सद्गुरु
सद्गुरु का अर्थ है जिसने अपना हृदय Totally vacant कर दिया, बिल्कुल शून्य कर दिया। फिर उस रीतापन में, उस शून्यपन में परमात्मा का अवतरण हो जाता है। जिस चेतना में परम चेतना का अवतरण हुआ, वह सद्गुरु चेतना।
सद्गुरु के आपके प्रति खुलनेवाले दो ही कार्य हैं। एक कार्य है आपमें अगर प्रभुमिलन की प्यास नहीं जगी है, तो उसे जगाना। और दूसरा कार्य है कि अगर आपमें वह प्यास जग गई है, तो प्रभु से आपका मिलन कराना!
प्रभु से आपका मिलन कराने के लिए ज़रूरी है आपको निर्मल बनाना। गुरु चेतना यह कार्य करती है; आपको, आपके हृदय को निर्मल बनाती है। और जैसे ही आपका हृदय निर्मल बना, परम चेतना उसमें अवतरित हो जाती है।
परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा के सम्मुख प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! मेरी इतनी ही इच्छा है कि तेरी आज्ञा का पालन निशदिन इस काया से, इस वचन से, इस मन से हुआ करे। और आज्ञा पालन का आनंद इतना तो मुझे मिले कि मैं सदा ही आज्ञा पालन के आनंद में फिरता रहूँ, नाचता रहूँ।”
कुमारपाल महाराजा को कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य ने एक विशेषण दिया था — ‘परम आर्हत’। ‘आर्हत’ का अर्थ है प्रभुमय व्यक्तित्व, और ‘परम आर्हत’ शब्द का अर्थ है प्रभुमय अस्तित्व। हमारे व्यक्तित्व को, परमात्मा मय व्यक्तित्व को, हमें अस्तित्व में पलटना है। और इसके लिए संत कबीर जी ने दो सूत्रों का सेट (Set) दिया है।
पहला सूत्र है: “बूंद समाना समुंद में।”
और दूसरा सूत्र है: “समुंद समाना बूंद में।”
पहला सूत्र, “बूंद समाना समुंद में।” जीवन का यह बूंद संसार की मरुभूमि पर गिरेगा, तो क्या होगा? खत्म हो जाएगा, विलीन हो जाएगा। लेकिन यही बिंदु समंदर में गिरेगा तो? शाश्वती के लय में पलट जाएगा। वह बिंदु समुद्र में घुल गया, मिल गया, और समुद्र बन गया।
कलापूर्णसूरी भगवंत को हमने देखे हैं। दौलतसागरसूरी महाराज साहब को आप सबने देखे हैं। ऐसे जो महापुरुष थे, उन्होंने क्या किया था? एक ही काम किया था — जीवन की बूंद को परमात्मा को समर्पित कर दिया। “प्रभु, ये तेरा है। मेरा कुछ नहीं।” आप भी स्तवन में तो बोलते हो, “में प्रभु तेरा…तू प्रभु मेरा।” प्रभु तो अपने हैं ही, लेकिन हम प्रभु के हुए?
