Kumarpal Maharaja Ni Prarthna | 22-06-2026 | Pune

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सद्गुरु दियो बताय।


परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा के सम्मुख प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! एक ही इच्छा मेरी है कि तेरी आज्ञा का पालन जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाए मेरे जीवन में, त्यों-त्यों मेरा आनंद बढ़ता जाए।”

आनंद ही आनंद! प्रभु मिल गए, प्रभु की साधना मिल गई, साधना को दर्शाने वाले सद्गुरु मिल गए… आनंद ही आनंद! मैंने बहुत सद्गुरु देखे हैं, ऐसे सद्गुरु जिनका पूरा अस्तित्व परममय था। और जिनका अस्तित्व परममय हो गया, वे आनंद में डूब गए।

एक आचार्य भगवंत, वयोवृद्ध थे। विहार यात्रा आपकी चल रही थी। आप डोली में विराजमान थे। डोली वाले आचार्य भगवंत को लेकर झड़प से दौड़ रहे थे। एक गांव आया, लेकिन वहां आचार्य भगवंत को रुकने का नहीं था, आगे जाने का था। लेकिन दो बच्चे वहां खेलते थे। उन्होंने देखा महाराज साहब पधार रहे हैं। दोनों बच्चे इतने संस्कारी, दौड़ते-दौड़ते आचार्य भगवंत के पास गए और चरण स्पर्श किये।

सद्गुरु के पास जब भी हम जाएंगे, हम चरण स्पर्श करेंगे। एक बड़ी ही सुंदर पुस्तक अभी-अभी आई है — Living with the Himalayan Masters. स्वामी राम ने ये पुस्तक लिखी है। पुस्तक में स्वामी राम के गुरु, राम को पूछते हैं कि, “बेटा! जब भी हम सद्गुरु के पास जाते हैं, सद्गुरु के पैरों को हम स्पर्श करते हैं। न मस्तिष्क को, न हाथ को… सिर्फ सद्गुरु के चरणों की स्पर्शना हम करते हैं। तो इसका कारण क्या?”

स्वामी राम ने कहा कि, “गुरुदेव! हमारी परंपरा तो यही है कि हम सद्गुरु के पैरों को छूते हैं। लेकिन क्यों छूते हैं, वो मुझे मालूम नहीं है, आप ही बतलाइए।”

तब सद्गुरु ने बहुत बड़ी बात की। गुरु ने कहा कि, “सद्गुरु क्या है? सद्गुरु एक विशिष्ट संघटना है, ऐसी संघटना जो सिर्फ प्रभु में ही डूबी हुई है। कोई भी सद्गुरु को हम प्रभु के दरबार में कल्पे… कलापूर्ण दादा शंखेश्वर प्रभु के दरबार में पधारे हुए हैं। अब दादा प्रभु के चरणों में लेट जाएंगे, हम दादा के पीछे हैं। दादा पूरे के पूरे प्रभु के चरणों में लेट चुके हैं। उस समय हम पीछे हैं, तो हमारे सामने सद्गुरु के शरीर का कौन सा अंग आता होगा? सिर्फ दो पैर! दो चरण! क्योंकि सद्गुरु तो प्रभु में डूबे हुए हैं। सिर्फ दो चरण पीछे हैं। लेकिन वे दो चरण हैं, उनका स्पर्श हम कर लें, तो प्रभु के चरणों के स्पर्श तक हम पहुंच जाएं। सद्गुरु का चरण स्पर्श हमें प्रभु के चरण स्पर्श की ओर ले जाता है।”

तो दोनों बच्चों ने चरण स्पर्श किया। डोली वाले दौड़े। दोनों भाई थे, दो बच्चे… एक छः साल का, एक आठ साल का। अब छोटे बच्चे ने बड़े भाई से पूछा कि, “भाई! ये आचार्य भगवंत डोली में विराजमान हैं और ये डोली वाले दौड़ रहे हैं, तो क्या आचार्य भगवंत के शरीर का वजन उन्हें नहीं लगता होगा? वे कैसे दौड़ते होंगे?”

छः साल के बच्चे के मन में ये सवाल पैदा हो सकता है। लेकिन आठ साल के बच्चे ने जो उत्तर दिया, हमें लगेगा कि हमारी परंपरा में जो बच्चा पला है, उसके होठों से ही ये उत्तर निकल सकता है। ये माताएं यही तो काम करती हैं, बच्चों को शिक्षा देती हैं, संस्कार देती हैं। एक मां अपने बच्चों पर क्या काम कर सकती है!

