Kumarpal Maharaja Ni Prarthna | 24-06-2026 | Pune

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No vacancy for others!

भक्त की शक्ति है – असहाय दशा। हम असहाय हो गए कि “प्रभु! मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ, तुझे ही सब कुछ करना है।” बस, उस ही क्षण प्रभु तैयार हैं। प्रभु आपको मोक्ष तक ले जाने के लिए तैयार हैं; आपके पास सिर्फ असहाय दशा चाहिए।

अनंत जन्मों में हमने क्या किया मालूम है? राग-द्वेष के कचरे से हृदय को भर दिया और फिर परमात्मा के लिए बोर्ड लगाया: “No vacancy for you”। इस जन्म में क्या करना है? प्रभु से, प्रभु के प्रेम से हृदय को भर देना है और फिर बोर्ड लगाना है: “No vacancy for others”!

अब सिर्फ प्रभु ही अंदर आ सकते हैं; किसी और के लिए भीतर जगह नहीं है। ऐसा प्रभु को रिझाना, प्रभु का मिलन करना ही जब हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाए, तब हमारे जीवन में वास्तविक रूप से सद्गुरु चेतना का प्रवेश होता है।


परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! तेरी आज्ञा का पालन जो मैं कर रहा हूँ, उस पालन का आनंद मुझे दे दो।”

ऐसी ही प्रार्थना ‘अजितशांति स्तोत्र’ के अंत में नंदिषेण महामुनी ने की: “मम य दिसऊ संजमे नंदिं।” नंदिषेण मुनि प्रभु से कहते हैं कि, “प्रभु! तेरी शक्ति अपार है।”

परम पावन शत्रुंजय गिरि की यात्रा के लिए नंदिषेण मुनि गए हुए हैं। नौ टूक में वे पधारे। एक ओर अजितनाथ प्रभु का मंदिर, सामने ही शांतिनाथ प्रभु का मंदिर। एक जगह दर्शन करने के लिए जाओ, सामने वाले प्रभु की आशातना होती है। वहां दर्शन करने के लिए जाओगे, तो यहां वाले प्रभु की आशातना होती है, क्योंकि मंदिर आमने-सामने हैं। नंदिषेण मुनि दोनों मंदिरों के बीच में, चौक में, बैठ गए। और प्रभु से उन्होंने प्रार्थना की, “कि प्रभु! मेरी तो कोई ताकत नहीं, लेकिन तेरी शक्ति अपार है। अनंत इंद्रों से भी ज्यादा शक्ति प्रभु की होती है।” तो नंदिषेण मुनि ने कहा कि, “प्रभु! मैं तो कुछ नहीं कर सकता हूँ, लेकिन मैं तेरे चरणों में प्रार्थना करता हूँ कि आमने-सामने वाले मंदिर आस-पास में आ जाएं।”

भक्त की शक्ति है – असहाय दशा। एक बच्चे की ताकत क्या होती है? बच्चे की असहाय दशा। एक मां अपने छोटे बच्चे को लेकर पालिताना गई। गिरिराज को चढ़ने की बेला आई। बच्चे ने कहा, “मां मैं चढूंगा। मुझे चढ़ना है।” मां ने कहा, “हां बेटे, चढ़ो।” लेकिन जब बच्चा थक जाता है और कहता है, “मां, अब मैं नहीं चढ़ पाऊंगा। अब मैं नहीं चल पाऊंगा।” मां उसे उचक लेती है (गोद में उठा लेती है)।

ऐसी ही बात प्रभु से है। हम असहाय हो गए, “प्रभु मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ, तुझे ही सब कुछ करना है।” प्रभु तैयार हैं….. प्रभु मोक्ष तक ले जाने के लिए तैयार हैं। अपने पास सिर्फ असहाय दशा चाहिए।

संत हरिदास बिहार में हुए। उन्होंने ब्रज भाषा में एक पद लिखा है। उस पद में वे लिखते हैं: “तिनका बुयारी  के बस।” प्रभु! एक तिनका बुयारी के बस होता है। ऐसे ही मैं तेरे हाथ में हूँ। मैं अपनी इच्छा से कुछ भी करने वाला नहीं हूँ। जो तेरी इच्छा हो, मुझे स्वीकार है। प्रभु की आज्ञा, प्रभु की इच्छा!