पहले के युग में बहना शादी करके घर पर आती थी, तब कहती थी पतिदेव से कि, “मैं आपकी हो गई। अग्नि की साक्षी से मैं आपकी हो गई। लेकिन पीयर से जो लेकर आई हूँ, वो मेरा है।” आप तो ऐसा नहीं कहेंगे? “मैं प्रभु तेरा, लेकिन मेरा है तो मेरा!” तो ऐसे महापुरुषों ने पूरा जीवन प्रभु के चरणों में उंडेल दिया। मीरा ने तो कहा:
“चौपट खेलूं पीव सूं …”
बहुत बड़ी बात की। खेल खेलना है, चौपड़ की, शतरंज की लीला करनी है। लेकिन प्रभु के बिना किसके साथ मैं खेलूं? मैं बतियाऊं तो भी प्रभु से। मैं खेलूं तो भी प्रभु से। प्रभु के सिवा संसार में कोई चीज, कोई व्यक्ति मीरा के लिए है ही नहीं। तो मीरा ने कहा, “चौपड़ खेलूं पीव सूं, तन मन जोर लगाय।” और फिर भी ये होगा, या तो मीरा हारेगी या तो प्रभु हारेंगे। एक जीतने वाला है, एक हारने वाला है। तो मीरा कहती है:
“हारी तो पीव की भयी”, मैं हार गई तो प्रभु की हो गई! “जीती तो पीव मोर!” और मैं जीत गई तो प्रभु मेरे हो गए! दोनों ओर लड्डू। हार गई तो मैं प्रभु की हो गई, मैं जीत गई तो प्रभु मेरे हो गए।
तो ये जो महापुरुष —कलापूर्णसूरी दादा, सिद्धिसूरी दादा, दौलतसागरसूरी दादा ये सब महापुरुष, महापुरुष कैसे हुए? एक ही बात थी, वे थे ही नहीं, प्रभु ही थे।
सद्गुरु का अर्थ क्या है? सद्गुरु ने अपना हृदय टोटली वेकेंट (Totally vacant) किया हुआ है, बिल्कुल शून्य। और उस रीतापन में, उस शून्यपन में परमात्मा का अवतरण होता है। और इसलिए एक स्टेटमेंट (Statement) मैं बार-बार देता हूँ: There is the same fragrance and the same taste in all the respected Sadguru. जो पहुंचे हुए सद्गुरु हैं, उन सबका आस्वाद एक सरीखा, उन सबकी सुगंध एक सरीखी। कारण, वो जो सुगंध है वो परमात्मा की सुगंध है, वो जो आस्वाद है वो परमात्मा का आस्वाद है। सद्गुरु के चरणों में आप बैठो और उनकी पावन बॉडी (Body) से जो ऊर्जा बिखर रही है, उस ऊर्जा को यदि आप प्राप्त कर सको, तो आपको भी मालूम हो जाए कि परम चेतना क्या होती है।
हमारे वहां एक परंपरा है… गुरु व्यक्ति, एक गुरु चेतना, और परम चेतना। दौलतसागरसूरी महाराज साहब थे, बहार से हम गुरु का दर्शन करते थे, तब हमारे लिए एक गुरु व्यक्ति। लेकिन अपने भीतर वो गुरु चेतना थे। गुरु चेतना का मतलब यही है कि जिस चेतना में परम चेतना का अवतरण हुआ, वो सद्गुरु चेतना। तो सद्गुरु व्यक्ति, सद्गुरु चेतना और सद्गुरु चेतना के साथ हमारा मिलन हो गया, तो सद्गुरु परमात्मा से हमारा मिलन करा ही देंगे।
सद्गुरु के आपके और खुलते दो ही कार्य हैं। एक तो कार्य है प्रभु की प्यास जगाना। प्यास नहीं जगी है? सद्गुरु के चरणों में आकर बैठो। सद्गुरु परम चेतना की प्यास जगा देंगे। और ये तो सब पुणे वाले हैं, प्यास तो जग गई है, मेरा काम तो कितना है? मिलन करा देने का! प्यास तो जगी है, तभी तो 8 बजे दौड़ के आते हो। प्यास जगी हुई है, अब मिलन करा देना है।
एक सद्गुरु को एक युवान ने पूछा था कि, “गुरुदेव! प्रभु से कैसे मिलना?”
“सूली ऊपर सेज पिया की” “सूली ऊपर सेज पिया की, किस बिध मिलना होय?”
