प्रभु-माँ
प्रभु जैसी माँ मिल जाए, कितना बड़ा सौभाग्य हमारा होगा! सर्वशक्तिमान, अखिलेश्वर, त्रिलोकेश्वर परमात्मा हमारी माँ हो! फिर हमें जो भी चाहिए, तत्क्षण मिल जाएगा। प्रभु तो माँ बनने के लिए तैयार हैं; पर क्या आप बालक बनने के लिए तैयार हैं?
बच्चे की सिर्फ एक लाक्षणिकता है। बीमार हो गया, पेट में दर्द है, भूख लगी है – कुछ भी तकलीफ है, कुछ भी चाहिए; बच्चा सिर्फ माँ के सामने देखेगा। सिर्फ माँ ही बच्चे के लिए पूरी दुनिया है; माँ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। हम भी प्रभु-माँ के बच्चे तभी बन सकते हैं, जब सिर्फ माँ की ओर ही हमारी दृष्टि जाती हो।
जीवनमें कोई भी तकलीफ आए, सिर्फ प्रभु के सामने हम देखेंगे और प्रभु से निवेदन करेंगे कि “प्रभु! मुझे समाधि दो”। साधना के भी किसी अग्रिम पड़ाव पर पहुंचने के लिए हमारी एक ही बात हो : “प्रभु! यह पड़ाव मुझे दे दो” और प्रभु दे देंगे! साधना भी प्रभु देंगे; साधना का आनंद भी प्रभु देंगे।
परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! तेरी आज्ञा का पालन तेरी कृपा से होगा और साधना का आनंद भी तेरी कृपा से मुझे प्राप्त होगा।” साधना का पूरा कर्तृत्व प्रभु के पास है। प्रभु की कृपा के बिना साधना मार्ग में हम एक इंच, एक सेंटीमीटर भी चल पा नहीं सकते। साधना प्रभु करवाते हैं। साधना का आनंद भी प्रभु देते हैं। बस, हमें तो सिर्फ प्रार्थना करनी है।
एक बच्चा मां से क्या कहेगा? एक बच्चा स्कूल से घर लौटा और मम्मा से बच्चे ने कह दिया कि, “मां! ये वाटर बैग अब नहीं चलेगा। ईगल का मरून कलर का फ्लास्क मुझे चाहिए। और ऐसा वाटर बैग कल नहीं प्राप्त हुआ, तो मैं स्कूल नहीं जाऊंगा।” मम्मा ने शॉपिंग करके ऐसा ही वाटर बैग ला दिया और बच्चे के कंधे पर टांग दिया। बस, यही बात है। साधना के किसी भी पड़ाव पर हमें जाना है, प्रभु से कह देना है— “प्रभु! ये चाहिए।” प्रभु हमारी मां हैं।
एक बात मैं आपसे पूछूं आज? प्रभु जैसी मां मिल जाए, कितना बड़ा सौभाग्य हमारा होगा! आपको पसंद आ गई बात? प्रभु हमारी मां हो! सर्वशक्तिमान, अखिलेश्वर, त्रिलोकेश्वर परमात्मा हमारी मां हो! फिर हमें जो भी चाहिए, तत्क्षण मिल जाएगा। तो प्रभु मां बनने के लिए तैयार हैं। आप बालक बनने के लिए तैयार हैं? बोलो तो? बच्चे की लाक्षणिकता क्या होती है? छह मास का एक बच्चा बीमार हो गया। मां पूरी रात जगेगी बच्चे के लिए। मां का तो प्यार है, ‘मेरा बच्चा!’ लेकिन जो छह मास का बच्चा है, उसकी भी एक सज्जता है। और सज्जता क्या है? कि बीमार हो गया, पेट में दर्द होता है, वो मां के सामने देखेगा। भूख लगी है, वो मां के सामने देखेगा। किसी भी चीज चाहिए, वो मां के सामने देखेगा। उस बच्चे के लिए मां के बिना दुनिया कुछ होती ही नहीं है। मां ही सिर्फ उसके लिए पूरी दुनिया है।
