विस्मयो योगभूमिकाः
विस्मय (आश्चर्य) योग का प्रवेश द्वार है; साधना का, भक्तिधारा का प्रवेश द्वार है। किसी तीर्थ के भोयरे में विराजमान विशालकाय परमात्मा को देखते ही हमें जो आश्चर्य होता है, वे आश्चर्य के क्षण भक्ति की धारा में प्रवेशने का द्वार हैं। उन क्षणोंमें कॉन्शियस माइंड छूट जाता है।
सुबह जब आप मंदिर में जाएं, तब भी आश्चर्य से भरे हुए हों… “ओहो! मेरे भगवान! आनंदघनजी जिसे दुर्लभ कहते हैं – दरिशन दुर्लभ – वैसा परमात्मा का दर्शन मुझे मिल गया; मैं कितना भाग्यशाली हूँ!” आश्चर्य के इन क्षणों में कॉन्शियस माइंड दूर हट जाएगा और आप अस्तित्व के झरोखे से प्रभु का दर्शन करेंगे।
अतीत की यात्रामें आप समवसरण में गए थे, तब प्रभु को निहारनेमें ऐसे तल्लीन हो गए कि प्रभु के शब्द आप सुन ही न पाए। पर कैसा आश्चर्य है कि प्रभु के वे शब्द आज गुरुदेव के द्वारा आपको मिल रहें हैं! आप कितने बड़भागी हो! यह आश्चर्य आपका जितना घना होगा, आनंद उतना ही घना होता जाएगा।
परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा के सम्मुख प्रार्थना करते हुए कहा था कि, “प्रभु! मेरी एक ही इच्छा है कि तेरी आज्ञा का पालन मेरे जीवन में ज्यों-ज्यों बढ़ता जाए, त्यों-त्यों आनंद का सागर बढ़ता ही जाए, बढ़ता ही जाए, बढ़ता ही जाए।”
भक्ति और साधना के क्षणों में ऐसा आनंद आता है जैसा आनंद हमने हमारे अतीत में कहीं भी अनुभूत ना किया हो। भक्ति के क्षणों में, साधना के क्षणों में हम प्रभु के साथ एकाकार हो जाते हैं। प्रभु और हम उस समय अलग नहीं रह पाते हैं। हमारी चेतना प्रभु चेतना से अभिन्न हो जाती है और तब जो आनंद छाता है, वो आनंद परम चेतना से आता है। अभी तक हमने ऐसा आनंद नहीं अनुभूत किया था। क्यों? कारण यही है कि प्रभु के पास हम गए थे, लेकिन ऐसे क्षण हमें नहीं मिले थे कि जिन क्षणों में हम प्रभु से एकाकार हो गए हों।
एक घटना मुझे याद आती है। पूज्यपाद प्रेमसूरीदादा के शिष्य यशोदेवसूरी महाराज, नमस्कार महामंत्र के श्रेष्ठ आराधक और अपने युग के बड़े ही भक्तियोगाचार्य, गुरुदेव खंभात में विराजमान थे, गुजरात में। सुबह 6:00-6:30 बजे गुरुदेव स्तंभन पार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन के लिए पधारते थे। गुरुदेव के साथ जो मुनिराज रोज जाते थे, उनको लगा कि गुरुदेव को 10 मिनट शायद हजू तैयार होने में लगेंगे, तो वे महाराज साहब पानी वोहरने के लिए गए।
और गुरुदेव तैयार हो गए। रत्नसुंदरसूरीजी उस वक्त मुनि रूप में वहां बैठे थे। उनको हुआ कि ऐसे बड़े भक्तियोगाचार्य दर्शन के लिए पधार रहे हैं, चलो आज मैं आपके साथ जाऊं। तो गुरुदेव का आसन रत्नसुंदरजीने उचक लिया और गुरुदेव चल पड़े।