और उस समय सद्गुरु ने एक छोटा सा सूत्र दिया: “तुम मिटो तो मिलना होय।”
तुम मिट जाओ, तुम्हारे अहंकार को दूर कर दो, तुम पिघल जाओ; मिलन ये रहा! सूरदास जी मिट गए, प्रभु को पा गई। मीरा जी मिट गईं, प्रभु को पा गईं। चंदना जी मिट गईं, प्रभु को पा गईं।
आज एक बिल्कुल नई बात मैं आपसे कह रहा हूँ। और ये नई बात सिर्फ माताओं के लिए, बहनों के लिए है। स्त्री देह में एक विशेषता है। स्त्री देह में ऐसी एक रासायनिक प्रक्रिया होती है कि स्त्री बहुत ही झड़प से (जल्दी) समर्पित हो सकती है। पुरुष अकडू है। हम अकडू है! आपको तो गुस्सा आ गया! मजा आ गया..! पुरुष अकडू है। लेकिन स्त्री देह जल्दी पिघल जाता है। और समर्पण ही हमारी साधना पद्धति है। समर्पण से ही हमारी साधना शुरू होती है और समर्पण ही साधना का आखिरी बिंदु है।
ये जो समर्पण है, बहनों के पास ज्यादा है। अब उपधान कराएंगे, बड़ी-बड़ी पत्रिका छपेगी, 200 आराधक हैं। लेकिन आप शाता पूछने के लिए आओगे तब पता चलेगा, भाई तो 20 हैं, 180 तो बहनें हैं। धर्म के मामले में माताएं-बहनें बहुत ही आगे हैं। मैं बहुत बार बहनों से बात करता हूँ कि आप एक सामायिक तो करती ही हो, लेकिन आपको दो करनी चाहिए, एक श्रावक की ओर से! ये तो करने वाले हैं नहीं, मुझे भरोसा है ना! लेकिन पुणे वालों का भाव हम सबको पसंद आया। और पुणे वाले इतने पसंद आ गए हैं कि चातुर्मास के बाद ऐसे ही जाना हमको अच्छा नहीं लगता, थोड़े पुणे वालों को लेकर जाएं।
तो संत कबीर जी ने दो सूत्र दिए। पहला सूत्र: “बूंद समाना समुंद में।” और फिर दूसरा सूत्र क्या है? “समुंद समाना बूंद में।”
कलापूर्णसूरी दादा को हम निहारते है, दौलतसागरसूरी महाराज साहब को हम निहारते, उनकी नन्ही सी काया में परम चेतना का समंदर कैसा लगता था! हम देखते रहते, लगता कि ये परम चेतना तो यहां आ गई! और इसीलिए कहा शास्त्रों में, “तित्थयरसमो सूरी” आचार्य भगवंत जो होते हैं वो तीर्थंकर के समान होते हैं। क्योंकि परम चेतना का प्रवेश उनके हृदय में हो गया है। और आपसे मैं कहूंगा कि परम चेतना के मन में ऐसी कोई बात नहीं कि संतों के हृदय में प्रवेश करना है और आपके हृदय में प्रवेश नहीं करना।
प्रभु तैयार हैं। मेरा एक लोगो (Logo) है: He is ever ready. Chintamani Parshwanath Dada is ever ready, तैयार है! आपको मालूम नहीं होगा, परम चेतना आपकी प्रतीक्षा कर रही है। He is waiting for you. He is waiting for us. और इसीलिए परम चेतना गुरु चेतना को भेजती है कि, “जाओ भाई, पुणे पहुंच जाओ। सब पुणे वालों के हृदय में मुझे अवतरित होना है, तो इनिशियल स्टेज (Initial stage) का काम करो।”
परम चेतना और गुरु चेतना में काम बंटे हुए हैं। इनिशियल स्टेज का, प्रारंभिक स्तर का कार्य गुरु चेतना करेगी। और बाद का कार्य परम चेतना करती है। गुरु चेतना क्या करती है? गुरु चेतना आपको निर्मल बनाती है। और जैसे ही आपका हृदय निर्मल बना, परम चेतना का अवतरण होता है।
संत दादू… भक्त रैदास के आंगन में। रैदास अपने काम में डूबे हुए हैं, जूते सांध रहे हैं। ख्याल नहीं कि सद्गुरु देव आंगन में पधारे हैं। एक मिनट, दो मिनट, तीन मिनट… रैदास अपने काम में डूबे हुए हैं। और सद्गुरु खिड़की पर खड़े हुए हैं। सद्गुरु पीछे लौटते नहीं हैं। ऐसा नहीं सोचते, “तीन-तीन मिनट हो गए और रैदास को ख्याल भी नहीं आता है, चलो मैं चला जाऊं।” नहीं। गुरु चेतना को वो कार्य करना है जिस कार्य की जिम्मेदारी परम चेतना ने गुरु चेतना को दी हुई है।
ऐसे परम चेतना परम सक्रिय और गुरु चेतना परम निष्क्रिय। “हमें कुछ भी करना नहीं है, जो उसकी आज्ञा है, जो प्रभु की आज्ञा। हमारी कोई इच्छा नहीं।” हम टोटली चॉइसलेस (Totally choiceless) हैं। तीन मिनिट हो गए।
रैदास को ख्याल नहीं आता है, तब गुरु आवाज देते हैं, “रैदास!”
