल-बोल करेंगे ना, तो प्रभु मौन में हो जाएंगे। मैं मौन में हूँ तो प्रभु बोलते हैं, और मुझे बहुत बड़ा मजा आता है प्रभु को सुनने का।

मैं प्रवचनकार नहीं हूँ, मैं प्रवचन का श्रोता हूँ। प्रभु बोल रहे हैं, यशोविजय सुन रहा है। आखिर में तो यशोविजय नाम की घटना ही प्रभु ने लुप्त कर दी। यशोविजय है ही नहीं। और जब हम नहीं होते और वो होता है, तो आनंद ही आनंद होता है।

शाम की बेला, मीरा गुरु के आश्रम गई हुई। द्वार बंद थे। मीरा ने द्वार खटखटाए। भीतर से गुरु की आवाज आई, “कौन है?” तो मीरा ने कहा, “मैं मीरा, प्रभु के चरणों की दासी।” लगेगा कि कितनी सुचारू रूप से मीरा ने अपने आपको इंट्रोड्यूस (Introduce) किया! “मैं मीरा, प्रभु के चरणों की दासी।” द्वार खुले, मीरा अंदर गई। गुरु के चरणों पर साष्टांग दंडवत होकर बैठी। बैठी तब गुरु ने कहा कि, “मीरा, अभी-अभी तूने कहा कि मैं मीरा प्रभु के चरणों की दासी। लेकिन मुझे पूछना है कि ये Dual Action कैसे हो सकता है? तुम मीरा भी हो और प्रभु के चरणों की दासी भी हो! ये दोनों साथ-साथ में कैसे हो सकते हैं?”

मीरा को ख्याल नहीं आया कि गुरुदेव क्या कह रहे हैं। मीराने पलकें ऊंची उठ गई। तब गुरुदेव ने कहा कि, “बेटा, प्रभु के चरणों की दासी बनने का मतलब क्या है? गुरु समझाते हैं… बारिश की एक बूंद, छोटी सी बूंद, वो समंदर में गिर जाएगी। अब फिर कोई कहे कि उस छोटी सी बूंद को बाहर लाओ, बाहर निकालो। कैसे निकालेंगे? जैसे ही वो बूंद समंदर में विलीन हो गई, उसकी आइडेंटिटी (Identity) खत्म हो गई। वो बूंद आइडेंटिटी लेस (Identity-less) हो गई।”

“तो गुरु कहते हैं कि प्रभु के चरणों की दासी बनने का अर्थ यह है कि परम के समंदर में तेरे जीवन का बिंदु mix-up हो जाए, विलीन हो जाए। तू मीरा के रूप में भी रहती है और आइडेंटिटी लेस भी हो जाती है, वो दोनों साथ-साथ में कैसे बनेगा? तू प्रभु के चरणों की दासी बनी मतलब तू आइडेंटिटी लेस बन गई। अब तेरी आइडेंटिटी कहां है?”

मीरा को ये बात गुरुदेव की इतनी तो पसंद आ गई… आपको भी आ गई है ना? मेरी बात पसंद आ गई? सबको मेरी बात पसंद आ गई है। नवकारशी करके आये हो ना? के आयम्बिल हे सबको? मेरी बात पसंद आ गई है ना? उसी समय मीरा ने निश्चित किया कि मीरा केंद्र से विदा हो रही है। मीरा आइडेंटिटी लेस हो रही है और प्रभु आ रहे हैं। ‘तुम नहीं तो वो सही’ – इतना ही सूत्र है। तुम नहीं, तुम्हारे केंद्र में तुम्हारा अहंकार नहीं है, प्रभु आकर बैठ जाएंगे।

एक प्रवचन में मैं बोल रहा था। एक भावक ने पूछा कि, “गुरुदेव! बहुत बार प्रभु से प्रार्थना करी कि ‘मन मंदिर आओ रे’, लेकिन प्रभु तो आए ही नहीं।” मैं बिल्कुल रिलैक्स मूड (Relaxed mood) में था। तो मैंने कहा, “प्रभु तो आए थे, लेकिन लौट चले।” तो उसने पूछा, “ऐसे कैसे हुआ?” तो मैंने कहा, “सिंहासन एक था और सिंहासन पर तू चढ़कर बैठ गया था। अब प्रभु आकर कहां बैठेंगे? तुमने सिंहासन खाली कर दिया, प्रभु वहां आकर बैठ गए। इतनी ही छोटी बात है। इतनी ही छोटी बात है!” 

