प्रभु का प्रेम
अहोभाव से समृद्ध पुणे नगरी में आज चातुर्मासिक प्रवेश उत्सव! यहां जब से आए हैं, आपकी जो श्रद्धा है, जो भक्ति और समर्पण है, जो अहोभाव है, उसे हम पीते रहे हैं।
साधना का Composition मैं इस रूप में देता हूँ कि 99% grace, 1% effort. 99% प्रभु की, सद्गुरु की कृपा, और 1% हमारा प्रयत्न। और वह प्रयत्न है श्रद्धा, वह Effort है भक्ति, वह कृत्य है समर्पण।
पूज्यपाद आनंदघन जी भगवंत को एक भक्त ने पूछा था कि, “गुरुदेव! हम तो प्रभु को चाह रहे हैं, उससे भी ज्यादा प्रेम हमारा प्रभु पर है। लेकिन प्रभु हमें चाह रहे हैं या नहीं?”
उस समय आनंदघन जी भगवंत ने कहा कि, “प्रभु तुम्हें चाह रहे हैं। प्रभु का प्रेम क्षण-क्षण तुम्हारे पर बरस रहा है।” पूरे चातुर्मास में मुझे एक ही बात दोहराने की है कि प्रभु का प्रेम हर क्षण हम पर बरस रहा है। अनगिनत समय से ये प्रेम बरस रहा था, लेकिन हम झेल नहीं पाए। क्योंकि हमारे पास जो श्रद्धा, जो भक्ति चाहिए थी, वो नहीं थी।
ऐसी भक्ति जो असहायता में परिवर्तित हो… “प्रभु मैं कुछ भी नहीं कर सकूँगा, जो भी करना है तुझे करना है।” भक्त की ये असहाय दशा; प्रभु के प्रेम को हम झेल सकते हैं! और प्रभु का प्रेम जब हमारे हृदय में फैल जाता है, तब क्या होता है? हमारा व्यक्तित्व, व्यक्तित्व नहीं रहता है, अस्तित्व में पलट जाता है। हम परम चेतना के समंदर की एक लहर बन गए। परम चेतना में जो सुगंध है, जो आस्वाद है, वो आस्वाद हमारे भीतर भी उतरेगा।
इसीलिए एक Statement मैं बार-बार देता हूँ:
There is the same fragrance and same taste in all the respected gurus and devotees.
सद्गुरुओं में और भक्तों में एक समान सुगंध और एक समान आस्वाद होता है। क्योंकि ये सुगंध, ये आस्वाद भक्त का नहीं होता है, सद्गुरु का नहीं होता है, वो परम चेतना का होता है। परम चेतना का प्रेम जब हमारे अस्तित्व में घुल जाता है, तब हमारा अस्तित्व बिल्कुल बदल जाता है। हमारी Body से जो ऊर्जा निकलती है, वो ऊर्जा भी बदल जाती है।
एक घटना याद आती है। हिम्मतभाई बेड़ावाले, चंद्रकांतभाई, प्राणलालभाई, शशिकांतभाई आदि पूज्यपाद पन्यासजी भगवंतके भक्त बद्री तीर्थ की यात्रा के लिए चल पड़े। बद्री तीर्थ यानी कि ऋषभदेव प्रभु का निर्वाण कल्याणक तीर्थ। बीच में समाचार मिला कि रास्ते से थोड़ी दूर एक गुफा है और गुफा में एक संत हैं। कार रुकवा ली और सब गुफा की ओर चले। कार गुफा तक चल सके ऐसा रास्ता नहीं था, पैदल चले।
सब तो पहले पहुंच गए। हिम्मतभाई धीरे-धीरे-धीरे चलते-चलते पहुंचे। सब पहुंच गए संत के पास। शिष्टाचार किया और फिर विनंती की कि, “हमें कुछ शिक्षा प्रदान करो।”
“लेकिन हमारे अग्रणी अभी आ रहे हैं, अग्रणी आ जाएं फिर आप कुछ शिक्षा हमें प्रदान करें।”
उसी क्षण हिम्मतभाई गुफा में Enter करते हैं। जैसा ही हिम्मतभाई ने प्रवेश किया, संकरी गुफा थी, हिम्मतभाई जैसे प्रवेशे, उनकी ऊर्जा गुफा में फैल गई। संत अपने आसन से खड़े हो गए। वे सामने आए हिम्मतभाई की ओर, और उन्होंने हिम्मतभाई के हाथ पकड़ कर कहा, “आप यहां क्यों आए? आप तो मुझसे भी बड़े संत हो!”
