साधना का आनंद
परमआर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा था कि, “प्रभु! तूने मुझे साधना दी है, मैं बहुत-बहुत तेरा ऋणी हूँ। अब साधना का आनंद भी तुझे देना है। सिर्फ साधना देने से नहीं चल पाएगा, साधना का दिव्य आनंद भी प्रभु तुझे देना है।”
प्रभु तैयार हैं। जब हम तैयार हो जाते हैं, साधना का दिव्य आनंद हमें मिल जाता है। एक घटना मुझे याद आती है। तीन वर्ष पहले शाहपुर ‘भुवनभानु मानस मंदिरम्’ तीर्थ में उपधान था। प्रवेश के अगले दिन मुंबई से एक भक्त आया था। मेरे पास वह बैठा। उसने मुझे कहा कि, “गुरुदेव! स्वाध्याय की धारा मेरे पास है। घंटों तक स्वाध्याय और अनुप्रेक्षा मैं कर सकता हूँ। लेकिन क्रिया मार्ग का अभ्यास मेरे पास नहीं है। और उपधान में तो क्रिया बहुत होती है, तो उपधान मेरे लिए कैसा रहेगा?”
मैं तो प्रभु पर निर्भर हूँ। यशोविजय नाम की घटना ही नहीं है। तो यशोविजय क्या बोलेगा? और यशोविजय क्या करेगा? मैंने कहा, “प्रभु तुम्हें मुंबई से यहां लेकर आए हैं, तो वे प्रभु ही क्रिया मार्ग में तुम्हें जोड़ देंगे। मुंबई से तुम आए नहीं, प्रभु तुम्हें लाए हैं। और प्रभु तुम्हें लाए हैं तो जिम्मेदारी प्रभु की है। ना मुझे कुछ करना है, ना तुम्हें कुछ करना है, जो भी करना है वो प्रभु को करना है!”
बहुत मजा आता है! जब से मैं प्रभु पर निर्भर हो गया, मैं निर्भार हो गया। यशोविजय को प्रभु ने Tension free बना दिया है। stress free! आज के युग को मनोवैज्ञानिक stress युग कहते हैं… The stress age! आप stress age में रहते हो। लेकिन, प्रभु का कर्तृत्व यदि आपने स्वीकार कर लिया, फिर आप निर्भार हो गए। आप tension free हो गए, stress free हो गए।
वे भाई उपधान में दाखिल हो गए। एक सप्ताह बाद, एक दोपहर को मेरे पास में आए। चरोवले से ज़मीनकी प्रमार्जना की, कटरासण बिछाया, विधिपूर्वक वंदन किया और वे बैठे। आंखों में आंसू थे।
मैंने पूछा, “क्यों? आंसू हैं?”
तब उन्होंने जो कहा, शायद आपको मन हो जाएगा कि “मैं भी शाहपुरमें उपधान करने के लिए चला जाऊं!” उस साधक ने कहा कि, “गुरुदेव! आपने पहले दिन ही ईर्या समिति की बात कही थी, कि ईर्या समिति का पालन तुम करोगे, तो प्रभु की आज्ञा का पालन होगा, दृष्टि संयम होगा, और निर्विकल्पता प्राप्त होगी। मैं यूं भी साधक हूँ और निर्विकल्प दशा का अभ्यास मुझे घना चाहिए ही था। आपने बतलाया कि ईर्या समिति के अभ्यास से निर्विकल्प दशा का अभ्यास होता है, तब मैंने ईर्या समिति को घोंटने का शुरू किया।”
“और गुरुदेव, आज हालात ऐसे हैं कि मेरी धर्मशाला के रूम से मैं तलहटी के मंदिर की ओर जाता हूँ, तो मंदिर जाते समय मुझे 20 मिनट लगते हैं।”
मैंने कहा, “20 मिनट? 8 मिनट का तो रास्ता है, 20 मिनट कैसे?”
तब उन्होंने कहा कि, “गुरुदेव! मैं चलता हूँ ईर्या समिति से, आंखों को नीचे ढाल कर जयणा पूर्वक मैं चलता हूँ। लेकिन 25-50 कदम चलता हूँ और मेरी आंखों से आंसू बहते हैं कि, ‘वाह मेरे प्रभु ने कैसा सुंदर इस समिति का मार्ग बताया!’ मेरी आंखों से आंसू बहते हैं, हर्ष के आंसू! अब आंखों में आंसू हैं, मार्ग दिखेगा नहीं, तो फिर कैसे चला जाए? मैं खड़ा रहता हूँ। napkin से आंखें पोंछता हूँ और आंख स्वस्थ होने पर चलता हूँ। फिर 20, 30, 40 कदम गया, फिर आंखों से आंसू बहने लगते हैं। फिर खड़ा हो जाऊंगा, फिर napkin से आंखें पोंछूंगा। ऐसे करते-करते 20 मिनट में मैं तलहटी के मंदिर पर पहुंचता हूँ।”
साधना का ये आनंद! 10-20 कदम तुम चलो और प्रभु के ऋण से तुम्हारी आंखें आंसुओं से भर आएं कि ‘मेरे प्रभु ने कैसा सुंदर मार्ग बताया है!’ तो कुमारपाल महाराजा ने प्रभु के पास सिर्फ साधना नहीं मांगी है, साधना का आनंद मांगा है। आपके पास साधना है, साधना का आनंद कितना है? एक चाय का शौकीन आदमी टेस्टी चाय पिएगा। चाय पीने में दो मिनट लगेंगे। धीरे-धीरे चुस्की लगाकर पिएगा, तो भी दो मिनट लगेंगे। लेकिन आधे घंटे तक एक नशा रहेगा, कैफ, “चाय सुंदर थी, मजा आ गया!” सामायिक पार लेंगे, फिर कितना समय सामायिक का आनंद रहेगा? के कटासना में पैक कर देंगे आनंद को!