एक बात मैं कहूं, गुरु चेतना का प्रवेश आपके हृदय में सचमुच कब होता है? ऐसे तो हम जन्म से पंच महाव्रत धारी गुरु को सद्गुरु के रूप में मानते हैं। लेकिन personally बात करें, तो मेरे लिए या आपके लिए सद्गुरु चेतना का प्रवेश वास्तविक रूप से कब होता है? जब हम निश्चित करते हैं कि प्रभु के मार्ग पर चलना है, प्रभु को रिझाना है।

मीरा ने प्रभु से ही पूछा था, “कैसे रिझाऊँ तुझे? दुनिया को रिझाना मुझे आता है, फवता है, लेकिन प्रभु तुझे मैं कैसे रिझाऊँ?” तो हम प्रभु से चाहते हैं यह कि प्रभु रीझ जाएं, प्रभु की कृपा हमें मिल जाए। लेकिन प्रभु कैसे रीझेंगे? प्रभु कैसे मिलेंगे, वो सद्गुरु बताते हैं। इसलिए जब हमने निश्चित किया कि प्रभु का प्रवेश ही हमारे हृदय में होना चाहिए। हमारा हृदय सिर्फ परमात्मा के लिए ही है।

अनंत जन्मों में हमने क्या किया मालूम है? राग और द्वेष के कचरे से हृदय को भर दिया और फिर परमात्मा के लिए बोर्ड लगाया — “No vacancy for you.” प्रभु तेरे लिए कोई जगह नहीं। लेकिन इस जन्म में क्या करना है? प्रभु से, प्रभु के प्रेम से हृदय को भर देना है। और फिर बोर्ड लगाना है — “No vacancy for others.” अब किसी के लिए जगह भीतर नहीं है। सिर्फ प्रभु ही अंदर हैं और प्रभु ही अंदर आ सकते हैं। तो प्रभु को रिझाना, प्रभु का मिलन करना ही हमारा लक्ष्य है। तब हमारे जीवन में वास्तविक रूप से सद्गुरु चेतना का प्रवेश होता है।

हम सद्गुरु को पूछते हैं कि, “गुरुदेव मैं क्या करूं कि प्रभु मेरे हृदय में आ जाएं, मेरे हृदय में बस जाएं?” और मैंने पहले कहा था, प्रभु तैयार हैं। He is ever ready. Are you ready? तुम भी तैयार हो ना? बारिश चालू थी फिर भी आप आ गए हो, इसीलिए तो आए हो! और गुरु का काम दूसरा क्या होता है? मैं तो दूसरा कोई कार्य करने वाला हूँ ही नहीं। मैं तो एक ही कार्य करता हूँ — “प्रभु चाहिए तुम्हें? ले लो, चलो। आ जाओ, ले जाओ।”

प्रभु चाहिए? नंदिषेण मुनि बैठ गए, प्रभु से प्रार्थना की और प्रार्थना का चमत्कार… आमने-सामने रहे हुए मंदिर आस-पास में आ गए! और फिर नंदिषेण मुनि ने आगे प्रार्थना की, “मम य दिसऊ संजमे नंदिं” प्रभु! संयम तूने दिया, अब संयम की प्राप्ति के बाद क्षण-क्षण में जो आनंद होता है, वो आनंद का दान भी तुझे ही देना है।