तो हम प्रभु रूपी मां के बच्चे तब बन सकते हैं, जब हमारे लिए एक मां की ओर ही दृष्टि जाती हो। कोई भी तकलीफ हो, प्रभु के सामने हम देखेंगे और प्रभु से निवेदन करेंगे कि— “प्रभु! मुझे समाधि दे दो।” प्रभु के पास तुम साधना के कोई भी पड़ाव को मांग सकते हो कि— “प्रभु! ये देना ही पड़ेगा!” प्रभु देने के लिए तैयार हैं। लेकिन हमारी सज्जता यही होनी चाहिए कि हमारी नजर, हमारी दृष्टि सिर्फ परमात्मा की ओर टिकी हो। कोई भी दर्द आ गया, परमात्मा से ही वो दर्द निकलेगा। ये हमारी श्रद्धा होनी चाहिए। हम दूसरे कहीं भी जगह पर नहीं जाएंगे। एक ही बात, जो भी होगा मेरे प्रभु से होगा। तो प्रभु हमारी मां हैं। साधना के किसी भी अग्रिम पड़ाव को पहुंचने के लिए एक ही बात करनी है— “प्रभु! ये पड़ाव मुझे दे दो।” और प्रभु दे देंगे। तो साधना भी प्रभु देंगे, साधना का आनंद भी प्रभु देंगे।
मुम्बई में आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वरजी म.सा. की प्रवचन धारा चल रही थी। एक युवा पहली बार आचार्य श्री के प्रवचन में आया। उस दिन आचार्यश्री ने प्रवचन में कहा कि, “तुम्हें जो मिला है, प्रभु की कृपा से मिला है। अब प्रभु की कृपा से जो मिला है, उसमें से तुम्हारा कितना और प्रभु का कितना? सब प्रभु का है ना? मैं बार-बार कहता हूं— You are only the trustee and not the owner. You are only the trustee and not the owner. तुम्हारी संपत्ति के तुम ट्रस्टी हो, मालिक नहीं। मालिक तो परमात्मा है।”
आचार्यश्री की यह प्रवचन धारा… प्रवचन पूर्ण हुआ। एक युवान आचार्यश्री के वंदन के लिए आया और उसने कहा— “गुरुदेव! मुझे नियम दो कि जो भी मैं कमाऊंगा, मार्च एंडिंग पर जो नेट प्रॉफिट रहेगा, उसमें से 10% मैं चैरिटी में खर्चूंगा। आप जैसे गुरुदेव जैसा फरमाएंगे, वैसे मैं खर्च करूंगा। लेकिन 10% मेरा नहीं, प्रभु का।” नियम ले लिया।
तीन वर्ष के बाद ये युवा फिर से आचार्य श्री को मिला। आचार्य श्री पहचान गए— “अरे! ये तो 10% वाला आ गया!” बहुत बड़ी घटना है सुंदर… आचार्य श्री ने पूछा कि, “तुम्हारा नियम तो चल रहा है ना? मुझे याद है कि तीन वर्ष पहले तूने मेरे पास नियम लिया था कि जो भी नेट प्रॉफिट होगा उसमें से 10% चैरिटी में खर्चूंगा। तो नियम तेरा चालू है ना?”
उस युवान ने कहा— “महाराज साहब! नियम चालू भी है और नहीं भी चालू है।” “अरे भैया! ऐसा तो कैसे बन सकता है? या तो नियम चालू हो सकता है, या तो चालू नहीं हो सकता है।” लेकिन ये युवा कहता है नियम चालू भी है और नहीं भी चालू है। आचार्य श्री ने पूछा कि, “डुअल एक्शन कैसे हो सकता है? डुअल एक्शन तो हम करते हैं कि आपको पहले तैयार करेंगे, फिर शक्तिपात करेंगे। डुअल एक्शन तो हमारा होता है।” तो आचार्य श्री ने पूछा— “तेरे पास डुअल एक्शन कैसे आ गया कि नियम चालू भी है और नहीं भी चालू है?”