कबीर जी ने कहा:

“पहले हम थे प्रभु नहीं, अब प्रभु है हम नाहिं।”

मेरे केंद्र में मेरा अहंकार था। मेरा अहंकार था, प्रभु कैसे आएंगे? पहले हम थे प्रभु नहीं, अब प्रभु है हम नाहिं। क्यों? ऐसा क्यों?

“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।”

प्रेम की गली, भक्ति की गली सांकड़ी गली है, उसमें दो का समावेश शक्य नहीं है। या तो तुम रहो, या तो प्रभु रहें। और आज आप निश्चित कर लें, किसको रहना है? हम तो एवर फ्रेश (Ever fresh), एवर ग्रीन (Ever green) हैं क्योंकि प्रभु आ गए। अब पूरी केयर (Care) हमारी प्रभु कर रहे हैं। हमें कुछ भी करना नहीं है। मेरा एक लोगो (Logo) है: ‘I have not to do anything absolutely. He has to do’। मुझे कुछ भी नहीं करना है।

सुरत में गत वर्ष चातुर्मास प्रवेश था। उस दिन मैंने कहा था कि सुरत तो बहुत बार आने का हुआ है, चातुर्मास भी हुए हैं पहले। लेकिन इस चातुर्मास में न तो मुझे वाचना देनी है, न मुझे प्रवचन देने हैं। सिर्फ प्रभु का प्रेम जो मैंने एंजॉय (Enjoy) किया है, वो प्रेम आपको देना है। पुणे में भी मुझे यही काम करना है। वाचना प्रभु देंगे, प्रवचन प्रभु देंगे। मेरा काम क्या? आप सबको प्रेम देना। मेरा यह जन्म तो बहुत ही सार्थक हो गया।

अचानक एक दिन प्रभु के प्रेम की वर्षा चालू हुई। चालू ही थी, लेकिन मैं एंजॉय नहीं कर पा रहा था। उस दिन प्रभु का प्रेम इतना घना बरसा, कहते हैं छप्पर फाड़ कर बरसा! ऐसा बरसा कि मैं प्रभु के प्यार में बह गया। पहले तो मैं स्तब्ध हो गया कि क्या ऐसा भी प्रेम हो सकता है? तब वीतराग स्तोत्र मैंने पढ़ा:

“त्वमकारणवत्सलः”

प्रभु को एक ही बात पसंद आती है, प्रेम बरसाना। प्रभु का स्वभाव है प्रेम बरसाने का। रोज हम मंदिर जाते हैं, इसीलिए जाते हैं कि प्रभु का प्रेम जो बरस रहा है, उस प्रेम को हम झेलें। हम एंजॉय (Enjoy) करें। एक प्रभु का प्रेम झेल लिया आपने, एंजॉय कर लिया आपने; आपका हृदय निर्मल-निर्मल हो जाएगा। मेरे देखे इस जन्म में हमारा लक्ष्य यही है कि हम हमारे हृदय को निर्मल बनाएं। निमित्तवासी हम हैं। क्रोध कभी आ भी जाएगा। लेकिन हमारी जागृति ऐसी होगी; क्रोध आया, गया! Touch and go!

एक बार मैंने एक प्रवचन सभा में पूछा था कि क्रोध क्यों आता है? अब सबके जीवन की ये बात है। क्रोध क्यों आता है? एक भाई मेरे सामने बैठे थे। उन्होंने कहा, “साहब जी, निमित्त मिल जाते हैं और क्रोध फूट उठता है।” मैंने सामने से पूछा कि हर निमित्त का असर होता है? आपको तो मालूम है सब। मैंने पूछा था उस भाई से कि, “आपका आठ साल का बेटा है, पेट में दर्द हुआ, निष्णात डॉक्टर को दिखाया। उसने कहा अपेंडिक्स (Appendix) है, इमीडिएट (Immediate) ऑपरेशन करना पड़ेगा। दो-तीन डॉक्टरों का अभिप्राय लिया। सबने कहा ऑपरेशन जरूरी है। अब हॉस्पिटल में बच्चे को एडमिट (Admit) करा लिया। एक सुबह ऑपरेशन थिएटर में बच्चे को ले गए कर्मचारी। ऑपरेशन सक्सेसफुली (Successfully) हो गया और बच्चे को स्पेशल रूम (Special room) में छोड़कर कर्मचारी गए।”

