Kumarpal Maharaja Ni Prarthna | 26-06-2026 | Pune

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साधना का आनंद


परमार्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा था कि, “प्रभु! तेरी आज्ञा का पालन मुझे प्राप्त हो और तेरी आज्ञा के पालन के समय जो दिव्य आनंद की अनुभूति होती है, वो भी मुझे प्राप्त हो।”

प्रभु से सिर्फ मांगना है। प्रभु से प्रार्थना सिर्फ करनी है। जब प्रार्थना अंतःस्तर से होती है, तब On that very moment प्रार्थना activate होती है। कुमारपाल महाराजा ने प्रभु से साधना मांगी, साधना मिल गई। साधना का आनंद मांगा, मिल गया। अपन भी यही प्रार्थना करें।

आप पूजा करते हैं, लेकिन पूजा के समय जो आनंद चाहिए वो आनंद आता है? श्रीपाल रास में एक बड़ी अच्छी घटना आती है। मयणासुंदरी पूजा करके, चैत्यवंदन करके घर पर लौटती है। घर पर जाकर मां ने पूछा कि कैसी रही पूजा? तब मयणासुंदरी कहती है कि, “मां! पूजा में इतना भाव आया, इतना भाव आया कि मैं शब्दों में इसकी बात नहीं कर सकती हूँ।”

कभी-कभी ऐसा आनंद आता है जो beyond the words, beyond the expectation होता है। हमें कल्पना भी नहीं होती कि ऐसा आनंद साधना में मिल सकता है!

मयणासुंदरी कहती है कि, “मां! आज पूजा में इतना भाव आया कि प्रभु के स्पर्श को एक घंटा बीत चुका है, लेकिन मेरा एक भी रोयां बैठने का नाम नहीं लेता। रोम-रोम विकसित है मेरा। प्रभु के स्पर्श को एक घंटा बीत गया है, और फिर भी सब रोयें खड़े हैं! प्रभु का स्पर्श मिल गया!”

ये जो साधना का आनंद है, ये आनंद हमें चाहिए।

हमारा पालिताणा में चातुर्मास था, गुरुदेव अरविंदसूरीदादा के सानिध्य में। उस समय गुरुदेव कलापूर्णसूरीदादा का चातुर्मास भी पालिताणा में था। पर्युषण के बाद मध्यप्रदेश से दादा का भक्त एक युगल (पति-पत्नी) दादा के दर्शन हेतु आए। तब दादा ने कहा कि, “हर साल तुम दर्शन के लिए आते हो, लेकिन उस समय तो मैं अकेला आचार्य होता हूं। पालिताणा में सैकड़ों आचार्य भगवंत हैं, तुम सबका दर्शन कर लेना।” और गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य करके वे पति-पत्नी सब जगह पर वंदन के लिए निकले।

हम वावपंथक धर्मशाला में थे। वहां भी वे आए। बड़े गुरुदेव को वंदन किया। फिर मेरी चेंबर में श्राविका जी पहले आ गए। मैं तो उनको पहचानता भी नहीं था, लेकिन श्राविका जी ने कहा कि, “गुरुदेव! अभी-अभी मेरे श्रावक जी आएंगे। मैं आपको इशारा करके कहूंगी कि ये मेरे पतिदेव हैं। मेरे पतिदेव को कलापूर्णसूरीदादा का इतना तो सम्मोहन है, दादा पर पतिदेव की इतनी तो भक्ति है कि दादा का नाम कोई लेता है तब उनके रोंमटे खड़े हो जाते हैं।”

मैं भी आश्चर्यचकित हो गया कि गुरु के नाम को सुनकर ये अवस्था! तब मैंने सोचा कि शास्त्रों में तो यह बात सुनी है, पढ़ी है, लेकिन नजरों से नहीं देखी है। आज नजरों से देखनी है।

तभी श्रावक जी मेरी चेंबर में आए और श्राविका ने इशारा किया, ‘यही मेरे पतिदेव।’ श्रावक जी ने वंदन किया। तब मैंने श्रावक जी से कहा कि, “हमारा इस चातुर्मास तो बड़ा ही भाग्य का प्रतीक हो गया। हम सुबह तलहटी जाते हैं और गुरुदेव कलापूर्णसूरी दादा तलहटी दर्शन करके लौटते हैं तो रास्ते में ही हमेशा दादा का दर्शन हो जाता है। और फिर दादा की वाचना में जाते हैं और दादा को पीते हैं हम।”