तब युवान ने जो कहा, आचार्य श्री की आंखें नम हो गईं। आचार्य श्री की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। युवान ने कहा कि— “गुरुदेव! आपसे जब मैंने नियम लिया था, तब मैं सोच रहा था कि मैं कमाऊंगा। नेट प्रॉफिट जो होगा, उसमें से 10% चैरिटी में मैं खर्चूंगा। तीन वर्ष हो गए। अब प्रभु 10% मेरे लेते नहीं हैं। प्रभु इतना बरसते हैं, मेरी कल्पना से भी परे! Beyond the expectation! मैं सालाना 10 लाख कमाता था। लेकिन ये नियम मैंने लिया और मेरी इंकम इतनी बढ़ गई जो कल्पना से बाहर थी। तो आज मैं मानता हूं कि प्रभु उदार हैं कि 90% मुझे देते हैं। मैं प्रभु को 10% देने वाला नहीं हूं। प्रभु मुझे 90% देते हैं! और 90% में भी इतना मिलता है, इतना मिलता है… 10 साल में कमाता था, इतना एक साल में प्रभु मुझे देते हैं। तो अब नियम इस रूप से नहीं चलता है कि मैं प्रभु को दूंगा, मैं प्रभु को देता हूं। अब प्रभु मुझे देते हैं। तो इसलिए मैं कहता हूं कि नियम चालू भी है व्यवहार रूप से, लेकिन निश्चय से मैं मानता हूं कि मैं प्रभु को नहीं देता हूं, प्रभु मुझे देते हैं।”
आज आयंबिल शाला के लिए आपके सामने कितनी सुंदर योजना प्रस्तुत हुई है। आयंबिल का तप, मांगलिक तप! कोई भी मांगलिक क्रिया होगी, हम आयंबिल से शुरुआत करेंगे। चातुर्मास का प्रवेश है, आयंबिल करो। कोई भी मांगलिक कार्य है, आयंबिल करो। आयंबिल भाव मंगल है। तो इस भाव मंगल में आपका सहयोग हो, इसलिए ट्रस्टी गण ने बहुत ही सुंदर योजना प्रस्तुत की है। और आपको क्या देना है? आपको देना नहीं है, आपको लेना है। देना है या लेना है? बोलो। लाभ लेने का है! पैसा देना है, ये तो बहुत छोटी बात है। लाभ लेना है। तो जो भी हमारे पास है, वो हमारा नहीं है, प्रभु का है।
एक घटना मुझे याद आती है। बहुत ही सुंदर घटना है। आप भी सुनोगे, आपकी आंखें नम हो जाएंगी। दादा गुरुदेव भद्रसूरीश्वरजी म.सा. और गुरुदेव ओंकारसूरी दादा का चातुर्मास राजस्थान, सिरोही में निश्चित हुआ। हमारा बड़ा काफिला सिरोही की ओर चातुर्मास के लिए जा रहा था। बीच में एक गांव आया। लोगों को मालूम हुआ कि बड़े आचार्य भगवंत पधार रहे हैं। स्वागत यात्रा हुई। सुबह संक्षिप्त प्रवचन हुआ। फिर दोपहर को तीन बजे भी प्रवचन रखा गया था। लोग बहुत भावुक थे।
दोपहर ढाई बजे होंगे। गुरुदेव आराम करके प्रतिलेखन के लिए तैयार हुए। हम सब प्रतिलेखन करने लगे। प्रतिलेखन हो गया और एक श्रावक जी आए— सिंपल शर्ट, धोती, पगड़ी। वंदन किया और गुरुदेव से कहा कि— “गुरुदेव! मेरी एक अर्ज है।” मैं पास में बैठा था। मुझे लगा कि कोई सामान्य आदमी लगता है और गुरुदेव से कोई मंत्र आदि लेने के लिए आया है। लेकिन जब उन्होंने बात की, तब मैं भी आश्चर्यचकित हो गया।
उस भाई ने कहा कि— “गुरुदेव! दिवाली के समय पर 1000 यात्रियों को लेकर ट्रेन द्वारा सम्मेत शिखर की यात्रा का लाभ मुझे मिला है। यात्रा के पूर्व अष्टान्हिका महोत्सव करना है, शांतिस्नात्र पढ़ाना है, तो आप कुंभ स्थापन का और शांतिस्नात्र का मुहूर्त मुझे दो।” गुरुदेव ने कहा— “अभी तीन बज रहे हैं। व्याख्यान है। व्याख्यान के बाद आप मिलो। मैं मुहूर्त देखकर आपको कह दूंगा।” वे भाई चले गए।