प्रभु तैयार हैं। 

50 वर्ष पहले की एक घटना है। एक छोटा सा गांव, 50-70 जैनों के घर। बड़ा ही भव्य जिनालय, भव्य उपाश्रय, पाठशाला। आचार्य गुरुदेव विहार करते-करते एक दिन वहां पधारे। लोग इतने भाविक थे, गुरुदेव आ गए हैं, पहले ही दिन गुरुदेव को संघ ने विनती की कि, “साहब जी! शेषकाल में आप एक महीना तक तो इस गांव में रह सकते हैं। तो हमें मासकल्प का लाभ दो।” गुरुदेव ने भी विनती स्वीकार कर ली। रोज प्रवचन होने लगे।

एक आठ साल का बच्चा, पूर्व जन्म के संस्कार। गुरुदेव के पास आने लगा, धार्मिक सूत्र पढ़ने लगा। एक महीना पूरा हुआ और गुरुदेव विहार करने वाले हैं। उस छोटे बच्चे को गुरुदेव के साथ इतनी प्रीति लग गई, इतना लगाव हो गया कि छोटे बच्चे ने गुरुदेव से कहा कि, “गुरुदेव! मैं आपके बिना नहीं रह पाऊंगा।” आपकी भी बात यही होगी, चातुर्मास के बाद, “साहब हम नहीं रह सकते आपके बिना!” तो हम कहेंगे कि, “चलो हमारे साथ।” बच्चा रोने लगा कि, “गुरुदेव आपके बिना मैं नहीं रह पाऊंगा, मैं नहीं टिक पाऊंगा।”

गुरुदेव ने कहा, “हमारा तो नियम है और प्रभु ने दिया हुआ नियम है, एक मास से ज्यादा हम शेषकाल में रुक नहीं सकते। हमें तो जाना ही पड़ेगा। लेकिन तेरे माता और पिता अनुमति दें, तो तू हमारे साथ चल।”

वो बच्चा तुरंत घर पर दौड़ा, अपने मां और पिता को लेकर आया। ये हमारे संस्कार हैं। इकलौता बेटा है, लेकिन जब मात-पिता को लगता है कि पूर्व जन्म का वैराग्य का संस्कार लेकर बच्चा आया है, तो मात-पिता तैयार हो गए। और मात-पिता ने गुरुदेव से कहा, “गुरुदेव! आप विहार में लेकर जाओ, एक साल तक रखो। आपको लगे कि दीक्षा के लिए योग्य है, तो हम दीक्षा देने के लिए तैयार हैं। आपको लगे कि दीक्षा के लिए योग्य नहीं है, तो एक साल स्कूल का बिगड़ गया, ठीक है, स्कूल में भर्ती फिर करा दूंगा। लेकिन मेरी कोख से जन्मा हुआ बच्चा,” मां कहती है, “प्रभु शासन को समर्पित हो तो मेरा सद्भाग्य।”

इतना कहाँ से? दो बच्चे होते हैं, तब तो एक बच्चा छोड़ना आसान होता है। लेकिन इकलौता बेटा है, एक ही बच्चा है। लेकिन प्रभु शासन के प्रति इतना प्रेम है, इतना अनुराग है मात-पिता को कि “गुरुदेव आपको योग्य लगे तो हम दीक्षा देने के लिए तैयार हैं।” आप सबको तो नियम है ना कि बच्चा तैयार हो जाए या बच्ची तैयार हो जाए तो आप ‘ना’ नहीं कहेंगे। बरोबर? परीक्षा जरूर करना कि वैराग्य पक्का है कि नहीं। लेकिन लगे कि वैराग्य परिपक्व है, तो दीक्षा की अनुमति देना।

गुरुदेव बच्चे को साथ लेकर विहार में चले। लेकिन ये बच्चा पूर्व जन्म का वैरागी आत्मा! कोई भी गांव में गया, अब छोटा बच्चा है, माताओं को तो प्यार आता है कि ‘छोटा बच्चा है, साहब जी के पास है और शायद दीक्षा भी लेगा, तो ऐसा भाग्यशाली बच्चा हमारे वहां कहां से?’ तो ये माताएं सब भक्ति करतीं। लेकिन वो बच्चा कहता, “रोटी और सब्जी, दो ही चीज, तीसरा कुछ मैं नहीं लूँगा।”