जैसे ही मैंने कलापूर्णसूरी दादा का नाम लिया, इतना शर्ट पहन करके भी आए थे, इतना हाथ खुला था, मैंने देखा एक-एक रोयां खड़ा हो उठा। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे… “दादा! दादा तो मेरे गुरुदेव हैं। अरे गुरुदेव क्या कहूं? मेरे प्राणाधार, मेरे जीवन दादा हैं।”

ये गुरु भक्ति, ये प्रभु भक्ति आपके पास है। और इसीलिए कहता हूं कि प्रभु के पास सिर्फ मांगो कि, “प्रभु! तूने साधना दी, अब साधना का आनंद भी तुझे देना है। मैं कहां से ले पाऊंगा? और मैं कहां लेने जाऊंगा भी? तू देने वाला है तो मैं दूसरी जगह जाने वाला हूं भी नहीं। तुझे ही देना है।” तो प्रभु ने साधना दी है, साधना का आनंद भी प्रभु देंगे। हमारे पास क्या है? हमारे पास यही तो है, साधना का आनंद। हम ever green, ever fresh हैं। क्यों? प्रभु की साधना मिल गई।

सुबह ये रजोहरण को हाथ में लेकर सिर पर लगाते हैं, तब हमारा भी रोयां-रोयां खिल उठता है कि हमारी कोई सज्जता नहीं, हमारी कोई पात्रता नहीं, और प्रभु का ये वरदान हमें मिल गया! आप तिलक करते हैं, उस समय आपका भी रोयां-रोयां खिल जाना चाहिए। तिलक का अर्थ क्या है? “प्रभु! तेरी आज्ञा को मैं शिरोधार्य करता हूं। प्रभु! तेरी आज्ञा मुझे मिल गई?! अब तेरी आज्ञा का आनंद भी मुझे दे दे।”

अभी-अभी एक घटना हुई थी। ऐसी घटना कि जिसमें एक साधक को सिर्फ साधना का आनंद चाहिए था और साधना के आनंद के लिए वो सब कुछ त्यागने के लिए भी, छोड़ने के लिए भी तैयार था। मुंबई की घटना है। एक युवा डायमंड के बिजनेस में पार्टनरशिप में काम करता था। पार्टनर भी जैन था और दोनों अच्छी तरह से कारोबार चलाते थे। करोड़ों का कारोबार था, अच्छी तरह से चलता था।

एक दिन क्या हुआ कि युवा का जो पार्टनर था, उसकी बुद्धि बिगड़ी। चाबी तो दोनों के पास ऑफिस की थी। तो पार्टनर ने रात में ऑफिस खोली और रात में जाकर अपने भाग के पैसे, डायमंड तो ले लिए, युवान के हिस्से के ४० लाख का डायमंड भी ले लिया। अपने भाग का सब कुछ और युवान का ४० लाख का डायमंड ले लिया, और रात को भाग चला।

सुबह युवान ऑफिस में आया। रोज का नियम था, पहले युवान आता था, फिर वो पार्टनर आता था। तो युवान ने ऑफिस खोला। जैसे ही तिजोरी खोली, मालूम हो गया, चोरी हो गई। पता चल गया कि चोर आया नहीं है, पार्टनर ने ही चोरी की है। सीसीटीवी से मालूम भी हो गया। अब फोन लगाया पार्टनर को, लेकिन फोन ऑफ आए।

ऑफिस बंद करके पार्टनर के घर पर पहुंचे। पूछने के लिए कि, “भैया, ये क्या गड़बड़ी है? तुम्हारे पैसे तो ले गए, मेरे हिस्से के ४० लाख का डायमंड तुम ले गए हो।” लेकिन घर पर वो है नहीं। घर वालों ने कह दिया कि रात को ही गए हैं, फिर आए ही नहीं हैं।