मैं यहां आया, मेरी मां की वजह से। मैंने दीक्षा नहीं ली। निश्चय से कहूं तो प्रभु ने मुझे दीक्षा दी। लेकिन व्यवहार भाषा में मैं कहूंगा कि मेरी मां ने मुझे दीक्षा दी है।  

तो आठ साल के बच्चे ने कहा कि, “डोली में बैठे हैं, वो महाराज साहब हैं। महाराज साहब के हृदय में भगवान होते हैं, और जिनके हृदय में भगवान होते हैं, उनका वजन होता ही नहीं! वे निर्भार होते हैं।” तो ये माँ की शिक्षा थी। आठ साल के होठ से निकली थी लेकिन शिक्षा देने वाली उसकी मां थी।

अब मैं कहूं कि मेरी मां ने क्या किया? सात साल की मेरी उम्र और टाइफाइड हुआ। मेरा छोटा सा गांव, वहां मेडिकल सर्विसेस (Medical services) इतनी नहीं थीं, तो पास के टाउन (Town) के हॉस्पिटल (Hospital) में मुझे एडमिट (Admit) कराया गया। डॉक्टर (Doctor) बड़े होशियार थे। दवाई का कोर्स (Course) चालू हो गया। लेकिन सात पखवाड़े हुए, सेवन वीक्स (Seven weeks), फिर भी बुखार कम नहीं होता था। न खाने की रुचि, न बुखार का कम होना, और शरीर तो हुआ जैसे हड्डियों की माला।

उस समय मेरी मां की आंखों में आंसू आए। लेकिन मेरी मां प्रभु की बड़ी भक्त थीं। मां ने प्रभु के कोर्ट में बॉल (Ball) फेंक दिया। मां ने कहा कि, “प्रभु! ये मेरा बच्चा जिंदा रहेगा या नहीं रहेगा, ख्याल नहीं आता है। लेकिन यदि वह जिंदा रह गया, वह स्वस्थ हो गया, तो वह तेरा, मेरा नहीं।”

क्या समर्पण था मां का! बच्चा स्वस्थ हो गया तो “प्रभु बच्चा तेरा!” और क्या प्रार्थना का चमत्कार होता है! प्रार्थना तो बहुत ही स्पीड (Speed) से काम करती है, स्पीडली एक्टिवेट (Speedily activate) होती है। मां ने प्रार्थना की, मेरा स्वास्थ्य अच्छा होने लगा। तीन दिन में तो हॉस्पिटल से डिस्चार्ज (Discharge) मिल गया। घर पर हम पहुंच गए, मेरी स्कूल भी चालू हो गई।

बाद में एक दिन मां ने कहा कि, “बेटा! तू जब इतना अस्वस्थ हो गया था कि मुझे लगा कि तू रहेगा या नहीं रहेगा, तू जिंदा रह पाएगा या नहीं रह पाएगा, उस समय मैंने प्रभु से कहा था कि प्रभु मेरा बच्चा स्वस्थ हो जाएगा तो तेरा है।”

तो मैंने पूछा मां से, “तो मां मुझे क्या करने का है?”

तो मां ने कहा, “तुझे दीक्षा लेने की है।”

सिर्फ मां का वचन… “तुझे दीक्षा लेने की है।”

मैंने कहा, “मां मैं तैयार हूँ।”

मां का जो ऋण हमारे पर है, उस ऋण से मुक्ति हम कैसे कर पाएं? प्रभु का ऋण, सद्गुरु का ऋण और मात-पिता का ऋण… इन ऋणों से मुक्त होना हमारे लिए बिल्कुल क्वाइट इम्पॉसिबल (Quite impossible) है, अशक्य है। तो मैंने कहा, “मां मैं तैयार हूँ, जब तू कहेगी मैं दीक्षा ले लूँगा।”