अब रैदास चौंके। “अरे! ये तो गुरु की आवाज!” पलकें ऊंची उठीं, देखा ये तो सद्गुरुदेव। फिर तो सोय -दोरा एक ओर, जूते एक ओर, साष्टांग दंडवत होकर गुरु के चरणों में रैदास गिरे। गुरुदेव को आसन पर विराजमान किया और रैदास सिसक-सिसक कर रोने लगे, फूट-फूट कर रोने लगे। एक ही बात, “गुरुदेव! आप आए, मुझे ख्याल नहीं रहा?” पुणे वाले तो तैयार हैं हों। 18 की सुबह कितनी दूर आ गए, टनल (Tunnel) के भी उस पार! तो यही बात है, गुरु ही टनल को पास कराते हैं ना? तो आप टनल के उस छोर पर आ गए, गुरुदेव के साथ-साथ टनल को पास कर लो। ठीक है?
“गुरुदेव, आप आ गए, मुझे ख्याल भी ना रहा।” आज गुरु को बड़ा मजा आया। ऐसा नहीं था कि गुरुदेव कभी रैदास के घर पर नहीं आए थे। ऐसा भी नहीं था कि रैदास पहले गुरु के आश्रम नहीं गए हुए थे। लेकिन आज रैदास भीगे भीगे। “तुम्हारे आंसू सिर्फ काफी हैं, दूसरा कुछ हमें नहीं चाहिए।” मिट्टी भीगी-भीगी हो गई, फिर आकार देना है। कितनी बार लगे? शिल्पी के हाथ में मिट्टी आई और शिल्प बन गया।
गुरु ने कहा रैदाससे, “मैं तो तीन मिनट से यहां खड़ा था और तुझे पश्चाताप होता है कि गुरुदेव कब के आए होंगे, कब से खड़े रहे होंगे। बेटा! मैं तो तीन मिनट से ही खड़ा हूँ यहाँ। लेकिन परमात्मा तेरे द्वार पर आकर तेरी प्रतीक्षा कर रहा है जन्मों-जन्मों से, तुझे ख्याल है?”
अब चौंकने की बारी रैदास की थी। “प्रभु मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं?”
आपको मैं कहूं, ‘Chintamani Dada is waiting for you, क्या होगा? रोयां-रोयां खिल उठेगा? क्या होगा? “अरे गुरुदेव! क्या कहते हो आप?! एक सद्गुरु हमारी प्रतीक्षा करे वो भी बड़ी बात है, लेकिन परमेश्वर, त्रिलोकेश्वर, अखिल ब्रह्मांडेश्वर, वे हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं?” रैदास इतने तो भीगे हो गए गुरु के साथ-साथ, गुरु के पीछे-पीछे रैदास खुली दुकान को छोड़कर निकल गए, प्रभु को भेंटने!
तो ये बात है कि परम चेतना सद्गुरु चेतना को आपके द्वार पर भेज देती है कि, “जाओ, उनको तैयार करो। मुझे आना है।”
ऐसा है… एक गिलास है, ऊपर तक धूल से भरा हुआ है। अब इसमें पानी डालोगे तो क्या होगा? कीचड़ होगा। तो क्या करना चाहिए? धूल को निकाल लेना चाहिए, गिलास को पोंछ लेना चाहिए, स्वच्छ करना चाहिए और फिर निर्मल जल आएगा तो पीने के लिए काम आएगा। तो प्रभु तो बरस ही रहे हैं। एक क्षण ऐसा नहीं, एक सेकंड ऐसा नहीं कि प्रभु न बरसते हो। प्रभु का प्रेम सतत बरस रहा है। लेकिन उस प्रेम को हम झेलेंगे किस पात्र में? हमारा हृदय का पात्र राग और द्वेष की, अहंकार की धूल से भरा हुआ है। अब इसमें प्रभु के प्रेम का जल गिरेगा तो फिर होगा क्या? तो सद्गुरु क्या करेंगे? सद्गुरु आपके हृदय को निर्मल कर देंगे।
सद्गुरु कहेंगे कि, “भैया, तू क्रोध कर रहा है। तू क्यों क्रोध कर रहा है?”