और दूसरे एक भाई आए जो अहमदाबाद रहते थे और इसी गांव के थे। परिचित थे। तो गुरुदेव ने पूछा कि— “ये भाई जो अभी गए, वे कौन थे?” तो इस भाई ने कहा कि— “हमारे गांव की बड़ी से बड़ी पार्टी वो हैं। और 1000 यात्रियों को सम्मेत शिखर की यात्रा करवाने वाले हैं। और यात्रा के पूर्व हमारे जितने गांव हैं और गांव में हमारे जितने घर हैं, घर-घर पर चांदी के बर्तन का सेट उनकी ओर से भेंट दिया जाएगा। और हजार यात्री जो आएंगे, उन सबको अष्टप्रकारी पूजा का चांदी का सेट भेंट देंगे।” उस समय, 50 साल पहले की बात है। 10 करोड़ तो शायद खर्च हुए होंगे।
व्याख्यान के बाद वे भाई आए। गुरुदेव ने मुहूर्त दिया। फिर उस भाई ने कहा— “गुरुदेव! मैं मेरे संबंधियों को तो ले जा रहा हूं। लेकिन जितने भी मुमुक्षु आपके पास हों या अन्य गुरुदेव के पास हों, 100-200 मुमुक्षु हों तो भी कोई दिक्कत नहीं है। मुझे लाभ मिलेगा, आप सिर्फ नाम और टेलीफोन नंबर दे दो, फिर मेरा काम। और मुमुक्षु ही नहीं, जो भी ऐसे साधर्मिक हों जो अपने द्रव्य से यात्रा नहीं कर सकते, उनके भी टेलीफोन नंबर आप दे सकते हैं, तो मुझे आनंद होगा। तो मेरे साधर्मिकों को मैं यात्रा करवाऊंगा। ये तो मेरे संबंधी हैं, हजार, 1200, 1300, 1500 होंगे तो भी क्या है? दो डिब्बे और जोड़ देंगे हम।”
फिर मुझे याद है कि जितने भी साधर्मिकों के, मुमुक्षुओं के नाम-नंबर हमने दिए, वे भाई पीछे लग गए। एक साधर्मिक ने कहा था बाद में कि— “साहब! उनका फोन आया कि आपको सम्मेत शिखर यात्रा में सपरिवार आना है। हम तो आश्चर्य में पड़ गए। हमने कहा, कैसे आप आमंत्रण देते हो हमें? तो उन्होंने कहा कि गुरुदेव ने आपका नंबर दिया है। तो फिर हमने कहा कि भाई, मुझे तो अभी सुविधा नहीं है। अभी मैं नहीं आ सकता हूं। लेकिन वे इतने पीछे लग गए— ‘नहीं, तुम्हें आना ही पड़ेगा। तुम्हें क्या तकलीफ है वो बोलो। तुम्हारा बिजनेस 15 दिन तक अटक जाएगा? तो बिजनेस अटक जाएगा, उसके जो पैसे हैं वो मैं दे दूंगा। लेकिन तुम्हें आना ही पड़ेगा।'”
तो ये क्या बात थी? कपड़े उन्होंने बिल्कुल सिंपल पहने थे। सोने के गहने एक भी पहने नहीं थे। क्योंकि नियम था कि जब तक सम्मेत शिखर की यात्रा करवाऊं नहीं, तब तक सोने का गहना नहीं पहनूंगा। एक ही बात थी— प्रभु की कृपा से ये संपत्ति मिली है, और प्रभु की भक्ति में यह संपत्ति मुझे देनी है।
आप सब वेलसेट हैं, मजे में हैं। साता पूछूं ना? साता में हो ना? पूजा वाले सब साता में हैं ना? बोलो। (શ્રાવકો: હા જી, સાતામાં છીએ.) बोलो तो, देव-गुरु पसाय तो बोलो! कि लक्ष्मीजी पसाय बोलेंगे? लेकिन एक बात समझना, लक्ष्मीजी की कृपा भी तभी उतरती है, जब देव-गुरु-धर्म की कृपा होती है। हमारा पुण्य अनुकूल है, तो लक्ष्मीजी हमारे पास हैं। मैंने एक दिन व्याख्या की थी कि लक्ष्मी क्या है और पैसे क्या हैं? तुम्हारे पास हैं और समाज के लिए, संघ के लिए, राष्ट्र के लिए जो संपत्ति काम में आए, वो लक्ष्मी है। और तुम्हारे पास जो पैसे हैं, तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के काम में आते हैं, वे पैसे हैं। प्रभु शासन मिला है, तो आपको लक्ष्मीजी मिली है और आपके पास जो है, वो आप दान देने में ही खर्च कर रहे हैं।
बाकी जिसको प्रभु शासन नहीं मिला है, उनकी हालत क्या होती है मालूम है? 2BHK का अपार्टमेंट होगा। फ्लैट। एक ही बच्चा है। एक बेडरूम उसका, एक बेडरूम आपका। लेकिन नहीं, 4BHK का फ्लैट चाहिए, 5BHK का चाहिए, बंगलो चाहिए। किसके लिए? तुम्हारे लिए या सोसाइटी के लिए? बोलो। तुम्हारे लिए तो 2BHKका, 3BHK का फ्लैट पर्याप्त था। ये 5BHK का फ्लैट है, वो सोसाइटी को दिखाने के लिए। सोसाइटी को रहने के लिए नहीं। ठीक है? सोसाइटी को दिखाने के लिए… दिखाने के लिए? ‘मेरे पास है देखो तुम! जलो ईर्ष्या से!’