मां ने कहा, “ऐसे दीक्षा नहीं ली जाती। दीक्षा के लिए गुरुदेव के पास जाना होगा, ट्रेनिंग (Training) लेनी पड़ेगी, और ट्रेनिंग में तू पास होगा, तो फिर तुझे दीक्षा मिलेगी।” ट्रेनिंग भी हो गई, दीक्षा के लिए पास भी हो गया और ग्यारह वर्ष की उम्र में मेरी दीक्षा हो गई। गुरुदेव थे uncle महाराज, ओंकार सूरी दादा। और दादा गुरुदेव थे, भद्र सूरी दादा।

भद्र सूरी दादा की आज पुण्यतिथि है। 49वीं पुण्यतिथि। 50वां समाधि पर्व वर्ष आज से शुरू होता है। और अगले ज्येष्ठ सुदी आठम को 50वां वर्ष पूरा होगा। तो ये दादा गुरुदेव हमारे युग के बड़े ही भक्तियोगाचार्य थे, बड़े ही साक्षी भाव के प्रणेता थे। मेरा शैशव उनके चरणों में बीता। वैसा कोई अभ्यास मैंने उस समय नहीं किया था दीक्षा के बाद तुरंत। लेकिन मुझे अभ्यास करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। दादा गुरुदेव जीवंत ग्रंथ थे! मैं दादा के पास बैठ जाता, दादा को देखता रहता। साक्षी भाव और समर्पण, ये प्रभु की साधना है। ये प्रभु की साधना को दादा गुरुदेव अस्तित्व के स्तर पर ले गए।

गुरुदेव के जीवन की एक घटना कहूं… एक आंख की रोशनी खत्म हुई ग्लूकोमा से, ग्लूकोमा — जामर उतर गया। एक आंख की रोशनी खत्म हो गई। दूसरी आंख में कैटरेक्ट (Cataract) आता था, मोतिया। ऑपरेशन (Operation) हुआ। ऑपरेशन फेल (Fail) हुआ। दोनों आंखों की रोशनी खत्म हो गई। लेकिन उस समय दादा गुरुदेव आनंद में थे। पीड़ा की, विषाद की एक तनिक रेखा भी दादा के चेहरे पर नहीं थी।

उन्होंने उस समय कहा था कि, “ये तो प्रभु का संकेत है। अभी तक मैं स्वाध्याय करता था। अब प्रभु कह रहे हैं कि स्वाध्याय का युग तेरा समाप्त हुआ, अब ध्यान में जाना है… तो अब मैं ध्यान में जाऊंगा।” दोनों आंखों की रोशनी खत्म हुई है, लेकिन घटना का कोई असर गुरुदेव के चेहरे पर नहीं, गुरुदेव के मन पर नहीं है!

दो शब्द हमारे वहां आए हैं — ‘घटना प्रभावित’ और ‘प्रभु प्रभावित’। आप सब प्रभु शासन में हैं तो आप तो सब प्रभु प्रभावित ही हैं, घटना प्रभावित तो नहीं होंगे ना? मोबाइल की रिंगटोन बज जाए और आपका ध्यान वहां जाए, तो आप घटना प्रभावित हो गए।

मैं एक संघ में गया था, कदंबगिरी से परम पावन शत्रुंजय तीर्थ का। संघ का पहला ही दिन। दोपहर तीन बजे प्रवचन शुरू हुआ। 1000 से ज्यादा यात्रिक थे, पंडाल खचाखच भरा हुआ था। मैंने मंगलाचरण किया। उद्घोषक भाई खड़े हुए और उन्होंने कहा कि मोबाइल को साइलेंस मोड (Silence mode) पर रख दो, अब प्रवचन शुरू हो रहा है। लेकिन प्रवचन शुरू भी हुआ और रिंगटोन भी बजने लगी! लेकिन मैं तो फ्लेक्सिबल (Flexible) आदमी हूँ, हंसने वाला। कोई घटना का असर मुझ पर नहीं होता, दादा गुरुदेव की वजह से। अब दो, तीन, चार बार रिंगटोन बजी, लोगों का ध्यान प्रवचन से वहां गया। तो मैंने कहा, “अरे! आप चिंता क्यों करते हो? ये सब यात्रिक दादा की यात्रा के लिए निकले हैं, 15 किलोमीटर सुबह चले हैं, एकासना किया है, दादा की इतनी भक्ति की है… अब रिंगटोन बजी तो दादा का फोन आया होगा!” यहां भी रिंगटोन बज गई है लेकिन फोन तो दादा का  था ना!