रोज गुरुदेव के पास लोग आते कि, “गुरुदेव! इतना छोटा बच्चा है और इतना त्याग करता है। दीक्षा लेने की है, दीक्षा लेने के बाद त्याग जरूर करे, अभी तो थोड़ा खाना चाहिए, कुछ नहीं खाता है!” तब गुरुदेव समझते हैं कि वैराग्य उसका परिपक्व है। एक साल बीत गया। बच्चा पढ़ने में भी निष्णात। एक दिन में 100 गाथा, 200 गाथा कंठस्थ कर दे। भक्ति भी प्रभु की इतनी, स्वाध्याय इतना, त्याग इतना, वैराग्य इतना!

तो गुरुदेव ने मात-पिता को घोषित किया कि, “बच्चा आपका तैयार है। आप तैयार हों, तब दीक्षा का मुहूर्त हम निकालेंगे।” दीक्षा का मुहूर्त भी निकल गया। छोटे बच्चे की दीक्षा भी हो गई। दीक्षा के बाद का पहला चातुर्मास गुरुदेव का पालिताना में था। तो बाल मुनि के मात-पिता ने सोचा कि हम भी पालिताना चातुर्मास करें। पालिताना चातुर्मास करना, ये तो श्रावक का कर्तव्य होता है। और हमारे बाल मुनि भी वहां आए हैं, तो बाल मुनि का रोज दर्शन भी होगा। तो गुरुदेव ओसवाल यात्रिक भवन में चातुर्मास करने वाले थे, वहीं उन्होंने एक रूम बुक करवाई।

कल माताओं ने देखा था ना, छोटे-छोटे मुनि बैठे थे ने सब? आजभी आने वाले थे लेकिन बारिश चल रही है। तो ऐसे छोटे-छोटे बाल मुनियों को देखकर आपको क्या होता है? इनको नहीं पूछो, आपको क्या होता है? “मेरा भी बच्चा बाल मुनिराज हो! और ये बाल मुनिराज फिर युवान बने, आचार्य बने, प्रवचन देता हो!” तब मां की आंखों में कितने आंसू आएंगे। “मेरा लाडला, मेरा बच्चा देखो हजारों का नेता हो गया!” संसार में रहता तो थोड़ा कारोबार चलाता, लेकिन हजारों लोगों की श्रद्धा का भाजन होना, ये तो दीक्षा के बिना शक्य ही नहीं है।

तो आपको आपका भविष्य कहां दिखता है बच्चे का? अभी तो क्या होता है? मैं मुंबई चातुर्मास घाटकोपर था, तीन-चार दिन होता, और एक मां आती है बच्चे को लेकर, “साहब जी, बच्चा Abroad जा रहा है, परदेश पढ़ने के लिए, आशीर्वाद दो।” दूसरा सप्ताह, दूसरा बच्चा, दूसरी बच्ची आती थी, “साहब जी, Abroad जाना है, परदेश जाना है पढ़ने के लिए।” आपका बच्चा परदेश जाएगा, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जाएगा। फिर उस देश के प्रेम में पड़ जाएगा। आप कहेंगे, “बेटा भारत कब आना है?” “अब भारत में क्या है? मैं तो यहां ही स्थिर हो गया हूँ।” आप आपके बच्चे को गंवा देते हो। तो आपका बच्चा अमेरिका जाए और वहां ही स्थिर हो जाए, वहां ही शादी कर ले और उसका बच्चा हो जाए, तो आपको मोबाइल पर दिखा दे, “पापाजी, ये बच्चा, ये मेरी औरत आप देख लो, मैं अभी आ नहीं सकता हूँ भारत।” तो यह परिस्थिति अच्छी है या आपका बच्चा दीक्षा ले वह परिस्थिति अच्छी है?