एक भाई ऑफिस से साढ़े बारह बजे घर भोजन के लिए आया। ऑफिस और घर नजदीक थे। लग्जुरियस अपार्टमेंट में वे लोग रहते थे। ऐसा अपार्टमेंट जहां डस्टबिन तो हर जगह पर लगे हुए हैं। सीढ़ियों में, बालकनी में, कहीं भी रजकण नहीं मिलता। लेकिन वो अपने फ्लैट के पास आया। फ्लैट के दरवाजे पर आम की गुठलियां, आम के छिलके बाहर, मक्खियां बिनबिनाती थीं। उसका तो टेंपरेचर बढ़ गया। “मेरे घर के सामने, मेरे घर के बाहर ये आम के छिलके किसने डाले?” लेकिन अच्छा हुआ कि पहले जरा घर में जाकर पूछ लूं। घर में गया, श्राविका से पूछा कि— “आम के छिलके किसने डाले हैं हमारे घर के बाहर?” उसने कहा— “मैंने डाले हैं।” “अरे! तुझे इतना ख्याल नहीं आता है? इतने लग्जुरियस अपार्टमेंट में हम रहते हैं, जहां डस्टबिन हर जगह पर है। डस्टबिन में डालो! बाहर खुले में तुम डालते हो?” तो वो कहती है— “तुम ऑफिस के मामले में होशियार हो। घर के मामले में तुम होशियार नहीं हो। आपको तो क्या सर्टिफिकेट मिलता है मुझे ख्याल है.. और फिर भी आप हमारे पास नहीं आते दीक्षा के लिए, मुझे आश्चर्य लगता है। कैसा-कैसा सर्टिफिकेट मिलता है! जाहर में तो बोला भी ना जाए!”
तो श्राविका ने कहा— “आज पहली बार आम अपने घर पर आए हैं। हम रस-पूरी खाने वाले हैं। तो दूसरों को मालूम क्या होगा? तुम रस पियोगे, दूसरों को छिलके दोगे?” लेकिन यह तो दूसरों की बात है। आपकी बात तो क्या होती है मालूम है? आप घर पर आम लेकर आएंगे। पहले तो मंदिर लेकर जाएंगे। प्रभु के सामने फल के रूप में धरेंगे। फिर रस निकाला है। और 48 मिनट हो गए हैं। फ्रिज में नहीं है। महाराज साहब गोचरी के लिए आए और महाराज साहब कृपा करके वोहरे, तो दूसरे नंबर पर महाराज साहब। पहले नंबर पर प्रभु, दूसरे नंबर पर महाराज साहब, तीसरे नंबर पर तुम्हारे अपार्टमेंट में रहने वाले साधर्मिक। ठीक है? और चौथे नंबर ऊपर तुम!
मैं प्रवचन में कह रहा था, एक भाई मेरे सामने हंस रहा था। मैंने कहा— “ठीक है?” उसने कहा— “हां महाराज साहब! आपने कहा वैसा ही है।” मैंने पूछा— “कैसे?” तो उसने कहा— “मेरे घर पर जो हैं महाराज साहब! मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, वो साधर्मिक ही हैं या नहीं? जैन धर्म को पाले वो साधर्मिक!”
लेकिन, ये नंबर बहुत अच्छे हैं। पहले नंबर पर प्रभु, दूसरे नंबर पर सद्गुरु, तीसरे नंबर पर साधर्मिक और चौथे नंबर ऊपर तुम। अब ठीक है ना? इस साल तो आम की गई ऋतु, अब अगले साल आएगी। ख्याल रखना हो! तीसरा नंबर भूल ना जाना। दो नंबर नहीं भूलेंगे, और चौथा तो भूलने वाले हैं ही नहीं। तीसरा नंबर भूल जाते हैं, वो नहीं भूलना है।
तो साधना प्रभु देते हैं, साधना का आनंद भी प्रभु देते हैं। बस, प्रभु से यही मांगना है कि— “साधना आपने दी है, साधना का आनंद भी हमें दें।”