मंदिर में गए। गुरुदेव तो सब कुछ भूल गए। आप भी मंदिर जाते हैं ना? पहले 10 मिनट क्या होगा? आप भी होंगे, प्रभु भी होंगे। लेकिन 11वें मिनट पर आप नहीं होंगे, सिर्फ प्रभु होंगे। ठीक है ना? ऐसा ही होता है ना? आखिर पताशा पानी में डालो तो कितने समय रह पाएगा? आखिर तो घुल ही जाएगा पानी में! आनंदघन जी ने कहा है — ‘पानी बीच पताशा।’ पताशा पानी के बीच आ गया, अब घुल ही जाएगा, विलीन ही हो जाएगा। तो 10 मिनट मंदिर में हम गए, हम भी हैं, प्रभु भी हैं। लेकिन 11वें मिनट पर… तो बात फिर से समझ लो।
पहले 10 मिनट तक आप भी हो, परमात्मा भी हैं, लेकिन दो ही हैं, तीसरा कोई भी नहीं है। शायद पांच मिनट हुए और सिर दर्द हुआ या छाती में दर्द हुआ, बाहर निकलना पड़ा। कोई पूछेगा, “सिद्धचक्र पूजन चालू हो गया, कितने भक्त आए हैं?” आप कहेंगे, “मुझे कोई पता ही नहीं! मैं तो मंदिर में गया, बस प्रभु को निहारता ही रहा, प्रभु को निहारता ही रहा। कोई था या नहीं था मुझे पता ही नहीं है।” तो 10 मिनट तक आप भी हैं, प्रभु भी हैं। 11वें मिनिट पर आप नहीं हैं, पताशा पानी में घुल गया, अब सिर्फ प्रभु हैं। आपकी चेतना प्रभु की चेतना में घुल गई।
लेकिन ये तो हमारी बात है। गुरुदेव तो बड़े ही भक्तियोगाचार्य थे। वे तो निसीहि करके मंदिर में दाखिल हुए, वे गए… गुरुदेव थे ही नहीं, प्रभु ही थे! आधे घंटे तक स्तुतियां चलीं। फिर देववंदन शुरू हुआ। स्तवन आए, गुरुदेव स्वयं स्तवन गाने लगे। रत्नसुंदरजी तो पहली बार गुरुदेव के साथ आए थे। ये तो मालूम था कि बड़े ही भक्तियोगाचार्य गुरुदेव हैं। लेकिन आखिर मंदिर में तो गुरुदेव कितना समय रहते होंगे? आधा घंटा, पौना घंटा, अरे घंटा!
एक स्तवन… दो स्तवन… तीन स्तवन… रत्नसुंदरजी ने सोचा कि गुरुदेव रोज तीन स्तवन बोलते होंगे। रत्नसुंदर जी ने मुझे कहा था कि, “साहब जी! तीसरा स्तवन जैसे ही पूरा होने लगा, मैं तैयार होकर बैठा था कि तीसरा स्तवन पूरा हो और सीधा उव्वसग्गहरं लेकर चलूं। लेकिन तीसरा स्तवन पूरा हुआ और चौथा चालू हो गया!”
उस दिन गुरुदेव ने 17 स्तवन गाए। 17! आप कितने गाते हैं? चलो आपके लिए ऐसा कोई नियम नहीं कि 17 गाना। लेकिन एक नियम आपके लिए है, क्या नियम होगा? प्रतिष्ठा महोत्सव है। तीनों समय की नवकारसी पांडाल में रखी हुई है। आप सुबह नाश्ते के लिए जाएंगे और पांडाल में दाखिल होंगे, तभी आप नक्की कर लोगे ना कि “8:00 बजे हैं, 8:10 पर पांडाल को छोड़ दूंगा”? वहां गए, कुर्सी खाली नहीं रही, खड़े रहे। कुर्सी खाली हुई, बैठे। वेटर ने जब परोसा, उसमें भी ऐसा नहीं कि दो ही इडली खा लेंगे। ऐसा कुछ नहीं। जहां तक पेट न भरा जाए, वहां तक नाश्ता करने का! ठीक है? ठीक है ना? ऐसा कोई नियम नहीं कि एक ही इडली खाने की, दो ही खाने की या चार ही खाने की। नियम क्या हुआ? पेट न भर जाए तब तक खाने का! तो अपन भी यही नियम मंदिर में दाखिल कर दें कि जब तक मन भरा ना जाए तब तक स्तवन गाना!