१५ दिन तक वो लापता रहा पार्टनर। १६वें दिन आकर बैठ गया और दूसरी जगह कारोबार शुरू कर दिया। युवान ने अपनी ऑफिस चालू रखी। जब मालूम हुआ कि पार्टनर आ गया है, तो घर पर पहुंचा कि, “बोलो भैया, क्या बात है? ये क्या गड़बड़ी तुमने की?” तो वो तो नामुकर (मुकर) गया। “क्या गड़बड़ की है? मैंने मेरे हिस्से का पैसा लिया है।” “नहीं, तुम्हारे हिस्से का नहीं, मेरे हिस्से के ४० लाख का डायमंड तुमने ले लिया।” तो उसने कहा, “चलो ले लिया है, तुम क्या करोगे?” ब्लैक का कारोबार है, कोर्ट में तो जाया नहीं जा सकता।

युवान ने बहुत ही प्रेम से कहा कि, “तुम दे दो, तुम ऐसा क्यों करते हो? एक-दो लाख होता तो ठीक बात थी, मैं भी छोड़ देता। ये ४० लाख की बात है, मैं कैसे छोडूं? तुम्हें देना ही पड़ेगा।” उसने कहा, “आज भी नहीं और कल भी नहीं, मैं नहीं दूंगा।”

अब ये बात तो वहां हो गई। समस्या अब ये हुई कि दोनों जैन थे। दोनों प्रभु की पूजा करते थे और दोनों एक एरिया में रहते थे। मंदिर एक ही लगता था। और मुंबई, ९-१० बजे तो ऑफिस जाना ही पड़े। ८:०० बजे पूजा के लिए आने का। ८:०० बजे युवान आता है और पार्टनर भी आता है। या तो पहले पार्टनर आता है पूजा के लिए और फिर युवान आता है। तो मंदिर में दोनों इकट्ठे हो जाते हैं। और ये पार्टनर लंबी-चौड़ी कार लेकर आता है और बड़ी पूजा की पेटी। युवान के मन में इतना क्रोध उभरता है, “साला! मेरे पैसे तो देने नहीं हैं और प्रभु को ठगने के लिए आया है!”

एक दिन, दो दिन, चार दिन, पांच दिन… पूजा बिगड़ गई। युवान की पूजा बिगड़ गई। तो युवान ने सोचा कि, “में दूसरी कोई आराधना तो करता नहीं हूं, न प्रतिक्रमण, न सामायिक। एक ही पूजा मैं करता हूं। और पूजा के समय पूजा का भाव तो आता नहीं, क्रोध का भाव आता है उसको देखकर, तो मेरी पूजा बिगड़ जाती है। तो ये तो अच्छा नहीं है, पूजा का आनंद मुझे मिलना ही चाहिए।”

उस समय आचार्य रत्नसुंदरसूरीजी का इस संघ में आगमन हुआ। आचार्य श्री का प्रवचन सुना। एक संडे को युवान आचार्य श्री को वंदन करने हेतु गया और पूछा कि, “गुरुदेव! मैं सिर्फ प्रभु की पूजा करता हूं, लेकिन इस कारण से मेरी पूजा क्रोध में कन्वर्ट हो जाती है। तो एक ही तो पूजा मैं करता हूं, और पूजा में भी कोई दम नहीं। तो गुरुदेव! मेरी पूजा पूर्ववत अच्छी हो इसलिए मैं क्या करूं?”

गुरुदेव ने पूछा कि, “अभी तुम्हारी आर्थिक स्थिति कैसी है?” उसने कहा, “बहुत अच्छी। इस पॉश एरिया में लग्जूरियस अपार्टमेंट में रहता हूं। जोड़ी अपार्टमेंट है, जोड़ी फ्लैट और एक नहीं दो कार हैं। बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल में भेजकर शिक्षा देता हूं और करोड़ों का कारोबार चलता है। ऑफिस अच्छी चलती है।”

तो गुरुदेव ने कहा कि, “तेरी पूजा सुंदर हो जाए, तू ४० लाख छोड़ सकता है, बोल? तेरी पूजा मैं सुंदर कर दूं, तू ४० लाख को छोड़ सकता है?”