अपन क्या कहेंगे? “साहब, मैं कहाँ क्रोध कर रहा हूँ? उस आदमी ने ऐसा कहा तो मुझे गुस्सा आ गया।” आप तो बिल्कुल निर्दोष, निरंजन, निराकार! दोष जो भी है सब दूसरों के!
एक फिलोसोफेर ने लिखा है, आज के आदमी के पास पारसमणि है, पारसमणि है तो क्या होगा? लोहे को सोने में बदल देता है। तो जो क्रोध दूसरों के पास है और बुरा है, वो आपके पास आएगा तो अच्छा हो जाएगा! ठीक है?
आप कहेंगे, “साहबजी, थोड़ा-थोड़ा क्रोध तो चलता है, थोडा थोडा…”
एक सेठजी प्रवचन में गए थे। प्रवचन में महाराज साहब ने कहा कि क्रोध से कितना नुकसान होता है। उस आदमी को इतना गुस्सा आता था कि घर पर जब तक वो हो, तब घर में शांति नहीं। सब घर वाले इछते कि बाहर जाए भाई साहब। वह भी कंटाल गया था। प्रवचन के बाद महाराज साहब के पास में गया और कहा, “साहब जी! मुझे क्रोध बहुत आता है। मैं क्या करूं?” गुरुदेव बड़े मनोवैज्ञानिक आयाम के आचार्य थे। उन्होंने समझा कि ऐसे मैं कहूंगा कि क्रोध नहीं करना, तो बस ऐसे-ऐसे करके चला जाएगा। गुरुदेव ने कहा, “सचमुच तुझे क्रोध नापसंद है? सचमुच?”
उसने कहा, “सचमुच।”
“तो एक नियम ले, जिसके ऊपर क्रोध आ जाए उसको ₹100 दे देना।” बड़ा मनोवैज्ञानिक आयाम था कि क्रोध के सामने लोभ को टकराओ। क्रोध नहीं जाता है तब लोभ को सामने लाओ। इतना कंटाल गया होगा कि उसने नियम ले लिया कि जिस पर गुस्सा आएगा, ₹100 का नोट दे दूंगा।
प्रवचन हॉल से बाहर निकला। टैक्सी वाले को बुलाया, क्राफट मार्केट जाना है, बैठ गया। टैक्सी वाले ने सोचा कि ये सेठ शायद मुंबई के नहीं लग रहे, बाहर के लग रहे है, थोड़ा घुमा कर टैक्सी को लेजाता हु, मीटर चढ़ जाए। तो मार्केट का रास्ता यहां, टैक्सी घुमाई यहां! और सेठ आगबबूला हो गए! “क्या करते हो? मार्केट कहां पर है? टैक्सी कहां पर ले जा रहे हो?” ड्राईवर समझ गया,शेठ मुंबई वाला है। मार्केट में पहुंच गए। ₹57 का बील हुआ।
टैक्सी वाले ने कहा, “₹57।” सेठ जी को नियम याद आया! सेठ जी ने ₹157 दिए। टैक्सी वाले ने कहा, “अरे सेठ जी, ओनली 57, नॉट 157!” सेठ ने कहा, “मुझे पता है। मैं पाई-पाई का हिसाब रखने वाला हूँ। एसेही 100 रूपया थोड़ी दे दूंगा, लेकिन आज मैंने नियम लिया है कि जिस पर गुस्सा आ जाए उसको ₹100 दे दूँगा।” टैक्सी वाले ने सोचा कि ये सेठ जी बहुत अच्छे हैं! सेठ जी कल टैक्सी लेकर कहाँ पर आना है?