अरे एक स्तवन बोलो और आपका मन भर जाए तो एक ही स्तवन बोलो। मन होता ही नहीं है मंदिर में? होता है? मन तो बाहर होता है! चलो मंदिर की बात तो छोड़ो, यहां तो मन लेकर आए हो ना? कि शरीर को बिठा दिया है? कि व्याख्यान में तू बैठ जाना शरीर, मैं चला जाऊंगा बाहर! मैं तो टाइम का बिल्कुल पंक्चुअल (punctual) हूँ। 9:30 पर छोड़ ही दूंगा प्रवचन। लेकिन कोई प्रवचनकार भगवंत ऐसे भी होते हैं कि आपकी करुणा के लिए 10:00 तक भी चला लें। फिर आपका मन क्या कहेगा? “अरे महाराज! अब तो छोड़ो!”
मंदिर में जाते हैं, कौन जाता है? आपका शरीर जाता है या आप जाते हो? मेरा एक सूत्र है — ‘There should be the totality।’ ‘There should be the totality।’ प्रवचन में आप 10 मिनट आओ, चल जाएगा, लेकिन there should be the totality। समग्रता से प्रभु को सुनो। और मैं तो वहां तक कहूंगा कि प्रवचन सुनना ही नहीं, प्रवचन सुनोगे या पियोगे? प्रवचन पीने की चीज है। और पी लो तो क्या होता है?
एक शराबी मयखाना में गया, चकाचक पी लिया शराब। फिर बाहर निकला। उसकी चाल देखकर आप निश्चित कर लेंगे कि चकाचक पी कर निकला है। और आप यहां से निकलेंगे तब भले बाइक पर सवार हों या कार में सवार हो जाएं, लेकिन आपके चेहरे को देखकर किसी को मालूम होना चाहिए कि ‘प्रभु को पीकर ये आया है।’
रवींद्रनाथ टागोर ने ‘गीतांजलि’ में लिखा कि, “प्रभु! मैं तेरा दर्शन करके घर पर जब आता हूँ, घर पर आने के बाद चाय पीने के लिए कुर्सी पर बैठता हूँ। मेरे हाथ में चाय का कप होता है। मैं चाय सिप (sip) करता हूँ। उस समय कोई आदमी रास्ते पर से गुजरता है और वह खिड़की के जरिए मेरे मुंह को देखता है, तो मेरे चेहरे पर प्रभु तेरे चेहरे की छाप उसको दिखती है। मैं चाय पीता हूँ लेकिन मेरा मन तुझमें अटका हुआ है, और इसलिए मेरे चेहरे पर तेरे चेहरे की अमिट छाप लग जाती है।”
मेरे चेहरे पर तेरे चेहरे की अमिट छाप! तो प्रभु को पीना है। मुझे तो कुछ बोलना ही नहीं, ना देवश्रवण विजय को कुछ बोलना ही नहीं। We have not to speak a single word, He has to speak। लेकिन वह बोले, हम सुनेंगे नहीं, हम उसे पिएंगे! फिर मजा आ जाएगा!
तो आपका नियम निश्चित हो गया कि मन जब तक भर ना जाए तब तक स्तवन गाने का। ठीक है ना?
