Kumarpal Maharaja Ni Prarthna | 21-06-2026 | Pune

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सद्गुरुयोग

सुहगुरुजोगो. हम प्रभु के पास सद्गुरु नहीं मांगते हैं; सद्गुरु के चरणोंमें हमारा समर्पण हो, ऐसा मांगते हैं। क्यों? क्योंकि हमारी अतीत की यात्रा में कितने ही सद्गुरु मिले लेकिन हम उनको समर्पित न हो सके, इसलिए वे हम पर कुछ काम नहीं कर पाए। जिस क्षण हम समर्पित हो जाएँ, सद्गुरु का कार्य शुरू भी और पूरा भी!

सद्गुरु face reading के मास्टर हैं। आपके चेहरे को देखकर आपकी जन्मांतरीय साधना का stand point सद्गुरु को ख्याल आ जाता है। और फिर इस जन्म में आखिरी छोर तक आपको कहां तक पहुंचाना है, यह भी सद्गुरु निश्चित कर लेते हैं।

सद्गुरु हम पर चार कार्य करते हैं। हमारे लिए appropriate साधना कौन सी है, यह निश्चित करते हैं। वह साधना कैसे घोटनी है यह हमें समझाते हैं। साधना के लिए appropriate atmosphere भी देते हैं और साधना में अवरोध आएँ, तो सद्गुरु उन अवरोधों को भी हटाते हैं।


परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा के सम्मुख प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! मेरी दूसरी कोई इच्छा नहीं है, एक ही इच्छा है कि तेरी आज्ञा का पालन जैसे-जैसे मैं करता जाऊं, मेरा आनंद घना होता जाए। इतना तो आनंद घना हो जाए कि मैं उस आनंद के क्षणों में नाचने लगूं, थिरकने लगूं।”

आज्ञा पालन का आनंद! आज्ञा का पालन हमारे पास भी है, आपके पास भी है। लेकिन अब चाहिए आज्ञा पालन का आनंद! हमारे युग के श्रेष्ठ साधक ऋषभदास जी ने कहा था कि, “एक खमासमण मैं देता हूँ प्रभु के चरणों में, और इतना तो आनंद हृदय में पैदा होता है कि समस्या होती है कि हृदय का छोटा सा तंत्र इस आनंद को झेल पाएगा या नहीं झेल पाएगा! इतना आनंद एक खमासमण देने में!”

एक घटना मुझे याद आती है। शंखेश्वर के पास एक गांव तेरवाड़ा, एक बहन की दीक्षा में हमें वहां जाने का हुआ। वहां एक मुस्लिम युवान था। वह मेरे पास आया और उस युवान ने कहा कि, “गुरुदेव! मुझे जैनोलॉजी का अध्ययन करना है। आप मुझे अध्ययन कराएंगे?”

मैंने कहा, “जरूर।”

वह रोज मेरे पास आता था। मैं जैन धर्म की, अपने धर्म की बारीकियों के बारे में उसको समझाता रहा। ऐसे में दीक्षा का दिन आ गया। तो उस मुस्लिम युवान ने मुझे पूछा कि, “क्या मैं दीक्षा देखने के लिए आ सकता हूँ? मैं जैन नहीं हूँ, हिंदू भी नहीं हूँ, मुस्लिम हूँ। तो क्या मैं भी दीक्षा की इस पवित्र विधि को देख सकता हूँ?”

मैंने कहा, “जरूर तुम आओ।” 

वह आया, भावपूर्वक उसने सब क्रियाएं देखीं। दोपहर को वह मेरे पास आया अध्ययन के लिए, और उस समय सबसे पहले उस युवान ने मुझसे पूछा कि, “गुरुदेव! जब उस बहन को गुरुदेव ने ये रजोहरण समर्पित किया, तब बहन नाच उठी, तो नाचना क्या विधि थी?”