कुमारपाल महाराजा ‘परम आर्हत’… उन्होंने अपने व्यक्तित्व को, परममय व्यक्तित्व को परममय अस्तित्व में बदल दिया। हमने भी दीक्षा ली, उस समय क्या हुआ? जहां तक हमने दीक्षा नहीं ली थी, हमारे केंद्र में भी हम ही थे, हमारा अहंकार था। लेकिन जिस क्षण ये रजोहरण मिल गया, केंद्र बदल गया। केंद्र पर प्रभु आ गए, केंद्र पर प्रभु की आज्ञा आ गई। हम परिध में चले। और आज कहूंगा, मैं Ever Fresh Ever Green हूँ!
आप तो पूछते हैं, “साहब जी साता में?” आपको भी कोई पूछता होगा ” साता में हो? कैसे हो, किधर हो?” तो आप क्या कहेंगे? “लक्ष्मीजी पसाय” क्या कहेंगे? लेकिन आपको मालूम है? लक्ष्मी अलग चीज है, पैसा अलग चीज है। मैं बहुत बार कहता हूँ अंग्रेजी में शब्द है ‘रिच मैन’ (Rich man)। उसका हिंदी पर्याय कोई ‘पैसे वाला’ कर दे तो मुझे कोई दिक्कत नहीं। लेकिन ‘लक्ष्मी वाला’ करे तो मुझे दिक्कत है। लक्ष्मी अलग संघटना है, पैसा अलग संघटना है।
हमारी हिंदू संस्कृति में, अपनी जैन संस्कृति में लक्ष्मी जी का कितना महत्व है! पर्युषण पर्व आएगा, फिर चढ़ावे शुरू होंगे, चाहे दोपहर को होंगे चढ़ावे या सुबह को होंगे, आप चाय बाय पि कर आए होंगे… पहला स्वप्न, दूसरा स्वप्न, तीसरा स्वप्न… नींद पूरी नहीं होती! लेकिन जब चौथा स्वप्न — लक्ष्मी जी — तब कितने अलर्ट! तो लक्ष्मी जी का मतलब क्या है? जो धन आपके पास है और समाज के, संघ के, राष्ट्र के उपयोग में आए, वो लक्ष्मी है। और जो आपके पास है और आपके और आपके परिवार के काम में आए, वो पैसा है।
आज पुणे वालों को आशीर्वाद देना है, सब लक्ष्मीवान हों जाये! और मुझे बहुत ही आनंद होता है कि जो जैनो के पास जो श्रद्धा है, जो भक्ति है, जो समर्पण है, शायद ही कहीं और मिलेगा। स्वद्रव्य से जिनालय बनाना है, लोग लाइन में खड़े हो जायेंगे। हमारे पास इतने नंबर हैं। लोग कहते हैं, “साहब जी! स्वद्रव्य से जिनालय बनाना है, किसी को विहार धाम बनाना है, किसी को उपाश्रय बनाना है, किसी को संघ काढ़ना है, किसी को उपधान कराना है।” हमारे जैसे संतों को तो समय ही नहीं मिलता है! पांच-पांच साल का हमारा बुकिंग होता है! लोग इतने भावुक हैं। बस हमारे पास पैसे आएं। लेकिन पैसे किनके? प्रभु के। ठीक है? आप वेलसेट है। मजा में है। लेकिन प्रभु की कृपा से! पुण्य किया ना। लेकिन पुण्य के भी मालिक कौन? पुण्य के मालिक परमात्मा। नव तत्त्व किन्होंने बतलाए? प्रभु ने बतलाए। तो तुम्हारे पास जो भी है, वो प्रभु का है। हमारे पास जो भी है, वो प्रभु का। हमारे तो एक-एक क्षण पर प्रभु का अधिकार है।
प्रभु दत्त क्षण! हमारे एक-एक क्षण प्रभु दत्त हों। प्रभु द्वारा बिलकुल जिस पर सिग्नेचर हुआ हो, ऐसी हमारी क्षण है। तो बहुत ही सुंदर प्रभु का शासन मिला है। कुमारपाल महाराजा बहुत सुंदर प्रार्थना कर रहे हैं कि, “प्रभु! तेरी आज्ञा का पालन ऐसे करूं, ऐसे करूं, कि आज्ञा के पालन के आनंद में झुमु, झुमु, में मग्न रहूँ।”