17 स्तवन तो हुए, फिर बाद में गुरुदेव भक्तामर बोले, फिर पंचसूत्र… देववंदन पूरा हुआ, फिर स्तुतियां चलीं। 11:30 बजे! 6:30 बजे गए थे, 11:30 बजे! अब गुरुदेव को ये ख्याल ही नहीं है कि रत्नसुंदर मेरे साथ है। मंदिर में दाखिल हुए, बस प्रभु ही प्रभु हैं। प्रभु की चेतना में गुरुदेव की चेतना घुल गई है। तो ख्याल ही नहीं है कि रत्नसुंदर मेरे साथ है। बाहर निकले गुरुदेव मंदिर से और रत्नसुंदरजी को देखा।
“अरे रत्नसुंदर! तू आज मेरे साथ आया है? क्यों?” में तो भूल ही गया था। “तेरी नवकारसी का क्या हुआ?” रत्नसुंदरजी कहते हैं, “बापजी! छोड़ो नवकारसी की बात, पोरसी भी गई, साढ़पोरसी भी गई।”
लेकिन रत्नसुंदर सूरी जी आज भी याद करते हैं कि, “ये एक दिन ऐसा था, सुवर्णमय दिन, कि गुरुदेव की भक्ति को मैं निहारता ही रहा, निहारता ही रहा।” रत्नसुंदरसूरी कहते हैं कि उस दिन मैं ऐसा पज़ल (puzzle) हुआ कि मैं मुश्किल में पड़ गया था कि प्रभु को देखूं या गुरुदेव को देखूं? वहां भी प्रभु मंदिर के गभारे में, और यहां कुर्सी पर विराजमान भी प्रभु! दोनों ओर प्रभु थे। गुरु चेतना तो थी! तो रत्नसुंदर सूरी कहते हैं कि, “मैं मुश्किल में पड़ गया था कि गभारे में बैठे हुए प्रभु का दर्शन करूं या कुर्सी पर बैठे हुए प्रभु का दर्शन करूं?”
तो ये जो आनंद आता है, उस आनंद का मूल कारण क्या है? अपन को भी ऐसा आनंद क्यों ना आए? भारतीय परंपरा में एक सूत्र है — ‘शिवसूत्र’। पार्वतीजी ने प्रश्न पूछे हैं और महादेवजी स्वयं उत्तर देते हैं। एक प्रश्न शिवसूत्र में पार्वती जी ने पूछा है कि, “प्रभु! भक्ति की धारा में, साधना की धारा में, योग की धारा में प्रवेश करना है, तो प्रवेश द्वार कौन सा है? कौन से प्रवेश द्वार से हम भक्ति की धारा में, साधना की धारा में या योग की, ध्यान की धारा में प्रवेश करें?”
तब महादेवजी ने एक सूत्र कहा है संस्कृत भाषा में: “विस्मयो योगभूमिकाः।” आश्चर्य जो है – विस्मय, वोही साधना का प्रवेश द्वार, वोही भक्ति धारा का प्रवेश द्वार, वोही योग और ज्ञान का प्रवेश द्वार। आश्चर्य! प्रभु का दर्शन रूटीन (routine) हो गया, आश्चर्य रूप नहीं हुआ। तीर्थ में जाते हैं, भोयरे में बड़े ही विशालकाय परमात्मा विराजमान हैं। हम देखेंगे, आश्चर्य होगा… “अरे! इतने बड़े परमात्मा!” ये आश्चर्य के क्षण जो हैं न, वो भक्ति की धारा में प्रवेशने का द्वार हैं। आश्चर्य के क्षणों में क्या होता है? कॉन्शियस माइंड (conscious mind) छूट जाता है।
अभी आप प्रवचन सुनते हैं। प्रवचन में कितनी बातें याद रहेंगी? आज का प्रवचन तो याद रहेगा या नहीं रहेगा, कल का प्रवचन याद रह गया होगा — टेलीफोन वाला! जब-जब मोबाइल को कान पर लगाएंगे, तब याद आता है ना कि प्रभु का फोन आया? किसका फोन आया? आश्चर्य!