युवान ने एक सेकंड नहीं विचारा। उसने कह दिया, “हां गुरुदेव! मैं तैयार हूं।” तो गुरुदेव ने कहा कि, “आज नियम ले ले कि वो देने के लिए आए, तुझे मांगना तो नहीं है, वो देने के लिए आए, तो भी ४० लाख में से एक पैसा भी तेरा नहीं। चालीस के चालीस लाख चैरिटी में खर्च डालने के। मैं जहां कहूं वहां खर्च डालने के। ४० लाख तेरे नहीं।” गुरुदेव ने हंसते-हंसते कहा, “मेरे हो गए अब।” ऐसे भी तुम्हारे पैसे हमारे ही होते हैं, तुम्हारे तो हैं ही नहीं।”

तुम तो प्रभु से क्या कहते हो? “मैं प्रभु तेरा… तू प्रभु मेरा।” प्रभु का तो वचन है, प्रॉमिस।। प्रभु तुम्हारे हैं। लेकिन तुम प्रभु के हो? बोलो? प्रभु के नही हो ना? कुमारपाल राजा को क्या विशेषण मिला था? ‘परमार्हत’ कि जो प्रभु का ही है, संसार का नहीं है। सिर्फ प्रभु का ही है। जिसका मन प्रभु में ही लग गया, वो परमार्हत है। आप रहते हैं संसार में, लेकिन आपका मन कहां है? शरीर संसार में, शरीर ऑफिस में, शरीर घर में, मन कहां? उपाश्रय में! बोलो? मन कहां? मन प्रभु को दे देना है।

भगवत गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि, “तू तेरा मन मुझे दे दे।” अर्जुन बड़ा चालाक है। अर्जुन पूछता है कि, “मैं आपको मन दे दूं तो मुझे क्या मिलेगा?” उस समय श्री कृष्ण ने वचन दिया है:

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ 

“अर्जुन! तू जो तेरा मन मुझे दे देता है तो तू मुझ में है। तू तुझ में नहीं, तू मुझ में है। तू मेरा हो गया।”

तो आपके लिए डिस्काउंट! हम तो शरीर से ही प्रभु के, मन से भी प्रभु के। आपके लिए डिस्काउंट! कितना बड़ा डिस्काउंट, बोलो तो? मन से आयंबिल करना, बोलो कितना बड़ा डिस्काउंट हुआ? सुबह चाय-नाश्ता करो, दोपहर भोजन करो, शाम डिनर लो और तो भी आयंबिल! कैसे? मन से, भाव से। आयंबिल वालों की तुम भक्ति करो, एक कूपन ले लो तो क्या हुआ? भाव से आयंबिल हो गया। भाव से आयंबिल वालों की भक्ति हो गई। तो कितना बड़ा डिस्काउंट मिल गया! तीन समय खाओ, चार समय खाओ, पांच समय खाओ और आयंबिल!

ऐसा ही डिस्काउंट यहां है। कि शरीर संसार में, मन प्रभु में। शरीर ऑफिस में, मन प्रभु में। आप ऑफिस जाएंगे तो पहले क्या करेंगे? प्रभु के सामने धूप-दीप करेंगे, फोटो के सामने। फिर गुरु महाराज हैं तो उनके फोटो के सामने धूप-दीप करेंगे। प्रभु को धूप-दीप क्यों करेंगे? उस समय प्रभु को कहना कि, “प्रभु! ये दुकान में आप बैठे हो। ये ऑफिस में आप विराजमान हो। और आप जहां विराजमान हो वहां इम्मोरैलिटी, अनीति हो नहीं सकती। इसीलिए शायद लोभवश अनीति का भाव मेरे मन में आ जाए तो भी आप मेरी रक्षा करना।”

और गुरुदेव की फोटो की पूजा करते हो, क्यों? हमारे गुरुदेव कैसे होते थे? वोहराने (गोचरी के) लिए जाते, मासक्षमण का पारणा होता और वोहरने के लिए जाते। निर्दोष गोचरी मिलती तो कहते थे कि, “चलो संयम वृद्धि हुई,” पारणा करते थे लेकिन शरीर के लिए नहीं, संयम के लिए। संयम योग अच्छे रूप से चले इसलिए। और निर्दोष गोचरी नहीं मिली, ३१वें दिन पर उपवास किया तो क्या कहते थे? “चलो तपोवृद्धि हुई।”