मैंने कहा, “नाचना एक विवशता थी! दो वर्षों से ये बहन गुरुदेव से प्रार्थना कर रही थी कि गुरुदेव मुझे प्रभु का वरदान दो। गुरुदेव प्रसन्न हुए। गुरुदेव को लगा कि प्रभु के वरदान को झेलने की सज्जता उस बहन के पास है। और गुरुदेव ने ये प्रभु की प्रसादी समर्पित की, तो बहन नाच उठी।”

और फिर मैंने कहा कि, “तूने तो दो पैरों से बहन को नाचते हुए देखा था। लेकिन वह बहन साढ़े तीन करोड़ रोएं से नाची! एक-एक रोयां नृत्य में सहभागी था। ऐसा एक अवसर, प्रभु की प्रसादी मिल गई! साढ़े तीन करोड़ रोयों से ये बहन नाच उठी थी, थिरक उठी थी!”

आप कब नाचेंगे? हम तो नाचते हैं। रजोहरण मिला तब भी हम नाचे थे, और आज भी हर सुबह उठते ही पहला कार्य हमारा क्या होता है? इस रजोहरण को सिर पर लगाना। और उस समय हमारी आंखें नम हो जाती हैं। हमारी आंख के आंसू प्रभु से कहते हैं कि, “प्रभु! मेरी कोई सज्जता नहीं थी, मेरी कोई पात्रता नहीं थी, और तूने ये वरदान मुझे दे दिया!” हम नाचते हैं रोज। आप कब नाचोगे? प्रभु के सामने तो नाचते हैं चामर लेकर।

तो कुमारपाल महाराजा ‘परम आर्हत’ थे। परममय अस्तित्व के धनी। जो भी व्यक्ति परमात्ममय अस्तित्व का धनी हो गया, वह Ever Fresh, Ever Green हो गया। सब चिंता प्रभु को! हम बिल्कुल निश्चिंत होते हैं। प्रभु हर क्षण हमारी care लेते हैं।

दीक्षा के बाद ऐसा एक क्षण नहीं हुआ जब प्रभु की care मुझे ना मिली हो। प्रभु की care दो रूप से मिली — बाह्य रूप से भी, अभ्यंतर रूप से भी। बाह्य रूप से आनंद ही आनंद, समाधि ही समाधि, प्रसन्नता ही प्रसन्नता! और अभ्यंतर रूप में प्रभु ने ऐसा सुरक्षाचक्र दिया कि एक क्षण भी विभाव में जाने का नहीं होता है। ऐसा सुरक्षा चक्र आप सबको मिला है। ‘करेमि भंते’ मिल गया; प्रभु का सुरक्षा चक्र मिल गया। तुम राग में जा ही नहीं सकते हो। कैसे जाओ? प्रभु के सम्मुख, सद्गुरु के मुंह से प्रतिज्ञा ली हुई है कि करेमि भंते सामाइयं… मैं समभाव में ही रहूंगा।

कैसे प्रभु की कृपा! अब सब यहां आ गए, कभी ऐसा मत कहना कि “दीक्षा की अनुमति नहीं मिलती थी, मैंने छह विगई का त्याग किया और दीक्षा मिली।” ऐसा कभी मत कहना। हम दीक्षा लेने वाले कौन हैं? प्रभु ने दीक्षा दी!

बोलो तो, तुमने दीक्षा ली कि प्रभु ने दी? बोलो? प्रभु ने तुम्हें सिलेक्ट कर लिया, फिर सद्गुरु ने रजोहरण दिया।

एक बार आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वरजी ने पूज्यपाद कलापूर्णसूरी दादा को पूछा था कि, “गुरुदेव! आप तो प्रभु की कृपा की बात सदा करते रहते हो, प्रभु के प्रेम की बात, लेकिन मेरे जीवन में प्रभु की कृपा का अनुभव मैंने नहीं किया।”

तब गुरुदेव ने पूछा रत्नसुंदरसूरीसे कि, “तुम्हारी दीक्षा कैसे हुई?”

तब रत्नसुंदरसूरीजी ने कहा कि, “मैं पहली बार आबू अचलगढ़ शिबिर में पूज्यपाद गुरुदेव भुवनभानु सूरीश्वरजी महाराज की निश्रा में गया। गुरुदेव की नजरों में मैं बस गया। गुरुदेव ने मुझे खींच लिया, मैं आ गया।”

अब गुरुदेव कहते हैं कि, “अच्छा, उस शिबिर में कितने युवान थे?”