सुबह मंदिर में जाएं, आप आश्चर्य से भरे हुए हों… “ओहो! ये मेरे भगवान!” आनंदघन जी भगवंत भी कहते हैं कि ‘दरीशन दुर्लभ’ — प्रभु का दर्शन दुर्लभ है। वैसा परमात्मा का दर्शन मुझे मिल गया! मैं कितना भाग्यशाली हूँ! आश्चर्य! आश्चर्य के क्षणों में कॉन्शियस माइंड दूर हट जाएगा और आप अस्तित्व के झरोखे से प्रभु का दर्शन करेंगे।
अभी तो ऐसा होता है, पुणे की श्राविकाएं कैसी हैं, मुझे तो अभी पता लगाने का बाकी है। आप दर्शन करके घर जाएंगी। परीक्षा तो लेंगी ना? दर्शन करके आये? आप कहेंगे, “हां, दर्शन करके आया, चैत्यवंदन भी किया था।” फिर वे पूछेंगी, “आज आंगी कैसी थी? वो तो बोलो!” और तुम सिर खुजलाने लगीं… “आंगी तो… आंगी तो होगी! अपने वहां महोत्सव चल रहा है।” लेकिन आंगी कैसी थी? बहुत भारी प्रश्न! अब फिर से मंदिर जाना पड़ेगा।
एक भाई पालिताना जाने वाला था। मैं अहमदाबाद में था। तो उसने पूछा, “महाराज साहब! पालिताना जा रहा हूँ कामकाज?” मैंने कहा, “काम क्या? प्रभु का दर्शन करो। याद करना।” सुबह प्रवचन से उठकर मुझे मिला था। दूसरे दिन प्रवचन में फिर आ गया। मैंने पूछा, “क्यों? पालिताना जाकर आए?” “हां महाराज साहब! जाकर आया।” मुझे कहां विहार करने का था? अहमदाबाद से भावनगर। भावनगर से पालिताना। “अहमदाबाद से फ्लाइट पकड़ी भावनगर। भावनगर से टैक्सी पकड़ी। जाना धर्मशाला में फ्रेश हुआ। रिक्शा में तलेटी पर। डोली में ऊपर। पूजा कर ली। फिर डोली में नीचे। रिक्शा में धर्मशाला पे, थोड़ा भोजन कर लिया। टैक्सी पकड़ी भावनगर। फ्लाइट पकड़ी रात को, तो अहमदाबाद आ गया।”
तब मैंने पूछा कि, “जब तुमने प्रभु की पूजा की शाम को तीन-चार बजे, उस समय प्रभु को आंगी धराई गई थी। तो आंगी कैसी थी?” तो उसने पूछा, “महाराज साहब! इतना भारी प्रश्न पूछते हो? मुझे फिर से पालिताना जाना पड़ेगा!”
ये रूटीन दर्शन हो गए। लेकिन जब आश्चर्य होता है… “ओहो! मेरे परमात्मा!” और ये परमात्मा कौन हैं? जयपुर से आए हुए नहीं हैं। सिद्धशिला से personally for me, personally for us, आए हुए परमात्मा! “ओहो! मेरे लिए, हमारे लिए परमात्मा सिद्धशिला से विहार करके यहां तक पधारे हैं!” और ये परमात्मा की पूजा करने में आप कितने एकाग्र हो जाओगे! तो ‘विस्मयो योगभूमिकाः।’ — आश्चर्य जितना घना होगा, आनंद उतना ही घना होगा।
प्रवचन सुनना है, लेकिन यशोविजय को सुनना नहीं है। समवसरण में गए थे, प्रभु के अमृतमय वचन निकल रहे थे, लेकिन हम प्रभु को निहारते ही रहे, निहारते ही रहे। शब्द छूट गए थे, उन शब्दों का अनुसंधान हम कर रहे हैं। आश्चर्य! कि ये प्रभु के शब्द आज मुझे मिल रहे हैं! आप कितने बड़भागी हो! संस्कृत आपने नहीं पढ़ा, प्राकृत आपने नहीं पढ़ा, फिर भी 45 आगमों का जो सार है, वो सार प्रवचनकार महात्मा आपको सुना देते हैं। तो आश्चर्य घना होना चाहिए।
आज शाम प्रभु के दर्शन के लिए जाओ — “ओहो! ये प्रभु मुझे मिल गए!” फिर प्रतिक्रमण के लिए आओ, सामायिक की अमृत क्रिया — “ओहो! ये अमृत क्रिया मुझे मिल गई! ये प्रतिक्रमण मुझे मिल गया!” बस ये आश्चर्य आपका घना हो, और आश्चर्य की सघनता से आपका आनंद भी सघन हो, ऐसा आशीर्वाद…