अपने वहां अनुष्ठान तो बहुत हैं… छ’री पालित संघ, सामूहिक अठ्ठम तप की आराधना, दूसरी भी आराधनाएं हैं। लेकिन उपधान तप की आराधना सिरमोर आराधना है। सिरमोर इस संदर्भ में है कि 47 days तक हमारा जैसा बन जाए।
मैं आपसे पूछूं ना ‘आप साता में?’ कि ‘हम साता में’, बोलो! बोलो, साता में कौन? हम कि आप? आप हमारी साता पूछते हो, मुझे तो लगता है कि मुझे आपकी साता पूछनी चाहिए! साता में हो सब? चाय पी के आए हो ना? उतावल नहीं है ना? Saturday है आज तो। तो चाय पी के आए हो, नाश्ता करके आए हो, साता में हैं ना?
हम साता में क्यों हैं? आपको राज़ बताऊं – हम साता में इसलिए हैं कि हमारा एक-एक क्षण प्रभु पर निर्भर है। ऐसा एक क्षण हमारे जीवन में नहीं है, जिस पर प्रभु का signature ना हो। हमारे जीवन के एक-एक क्षण पर प्रभु का signature होता है।
और आप लोग हमें vvip treatment देते हैं। आपका क्या भाव है! हमारे सब मुनिराज कहते हैं, जो वहोरने के लिए जाते हैं कि, “साहब, पुणे वाले भी कम नहीं हैं! भाव यात्रा में पुणे वाले भी बहुत आगे हैं।”
10 दिन यहां रहे, बहुत मजा आया। आपके साथ मिलने का भी एक मजा आता है। ऐसे तो हम बैठे हुए होते हैं, आप इक्के-दुक्के आते हैं, लेकिन 1000 भक्तों को एक साथ मिलने का, तो ये भी एक आनंद होता है।
पूज्यपाद दौलतसागरसूरी महाराज साहब के शिष्य रत्न, हर्षसागरसूरी महाराज द्वारा संस्थापित ‘देवसूर महासंघ’ के तत्वावधान में 10 दिन की वाचना श्रेणी आयोजित हुई। आप लोगों ने बहुत ही लाभ लिया है।
और अब हम कल नंदू भवन जाएंगे, और परसों से हमारा जहां-जहां मुनिराजों का, आचार्य भगवंतों का चातुर्मास प्रवेश है, वहां जाने का होगा। और 12 तारीख को हम गोड़ीजी में प्रवेश करेंगे। तो आप सबको आमंत्रण है। हमें तो विहार करने का होता है, आपको तो विहार नहीं होता है ना, बाइक लगाई और सीधे पहुंच गए!
और यूं भी आप पुणे वाले चिंतामणि दादा के, गोड़ीजी दादा के भक्त हैं, सब वहां दर्शन करने के लिए आते ही हैं। तो आपके लिए ऐसा समय रखेंगे सुबह का कि आपका schedule जो है वो यहां का भी ठीक रहे, वहां का भी ठीक रहे। आप वहां भी प्रवचन सुन सको और यहां आपके संघों में जो प्रवचन धारा चलती है, वहां भी आप लाभ ले सको, ऐसा समय भी रखेंगे। तो 10 दिन आपने जिनवाणी का श्रवण किया। और एक ही बात पर 10 दिन वाचना श्रेणी हुई कि ‘साधना का आनंद प्रभु से हमें चाहिए।’
आज भाग्यशाली परिवार गोरेगांव मुंबई से आए हुए हैं। उनको शाहपुर भुवनभानु मानस मंदिरम तीर्थ में उपधान, चातुर्मास के बाद तुरंत कराने का है, इसका मुहूर्त देने का है। मुहूर्त स्वीकार के पश्चात भाग्यशाली परिवार भी विनती करेंगे कि आप सब उपधान आराधना में पधारो। लेकिन हम भी पहले से आपको निमंत्रण देते हैं। अरे आपको समय कम हो, 18 दिन के लिए आ जाओ, अढारिया कर लो। 18 दिन के उपधान आप कर लेते हैं, तो नमस्कार महामंत्र आपका certified recognized हो जाता है। आपको नवकार मंत्र दिया गया है, लेकिन conditionally दिया गया है। और condition यही है कि जब भी आपकी शक्ति हो, तब आप 18 दिन का उपधान तो कर ही लो। तो अभी मुहूर्त हम दे रहे हैं, बाद में वे लोग विनती करेंगे।
10 दिन यहां कोंढवा में रहने का हुआ। आप लोग कोंढवा में ज्यादा संख्या में रहते हो। और आपकी विनती भी है, लेकिन वो तो चिराग भाई के हाथ में है! अब हमसे विनती नहीं करने की, चिराग भाई से विनती करना।