तो पालिताना में गुरुदेव का चातुर्मास प्रवेश हुआ। बाल मुनि के माता-पिता भी आ गए। भोजन के लिए प्रबंध शुरू कर दिया अपने वहां ही, कि साधु-साध्वी भगवंतों का भी लाभ मिले। अब आषाढ़ सुदी में गुरुदेव का प्रवेश हुआ था। और चौदस तक तो यात्रा कर सकते हैं हम। अब तो यात्रा के दिन थे। सभी यात्रा करते थे। और चातुर्मास शुरू होने के बाद सब पढ़ाई का Schedule शुरू होने वाला था। विहार में आए हुए थे धूप में, गर्मी में, तो पाठ बंद थे।

अब बाल मुनि की माता जब भी उपाश्रय में आती, गुरुदेव को वंदन करती, और बाद में नज़र जाती अपने बाल मुनि पर। लेकिन बाल मुनि के हाथ में कभी भी किताब नहीं देखी। बतियाते थे, किसी के साथ आनंद करते थे या कहानी की पुस्तक पढ़ते थे। मां को चिंता हुई कि “ये मेरा बच्चा पढ़ता नहीं, और पढ़ता नहीं है तो होनहार कैसे होगा?”

सप्तमी या अष्टमी थी आषाढ़ सुदी की। माता गुरुदेव के वंदन के लिए आई और बाल मुनि यात्रा करने के लिए गए थे। उस समय मां ने देखा बाल मुनि नहीं हैं। तो गुरुदेव के पास मां सिसक-सिसक कर रोने लगी। गुरुदेव ने कहा, “अरे तुम क्यों रोती हो? तुम तो भाग्यशाली हो कि तुम्हारी कोख से जन्मा हुआ संतान प्रभु शासन को समर्पित हुआ।” तब वो मां कहती है कि, “गुरुदेव! मैंने तीन-चार बार आकर देखा, बाल मुनि के हाथ में पढ़ने की किताब तो होती ही नहीं। यदि वे पढ़ते ही नहीं और आप ध्यान भी रखते नहीं हैं, तो मेरा बच्चा होनहार कैसे बनेगा?”

ये मां! मां का जो प्यार है, उसको हम कभी भी समझ भी नहीं सकते। ऋण मुक्ति की बात तो बहुत दूर है, मां के प्रेम को समझना वो भी कठिन बात है। मां के लिए अपना केंद्र बिंदु बच्चा ही होता है। मां का केंद्र बिंदु ‘मैं’ नहीं होता, बच्चा होता है। और तभी तो मां का प्रेम Superior प्रेम है।

रूसी लेखक टॉल्स्टॉय (Tolstoy) ने एक कहानी लिखी है, बहुत सुंदर कहानी। एक मां, दो बच्चे — एक छः साल का, एक आठ साल का। एक दिन आठ साल के बच्चे ने मां से कहा कि, “मां! तेरा प्रेम तो Superior होता ही है।” (मां का प्रेम तो प्रभु और गुरु के प्रेम से पीछे तुरंत ही किसी का भी प्रेम आता है, तो वो मां का प्रेम आता है)। “तो मां! तेरा प्रेम Superior है। लेकिन आज मुझे कहना है कि तेरा हम पर जो प्रेम है, उससे भी Superior प्रेम हमारा तुझ पर है।” मां हंसने लगी। बच्चा कहता है कि, “तेरा जो हम पर प्यार है, उससे भी Superior प्यार हमारा तुझ पर है।” मां हंसने लगी, फिर पूछी, “क्यों? कैसे?” तब बच्चे ने कहा, “सीधी बात है। तेरे दो बच्चे हैं, तो तेरा प्रेम आधा-आधा बंट जाता है। पर हमारी एक ही मां है, तो हमारा पूरा प्रेम तुझे मिलता है।”

टॉल्स्टॉय की कहानी तो यहां पूरी होती है, लेकिन मैं इस कहानी को आगे बढ़ाता हूँ कि उस मां के दो बच्चे थे। हमारी प्रभु-मां को दो नहीं, तीन नहीं, चार नहीं, अनगिनत बच्चे हैं। पर फिर भी हमारी वो मां हम पर Personal care रखती है। Personal care! एक-एक पर केयर उसकी होती है। कितना प्रेम! हमारी माता है! जन्मदात्री, माता का प्रेम तो है ही। प्रभु का प्रेम भी कितना घना है!