दूसरे दिन मैं चल रहा था। एक भाई मुझसे मिलने के लिए आए रास्ते में। उसने कहा, “महाराज साहब! कल का आपका प्रवचन पूरा तो याद नहीं रहा, लेकिन ये रिंगटोन वाली बात बहुत पसंद आ गई। मेरे मोबाइल फोन पर दादा का संदेश अभी तक नहीं आया है, लेकिन मैं इच्छा करता हूँ कि दादा को फोन लगाऊं, तो दादा का नंबर मुझे दो।” आपको चाहिए नंबर? तो मैंने कहा, “जिस फोन से तुम सामान्य आदमी से बात करते हो, उस फोन से तो प्रभु से बात नहीं हो सकती। तुम्हें सब नंबर डिलीट (Delete) करने होंगे।”

लेकिन वो भी खोपड़ी का था। उसने कहा, “महाराज साहब! पूरा बिजनेस मोबाइल पर जमा हुआ है, नंबर डिलीट करूं तो मेरा कारोबार कैसे चलेगा? लेकिन आज ही नया मोबाइल फोन लेकर आऊंगा और उसमें दादा का नंबर ही सेव (Save) करूंगा। अब नंबर बोलो।”

मैंने कहा, “दादा का नंबर याद रखने में तो बहुत ही सरल है, लेकिन लगाना बहुत कठिन है।”

उसने कहा, “देखो महाराज साहब! अब मैंने कह दिया कि नया मोबाइल फोन मैं लाता हूँ, अब आप नंबर के लिए ऐसा करो ये बात ठीक नहीं, आप दे दीजिए, आपको नंबर देना ही पड़ेगा।”

मैं तो तैयार ही था। तुम दादा के साथ बात करो तो मुझे तो बहुत अच्छा लगे ना! मंदिर में जाते हो, बात किससे करते हो? बोलो तो, बात किससे करते हो? प्रभु से या आजू-बाजू वालों से? 

मैं एक गांव में गया था। उस दिन चैत्य परिपाटी थी, 1000 आदमियों की चैत्य परिपाटी। मेरे नेतृत्व में चैत्य परिपाटी चली। मैं तो नया था उस गांव में। मेरे पास एक भाई था, उन्होंने कहा, “महाराज साहब! स्तवन का आदेश उस भाई को देना, चश्मे वाले को, उसका कंठ बहुत ही सुंदर है।” मैंने कहा ठीक है। उन्होंने आदेश मांगा, मैंने आदेश दे दिया। और क्या कंठ उनका! और क्या स्तवन! 15 मिनट तक सब लोगों को बांधे रखे, इतना सुंदर कंठ!

दूसरे दिन मैं वहां ही था। मंदिर में गया था और वे भाई आए। और चैत्यवंदन उन्होंने शुरू किया। तो मैंने सोचा कि मैं चैत्यवंदन बाद में करूंगा। ये चैत्यवंदन कर रहा है और ये स्तवन गाएगा, उसका स्तवन पहले सुन लूँ। कल बहुत मजा आया था। लेकिन ‘नमोSर्हत्-सिध्धाचार्योपाध्याय-सर्व-साधुभ्य: ! उवसग्गहरं पासं पासं वंदामि’ पांच मिनट में चैत्यवंदन पूरा! मैंने कहा, “क्यों भैया? कल तो स्तवन अच्छा गाया था, आज क्यों नहीं?” तो उसने कहा, “महाराज साहब! आज कोई सुनने वाला तो है नहीं।” तो तू प्रभु को सुनाने के लिए गाता था कि लोगों को सुनाने के लिए?

तो मैंने उसे नंबर दीया। आपको भी नंबर याद रह जाएगा — 10 टाइम 0 (10 Time 0)। बस ये नंबर है दादा का। 10 टाइम 0…0000 ….