कैसे मालूम हुआ? ये जो परमात्मा की सुगंध हिम्मतभाई के भीतर उतरी थी, उस सुगंध का आस्वाद संत को मिल गया। तो परमात्मा हर क्षण प्रेम को बरसा रहे हैं। हमें एक ही काम करना है, परमात्मा के प्रेम को झेलना है।
गत साल सूरत में मेरा चातुर्मास था। सूरत नगर में प्रवेश हुआ, तो पहले ही प्रवचन में मैंने कहा था कि सूरत तो बहुत बार आया हूँ मैं। बहुत प्रवचन दिए हैं सूरत में, बहुत वाचनाएं दी हैं। लेकिन इस चातुर्मास में मैं ना तो प्रवचन देने के लिए आया हूँ, ना वाचना देने के लिए आया हूँ। मैं सिर्फ प्रभु के प्रेम को आपको देने के लिए आया हूँ।
मैंने प्रभु का प्रेम झेला है। प्रभु के प्रेम का आस्वाद लिया है। जब पहली बार प्रभु के प्रेम का आस्वाद मिला, मैं स्तब्ध हो गया था कि क्या ऐसा प्रेम हो सकता है? और तब कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य याद आए थे:
त्वमकारणवत्सलः!
“प्रभु! दुनिया के रिश्ते स्वार्थमय होते हैं, लेकिन तेरा प्रेम अकारण प्रेम है। तू हम पर बरसता है, क्योंकि बरसाना ये तेरा स्वभाव है!”
तो प्रभु बरस रहे हैं। मेरी भी ऐसी दरिद्रता रही कि अनगिनत जन्मों तक मैं भी प्रभु के प्रेम का आस्वाद को प्राप्त ना कर सका। लेकिन इस जन्म में प्रभु के प्रेम का आस्वाद मैंने प्राप्त किया है। अब एक ही बात बोलने का मन होता है कि आप भी सब प्रभु के प्रेम को प्राप्त करो। प्रभु बरस रहे हैं… बरस रहे हैं… बरस रहे हैं।
पूरे चातुर्मास में प्रवचन प्रभु की भक्ति धारा पर और बिल्कुल सरलता से होगा। आप सब सुन सकें, आप सब Enjoy कर सकें, इस तरह से प्रवचन धारा चलेगी। क्योंकि आपको पकड़ना है ना मुझे तो! तो आप को पकड़ना है, तो आप Enjoy कर सको, इस तरह से प्रभु की बातें आपके समक्ष मुझे करनी हैं।
आज तो समय बिल्कुल कम है, इसलिए इतना ही कहूंगा कि प्रभु के प्रेम का आस्वाद, यही हमारे जीवन का अवतार कृत्य है।
एक दिन मैंने प्रभु से कहा था कि, “प्रभु! तू मुझे मिल गया, तेरा प्रेम मुझे मिल गया, मेरा अवतार कृत्य तो पूर्ण हो गया। अब मुझे यहां रहकर क्या करना है?”
तो प्रभु ने कहा कि, “तुझे यहां ठहरने का है। तूने जो आस्वाद लिया है, उस आस्वाद की भनक दूसरों को देने की है।” तो मेरा एक ही कार्य होगा कि प्रभु का जो प्रेम है, उसका आस्वाद आपको कराऊंगा। आपको सिर्फ आना ही है, दूसरा सब कुछ हमारी ओर से हो जाएगा!