तो आप भी ऐसे गुरु को वंदन करके मन में क्या सोचेंगे? “आज मिल गया तो पुण्य वृद्धि हुई।” ठीक है? क्योंकि मिला वो तो आपका नहीं, चैरिटी में जाएगा। अरे थोड़ा तो जाएगा ना, कितना? वन परसेंट (१%)। एक बात मैं आपसे कहूं, आप आज से ही निश्चित करो कि वन परसेंट चैरिटी में देना है। और फिर आप देखो, ये जो वन परसेंट है ना, वो ९९% को विस्तृत कर देगा। अब सालाना जितना कमाते थे, उससे दुगुनी, तिगुनी, चौगुनी आय हो जाएगी १% देने से। तो मिला, संपत्ति मिली तो आप कहेंगे पुण्य की वृद्धि हुई। और नहीं मिली, आज इनकम नहीं हुई तो क्या कहेंगे? “चलो लोभ की वृद्धि नहीं होगी, संतोष की वृद्धि हुई।” मिले तो भी लाभ, न मिले तो भी लाभ!

अब युवान ने निश्चित कर लिया कि ४० लाख आज से मेरे नहीं। अब दूसरे दिन क्या हुआ चमत्कार? युवान आया था मंदिर में, और तभी पार्टनर आया। बड़ी चौड़ी गाड़ी लेकर गया। जैसे ही गाड़ी से उतरा, युवान वहां गया सामने। उसका हाथ पकड़ा, “प्रणाम! जय जिनेंद्र! कैसे हो? साता में हो? कुछ कामकाज हो तो कहना।” तो वो पार्टनर तो आश्चर्यचकित हो गया! “इसके ४० लाख मैंने दबाए हैं और ये मुझे सुख-साता पूछता है!”

एक दिन, दो दिन, तीन दिन… क्या हुआ? ४० लाख मेरे नहीं हैं, अब मिले तो भी नहीं चाहिए। और मिले तो भी मेरे तो हैं ही नहीं, चैरिटी में वापरने हैं। ४० लाख का भूत निकल गया तो क्रोध भी निकल गया। और पूजा बहुत सुंदर हो गई। फिर तो रोज पार्टनर मिले। रोज शेक-हैंड, “कैसे हो? आनंद में हो, मजा में हो? भाभीसा कैसी हैं?” वो तो पूछना ही पड़ता है!

हफ्ता हुआ, शनिवार का दिन था। पार्टनर ऐसा पिघल गया, ऐसा पिघल गया! जब वो युवान आया और प्रणाम किया, तब पार्टनर ने हाथ पकड़ लिए युवान के और कहा, “कल संडे है, कल दोपहर को घर पर आओ चाय-नाश्ते के लिए और हम हिसाब भी कर लें।” सामने से कहता है! तब युवान कहते हैं, “अब मुझे चाहिए ही नहीं। और मैंने नियम लिया है, मिल जाए तो भी मेरे नहीं हैं, चैरिटी में वापरने हैं।”

संडे को वो युवान उसके घर पर गया, चाय-नाश्ता हुआ। ४० लाख और ब्याज, सब पैसे बैग में इकट्ठे किए हुए थे। अटैची दे दी। “ये अटैची, ४२ लाख इसमें हैं, आप ले लो।” और युवान उस बैग को लेकर सीधा गुरुदेव के पास गया और गुरुदेव के चरणों में बैग सुपुर्द कर दी। “गुरुदेव! ये ४२ लाख आपको ठीक लगे वहां चैरिटी में यूज करो।”

गुरुदेव ने कहा, “ये तो हंसने की बात थी कि मेरे पैसे हो गए। हम तो अनगार हैं। तुम ही वापरो (उपयोग करो), लेकिन मैं सूचना दूं, १० लाख आयंबिल शाला में, १० लाख यहां उपाश्रय में और २० लाख साधर्मिक भक्ति में, ऐसा तुम यूज कर लो। और दो लाख जो हैं वो अनुकंपा में वापर लो। ४२ लाख का हिसाब तुम्हारा पूरा।”