Body-less Experience -First 0

Name-less Experience – Second 0

Mind-less Experience – Third 0

Family-less Experience – Fourth 0

उसने कहा, “महाराज साहब! आपने कहा ये बात ठीक थी, याद रखने में तो सरल है, लेकिन लगाने में बहुत मुश्किल लगता है।”

तो सद्गुरु ये काम करते हैं कि प्रभु के साथ आपका संबंध जोड़ देते हैं। मीरा ने प्रभु से कहा था कि, “प्रभु! तेरे पास मुझे आना है। मेरा अवतार कृत्य इतना ही है कि मैं तुझे मिल पाऊं। लेकिन मैं तेरे पास कैसे आऊं?” मीरा कहती है:

“ऊंचा ऊंचा महल पिया का, मासु चढ़ा न जाय,

पिया दूर, पंथ मारो झीणो, सूरत झकोरा खाय।”

मीरा कहती है, “प्रभु! कैसे मैं तेरे पास आऊं?” तीन अवरोध की चर्चा मीरा करती है।

पहला अवरोध — “पिया दूर।” प्रभु सिद्धशिला पर हैं, सात राजलोक दूर। मैं कैसे आऊं वहां?

चलो, इसके लिए मार्ग है… चौथे गुणठाणे पर, फिर पांचवें गुणठाणे पर, फिर छठवें गुणठाणे पर… ऐसे करते-करते चौदहवें गुणस्थानक पर और सिद्धशिला पर। लेकिन मीरा कहती है — “पंथ मारो झीणो।” कि मार्ग तो बहुत टफ (Tough) है। टफ क्या, टफेस्ट (Toughest) है! कैसे उस मार्ग पर मैं चलूं?

और तीसरी बात — “सूरत झकोरा खाय।” मार्ग कठिन है, अंधेरा छाया हुआ है और प्रभु की स्मृति का दीप जलता नहीं, बुझ जाता है। सदा ज्वलंत रहे स्मृति का दीप, तो भी चल जाऊं, लेकिन प्रभु की स्मृति का दीप भी सतत ज्वलंत नहीं रहता।

प्रभु की स्मृति, प्रभु का सुमिरन चंदनाजी के पास था। जब प्रभु चंदनाजी के घर से लौटे, तब चंदनाजी ने कहा था, “प्रभु! आप मेरे द्वार से कैसे जा सकते हो? एक सांस पर एक बार नहीं, एक सांस पर सौ बार मैं आपका सुमिरन करती हूँ, आप मेरे द्वार से कैसे जा सकते हो?” और वीरविजय महाराज कहते हैं कि चंदना के शब्दों पर, चंदना के अश्रुओं पर प्रभु को आना पड़ा है!

तो मीरा कहती है कि प्रभु तो दूर हैं, मार्ग बहुत कठिन है। मार्ग की कठिनता की बात आनंदघन जी भगवंत ने भी की, चौदहवें स्तवन के प्रारंभ में। उन्होंने कहा कि, “प्रभु! तलवार की धार पर चलना सरल है, लेकिन तेरे साधना मार्ग पर चलना कठिन है।” तलवार की धार पर चलेंगे, पैरों से लहू निकलेगा, लहू की धार निकलेगी, लेकिन जब तेरे साधना मार्ग पर चलना है, तब पूरे व्यक्तित्व को नष्ट करना होगा।” जब तक अहंकार पूर्णतया नष्ट नहीं होता है, तब तक प्रभु के साधना मार्ग पर हम चल नहीं सकते।

मीरा की प्रार्थना प्रभु ने सुनी। प्रभु ने क्या किया? लगता है कि सद्गुरु क्या करते हैं?

“मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, सद्गुरु दियो बताय।

जुगन-जुगन से बिछुरी मीरा को, लीनी घर में आय।”

प्रभु ने मीरा को इतना ही कहा कि, “ये तेरे सद्गुरु हैं। तू सद्गुरु के चरणों में बैठ जा। सद्गुरु मार्ग बता देंगे। और मुझे पाना है, तो सद्गुरु के जरिए ही तू मुझे मिल पाओगी।” सद्गुरु एक काम करते हैं, प्रभु से हमारा मिलन करवा देते हैं।

अब मीरा सद्गुरु के पास गई, सद्गुरु के चरणों में बैठ गई। सद्गुरु को ख्याल आ गया कि मीरा क्यों आई है। तो सद्गुरु ने कहा कि, “मीरा तु कहती है कि प्रभु दूर हैं, अरे प्रभु दूर कहां हैं?”