तो मां का हृदय था। मां फूट-फूट कर रोने लगी कि, “गुरुदेव आप क्यों ध्यान नहीं रखते? क्यों मेरे बच्चे को पढ़ाते नहीं हो? माँ गुस्से हो गई! अपने बच्चे पर प्यार है ना, गुरुदेव मैंने आपको मेरा बच्चा सौंप दिया। इकलौता बच्चा आपको मैंने सौंपा। क्यों सौंपा? वो होनहार हो, जिन शासन की सेवा करे। लेकिन वो पढ़ेगा ही नहीं तो क्या सेवा करेगा? आप क्यों नहीं पढ़ाते?”

गुरुदेव ने प्यार से कहा कि, “इतनी गर्मी में विहार करके हम आए हैं और हम यहां आए, दूज का हमने प्रवेश किया। चौदस तक ही यात्रा हो सकती है, चौदस के बाद तो यात्रा हो सकती नहीं है। तो इतने दिन यात्रा के लिए रखे हैं। अब रोज एक यात्रा, दो यात्रा करेंगे। आपका बच्चा और दूसरे मुनिराज, तो फिर थक भी जाएंगे। विहार की थकान भी है और यात्रा भी करेंगे। लेकिन आषाढ़ सुदी… चातुर्मास का दिन, चातुर्मास शुरू होगा, दूज के दिन से पढ़ाई का Schedule शुरू होगा। फिर आपका बच्चा सुबह से शाम तक पढ़ने लगेगा।”

और फिर मां ने पूछा, “गुरुदेव पढ़ने में कैसा है?” गुरुदेव ने कहा, “तुम बोलो स्कूल में कैसा नंबर आता था?” “स्कूल में तो First rank में आता था।” “तो बहुत ही होशियार है। हमारा जो पख्खी सूत्र होता है, 350 गाथा का… उस पख्खी सूत्र को करने में साडे तीन दिन नहीं, साडे तीन घंटे भी नहीं लगे थे। दो घंटे में पख्खी सूत्र की 350 गाथाएं उसने कंठस्थ कर लीं। तो आपका बच्चा होनहार है ही, आप चिंता मत करो। अरे, मेरा पूरा ध्यान उस पर है।” फिर मां को संतोष हुआ।

अब अष्टमी का दिन। दोपहर, सब एकासना के लिए बैठे थे। बाल मुनिराजकी गोचरी हो गयी थी और बाल मुनिराज बैठे थे। भेजते है, थोड़ी गोचरी लाने के लिए… ऐसे तो बाल मुनिराज को भेजते नहीं, लेकिन उनकी मम्मी के वहां ही भेजना था और बाजू में रूम थी, तो गुरुदेव ने कहा, “तुम्हारी मम्मी के घर जाकर इतनी गोचरी लेकर आओ।” ‘धर्मलाभ’ दे कर बाल मुनि रूम में गए। इतने तो Talented थे। 12:30 बजे हुए थे, मां एकासना के लिए बैठी थी और पापा जी शॉपिंग के लिए गए थे। मां सब बर्तन लेकर बैठी थी। कोई भी महाराज साहेब आये तो वहोरावे। ‘धर्मलाभ’ की आवाज सुनी। “अरे! मेरे छोटे लाडले! ओहो! पहली बार मेरे रूम में आए!” “आओ आओ आओ” इतने Talented बाल मुनिराज हैं, अभी तो आए हुए हैं।

मां की थाली पर नजर गई। सूखी रोटियां थीं, दूध भी नहीं था। रोटी और दाल, सूखी रोटी। तो माँ ने कहा की बोलो क्या वहोरावु? “वहोरने की बात बादमे, आज तुम्हे पच्चखान क्या है बोलो?” तो कहे, “एकसाना।” “अच्छा तो एकासना है तो फिर ये रोटी में घी क्यों नहीं है?” 