तो ये क्या था? ४० लाख रुपये छोड़ने के लिए युवा तैयार हो गया। क्यों? बात ये कही थी कि साधना का आनंद मुझे मिलना चाहिए।

आपके घर पर हमारे मुनिराज वोहराने के लिए आते हैं। मैं मुनियों से पूछता हूं और वे कहते हैं, “साहब! इतना भाव है लोगों का, इतना भाव है कि हमारी आंखें वोहराने के समय पर नम हो जाती हैं। ये माताएं, ये बहनें, कितना भाव है! बस यही बात, महाराज साहब लो, महाराज साहब वोहरो।”

महाबोधि सूरीजी ने एक प्रसंग अपनी किताब में लिखा है। उस समय वे मुनि थे। एक दिन वोहराने के लिए गए। एक घर पर गए, धर्मलाभ दिया। श्राविका जी बाहर गई हुई थीं, श्रावक जी घर में थे। १२ बज गए थे लेकिन रसोई नहीं हुई थी। लेकिन जैसे ही धर्मलाभ की आवाज सुनी, श्रावकजी नाचने लगे। “महाराज साहब! मेरे घर पर… साहब पधारो, पधारो, पधारो!” अब रसोई तो थी नहीं, लेकिन श्रावक का घर था, खाखरे, घी, नाश्ता, ये तो सब होता ही है। लेकिन खाखरे का डिब्बा कहां? रसोई घर से इतना नाता तो है नहीं श्रावक का, ऑफिस से नाता है।

लेकिन महाबोधि मुनिराज को तो रसोईघर का संबंध होता है। तो महाराज साहब ने कहा, “वो कोने में डिब्बा पड़ा है ना, उसमें खाखरे हैं।” उसने वो डिब्बा लिया, खोला, खाखरे थे! “महाराज साहब तो बड़े ज्ञानी हैं!” अब खाखरे तो आ गए, लेकिन रूखे खाखरे तो कैसे वोहराएं? घी तो चाहिए। घी का डिब्बा कहां? वो ढूंढता है लेकिन मिलता नहीं। तो महाबोधि विजय (मुनिराज) ने कहा, “घी चाहिए ना? वो जो दूसरे कोने में देख, वो डिब्बा जो है, उसमें घी है।”

वो डिब्बा लाया, उसमें घी था लेकिन सियाला (सर्दियों का मौसम) था तो घी जम गया था। अब घी हाथ में लिया और खाखरे पर चुपड़ने लगा। पतले खाखरे, जोर से चुपड़ने जाए और वो टूट जाएं।

तब श्रावक जी ने कहा… भक्ति थी। गुरुदेव ने कहा कि, “भैया, दो खाखरे और घी थोड़ा गूंद दो, ये चुपड़ने की कोई बात नहीं है।” “नहीं नहीं महाराज साहब! ऐसे तो कैसे वोहराऊं?”

फिर श्रावक जी ने कहा, “महाराज साहब! आपने बहुत उपकार किया। खाखरे का डिब्बा आपकी वजह से मिल गया, घी का डिब्बा भी आपकी वजह से मिल गया। अब एक और काम कर दो। लेकिन ये भक्ति है। इसमें दूसरी कोई बात नहीं।

तो आपकी एक-एक क्रिया में हम भक्ति देखते हैं। मैं तो आपकी आंखों में परमात्मा को देखने वाला हूं। रहीम की एक पंक्ति को मैं बार-बार दोहराता हूं:

“प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छबि कहां समाए।”

प्रियतम की छबि, वो प्यारे शांतिनाथ प्रभु की छबि, चिंतामणि पार्श्वनाथ या गोड़ी पार्श्वनाथ दादा की छबि आंखों में, हृदय में बस गई। फिर उन आंखों में, उस हृदय में दूसरा कुछ बसेगा ही नहीं! आपकी आंखों में है परमात्मा, आपकी आंखों में है अहोभाव, आपकी आंखों में है श्रद्धा, आपकी आंखों में है समर्पण, आपकी आंखों में है भक्ति। और इसी श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के जरिए हमें साधना का आनंद प्राप्त करना है।

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