प्रभु के लिए एक विशेषण है — ‘अंतर्यामी’। अंतर्यामी शब्द के दो अर्थ होते हैं। एक अर्थ तो है अंतःस्तर को जानने वाला। और दूसरा अर्थ है हमारे अंतःस्तर में प्रविष्ट। जो है, वो अंतर्यामी है। तो हमारे भीतर क्या है? अंतर्यामी प्रभु हैं। एक ही प्रश्न पूछ लूँ? तुम्हारे भीतर, तुम्हारे केंद्र में तुम हो या प्रभु हैं? बोलो भैया! चाय-पानी पीकर आए हो ना? बोलो, तुम्हारे हृदय के केंद्र में, व्यक्तित्व के केंद्र में तुम हो या प्रभु हैं?

आप तो श्रावक हैं सब। आप को हम पत्र लिखे थे ना, यहां से विहार के बाद? दो बातें होंगी, या तो साथ में ले जाएंगे, और साथ में नहीं आओगे तो पत्र तो लिखेंगे! ‘सुश्रावक’ लिखेंगे। तो सुश्रावक का अर्थ यही होता है कि जिसके केंद्र में प्रभु प्रतिष्ठित हो गए। हम मुनि हैं तो हमारे केंद्र में भी प्रभु प्रतिष्ठित हैं, आप श्रावक हैं, आप श्राविका हैं, तो आपके हृदय में भी प्रभु प्रतिष्ठित हैं। क्योंकि प्रभु ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। प्रभु ने ऐसा नहीं कहा कि “जो संसार छोड़ दे, उसको मैं मेरे धर्म संघ में स्थान दूँ, और जिसको संसार में रहना है उसको मैं कैसे स्थान दूँ?” ऐसा प्रभु ने नहीं कहा। प्रभु ने कहा, “जो निर्बलता के वश, मोहनीय कर्म के वश संसार में रहा है, लेकिन जिसकी दृष्टि मेरी आज्ञा की ओर है, उसको भी मैं मेरे धर्म संघ में स्थान देता हूँ।”

तो आपके केंद्र में आज से कौन? बोलो तो! मैं बोला हूँ और आप बोलो ऐसा नहीं, आप हृदय से बोलो। और एक बात आपसे कह दूँ, केंद्र में प्रभु आ जाएं तो मजा ही मजा, आनंद ही आनंद! फिर प्रभु चिंता करेंगे, हम क्यों चिंता करेंगे? मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता है, लोग मुझे कहते हैं कि तुम तुम्हारे स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते, तब मैं कहता हूँ कि, “मैं क्यों रखूं? वो रखेगा!” उसकी बातें मुझे करनी हैं, जब तक शरीर को ठीक रखेगा, उसकी बात मैं करता रहूंगा। उसकी जो इच्छा, मेरी कोई इच्छा ही नहीं!

तो आज से आप सबके केंद्र में प्रभु आ गए। नक्की?

तो गुरुदेव ने मीरा से कहा, “प्रभु अंतर्यामी हैं, प्रभु दूर कहां हैं!” जब प्रभु दूर ही नहीं हैं, तो मार्ग की कठिनाई कैसी? और मार्ग ही नहीं है तो फिर दीप जलता है कि नहीं जलता है, उसकी फिक्र कौन करेगा?

तो प्रभु ने मीरा को गुरु के पास भेजा और सद्गुरु ने मीरा को प्रभु दिया। कैसी एक चैनल (Channel) है! बोलो! आज ऐसे सद्गुरु हमारे हो गए, जिन्होंने हमें प्रभु दिए, प्रभु का मार्ग दिया। ऐसे सद्गुरु के ऋण से कभी भी हम मुक्त नहीं हो सकते। ऋण मुक्ति का उपाय एक ही है कि गुरुदेव को जो इष्ट था — प्रभु की आज्ञा का पालन — उसका पालन हम ज्यादा से ज्यादा करें। यही हमारे लिए गुरुदेव की ऋण मुक्ति का एकमात्र उपाय है।

तो कुमारपाल महाराजा ने प्रभु से प्रार्थना की और प्रभु ने कुमारपाल महाराजा को इतना आनंद दिया, इतना तो आनंद दिया! कैसा आनंद दिया? कुमारपाल महाराजा ने कहा है कि, “शब्दों में मैं उस आनंद की व्याख्या नहीं कर सकता हूँ। Beyond the words ! Beyond the expectation !” प्रभु जो आनंद देते हैं वो आनंद Beyond the words ! Beyond the expectation ! तो प्रभु ने दिया, सद्गुरु ने दिया। आज प्रभु के चरणों में, सद्गुरु के चरणों में शत-शत नमन।

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