“200 युवान थे।”

“अच्छा, 200 युवान थे तो तुम्हारे गुरुदेव की नजर तुम पर ही क्यों पड़ी? 200 युवान थे, तुम पर ही नजर क्यों गड़ी?”

और गुरुदेव ने समझाया आचार्यश्री को कि, “यही प्रभु की कृपा थी! पहले प्रभु ने तुम्हें सिलेक्ट किया और प्रभु चेतना ने गुरु चेतना को संदेश दिया कि ‘I have selected him’ और बाद में गुरु चेतना ने तुम पर काम शुरू किया।”

अब गुरुदेव पूछते हैं, “बोलो, अब अनुभव हुआ कि प्रभु की कृपा से ही, प्रभु के प्रेम से ही तुम आए हो?”

और साधना जगत में एक इंच भी तुम चले हो, एक सेंटीमीटर भी तुम चले हो, तो प्रभु की कृपा से। और इसीलिए महोपाध्याय यशोविजय जी महाराज ने कहा:

“तु गति”

“प्रभु साधना मार्ग में मेरी गति तु!”

प्रभु सद्गुरु को आपके पास भेजते है, और आप सद्गुरु को, प्रभु को समर्पित हो गए, फिर आपको कुछ करना नहीं है। There you have not to do anything absolutely. He has to do! सद्गुरु प्रभु देते हैं।

अपन जय वीयराय सूत्र में रोज प्रार्थना करते हैं — सुहगुरु जोगो। बहुत ही मनोवैज्ञानिक आयाम में यह प्रार्थना हुई है। हम प्रभु के पास सद्गुरु को नहीं मांगते हैं। लेकिन सद्गुरु के चरणों पर हमारा समर्पण हो, इतना हम प्रभु के पास मांगते हैं। क्यों? सद्गुरु को क्यों नहीं मांगते हैं? हमारी अतीत की यात्रा में कितने ही सद्गुरु मिले! हरिभद्राचार्य भगवंत जैसे, हीरसूरी दादा जैसे, हेमचंद्राचार्य जैसे! लेकिन गुरु थे, हम नहीं थे! अतीत की यात्रा में क्या हुआ? सद्गुरु थे लेकिन हम नहीं थे। हम समर्पित न हो सके, तो सद्गुरु हम पर कुछ काम नहीं कर सकते।

जिस क्षण हम समर्पित हो गए, सद्गुरु का कार्य शुरू और पूरा! ‘पंचसूत्र’ में भगवान हरिभद्राचार्य ने कॉल दिया है, वचन, Promise:

“आयओ गुरुबहुमाणो”

“तुम्हारे पास गुरु समर्पण है, तो गुरु तुम्हें मोक्ष देने के लिए तैयार हैं।” चाहिए मोक्ष? मोक्ष चाहिए? एक समर्पण आ गया; मोक्ष आ गया! तो अब प्रभु के पास हमने सद्गुरुयोग मांगा। “की प्रभु! मैं अकडू हूँ। मेरा अहंकार घना है। मेरे अहंकार को इतना शिथिल कर दो कि सद्गुरु के चरणों में मैं लेट जाऊं, समर्पित हो जाऊं।”

सद्गुरुयोग की मेरी व्याख्या है: 1 + 1 = 1. 1 + 1 = 2 नहीं, =1.  तुम गए, गुरु रहे, सद्गुरुयोग हो गया! बराबर है? तुम तो हो ही नहीं अब तो? तुम्हारा ‘मैं’ है, अहंकार है? सूत्र याद रखो: ‘1 + 1 = 1.’ जिस क्षण तुम गए, तुम केंद्र से विदा हो गए, प्रभु और गुरु केंद्र में आ गए। फिर मजा ही मजा, आनंद ही आनंद! तो सद्गुरु योग हो गया, फिर अपन को कुछ करना नहीं है।

