विस्मयो योगभूमिकाः
विस्मय (आश्चर्य) योग का प्रवेश द्वार है; साधना का, भक्तिधारा का प्रवेश द्वार है। किसी तीर्थ के भोयरे में विराजमान विशालकाय परमात्मा को देखते ही हमें जो आश्चर्य होता है, वे आश्चर्य के क्षण भक्ति की धारा में प्रवेशने का द्वार हैं। उन क्षणोंमें कॉन्शियस माइंड छूट जाता है।
सुबह जब आप मंदिर में जाएं, तब भी आश्चर्य से भरे हुए हों… “ओहो! मेरे भगवान! आनंदघनजी जिसे दुर्लभ कहते हैं – दरिशन दुर्लभ – वैसा परमात्मा का दर्शन मुझे मिल गया; मैं कितना भाग्यशाली हूँ!” आश्चर्य के इन क्षणों में कॉन्शियस माइंड दूर हट जाएगा और आप अस्तित्व के झरोखे से प्रभु का दर्शन करेंगे।
अतीत की यात्रामें आप समवसरण में गए थे, तब प्रभु को निहारनेमें ऐसे तल्लीन हो गए कि प्रभु के शब्द आप सुन ही न पाए। पर कैसा आश्चर्य है कि प्रभु के वे शब्द आज गुरुदेव के द्वारा आपको मिल रहें हैं! आप कितने बड़भागी हो! यह आश्चर्य आपका जितना घना होगा, आनंद उतना ही घना होता जाएगा।