“एनेस्थीसिया (Anesthesia) का असर कम हुआ। बच्चे को प्यास लगी। तो बच्चे ने कहा, ‘पापा, मुझे प्यास लगी है। पानी दो।’ पापा को पता नहीं कि अभी पानी दे सकते हैं या नहीं दे सकते, ऑपरेशन अभी हुआ है। तो वो भाई तो गए डॉक्टर के पास, बड़े डॉक्टर के चेंबर में। ‘साहब, आपने अभी-अभी मेरे बच्चे का ऑपरेशन किया अपेंडिक्स का, उसे प्यास लगी है तो पानी दे सकते हैं कि नहीं?’ डॉक्टर बड़ा क्रोधी स्वभाव का। 

बहुत लोग कहते हैं ना, मेरा स्वभाव क्रोधी है। आपको पूछूं, आपका स्वभाव क्रोधी है?” “एक शिष्य गुरु के पास गया और गुरुदेव से कहा कि, ‘गुरुदेव क्या करूं? मेरा स्वभाव ही क्रोधमय है।’ तब गुरु ने कहा, ‘अच्छा, मैं वन-टू-थ्री (One, Two, Three) बोलता हूँ। जब थ्री बोलूं तब क्रोध से फूट उठना।’ तो शिष्य ने कहा, ‘ऐसे तो क्रोध कैसे आएगा?’ अरे! तू कहता है तेरा स्वभाव है। तो स्वभाव को ढूंढने के लिए जाना पड़ता है? स्वभाव तो तैयार होता है!”

“तो डॉक्टर क्रोधी… जब भाई ने पूछा कि पानी दे सकते हैं कि नहीं, आगबबूला हो गए डॉक्टर! ‘मुझे पूछने के लिए आए हो? मेरे जूनियर डॉक्टर्स (Junior doctors) पेट चीर डालते हैं, फिर मैं ऑपरेशन थिएटर में जाता हूँ। और तू मुझे पूछने के लिए आया है कि पानी दे सकते हैं कि नहीं दे सकते? कोई नर्स नहीं है कॉरिडोर में? कोई जूनियर डॉक्टर नहीं है? पूछ लो उससे। मुझे क्यों पूछने आए?'”

“हां या ना कहा होता एक अक्षर में? आपको तो ऐसा होता ही नहीं ! घर में तो ऐसा ही होता है ना? श्राविका जी कहती हैं तो? हा या ना ? क्या कहेंगे? एकाक्षरी जवाब! तो मैंने कहा उस भाई से कि निमित्त मिला, डॉक्टर बहुत गुस्से हो गया। फिर भी तुम गुस्से न हुए, क्यों? तो उस आदमी ने कहा, ‘महाराज साहब, मेरे बच्चे का भविष्य डॉक्टर के हाथ में है ना! तो मैं गुस्से हो जाऊं और डॉक्टर दूसरा कुछ कर दे, और मेरे बच्चे का भविष्य खत्म हो जाए तो?'”

तो जब लगे कि अपना स्वार्थ जोखिम में है, तो हम क्रोध पर नियंत्रण कर सकते हैं। ठीक है बात? पहला लेसन (Lesson) आज का बराबर है? अब आप क्रोध करेंगे, दूसरा नुकसान होएगा या नहीं होगा, लेकिन दुर्गति का पाप तो आप बांध लोगे। शायद नरक गति में भी आपको जाना पड़े। तो ये कितना बड़ा निमित्त है! तो निमित्त है, फिर भी आपको लगे कि मेरा नुकसान है तो आप नहीं करेंगे। तो क्रोध से दुर्गति होती है, क्रोध से ही नरक में जाना पड़ता है। तो प्रभु की आज्ञा है, प्रेम से रहो। आज का पहला सूत्र — प्रेम से रहो।

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