सद्गुरु चार कार्य करते हैं। पहला कार्य — हमारे लिए appropriate साधना कौन सी है, वो गुरुदेव निश्चित करते हैं। आपकी जन्मांतरीय साधना क्या है, सद्गुरु देख लेंगे। सद्गुरु फेस रीडिंग के मास्टर हैं। आपके चेहरे को देखकर आपकी साधना का स्टैंड पॉइंट सद्गुरु को ख्याल आ जाता है। और फिर इस जन्म में आखिरी छोर तक आपको कहां तक पहुंचाना है, वह भी सद्गुरु निश्चित कर लेते हैं।

एक बार मैं प्रवचन में कह रहा था कि सब कुछ सद्गुरु नक्की कर लेते हैं। तुम्हारी जन्मांतरीय साधना सद्गुरु निश्चित करते हैं। जन्मांतरीय साधना में सद्गुरु तुम्हें बहाते हैं और आखिरी छोर पर ले जाते हैं। तब एक भावक ने मुझे पूछा कि, “गुरुदेव! सब कुछ गुरुदेव कर देंगे तो फिर हमें क्या करना है?” ठीक है ना? सब कुछ गुरुदेव कर देंगे तो फिर हमें क्या करना है?

तो मैंने कहा कि, “हमने एक ही काम किया। सद्गुरु की धारा चल रही थी, उस धारा में बहने का था। लेकिन हमने बुद्धि और अहंकार के पत्थर उस धारा में फेंके, और हमारी धारा रुक गई। अब बुद्धि और अहंकार को छोड़ देना है।”

झेन आश्रम में तो वे लोग तख्ती लगाते हैं: ‘No Mind Please.’ बुद्धि लेकर नहीं आना। और आप बुद्धि लेकर जाएंगे तो क्या होगा? 

संत दरिया ने एक बड़ा ही अच्छा रूपक दिया है। एक बिल्ली थी, भारत की ही रही होगी, तो बिल्ली को गुरु करने का विचार आया। अपने भारत में, अपनी हिंदू संस्कृति में गाली का एक्सट्रीम पॉइंट क्या है? ‘ये तो नगरा है।’ इसके सिर पर कोई गुरु नहीं है, तो उसकी कोई कीमत नहीं। गुरु बिना का होना, ये हमारी संस्कृति में अपराध बोध का एक्सट्रीम पॉइंट गिना जाता है।

तो बिल्ली ने सोचा कि मैं गुरु कर लूँ। अब दिक्कत ये हो गई कि बिल्ली चली गुरु को खोजने के लिए, लेकिन बुद्धि तो बिल्ली की थी! आप तो सब श्रद्धा वाले हैं। पुणे में आकर मैंने देखा, श्रद्धा ही श्रद्धा है। आपकी आंखों में सिर्फ श्रद्धा झलकती है, अहोभाव! एक प्रभु के चद्दर पर जो अहोभाव है, मुझे तो लगता है कि ये अहोभाव इस जन्म में या अगले जन्म में आपको प्रभु की चद्दर दिलाएगा ही। इतना अहोभाव आपके पास है!

लेकिन बिल्ली के पास तो बुद्धि थी। और बुद्धि लेकर चली। तालाब के किनारे आई और एक बगुले को देखा। बगुला तो ध्यान में बैठा हुआ है — ‘कब मछली आवे और पकड़ूं!’ ‘कब मछली आवे और पकड़ूं!’ अब बिल्ली की बुद्धि ने कहा कि, “गुरु हो तो ऐसा! बगुला जैसा!”