अब क्या हुआ था कि गुरुदेव ने आश्वासन तो दिया था कि तेरा बच्चा होनहार है, लेकिन माँ का ह्रदय, मां ने उस समय मनोबल निश्चित किया था कि ‘जब तक मेरे बाल मुनिराज 3000 गाथाएं नई न करें, वहां तक मुझे छः विगय का त्याग है।’ अब मां ने सोचा कि इनके लिए तो मैंने नियम लिया है! और पत्ते खोल दू। तो मां ने कहा, “है तो एकासना लेकिन छः विगय का त्याग है।” “क्यों? त्याग क्यों?” “तुम जहां तक 3000 गाथाएं नई न करो, उस समय तक मेरे छः विगय का त्याग है।” “अच्छा! 3000 गाथाएं करनी है? इसमें क्या बड़ी बात है!”

गोचरी वहोरी और वो गए, और जो धूनी लगाई… पांच दिन में 3000 गाथाएं! और नई! और पांचवें दिन पर भी, सुबह 11:00 बजे 3000 गाथाएं समाप्त कर दीं। गाथा समाप्त करके अपने रूम पर गए मां की। और मां को कहा, “गुरुदेव के पास चलो!” गुरुदेव के पास मां को लेकर आए और कहा, “गुरुदेव से पूछो, तुम्हारे घर वहोरने के लिए में आया था, उसके बाद मैंने 3000 गाथाएं नई की हैं या नहीं की हैं?” तो गुरुदेव ने कहा कि, “हां, तुम्हारे घर पर से आया और उसने कहा कि, ‘गुरुदेव मां ने ऐसा नियम लिया है और मुझे गाथाएं करनी हैं।’ मैंने अनुमति दी, और पांच दिन में उसने 3000 गाथाएं नई कर दीं!”

मां की आंखों में हर्ष के आंसू कितने आए होंगे? बोलो? “मेरा लाडला इतना होनहार! पांच दिन में 3000 गाथाएं!” और पांच दिन भी पूरे कहां से? पहला दिन तो 12:30 के बाद, और पांचवें दिन 11:00 बजे तो पूरा हो गया। तो चार ही दिन हुए और 3000 गाथाएं! मां खुश हो गई। अब बाल मुनिराज ने कहा, “बोलो! आज क्या वापरने का है? बोलो! अब छः विगय का त्याग नहीं है ना?” माने कहा की अब नहीं है। 

तो ये समर्पण! और यह समर्पण का आनंद हमारी परंपरा में है। प्रतिष्ठा का चढ़ावा होता है। आप दो करोड़, तीन करोड़, चार करोड़ बोलेंगे और प्रतिष्ठा का लाभ आपको मिल जाएगा। आपका हृदय खुशी-खुशी से फूल जाएगा, “ओहो! इतना अच्छा लाभ मिल गया!” आप चार करोड़ के सामने नहीं देखते हो, प्रभु की प्रतिष्ठा का लाभ मिला, यही देखते हो। 

तो यही साधना का आनंद है, यही भक्ति का आनंद है। और इस आनंद को भरपेट Enjoy करना है, तो रोज यही बात हम करेंगे कि जो मिला है वो अद्भुत मिला है, लेकिन उसे Enjoy कैसे करें? ऐसा Enjoyment हो… बस तुम्हारा फेस 24 घंटे हसता ही रहे। ये हमारी माताएं होती हैं… 5-10 महात्मा वहोरने के लिए आते है ना, इतना आनंद आता है कि खा नहीं सकती हैं वो! बस वहोराने से ही पेट भर जाता है! ये आनंद आपके पास है। इस आनंद को आप बहुत ही Enjoy करो, ऐसा आशीर्वाद…

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