बुद्धि क्या करेगी? हमारे मार्ग में, साधना मार्ग में श्रद्धा का ही प्रयोजन है। इसलिए ‘अरिहंत चेइयाणं’ में बोलते हैं हम:

सद्धाए, मेहाए, धिईए, धारणाए।

सबसे पहले श्रद्धा! तो बुद्धि और अहंकार का काम ही नहीं है। श्रद्धा! अब ऐसा करना, जब आओ ना इस तेरापंथ भवन में प्रवचन के लिए, बुद्धि और अहंकार को बोरिया-बिस्तर में लपेट करके बाहर छोड़ देने का, नीचे छोड़ देने का। यहां श्रद्धा से भर कर आ जाने का। फिर लौटते समय क्या करेंगे? लेकर जाएंगे! लौटते समय लेकर जाएंगे। बुद्धि से हमें कोई तकलीफ नहीं। लेकिन श्रद्धा युक्त बुद्धि हो, और श्रद्धा युक्त बुद्धि को हम ‘मेधा’ कहते हैं। ‘सद्धाए मेहाए’ सद्धाए के बाद मेहाए आती है। जब हृदय में श्रद्धा घनी हो गई, और तब जो विचार शैली चलेगी, वो है मेधा।

तो आपके लिए एप्रोप्रियेट साधना कौन सी है, वो सद्गुरु निश्चित करते है। हमारे पास तो गुरुदत्त साधना होती ही है। आपके पास भी गुरुदत्त साधना होनी चाहिए। हमारे वहां तीन गुरुओं की बात आती है।

एक हैं — ‘मंत्र दीक्षा दाता गुरु’। आपने उपधान किया और जिन गुरुदेव ने आपको नमस्कार महामंत्र प्रदान किया, वे गुरुदेव आपके लिए मंत्र दीक्षा प्रदाता गुरुदेव हैं।

दूसरे एक ‘साधना दीक्षा दाता गुरुदेव’ होने चाहिए। कि आप आपकी साधना को उन गुरुदेव के पास जाकर recognize करो कि, “गुरुदेव, ऐसे मेरी साधना चल रही है, मैं ठीक हूँ?”

और तीसरे गुरुदेव होते हैं — ‘जीवन व्यापी दीक्षा के दाता गुरुदेव’। आप सबका फ्यूचर प्लानिंग तो यही है। फ्यूचर प्लानिंग तो यही है! तो तीसरे गुरु आएंगे जब आप रजोहरण का स्वीकार करेंगे तब।

तो अभी आपके पास दो सद्गुरु हैं: मंत्र दीक्षा दाता सद्गुरु और साधना दीक्षा दाता सद्गुरु। साधना दीक्षा दाता सद्गुरु ऐसे होते हैं जिनके पास आप हर वर्ष या वर्ष में दो-तीन बार जाते हैं और आपकी साधना का बायोडेटा गुरुदेव के सामने आप प्रस्तुत करते हैं। आपकी आर्थिक परिस्थिति का ब्यौरा भी आपने गुरुदेव को कहा। समझो कि एक फर्म में पार्टनरशिप  की बात आई। आप अपने गुरुदेव के पास जाएंगे और पूछेंगे कि, “गुरुदेव! ये फैक्ट्री है और इसमें पार्टनरशिप की बात चलती है, तो मैं क्या करूं?”

हैं ऐसे गुरु आपके पास?

आप तो कहेंगे, “संसार की बात गुरु को कैसे पूछेंगे?” अरे! मेरे शरीर की बात मैं डॉक्टर से कहूंगा, कहना ही पड़ता है! अब ऐसे सद्गुरु होंगे जो आपको डांटेंगे। वे कहेंगे, “तेरा पेट भर जाता है? तेरा पिटारा भर गया है, तिजोरी भर गई है, और ये कर्मदान का बिजनेस करना है तुझे? नहीं करने का!” हैं ऐसे गुरु? ऐसे गुरु चाहिए।

आपके वहां तो आपकी पत्नी भी कल्याण मित्र है! वो भी कहती है ना कि “ज्यादा मत कमाओ, जो है वो ठीक है अपने पास, थोड़ा धर्म करो। कहती है ना? फिर आप क्या कहेंगे? “एक सामायिक मेरी ओर से तू ज्यादा कर लेना।” ठीक है? अब ऐसा करना, एक सामायिक वह कर लेगी आपकी ओर से। आप ऑफिस जाते हैं, टिफिन लेकर नहीं जाने का। टिफिन मंगवाने का नहीं। श्राविका को कह देने का, “दो रोटियां मेरी ओर से तू खा लेना।” सामायिक वह कर लेती है तो चल जाता है, तो रोटियां भी वो खा लेगी! नहीं चलेगा? तो सद्गुरु के पास हम जाएंगे।

आनंदमयी मां का बड़ा नाम था हिंदू परंपरा में। एक भक्त आनंदमयी मां का बड़ा ही भक्त था। 20 साल से हर मास वह मां को नमन करने के लिए आता था। मां के पास आना शुरू हुआ, 20 साल पूरे हुए। और एक दिन वह भक्त मां के चरणों में सिसक-सिसक कर रोने लगा।

मां ने पूछा, “बेटा! क्यों रो रहा है?”

तब भक्त ने कहा, “मां! 20 साल से मैं तेरे पास आता हूँ, लेकिन कोई परिवर्तन मुझ में नहीं है।”

और फिर भक्त ने जो पूछा था, बहुत ही अच्छा था। यही भक्त का विशेषाधिकार है। भक्त ने पूछा कि, “मां! 20 साल से मैं तेरे पास आता हूँ, मुझ में परिवर्तन नहीं है। शर्मिंदा मुझे होना चाहिए या तुझे होना चाहिए?”

सद्गुरु को आप चैलेंज कर सकते हैं कि, “मैं तुम्हारे द्वार पर आता हूँ और मुझ में परिवर्तन नहीं है, तो तुम क्या कर रहे हो?” यदि तुम समर्पित हो, तो गुरु चेतना की ओर से मैं वचन देता हूँ कि सद्गुरु तुम्हारी पूरी केयर करेंगे। पूरी केयर करेंगे, मैं एक गारंटी कार्ड देता हूँ।

एक साधक मेरे पास आया, और वह साधक संपूर्णतया प्रभु की आज्ञा को समर्पित है। सद्गुरु कहें वैसा ही करने वाला है। तो मैं मेरे लेटर हेड  पर गारंटी कार्ड लिख कर देता हूँ कि, “पांच वर्ष के बाद तेरी साधना इस पड़ाव पर पहुंच जाएगी।” और मैं कहता हूँ कि इस गारंटी कार्ड को संजो करके रखना। यदि पांच वर्ष के बाद तेरे में इतना रूपांतर नहीं हुआ है, तो इस गारंटी कार्ड को लेकर मेरे पास आना, मैं जिम्मेदार हूँ।

यदि तू समर्पित है तो सद्गुरु जिम्मेदार हैं। ‘we are ready. Are you ready?’ ‘He is ever ready.’ प्रभु हमेशा के लिए तैयार हैं। we are also ready. और आपकी ओर से कह दूँ? ‘You are also ready!’ आज मैं पूछूंगा नहीं, ‘are you ready?’ ‘You are also ready!’

ठीक है? अब तैयार हैं। 

इस चातुर्मास में ऐसी ही बातें करनी हैं। सरलता से प्रभु के प्रेम की बातें, प्रभु की साधना की बातें, सद्गुरु तुम पर क्या करना चाहते हैं वे बातें खुलकर मुझे करनी हैं। तो सद्गुरु चार कार्य तुम पर करते हैं: साधना को देते हैं, साधना कैसे घोंटनी वो समझाते हैं, साधना के लिए एप्रोप्रियेट एटमॉस्फियर सद्गुरु देते हैं, और साधना में अवरोध आते हैं तो सद्गुरु अवरोधों को हटाते हैं।

सद्गुरु तैयार हैं, और पुणे वाले भी तैयार हो गए। ठीक है? आज तो Sunday है, कल Monday होगा। कल तो छुट्टी नहीं होगी, लेकिन इस समय तो सबको आ जाना है। मैं प्रवचन को क्लोज (close) करने में बिल्कुल चुस्त आदमी हूँ। 9:30 पर मेरा प्रवचन पूर्ण हो ही जाएगा। जब मेरा प्रवचन पूर्ण हो, घड़ी देखो या ना देखो, समझ लेना 9:30 हो गए।

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